सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वास्तविकता में विन्यस्त कविताएँ - मंजुला बिष्ट

समीक्षा
विशाखा मुलमुले की कविताएँ समालोचन से लेकर कई जगहों से प्रकाशित हुई हैं जिनमें मीमांसा भी शामिल है। उन्हे सर्वत्र लक्षित किया गया। बोधि प्रकाशन ने प्रतिष्ठित दीपक अरोड़ा पाण्डुलिपि प्रकाशन योजना में उनके पहले संकलन का चयन कर इसे प्रकाशित किया है। कवि- कहानीकार मंजुला बिष्ट द्वारा  लिखी गयी यह समीक्षा शायद पहली है जिससे विशाखा की कविताओं पर समीक्षा- संवाद शुरू होने जा रहा है।


विशाखा मुलमुले का कविता-संग्रह"पानी का पुल"बोधि प्रकाशन,जयपुर द्वारा आयोजित 'दीपक -अरोड़ा पांडुलिपि प्रकाशन योजना"के तहत चयनित है।संग्रह में कुल 71 कविताएँ हैं,जिनके बारे में निर्णायक मंडल की व्यक्तिगत टीप भी किताब में दर्ज है।कवि दीपक अरोड़ा की स्मृति में नए कलमकारों को सम्मान दिए जाने के इस साहित्यिक प्रयास हेतु बोधि प्रकाशन व मायामृग जी अवश्य ही बधाई के पात्र है।
  जैसा कि हर कवि की अपनी भावभूमि होती है और उसके ऊपर गहराता उसका अपना मन-आकाश,इस संग्रह में भी यह कविमन अपने सुगठित व्यवहारिक ताने-बाने के साथ प्रस्तुत होता है।विशाखा की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि उन्हें अपनी बात कहने का असीम धैर्य है,जिसे वे बेहद तार्किक तरीक़े से लोक में आवाजाही कराती है।संग्रह में यह आवाजाही वैविध्य विषयों की गहन पड़ताल करती है।व्यक्तिगत तौर पर कलमकार के अनुभूत सुख-दुःख..जब लोक से सम्पर्क करता है,सामंजस्य साधता है तो यह देखना दिलचस्प होता है कि कलमकार के भीतर यह प्रक्रिया किस हद तलक व किस तरीके से घटित हुई है..संवर्धित हुई है,यही रचना की ग्राह्यशीलता बनाती है।और रचना की ग्राह्यशीलता ..हर पाठक के भीतर उसकी व्यक्तिगत सामर्थ्य-रुचि पर निर्भर करती है।
  विशाखा की कविताओं में लोक से हुई उसकी अनुभूतियों का लेन-देन ..शाइस्तगी लेक़िन मजबूती से दर्ज हुई है ।कविता'गिरफ़्त' में वे अपने समय को शंकालु ,संकोची,कटीला,निष्ठुर और यहाँ तलक कि हमलावर रूप में भी देख रही है..जिसकी गिरफ्त में आज हर संवेदनशील मनुष्य है।

"इस निष्ठुर समय में
अन्नदाता के समर्थन में
बापू के देश में
जीभ की परतंत्रता में
एक रोज़ का भी उपवास साध न सकी"


"रोटी,रेणु और मैं''कविता में रोटी बनाती हुई गृह-स्वामिनी व झाडू बुहारती सहयोगिनी के बीच जो तानाबाना बुनता है..उसे अंत की जाते देखना सुखद है,उम्मीद है।
वहीं,रोटी..को केंद्रबिंदु बनाकर लिखी गई अन्य कविता"वजूद" में अंत अवाक कर जाता है।जीवन मे महज रोटी कमाने में स्वयं की चाहनाओं ,दमित सपनों की तिलांजलि देते मनुष्य का अंत मार्मिक है।इन दोनों कविताओं में आत्मा के झरोखों से 'रोटी 'को बिम्ब बनाकर ..जगत को देखने-समझने की प्रक्रिया में कवि मन की विवशता महसूस होती है।दोनों कविताओं के आसपास रहने पर महसूस होता है जैसे,सुख पकड़ते हुए मुट्ठी से छूट गया..और दुःख न चाहकर भी अंगुली थाम रहा हो।
संग्रह में स्त्री-मन,स्त्री की दुनिया..में झांकती कुछ बहुत सुंदर कविताएँ हैं जो स्वाभाविक है भी।"नदी के तीरे" कविता में किशोरवय बेटे के असमंजस पर मरहम रखती,समझाती हुई माँ ...

