कला- जगत में लगभग बिसरा दी गयी शिल्पकार हिमा कौल पर राजाराम भादू ने पूरी किताब लिखी है जिसमें उनके कलात्मक विकास और वैयक्तिक संघर्ष का संवेदनशील और जीवंत चित्रण किया है। अपराजित: शिल्पकार हिमा कौल शीर्षक यह पुस्तक रजा फैलोशिप के अन्तर्गत लिखी गयी थी। कला- मर्मज्ञ हेमंत शेष ने इस पर बड़ी गहराई से लिखा है। अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन समीक्षक : हेमंत शेष अपराजित : शिल्पकार हिमा कौल एक नियमित जीवनी से कहीं अधिक है; यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का एक कार्य है। राजाराम भादू ने ऐतिहासिक उपेक्षा की छाया से एक उग्र, संवेदनशील कलात्मक विरासत को सफलतापूर्वक बाहर निकाला है। कला-इतिहासकारों, आलोचकों और आधुनिक भारतीय दृश्य संस्कृति में रुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए, यह पुस्तक एक ऐसी कलाकार का एक प्रभावशाली प्रमाण है, जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को स्थायी मूर्त रूप में बदल दिया। भारतीय कला-इतिहास और आलोचनात्मक साहित्य में, कई परिवर्तनकारी आवाज़ें अक्सर दुखद गुमनामी में चली गई हैं, जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श से बाहर कर दिया गया। दिवंगत मूर्तिकार हिमा कौल ऐसी ही एक गहन, फिर भी कम प्रलेखित उपस्थिति का ...
पूर्वकथन : लीलाधर मंडलोई ने वर्तमान साहित्य के शताब्दी कविता विशेषांक ( मई- जून,२०००) का संपादन किया था। इसमें शताब्दी की कुछ चुनी हुई कविताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ व लेख हैं जो अलग- अलग लोगों से लिखवाये गये थे। मैं ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेडिया श्रृंखला पर लिखा था। इसे उलटते- पलटते लगा कि यह आज तो और भी मौजूं है। भगतसिंह की जेल में लिखी डायरी- ए मार्टायर्स नोटबुक ( इंडियन बुक क्रानिकल) का हिन्दी अनुवाद आ चुका है- शहीदे- आजम की जेल नोटबुक ( परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ)। इसमें भगतसिंह द्वारा मूल पृष्ठ ३९ में तिरछे लिखी ये पंक्तियां उद्धृत हैं- महान इसलिए महान हैं क्योंकि हम घुटनों पर हैं आओ उठ खडे हों। पंक्तियों के लेखक का नाम नहीं है, बहुत संभव है ये स्वयं भगतसिंह की लिखी हों। सर्वेश्वर की इन कविताओं को पढते हुए मुझे लगता है, ये महानता के विरुद्ध साधारण जनों को उठ खडे होने के लिए आह्वान करती कविताएँ हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी काव्य- यात्रा सोच के जिस धरातल से शुरू की थी, बाद में वे लगभग उसके विपरीत छोर पर छोर पर पहुँच गये थे। यहां वे आततायी शक्तियों के प्रतिपक्...