सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हाशिये के समुदाय तीन इतिवृत्त



हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं।

ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में बावरी। हालांकि नेमीचंद बोयत उच्च शिक्षा में पढाते रहे हैं, फिर भी शायद अकादमिक जगत उनकी लेखन पद्धति को पूरी तरह इतिहास के संदर्भ में आधिकारिक नहीं माने और उन्हें एक इतिहासकार नहीं स्वीकार करे। इसलिए मैं इन दस्तावेजों को इतिवृत्त कह रहा हूँ जो इतिहास नहीं भी हैं तो इन समुदायों के भावी इतिहास के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। अभी तो इतिहास इन समुदायों को लेकर मौन की स्थिति में है। यहाँ एक और तथ्य उल्लेखनीय है कि नेमीचंद बोयत स्वयं वाल्मीकि समुदाय से आते हैं। जोधपुर से ही वाल्मीकि समुदाय से निकले प्रो. श्यामलाल जाने माने समाजशास्त्री हैं जिन्होंने दशकों पहले अंग्रेजी में न केवल अपनी आत्मकथा लिखी बल्कि वाल्मीकि समुदाय पर समाजशास्त्रीय पक्ष से लिखा है। लेकिन इन किताबों में बोयत ने कहीं उनका कोई संदर्भ इस्तेमाल नहीं किया है। इनकी भूमिकाएं भी अलग विद्वानों ने लिखी हैं जिनमें ख्यात साहित्यकार हेतु भारद्वाज, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ॰ शोभाग माथुर और इसी विश्वविद्यालय के इसी विभाग से सम्बद्ध रहे प्रो. जहूर खां मेहर शामिल हैं। बोयत जी ने बताया है कि अपने सेवा काल में हेतु भारद्वाज के साथ वे एक ही मकान में साथ रह चुके हैं। कहना न होगा कि इन सभी विद्वानों ने उनके काम की भूरि-भूरि प्रशंसा की

चर्चित दलित रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की एक किताब है - सफाई देवता। मुझे मुजफ्फरपुर में एक कार्यक्रम के दौरान वे मिले और बड़े उत्साह के साथ उन्होंने ये किताब मुझे दी। मैं भी इसे पाकर बहुत खुश हुआ क्योंकि वाल्मीकि समुदाय को लेकर मेरे मन में बहुत सवाल घुमडते रहे हैं। लेकिन किताब पढकर मुझे निराशा हुई क्योंकि वाल्मीकि समुदाय के अतीत की खोज के क्रम में उन्होंने डॉ० अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत इतिहास को ही दुहरा दिया जो उन्होंने दलितों के संदर्भ में लिखा है। जबकि वाल्मीकि तो अछूतों में भी अछूत हैं, फिर उनका इतिहास कैसे समान हो सकता है। ये समुदाय देश भर में किंचित भिन्नता, पारस्परिक अन्तर्भेद और अलग- अलग नामों से विश्रृंलित है। इनमें धर्मान्तरण, सामाजिक सुधार और संस्कृतिकरण की प्रक्रियाओं की तो आधिकारिक जानकारी मिलती है लेकिन अतीत को लेकर अभी तक बिल्कुल अंधेरा है। सबाल्टर्न इतिहास के सूत्रधार रणजीत गुहा ने सूर्य व चन्द्र ग्रहण और राहु
केतु के आख्यानों का इस समुदाय की उत्पत्ति से जोडकर कुछ अध्ययन किया है। बोयत जी पौराणिक आख्यानों, देशज इतिहास, जनसंख्या सर्वेक्षण और समुदायों में प्रचलित दंतकथाओं तथा विभिन्न अंचलों में समुदाय की सापेक्षिक स्थिति के आधार पर इनके अतीत को चीन्हने का गंभीर और ईमानदार प्रयास किया है।

