सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जाति गणना के निहितार्थ - राजाराम भादू

इस दशक (2010) की जनगणना में दो ऐतिहासिक चीजें होने जा रही हैं। इनमें एक है जातिवार जनगणना और दूसरी है हर व्यक्ति का विशिष्ट परिचय पत्र (यूनिक आइडेन्टिटी कार्ड)। हम पहली परिघटना पर विमर्श में शामिल होना चाहते हैं।
जाति आधारित जनगणना कहते हैं कि आखिरी बार 1930 में हुई थी, उसके बाद इसे बंद कर दिया गया। भारतीय संविधान में सकारात्मक सक्रियता (अफर्मेटिव एक्शन) के चलते आरक्षण का प्रावधान करते समय जातियों को आधार न बनाकर इनकी अनुसूचित श्रेणियों को आधार बनाया गया था। संविधान निर्माताओं की संकल्पना थी कि देश से जल्दी ही जातियां तिरोहित हो जायेंगी। हम देखते हैं कि संविधान लागू होने के छह दशक बाद भी भारतीय समाज में जाति व्यवस्था और मजबूत हुई है। इसके कारणों का गंभीर विश्लेषण भले ही न हुआ हो लेकिन जन्नत की हकीकत हम सभी जानते हैं।
इन दशकों में जातियों की गणना की मांग भी उठती रही है। विशेषकर आरक्षण के संदर्भ में अक्सर जातियों की सही संख्या पता करने की बात की जाती है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद से पिछड़ों की जनसंख्या को लेकर न्यायालय ने भी जाति आधारित जनगणना पर अपनी राय का इजहार किया था। अभी तक जातियों को लेकर 1930 की गणना के आधार पर ही कयास (प्रोजेक्शन) लगाये जाते थे। विगत कुछ वर्षों से कहा जा रहा था कि जनगणना में जातियों के आधार को भी शामिल किया जाये।
जब 2010की जनगणना प्रक्रिया शुरू हुई तो यह मांग बलवती होकर उभरी। आरंभिक अन्यमनस्कता के बाद कांग्रेस नीत प्रगतिशील गठबंधन सरकार अंततः जातियों के आधार पर जनगणना के लिए राजी हो गयी। यह दिलचस्प है कि संसद में इस मुद्दे को लेकर कोई विशेष वैचारिक बहस नहीं हुई। भाजपा सहित किसी विपक्षी राजनैतिक दल ने भी इसका कडा प्रतिवाद नहीं किया। चंद संसदीय और मंत्रिमण्डलीय समितियों में सलाह-मशविरे के बाद जाति गणना को लेकर लगभग राजनीतिक सर्वसहमति बन गयी। अर्थात् संविधान लागू होने के छह दशक बाद भारतीय समाज में जाति के अस्तित्व को राजनीतिक मान्यता मिल गयी।
जाति के आधार पर जनगणना का कोई सशक्त राजनीतिक प्रतिवाद सामने नहीं आया। बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और जन संगठनों के कुछ नुमाइंदों ने मिलकर जरुर इसका कडा विरोध किया पर देश के विराट फलक पर यह विरोध करीबन प्रतीकात्मक से ज्यादा दर्जा नहीं पा सका। इन लोगों का तर्क था कि जाति आधारित जनगणना समाज के लिए विघटनकारी है। यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। इससे भारतीय समाज खंड-खंड हो जायेगा। इसमें सूक्ष्म फासीवादी प्रवृत्तियों के उभार के खतरे हैं। कुल मिलाकर यह एक प्रतिगामी प्रक्रिया है जो समाज को सामंती युग की ओर वापस ले जायेगी। निसंदेह प्रतिवादियों के ये तर्क निराधार नहीं हैं।
हम जरा जाति गणना के इतर निहितार्थों पर भी विचार करना चाहते है। इस प्रसंग मंे प्रबल कारक वस्तुगत यथार्थ है जो बताता है कि जाति भारतीय समाज की एक ठोस परिघटना है। यह व्यक्ति की जन्मजात पहचान से जुड़ी है। आधुनिकता की हवा भी इसे क्षरित करने में असफल रही है। भारतीय राजनीति में जैसे-जैसे वैचारिक हृास होता रहा है,उसमें साम्प्रदायिक कारकों के समानान्तर जाति का कारक प्रभावी भूमिका ग्रहण करता गया है। सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरिंग) के नाम पर वर्तमान राजनीति में जातीय गठबंधनों ने जो स्वीकृति पायी,उसकी तार्किक परिणति हम जाति-गणना के रुप में देखते हैं। जब इसके तिरोहित होने की क्षीण-सी संभावना भी नजर नहीं आती, इसकी उत्तरोत्तर अहम होती भूमिका दिखायी दे रही है तो फिर क्यों नहीं इसे गतिशील वास्तविकता के रुप में स्वीकार कर लिया जाये।
जाति गणना के तात्कालिक नतीजे तो जातियों के पुनः एकीकरण,धु्रवीकरण और राजनीतिक गोलबंदी के रुप में दिखायी देंगे। आरक्षण को जातियों के अनुपात मंे विभाजित करने की अनेकानेक आवाजें उठेंगी। इसके बाद जाति विशेष पर वर्चस्व कायम करने की राजनीतिक-सामाजिक प्रतिस्पर्धाएं छिडेंगी। ये सभी चीजें अभी भी स्वतः स्फूर्त अवस्था में मौजूद हैं। इन्हें एक ठोस जन-सांख्यिकीय आधार मिल जायेगा।
