सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

उत्तर-आधुनिकता और जाक देरिदा

उत्तर-आधुनिकता और जाक देरिदा

जाक देरिदा को एक तरह से उत्तर- आधुनिकता का सूत्रधार चिंतक माना जाता है। उत्तर- आधुनिकता कही जाने वाली विचार- सरणी को देरिदा ने अपने चिंतन और युगान्तरकारी उद्बोधनों से एक निश्चित पहचान और विशिष्टता प्रदान की थी। आधुनिकता के उत्तर- काल की समस्यामूलक विशेषताएं तो ठोस और मूर्त्त थीं, जैसे- भूमंडलीकरण और खुली अर्थव्यवस्था, उच्च तकनीकी और मीडिया का अभूतपूर्व प्रसार। लेकिन चिंतन और संस्कृति पर उन व्यापक परिवर्तनों के छाया- प्रभावों का संधान तथा विश्लेषण इतना आसान नहीं था, यद्यपि कई. चिंतक और अध्येता इस प्रक्रिया में सन्नद्ध थे। जाक देरिदा ने इस उपक्रम को एक तार्किक परिणति तक पहुंचाया जिसे विचार की दुनिया में उत्तर- आधुनिकता के नाम से परिभाषित किया गया। आज उत्तर- आधुनिकता के पद से ही अभिभूत हो जाने वाले बुद्धिजीवी और रचनाकारों की लंबी कतार है तो इस विचारणा को ही खारिज करने वालों और उत्तर- आधुनिकता के नाम पर दी जाने वाली स्थापनाओं पर प्रत्याक्रमण करने वालों की भी कमी नहीं है। बेशक, उत्तर- आधुनिकता के नाम पर काफी कूडा- कचरा भी है किन्तु इस विचार- सरणी से गुजरना हरेक बौद्धिक और सर्जक के लिए लगभग एक अनिवार्य अभ्यास है। उत्तर- आधुनिकता को हम विचार- सरणी इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह पारंपरिक विचारधाराओं से भिन्न है। इसका कोई एक प्रवर्तक नहीं है। यह बौद्धिक और सर्जकों के समूह का सामूहिक उपक्रम है।

सोवियत संघ के निर्णायक पतन पर जब फ्रांसिस फुकोयामा ने बाईबिल में उल्लिखित शुभ संदेश का संदर्भ देते हुए घोषणा की कि अब ईसाइयत की विश्व- विजय का वक्त आ गया है, तब देरिदा ही थे जिन्होंने इसका तीव्र प्रतिवाद किया। फुकोयामा की घोषणा का निहितार्थ वस्तुत: अमेरिका- नीत भूमंडलीकरण के नव- साम्राज्यवादी वर्चस्व से था। यूरोप और सोवियत संघ के साम्यवादियों को ईसाइयत के विरोध में देखने की वहाँ लगभग एक परंपरा बन गयी थी। फुकोयामा के अनुसार ईसाई विश्व- वर्चस्व के बड़े अवरोध साम्यवाद का दुर्ग ढह गया था। इसके बाद सेमुअस हटिंगटन ने सभ्यताओं के संघर्ष की थियरी दी। फुकोयामा और हटिंगटन दोनों एक ऐसे थिंक टैंक से संबद्ध थे जो अमेरिकी सत्ता- प्रतिष्ठानों की मदद से चलता था। फुकोयामा से विपरीत, देरिदा ने इस परिघटना की जो व्याख्या की, विश्व के बौद्धिक समुदाय पर उसका असर आज तक जारी है। उन्होंने कहा कि यह वस्तुत: वृहत परंपराओं ( ग्रेट ट्रेडिसंस) का पतन है। पूंजीवाद और साम्यवादी दोनों ही वृहत सभ्यताएँ अपने भीम आकार और भार से नष्ट हो रही हैं। एक वृहत परंपरा ( बेशक विचारधारा भी) , देरिदा के अनुसार अनेक छोटी परंपराओं और असहमतियों को कुचल कर विकसित होती है। देरिदा की घोषणा थी कि वृहत परंपराओं का युग समाप्त हो गया है, विश्व- सभ्यता केन्द्रीय धुरी से मुक्त हो गयी है। अब विकेन्द्रित सभ्यताओं और छोटी परंपराओं का समय है।