"मैं कहती हूँ , पिता है पर्वत समान 
जो खाते है बाहरी थपेड़े 
रहते हैं मौन गम्भीर 
देते हैं तुम्हें धीर

मैं उस पर्वत की बंकिम नदी 
टटोलती हूँ तुम्हारे समस्त भूभाग 
आजकल की नहीं यह बात 
इतिहास में है वर्णित 
सभ्यताएं पनपती है नदी के तीरे !"

एक कविता है जिसे पढ़कर पाठक मुस्कराते हुए अचानक चुप हो सकते हैं।" गधापच्चीसी" कविता में कवि जब घोड़े व गधे के जीवन और उनके कार्य-व्यवहार पर नजर रखती है तो अहसास होने लगता है कि यह दरअसल सदियों से चले आ रहे स्वभाव के आधार पर बरते जा रहे भेदभाव पर प्रहार है।समाज में जोर से चिल्लाती आवाज़ें,समयानुसार बदलती मानसिकता ही अवसर पाती है..किसी नियत रास्ते पर चलते लकीर के फकीर नहीं।यह कविता बहुत धीमी आहट से दिलोदिमाग में प्रवेश कर वर्षों से लगी सांखल को खटखटा जाती है।शानदार कविता है यह,प्रभावी शिल्प के साथ

"गधों ने स्वीकार किया गधा होना 
तो वह ढोता रहा माल - असबाब , आदेश 
घोड़ा रहा चालाक 
सीखता गया नित नई चाल 
ठुमक , लयबद्ध , तिरछी , कभी मौके पर अढाई घर 
-----
-----
------
उन्हें मालूम है घोड़ों की हिनहिनाहट से गूँजती है वादी
उनकी ठसक पर निहाल होती बहुसंख्यक आबादी 
बोझ तो आखिर में उन्हें ही ढोना है 
गधा तो आरम्भ से उन्हें ही होना है ।"

  एक शब्द पूरी कविता का केंद्र-बिंदु बनकर अपने पूरे प्रभाव में मौजूद रह सकता है ,यह कविता" पीछे" पढ़कर जाना जा सकता है।कलम यहाँ भी भावातिरेक में लंबे-गहरे व्याख्यान नहीं देकर सुगठित-सुचिंतित पंक्तियों के जरिये अपने उद्देश्य को पाती दिखती है,जो विशाखा की कलम की विशेषता भी है।यह कविता कवि के जीवन-मीमांसा की एक झलक प्रस्तुत करती है।
   कोरोना महामारी के इस समय में 'संक्रमण -काल' किसी वायरस से उपजे नैराश्य,अवसाद संताप व हाहाकार को नहीं बताती है,वरन यह कविता मानवीय रिश्तों में घुसपैठ कर चुकी शीतलता का  रिपोर्ट-कार्ड दिखाती है।यह एक पठनीय कविता है।
संग्रह में एक अति महत्वपूर्ण कविता बार-बार मेरा ध्यान खींचती है.."और स्वतंत्रता फिर हाथ से निकल गई"।यह कविता पाठक से धैर्य व समय की मांग करती है..स्त्री-स्वतन्त्रता जो देश को स्वंतत्रता मिलने के इतने वर्षों बाद भी सिर उठाकर किसी सहयोग की आशा में मुँह छिपा रही है।यह कविता भीतर धँसती है..बेचैनी पैदा करती है।यहाँ कवि बदलते समय के तेवर पर नहीं बल्कि स्त्री देह के स्वयं के भीतर सिमटने पर सजग निगरानी रखती है..जो प्रभावित करता है।यहाँ कलम आधुनिक-शिक्षित स्त्री को कच्छप गति से मिल रही सुविधाओं/सुरक्षा के लिए एक आवश्यक गम्भीर विमर्श की सम्भावना दिखाती है।

"परतंत्रता हमारे गुणसूत्रों में क्या कुंडली मार पैठ गई 
जबकि , जब बापू चल रहे थे लाठी टेक 
नमक सत्याग्रह का था वह समय 
हम दौड़ रहीं थी पीछे ख़ून का नमक किये 
बापू की लाठी न होने पर , बनी हम लाठी , दिया अपना कंधा 
एक दिन भाग ही गए विदेशी देश छोड़ 
बच्चे , बूढे , जवान सबको मिली स्वतंत्रता 
मवेशी , हवा , पंछी तो पहले ही थे स्वतंत्र 