जाति का प्रश्न एक सांस्कृतिक प्रश्न भी है। जैसाकि हमने पूर्व में उल्लेख किया, संविधान ने जातियों को अनुसूचित श्रेणियों के आधार पर आरक्षित किया था। तदन्तर सामाजिक न्याय के मुद्दे पर ये श्रेणियां दलित और आदिवासी के रुप में गोलबंद हुई। पिछडों की एकता की बात भी मंडल आयोग के बाद उठती रही। जल्दी ही इन सामाजिक श्रेणियों को सांस्कृतिक अस्मिता के रुप मंे स्थापित करने की कोशिशें शुरु हुईं। यदि सामाजिक गतिशीलता की इस प्रक्रिया में उभरे नये वर्चस्व का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि इन श्रेणियों में कुछ नेतृत्वकारी जाति समुदाय ही लाभान्वित हुए। श्रेणी समुच्चय में शेष बहुसंख्यक जाति समुदायों की वंचना बरकरार रही।
जाति गणना छोटे और विश्रृंखलित जाति समुदायों को सामाजिक गतिशीलता में मददगार हो सकती है। इसके चलते दलित, आदिवासी और पिछडों की स्थापित श्रेणियां विखंडित होंगी और अभी तक उपेक्षित और हाशियाकृत समुदायों की स्वतंत्र इयत्ता स्थापित होगी। असल में दलित और आदिवासी अन्तर्भेद के मुद्दे अभी तक अस्मिता विमर्श में स्थगित किये जाते रहे हैं। जबकि अनेकानेक जाति और जनजाति समुदायों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक अस्मिता है। इसे अब राजनीतिक मान्यता मिलने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि एक छोटा ही सही किन्तु दबाव रखने वाला मतदाता समूह किसी भी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हमें नहीं मालूम की मुस्लिम और ईसाई तबकों में जाति आधारित गणना होगी या नहीं। समाजशास्त्रीय और नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन यह प्रमाणित कर चुके हैं कि इन तबकों में भी भिन्न-भिन्न जाति-समुदायों का अस्तित्व है, इनके बीच सोपान क्रमिक संबंध और अन्तर्भेद हैं। हमारा मानना है कि इन तबकों पर भी जाति आधारित गणना को लागू किया जाना चाहिए। वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा निजी हितों के लिए सामुदायिक राजनीति यहां और भी भयावह रुप में विद्यमान है। बिहार मंे पसमांदा महाज जैसे प्रतिरोधों में हम इसे देख चुके हैं।
सच्चर समिति और जस्टिस रंगनाथ आयोग की मुस्लिम समुदाय पर आयी रिपोर्टो के तथ्यों को हम अन्तर्सामुदायिक भेद व क्षेत्रीय आधार पर विश्लेषित कर सकते हैं। मुस्लिम समुदाय के पिछडे तबकों के आरक्षण की लडाई भी इस समुदाय में जाति गणना से सफलता की ओर बढ़ सकती है। भारत बहुधार्मिक, उप राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक बहुलता वाला देश है। इसमें जाति बहुलता के तथ्य को भी हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। विभिन्न जाति समुदायों के बीच सहमेल की कल्पना तब तक नहीं की जा सकती जब तक हम राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रुप से उन्हें न्याय और गरिमा प्रदान नहीं की जाती। जाति गणना को हम इस अनिवार्य कार्यभार के लिए आधार भूमि के रुप में लें तो सही मायने में यह एक ऐतिहासिक चरण की शुरुआत हो सकती है।
एक छोटी-सी टिप्पणी विशिष्ट पहचान पत्र (यू.आई.डी.) पर भी। इस प्रक्रिया में कार्पोरेट तकनीकी घरानों के दखल ने कई तरह की आशंकाएं पैदा की हैं। दूसरी ओर, इसे अगर तकनीकी के वर्चस्व के लिहाज से देखें तो व्यक्ति अस्मिता के एक अमूर्त अंक में बदल जाने का खतरा है। भारतीय विषमतामूलक समुदायों में इस सुविधा से किसको लाभ मिलेगा और कौन आंकडों के जटिल संजाल में उलझकर रह जायेगा, ये एक बडा यक्ष-प्रश्न है। इसके चलते व्यक्ति की बहुआयामी पहचान को कैसे सुनिश्चित किया जायेगा, उसे विकास की प्रक्रियाओं से कैसे सम्बद्ध किया जायेगा और ये सब विकेन्द्रीकृत प्रशासन और राष्ट्रीय सुरक्षा की संगति में होगा, यह अभी साफ नहीं है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...