देरिदा की विखंडन ( डि- कंस्ट्रक्शन) की अवधारणा वृहत परंपरा के महिमा- आलोक को ध्वस्त कर देती है। एक वृहत परंपरा अपने लिए भाषा का एक मायालोक रचती है। भाषा वस्तु- जगत के समानांतर एक प्रति- संसार रचने की सामर्थ्य रखती है। देरिदा कहते हैं कि एक वर्चस्वशील सभ्यता की भाषा वृहत परंपरा को एक मिथकीय आभा- मंडल प्रदान करती है। भाषिक सृष्टि ( कंस्ट्रक्ट) कभी भी यथार्थ का स्थानापन्न नहीं हो सकती। इसे ही दूसरे उत्तर आधुनिक चिंतकों ने बिम्बों की माया या भाषा का खेल कहा। देरिदा इसलिये संरचना ( कंस्ट्रक्ट) के विखंडन की बात करते हैं। इस प्रक्रिया में यथार्थ के नये अर्थ खुलते हैं और कृति का एक नूतन पाठ सामने आता है। स्वयं देरिदा निरंतर वृहत परंपराओं का विखंडन करते रहे जिन्होंने बौद्धिक और सांस्कृतिक जगत में उथल- पुथल मचाये रखी। देरिदा ने नितांत मौलिक विचारणाएं प्रस्तुत की हों, ऐसा नहीं है। भाषा और चिंतन के क्षेत्र में विटगेंस्टाइन, रोलां बार्थ और आक्टोविओ पाज ने अनेक नयी स्थापनाएं दी थी। विटगेंस्टाइन ने भाषा और चिंतन के वैज्ञानिक संबंध को स्थापित किया तो रोलां बार्थ और ओक्टोवियो पाज ने वैचारिक स्वातंत्र्य को कृति के पाठ से जोड़ा। ओक्टोवियो पाज ने कहा कि अर्थ पंक्तियों में ही नहीं, पंक्तियों के बीच भी होता है। कृति के पाठ में पाठ्य- वस्तु के रिक्त स्थानों और अवकाशों की अनुगूंजें भी महत्वपूर्ण हैं। देरिदा ने इस विचारणा को एक ऐसे शिखर पर पहुंचाया जहां से यह वैश्विक परिघटना के तीव्र संक्रमण का विश्लेषण और पुनर्पाठ करने के लिए आलोक- स्तंभ का कार्य कर सकती है।

देरिदा के समकालीनों में जो उनके कद के रहे, उनमें से एक एडवर्ड सईद थे। एडवर्ड सईद हालांकि देरिदा से कभी सहमत नहीं हुए, फिर भी उनका काम एक तरह से देरिदा के ही चिन्तन का क्षैतिजिक विस्तार रहा है। सईद ने औपनिवेशिक शिकंजे में सदियों तक जकडे रहे देशों की दमित संस्कृतियों की महत्ता को यूरोपीय क्लासिक कृतियों के विखंडन के जरिये पुनर्स्थापित किया है। एडवर्ड सईद की तरह नाम चोम्स्की भी देरिदा से अक्सर असहमत और किसी हद तक अप्रभावित रहे। किन्तु चोम्स्की की भाषिक स्थापनाएं अंततः लघु- सांस्कृतिक परंपराओं का पक्ष- पोषण करती हैं। उनकी राजनीतिक टिप्पणियां एक- ध्रुवीय शक्ति- केन्द्रण के कुत्सित प्रयासों पर तीखा आक्रमण होती हैं। हमारे समय के इन विचारकों से समकालीन दुनिया के जनतांत्रिक चिंतन और उसकी प्रतिभूतियों का प्रेरक संपुज निर्मित होता है। देरिदा का इसमें अहम स्थान है। अभी तक चिंतकों और सर्जकों की प्रतिबद्धता को भी दो ध्रुवीय विचारधाराओं के साथ जोडकर देखने का चलन था। देरिदा की प्रतिबद्धता समस्यामूलक रही क्योंकि वे दोनों वृहत परंपराओं पर समान रूप से आघात कर रहे थे। समकालीन विश्व- घटनाक्रम और सांस्कृतिक संक्रमण की रेमंड विलियम्स, एजाज अहमद और फ्रेडरिक जेम्सन ने मार्क्सवादी व्याख्याएं प्रस्तुत कीं लेकिन उन्होंने देरिदा के विचारों से प्रायः सचेत दूरी बनाये रखी। यहां तक कि अपने आखिरी दिनों में जब देरिदा ने मार्क्स पर अपना प्रसिद्ध व्याख्यान दिया तो एजाज अहमद सहित कई मार्क्सवादी व्याख्याकारों ने उन पर पलटवार किया। उल्लेखनीय है कि देरिदा ने मार्क्स के दर्शन को अभूतपूर्व बताते हुए अपने समय के युवा मानस की तुलना हैमलेट से की। शेक्सपियर का यह महान नायक क्या करूं क्या न करूं की असमंजस की मनःस्थिति में रहता है। देरिदा ने कहा कि मार्क्स का प्रेत आज भी यूरोप और अमेरिका पर मंडरा रहा है। हैमलेट के रूपक के जरिए ही देरिदा ने कहा कि हमें मार्क्स का ऋण चुकाना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि देरिदा ने अपने इस भाषण में तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देशों की दुरावस्था के लिए साफ- साफ तौर विकसित देशों को जिम्मेदार ठहराया था और इसे साबित करने के लिए आंकड़ों की एक फेहरिस्त दी थी। मार्क्स पर देरिदा देर से बोले और जब बोले तो मार्क्सवादी बौद्धिकों ने अपनी प्रसन्नता छुपाते हुए उनकी आलोचना की। बीसवीं शताब्दी के आखिर में ग्राम्स्की, अर्न्स्ट फिशर और वाल्टर बैंजामिन जैसे मार्क्सवादी चिंतकों की पुनर्प्रतिष्ठा हुई जिन्हें उनके समय के साम्यवादी सत्ता- प्रतिष्ठानों ने उचित अहमियत नहीं दी थी। अब उन्हें ठीक उन्ही कारणों से महत्ता मिल रही है जिनके कारण उनका उस समय हाशियाकरण हुआ था। मुझे लगता है कि इन. विचारकों की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए देरिदा की विचारणाओं ने उपयुक्त वातावरण बनाया। जो भी हो, देरिदा को फुकोयामा के प्रतिपक्ष में देखा जा सकता है तो उसे अमेरिकी वर्चस्व के विरुद्ध न देखने के पीछे मुझे कोई कारण नज़र नहीं आता।