हम भारत माता की जय में अटक गईं
हम सोने की चारदीवारी में देवी 
मिट्टी की चारदीवारी में बनी रहीं भोग्या 
चारों खानों से चित्त हुईं हम 
अचानक ही कच्छपों में बदलने लगी 
समेटने लगी ख़ुद को अपनी ही देह में 
और स्वतंत्रता दाएँ - बाएँ से गुज़र गई"

"पानी पर पुल" शीर्षक कविता प्रेमिल कविताओं की कोमल लेकिन सशक्त भावनाओं का संधिस्थल है।प्रेम से बावस्ता हो चुके मन से बेहतर कौन जानता -समझता होगा कि प्रेम में" अनिद्रा" का कितना मोल होता है!कविता में प्रेम की उनींदी तरंगों की छुवन महसूस होती है..

"तुम्हारे प्रेम में संक्रमित हो चुका जीवन 
आज अर्धरात्रि तुम्हारी निद्रा का संक्रमण चाह रहा
  - --
  - ----
शिशु के समीप से आती है जैसे दुग्ध की सुगन्ध 
तुम्हारे सामिप्य में मुझे मिलती गहन निद्रा की गंध 
अनिद्रा में गिनती हूँ तुम्हारे हृदय का एक - एक स्पंदन 
और रैन बीतते न बीतते  मेरे नैन लग जाते हैं ।"

 आज के मौजूद राजैनतिक-आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य में,सुव्यवस्था और आम आदमी जैसे दो विपरीत ध्रुव सिद्ध हैं।"आंकड़ा"कविता सीधी-सपाट भाषा में लेक़िन,विचारणीय प्रश्न करती है..इसे पढ़ते हुए कवि के सामाजिक सरोकारों के प्रति जिम्मेदारी को समझा जा सकता है,यही साहित्य के मुख्य उद्देश्यों में से एक है।मौजूद राजनीतिक-सामाजिक उठापटक और जनपक्षधरता की हिमायत करती हुई यह एक सशक्त सृजन है..जिसे पढ़ते हुए बिसराए हुए किसी अख़बार की सुर्खियों पर ध्यान जाने लगता है।

 "पार्षद के चुनाव में दो सौ 
विधायक के चुनाव में पांच सौ 
थोड़े और बड़े चुनाव में 
उसका अंगूठा हजार तक में बिका 

इस तरह अठारह से साठ की उम्र तक 
पहुँचते - पहुँचते 
गर जीवित रहता तो
तकरीबन जमा लेता वह बीस हजार रुपये"

'उसके जाने के बाद' कविता नागर जीवन में किरायेदार के चले जाने के बाद पसरे निचाट सन्नाटे के बहाने मानवीय सम्बन्धों पर बहुत सुंदर कविता है ।कविता में चली आई इन सहज अभिव्यक्ति इंसानी रिश्तों में उपस्थित सीमित व्यवहार की ओर कचोट पैदा करती है..अनमने से उद्वेग जैसे अन्तर्मन को टीस देती चली जाती है,विदाई से उपजे नैराश्य को पुकारती है।

"जब घर हरा भरा था 
तब उसकी एक चाबी मेरे पास रहा करती थी 
आज जब घर खाली है 
तब उस घर की सारी चाबियां मेरे पास है---
----
----
घर से नहीं घरवालों से मेरा सम्बंध था 
उनके स्थानांतरण के बाद
चाबियां होकर भी 
उस घर का दरवाजा मेरे लिए बंद था "

 विशाखा एक ही शब्द/भाव के ज़रिए अचानक ही अन्य लोक में ले जाकर जब छोड़ देती है तो एक पाठक के तौर पर देखना दिलचस्प होता है कि कोई भी शब्द/भाव ...अपने साथ एक विहंगम दृश्य लेकर उपस्थित हो सकता है।संग्रह में यदि पहली कविता में कोई किरायेदार स्थानांतरण होकर स्थान छोड़कर चला गया तो दूसरी कविता" किरायेदार"में पिता-पुत्र के मध्य सँवाद के जरिये देह को 'किराए की'कहा गया है वह कवि की आध्यात्म में रुचि व मानवीय जीवन के प्रति संवेदनशील सलंग्नता को बताता है।यह सलंग्नता कविमन के बदलते दृश्य पर थमी नजर को देखते हुए सुखद आश्चर्य भी देती है तो अपने वातावरण के प्रति सजग भी करती है।

"सोच में पड़ गए पिता 
देह भी तो किराए का मकान
जन्मते ही लग जाता है उपनाम 
एक रंग विशेष से जुड़ जाता है नाता 
लगती फिर उसी धर्म की कील 
टंगती उसी की तस्वीर "