राजस्थान में वाल्मीकि समुदाय के अतीत चर्चा करते हुए बोयत एक दिलचस्प बात कहते हैं ... कई शासक जातियों ने प्रायः कई कर्मकर जातियों को अपने- अपने समुदाय में ले लिया और उनसे वो ही काम लेते रहे जो पूर्व से वे करते आ रहे थे। इसी नियम से मेहतर जाति की भी कई शाखाओं को कई क्षत्रिय वंशों ने अपने- अपने गुट में रखकर काम लिया जिससे इस समाज का संबंध क्षत्रिय वर्ग से जुड़ गया और ये भी उन्ही की तरह भैरव- माता पूजने लगे। तात्पर्य यह है कि जैसे भाटों की उत्पत्ति अलग है मगर उनका संबंध कई जातियों से जुड़ा हुआ है, पुरोहित ब्राह्मण हैं, मगर उनका संबंध भी पृथक-पृथक क्षत्रियों से है, उसी प्रकार मेहतरों का भी संबंध क्षत्रियों से है। इसके बाद बोयत जी ने पांच प्रमुख राजपूत समुदायों से सम्बद्ध वाल्मीकि समूहों का बाकायदा विवरण प्रस्तुत किया है जिनके गोत्र राजपूतों से मिलते हैं। पुस्तक में ऐसे अनेक विचारणीय प्रसंग हैं।

घुमक्कड़ समुदाय के अतीत का उत्खनन तो और भी चुनौतीपूर्ण है। सांसी समुदाय के लोग तो सवर्ण हिन्दुओं से अभिन्न हैं। वे हिन्दुओं के सभी त्यौहार मनाते हैं। होली, दीवाली, रक्षाबंधन पर एक-दूसरे से वैसे ही मिलते हैं। नवरात्रि व दशहरा के त्यौहार पर देवी पूजन करते हैं। फिर भी सवर्ण जातियों के साथ दलित जातियाँ भी उनसे दूर रही हैं। अंग्रेजों के शासन में सांसी समुदाय पर बहुत- सी पाबंदियां लगायी गयीं। जब कभी उन्हें कहीं जाना होता तो थाने में सूचना देनी होती थी। उन्हें जरायमपेशा या अपराधी कौम करार दिया गया। उन्हें बाध्य होकर अन्य सभी जातियों के फटे- पुराने कपडों और त्याज्य वस्तुओं पर निर्भर रहना पड़ा। सांसी जाति की भाषा भी अलग थलग पडी भाषाओं में से एक है। इस समुदाय में कुछ लोग सूफी संत रोहिल शाह के अनुयायी हैं।

बाबरी समुदाय की उत्पत्ति को महाभारत के पात्र बर्बरीक के वंश से जोड़कर देखा जाता है। राज मारवाड़ की मरदम शुमारी रिपोर्ट १८९१ ई. में रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह ने इनके बारे में लिखा है कि बाबरी अपने को असल में राजपूत बताते हैं और कहते हैं कि हमारा आदि- वतन गुजरात है। आरम्भ में बाबडी पर रहने के कारण बाबडी वाले कहलाने लगे, फिर बाबडी और आखिर में बाबरी कहलाये। पंजाब में इन लोगों को बाबर यानी जाल लगाकर शिकार पकडने वाले होने के कारण मिस्टर आबिटसन ने इन्हें बाबरी कहा। सौराष्ट्र के इतिहास में भगवानलाल संपतराम ने इनको महाभारत के हवाले से बाबरी लिखा है जो उस समय हस्तिनापुर के पश्चिम में रहते थे। बाबरियों को पंजाब में बाबरिया, मेवाड़ में मोगिया और ढूंढाड में बोहरा भी कहते हैं। इनकी खापे हैं धांधल, मकवाणा, पंवार, चौहान, सोलंखी, भाटी, पडिहार, डाबी, देवडा, चारण और गहलोत वगैरह। ध्यान रहे कि बाबरी और बागरिया समुदायों में कोई आपसी संबंध नहीं है।



सांस्कृतिक अस्मिता और अस्मिता की राजनीति के इस दौर में हर जाति समुदाय अपने इतिहास को जानने का आकांक्षी है। वैसे प्रत्येक समुदाय के लिए अपने अतीत का पुनरावलोकन और वर्तमान का विश्लेषण सशक्तिकरण की प्रक्रिया के लिए
प्रस्थान- बिन्दु है। इस लिहाज से ये पुस्तकें संबंधित समुदायों के लिए तो उपयोगी हैं ही, हाशिये के समुदायों से सरोकार रखने वालों, उनके लिए काम करने वालों और अध्येताओं के भी काम की हैं। इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल तथा इतिहास के झराखे में सांसी नवभारत प्रकाश (, ९ महाराजा दिलीपसिंह कोलोनी, जेडीए के पास ) जोधपुर से प्रकाशित हैं जबकि इतिहास के आइने में बाबरी को राजस्थानी ग्रंथागार (प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट ) जोधपुर ने
प्रकाशित किया है। नेमीचंद बोयत का पुस्तक में उल्लिखित मोबाइल नं.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