 आध्यात्म और आत्मदर्शन की सुवास लिए अन्य कविताएँ..धम्मम शरणम गच्छामि,"तमसो मा ज्योतिर्गमय,और नृत्य हैं।' नृत्य' कविता बेहद ही खूबसुरती से सम्पूर्ण सृष्टि को नृत्यमय होते महसूस कराती है..जिसका समापन इन पंक्तियों पर जब होता है तो मन भीतर से भीजने लगता है..विश्रांति पैठ करने लगती है।नेत्र कुछ अधिक देखने की चाहनाएँ कुछ अधिक देर तलक मुलतवी कर सकते हैं...

"शिव के सम्मुख नृत्य है 

आकाश में नृत्य है ,
सूर्य , चंद्र , आकाशगंगाओं का 
नेपथ्य में भी चलता नृत्य है 
अलौकिक है  , असीम है ,
अनंत है , नृत्य है 

धरा पर भी नृत्य है ,
सूर्य किरणों का नृत्य है 
रज -रज में नृत्य है ,
कण -कण में नृत्य है 
--
----
--

हम भी है नृत्य में 
प्रकृति के हर कृत्य में 
देह के भीतर आत्मा का नृत्य है 
विदेह परमात्मा का नृत्य है 
सर्वत्र है ,
नृत्य है ..."

अपने रचना संसार को लेकर विशाखा की मनन-चिंतन शैली उनकी व्यक्तिगत है,जहाँ वे किसी भी वायवीय संसार में विचरण नहीं करती है न कराती है।उनकी कविताएं वास्तविकता का सन्धान करती है,संताप प्रकट करती है,उम्मीद जगाए रखती हैं और विचारणीय प्रश्न भी छोड़ देती हैं।कहते हैं न कि एक अच्छी कविता न सिर्फ़ स्वयं रची जाती है बल्कि अपने सृजक को भी रचती है और उसकी विचारशीलता का पता देती है।
 विशाखा के इस प्रथम-कविता संग्रह को पढ़ते हुए मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह विश्वास है कि उनके पास बगैर कोई भाषिक चमत्कार पैदा किए वे अपने समय व सच को ध्यान में रखते हुए सार्थक संवाद कायम करने में और व्यवहारिक दृष्टिकोण स्थापित करने में सफल हुई है।इस संसार में जब स्वयं को खोने का खतरा सबसे ज़्यादा होने लगा हो  तो कविताओं के इस व्यवहारिक पक्ष को पढ़ा जाना बेहद ज़रूरी हो जाता है।
 संग्रह में बहुआयामी और बहुसंदर्भी कविताएँ हैं जहाँ विशाखा अपने दृष्टिसम्पन्न और सामर्थ्यवान होने का परिचय देती हैं।विशाखा को प्रथम कविता संग्रह को महत्वपूर्ण प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित होने के लिए हार्दिक बधाई व भविष्य हेतु असीम शुभकामनाएं।मुझे उम्मीद है वे अधिक ऊर्जावान,सजग व संवेदनशील होकर सृजन पथ पर आगे बढ़ेंगी..इसी शुभेच्छा के साथ पुनश्च असीम मंगलकामनाएं।

मंजुला बिष्ट

वर्तमान में उदयपुर (राजस्थान) में निवास कर रही मंजुला बिष्ट की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं , साहित्यिक पोर्टल तथा ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी हैं ।

ईमेल आईडी-bistmanjula123@gmail.com

संपर्क : +91 94146 47315










टिप्पणियाँ

  1. विशाखा की कविताओं पर मंजुला ने बहुत समीचीन समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी है | विशाखा की कवितायें विभिन्न ब्लाग्स और और उनकी पोस्ट्स पर पढ़ता रहा हूँ | "पानी का पुल" के लिये विशाखा को बधाई और समीक्षात्मक टिप्पणी के लिये मंजुला विष्ट को साधुवाद |
    मीमांसा और विशेष रूप से राजाराम भादू को बहुत बहुत धन्यवाद कि नई पीढ़ी के रचनाकारों और अध्येता समीक्षकों को वे मंच उपलब्ध करा रहे हैं |

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सर्वेश्वर की भेडिया और हिंस्र शंक्लें - राजाराम भादू

पूर्वकथन : लीलाधर मंडलोई ने वर्तमान साहित्य के शताब्दी कविता विशेषांक ( मई- जून,२०००) का संपादन किया था। इसमें शताब्दी की कुछ चुनी हुई कविताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ व लेख हैं जो अलग- अलग लोगों से लिखवाये गये थे। मैं ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेडिया श्रृंखला पर लिखा था। इसे उलटते- पलटते लगा कि यह आज तो और भी मौजूं है। भगतसिंह की जेल में लिखी डायरी- ए मार्टायर्स नोटबुक ( इंडियन बुक क्रानिकल) का हिन्दी अनुवाद आ चुका है- शहीदे- आजम की जेल नोटबुक ( परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ)। इसमें भगतसिंह द्वारा मूल पृष्ठ ३९ में तिरछे लिखी ये पंक्तियां उद्धृत हैं- महान इसलिए महान हैं क्योंकि हम घुटनों पर हैं  आओ उठ खडे हों। पंक्तियों के लेखक का नाम नहीं है, बहुत संभव है ये स्वयं भगतसिंह की लिखी हों। सर्वेश्वर की इन कविताओं को पढते हुए मुझे लगता है, ये महानता के विरुद्ध साधारण जनों को उठ खडे होने के लिए आह्वान करती कविताएँ हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी काव्य- यात्रा सोच के जिस धरातल से शुरू की थी, बाद में वे लगभग उसके विपरीत छोर पर छोर पर पहुँच गये थे। यहां वे आततायी शक्तियों के प्रतिपक्...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

हाशिये के समुदाय तीन इतिवृत्त

हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में ब...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...
रंगमंच समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -2                                         राघवेन्द्र रावत  अंग्रेजों के आने के साथ साथ ही पाश्चात्य संस्कृति और साहित्य का प्रभाव भारतीय जनमानस पर पड़ने लगा था | जैसे जैसे औपनिवेशिक काल में औद्योगिक विकास होता गया मध्य वर्ग का उदय हुआ | जिसके पास ऊँचाइयाँ छूने के सपने थे तो असफलता से नीचे जाने का डर भी था | धार्मिक नगरों के रूप में बनारस, उज्जैन हरिद्वार आदि विकसित हुए वहीँ औद्योगिक नगरों के रूप में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास. भिलाई और जमशेदपुर जैसे नगर विकसित होते गए | इन नगरों में गाँव से मजदूर जीविकोपार्जन की तलाश में विस्थापित हुए | वहां उनके लिए जीविका के साथ साथ अपनी संस्कृति, बोली और घर की तलाश एक अहम् मुद्दा बन कर उभर रही थी |  यूरोप में नार्वे के प्रसिद्ध नाटककार हेनरिक इब्सन के नाटकों में यही मध्य वर्ग दिखाया जाने लगा | इब्सन के नाटकों में यथार्थवाद की अवधारणा का उदय हो चुका था | उनके नाटक ‘अ डॉल्स हाउस(1879)’,’घोस्ट्स’ (1881) तथा ‘ए...

गांव की स्मृतियाँ - ज्ञान चंद बागड़ी

भूमंलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों ने गाँव, कृषि और पारंपरिक उद्यमों का भयावह हाशियाकरण किया है। कथाकार ज्ञानचंद बागडी अपनी स्मृतियों के गाँव को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि अतीत का वह गाँव कोई आदर्श था लेकिन जिस तरह बदलाव आया, वह भी सहज नहीं कहा जा सकता। इसी संदर्भ में ये संस्मरण- लेख मीमांसा में प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरा गाँव मेरे लिए दुनिया की सबसे सुंदर जगह है , जहां मेरा बचपन बीता था । गाँव और बचपन की स्मृतियाँ  मुझे रोमांचित कर देती हैं । दिल करता है कि उड़कर गाँव पहुंच जाऊं । यही कारण है कि समय निकालकर वहां जाता रहता हूँ । वहां बिताये हुए कुछ ही दिन मुझे पूरे साल के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं । मेरे लिए गाँव का मतलब है प्रकृति का साथ , खेत-खलिहान ,  जहाँ सुबह आपकी आँख मुर्गे की बांग या किसी पशु के रंभाने से खुले , जहां मोर नाचते हों , झिंगुरों की आवाज सुनी जा सके , रात में एक-एक तारा साफ दिखाई दे , अंधेरे का संगीत और सन्नाटा सुनाई दे , साझी विरासत हो और साझी ही बहन-बेटियां , सहयोग हो , सामाजिकता हो , सादा खाना हो , मोटा पहनावा हो । ऐसा ही तो था मेरा गाँव , सरल औ...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...