कविताएँ : मनमोहन भारती

कविताएँ हम तो उसे मनमोहन भारती के नाम से ही जानते हैं। जिन दिनों मैं मुम्बई महानगर में ( अखबार में भी ) था, मनमोहन भारती और केसर सिंह बिष्ट दो युवा और साहसी रिपोर्टर थे। उन्होंने ही रातों की यात्राओं में मेरी बम्बई से कुछ पहचान करायी। बाद में धीर गंभीर प्रणव प्रियदर्शी इस टीम में आये। वापस आने पर भी मुझे महानगर के हालचाल मिलते रहे। इनमें मनमोहन किसी किस्से कहानियों का उदात्त चरित्र लगता है। जैसे लंबे संकोच के बाद प्रणव ने अपनी कहानियों के बारे में बताया। वे मीमांसा में और फिर दूसरी जगह आयीं और सराही गयीं। मनमोहन तो जितने साहसी हैं, उतने ही विनम्र और शर्मीले। उसने भी अपने भीतर एक कवि को जज्ब किया हुआ था। हमें खुशी है कि वह भी मीमांसा के जरिए बाहर आ रहा है। कविता कुछ लंबा रियाज चाहती है। आप इन्हें एक सच्चे, जज्बाती किन्तु निर्भय व्यक्ति के अंतस की शक्ति के रूप में भी पढ सकते हैं।               - राजाराम भादू 1. अंधेरों से हिस्से करने लगा हूं मैं जिंदगी तुम ही से डरने लगा हूं मैं अंधेरों में ही उजाले नजर आने लगे हैं अंधेरों से दीए जलाने लगा हूं मैं ...

उत्तर- आधुनिकता के अन्तर्विरोध

उत्तर- आधुनिकता को लेकर भारत में और विशेष रूप से हिन्दी- क्षेत्र में बहुत भ्रम और आकर्षण है। सामान्यतः हमारे पास इसको लेकर बहुत आधी- अधूरी सूचनाएं हैं। ज्यादातर तो उत्तर- आधुनिकता की चर्चा बतौर फैशन की जाती है, उसे लेकर कोई गंभीर चिंतन और चिंता हमारे यहां लगभग अनुपस्थित है। इस संदर्भ में हम इस खतरनाक भ्रम पर कुछ विचार करना चाहेंगे। वास्तव में, उत्तर- आधुनिकता कोई एक विशिष्ट चिंतन- सरणि या विचारणा नहीं है, यह उत्तर- आधुनिक पाश्चात्य समाजों की विभिन्न चिंतन- सरणियों के एक समग्र दौर का नाम है। यह समय- विभाजन को, उसमें आए समस्त परिवर्तनकारी कारकों के परिप्रेक्ष्य को ठीक से समझने के लिए दी गयी एक संज्ञा है। पिछले दशकों में यूरोप में चिंतन, संस्कृति और सृजनात्मकता के क्षेत्र में ढेर सारी प्रवृत्तियाँ उभरीं। इन प्रवृत्तियों को उत्तर आधुनिकता की संज्ञा से अभिहित किया गया। उत्तर- आधुनिकता यदि एक विशिष्ट जीवन- दृष्टि है तो इस अर्थ में कि इसमें उत्तर- औद्योगिक दौर की उन्नत सभ्यताओं की प्रमुख लाक्षणिकताएं- उच्च तकनीक, वैश्विक बाजार, नव- उपनिवेशवाद और आर्थिक उदारीकरण तथा विश्व स्तर पर संस्कृतियों क...

कुकुछीना स्मृतियां - राजाराम भादू

प्रो. लालबहादुर वर्मा का असमय जाना बहुतों की तरह मेरे लिए भी वैयक्तिक क्षति है क्योंकि मेरे लिए भी वे मेन्टर व गाइड की तरह रहे, हालांकि मैं उनसे उतना संपर्क- संवाद में नहीं था। उनके साथ मेरी कुकुछीना की स्मृतियाँ अहम रही हैं, जहाँ मैं ने उन्हें कई रंगतों में देखा। वहाँ वे हरेक से व्यक्तिगत आत्मीय बातचीत कर रहे थे। सबसे हंसी- मजाक करते बोल- बतिया रहे थे तो कोरस में गा रहे थे और मधुर धुनों पर समूह- नृत्य में भी भागीदारी कर रहे थे। वे जितनी चिन्ता से प्रबंधन की छोटी- छोटी जिम्मेदारियां संभाल रहे थे तो उतनी ही गंभीरता से विभिन्न सत्रों का संयोजन देख रहे थे। उनके उद्बोधन तो सदा अनुप्राणित करने वाले होते ही थे। उत्तराखण्ड की दूनागिरि पर्वतमाला में यह सुरम्य स्थान वर्मा जी ने ही खोजा था। कभी यूं ही भ्रमण करते वे इधर आ निकले थे और यह जगह उन्हें इतनी भायी कि अगले वर्ष से यहां मित्रों का एक समागम करने का तय किया जो तीन बार आयोजित किया गया। इसे मूर्त रूप देने में कुकुछीना के नेत्र वल्लभ जोशी का विशेष योगदान रहा। कुकुछीना को दो तरफ से घेरे दूनागिरि पर्वत के एक सिरे पर महावतार बाबाजी की गुफा है जिस...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान-1

रंगमंच  समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -1                                         राघवेन्द्र रावत  समकालीन हिंदी रंगमंच के बारे में बात बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से भी की जा सकती थी लेकिन मुझे लगता है कि उससे पूर्व के भारतीय रंगमंच के परिवर्तन की प्रक्रिया पर दृष्टिपात कर लेना ठीक होगा | उसी तरह राजस्थान के समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करने से पहले भारतीय हिंदी रंगमंच पर चर्चा करना जरूरी है, और उससे भी पहले यह जानना भी आवश्यक है कि वस्तुतः रंगमंच क्या है ?और रंगमंच के बाद हिंदी रंगमंच और उसके बाद समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करना एक उचित क्रम होगा भले ही यह मेरे अध्ययन की गरज ही लगे | राजस्थान के रंगमंच पर बात करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इस पर हिंदी साहित्य की तरह चर्चा नहीं हुई चाहे वह आलोचना की दृष्टि से देखें या इसके इतिहास की नज़र से देखें | दो वर्ष पहले ‘जयरंगम’ नाट्य समारोह के एक सेशन में बोलते हुए वरिष्ठ रंग एवं फिल्म समीक्षक अजित राय ने कहा था-“ पता नहीं कौन सा नाटक...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

विजयदशमी - रेखा चटर्जी

कहानी नयी सभ्यता द्वारा प्रदत्त संघातिक बीमारियों और उनके महंगे उपचार अल्प- आय वर्ग के परिवारों को तबाही की ओर धकेल रहे हैं। इसके विरुद्ध भी महिलाएं ही असीम धैर्य और अदम्य जिजीविषा से लड रही हैं। रेखा चटर्जी की कहानी में यह यथार्थ मार्मिकता में उभरता है, साथ ही बहनापा ( सिस्टरहुड ) भी  रूप  एक शक्ति के   रूप में उद्घाटित होता है। मीमांसा में स्वागत है रेखा ! दुर्गा माँ के बोधोन के साथ ही आज से दुर्गा पूजा शुरू हो गयी थी। हर बंगाली परिवार के घर में उल्लास का माहौल था, लेकिन भाव्या के लिए यह दिन पिछले कई दिनों की तरह भारी था। सौरभ की किडनी की बीमारी ने उसके परिवार के उत्साह और उल्लास को जैसे नजर लगा दी हो। कब सौरभ की दोनों किडनी खराब हो गयीं पता ही नहीं चला। सौरभ में तो कोई ऐब भी नहीं था। उसने शराब, गुटखा या सिगरेट के कभी हाथ भी नहीं लगाया, फिर ऐसा कैसे हुआ। लेकिन हकीकत यही थी कि सौरभ की दोनों किडनी डैमेज हो चुकी थीं और आज वो अस्पताल में जिन्दगी और मौत से संघर्ष करते हुए डायलिसिस के भरोसे एक नई जिन्दगी की पाने की उम्मीद में जी रहा था। ऐसे में भी भाव्या अस्पताल में भर्ती पति...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...