देरिदा निश्चय ही कई बार हमें उलझन में डालते हैं। जैसे जब वे झूंठ के इतिहास पर व्याख्यान दे रहे होते हैं तो लगता है जैसे सत्य के विरुद्ध खड़े हैं। ऐसा समझना एक सतही सरलीकरण है। हमें देरिदा की इस उक्ति से बिदकने की जरूरत नहीं है कि जितना पुराना सत्य का इतिहास है, उतना ही पुराना झूंठ है और इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अंतिम निर्णायक विजय सत्य की होगी। देरिदा यहां एक मिथक की चौंध से सत्य को आभा- विहीन तो कर ही रहे हैं लेकिन सत्य और झूंठ के वास्तविक परीक्षण और सत्य की अनिवार्यता के पक्ष में कुछ ठोस तर्क चाह रहे हैं। दुर्भाग्य से देरिदा के सृजन से अभी तक हममें से ज्यादातर लगभग अपरिचित हैं। वे मौलिक व्याख्याकार हैं, व्याख्या के पीछे संचालक उनकी अन्तर्दृष्टि के मूल उत्सों की पहचान अभी बाकी है।
सार्त्र के बाद वे शायद सबसे लोकप्रिय चिंतक थे जिनके लिए भारी भीड जुटती थी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सर्वेश्वर की भेडिया और हिंस्र शंक्लें - राजाराम भादू

पूर्वकथन : लीलाधर मंडलोई ने वर्तमान साहित्य के शताब्दी कविता विशेषांक ( मई- जून,२०००) का संपादन किया था। इसमें शताब्दी की कुछ चुनी हुई कविताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ व लेख हैं जो अलग- अलग लोगों से लिखवाये गये थे। मैं ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेडिया श्रृंखला पर लिखा था। इसे उलटते- पलटते लगा कि यह आज तो और भी मौजूं है। भगतसिंह की जेल में लिखी डायरी- ए मार्टायर्स नोटबुक ( इंडियन बुक क्रानिकल) का हिन्दी अनुवाद आ चुका है- शहीदे- आजम की जेल नोटबुक ( परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ)। इसमें भगतसिंह द्वारा मूल पृष्ठ ३९ में तिरछे लिखी ये पंक्तियां उद्धृत हैं- महान इसलिए महान हैं क्योंकि हम घुटनों पर हैं  आओ उठ खडे हों। पंक्तियों के लेखक का नाम नहीं है, बहुत संभव है ये स्वयं भगतसिंह की लिखी हों। सर्वेश्वर की इन कविताओं को पढते हुए मुझे लगता है, ये महानता के विरुद्ध साधारण जनों को उठ खडे होने के लिए आह्वान करती कविताएँ हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी काव्य- यात्रा सोच के जिस धरातल से शुरू की थी, बाद में वे लगभग उसके विपरीत छोर पर छोर पर पहुँच गये थे। यहां वे आततायी शक्तियों के प्रतिपक्...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

हाशिये के समुदाय तीन इतिवृत्त

हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में ब...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...
रंगमंच समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -2                                         राघवेन्द्र रावत  अंग्रेजों के आने के साथ साथ ही पाश्चात्य संस्कृति और साहित्य का प्रभाव भारतीय जनमानस पर पड़ने लगा था | जैसे जैसे औपनिवेशिक काल में औद्योगिक विकास होता गया मध्य वर्ग का उदय हुआ | जिसके पास ऊँचाइयाँ छूने के सपने थे तो असफलता से नीचे जाने का डर भी था | धार्मिक नगरों के रूप में बनारस, उज्जैन हरिद्वार आदि विकसित हुए वहीँ औद्योगिक नगरों के रूप में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास. भिलाई और जमशेदपुर जैसे नगर विकसित होते गए | इन नगरों में गाँव से मजदूर जीविकोपार्जन की तलाश में विस्थापित हुए | वहां उनके लिए जीविका के साथ साथ अपनी संस्कृति, बोली और घर की तलाश एक अहम् मुद्दा बन कर उभर रही थी |  यूरोप में नार्वे के प्रसिद्ध नाटककार हेनरिक इब्सन के नाटकों में यही मध्य वर्ग दिखाया जाने लगा | इब्सन के नाटकों में यथार्थवाद की अवधारणा का उदय हो चुका था | उनके नाटक ‘अ डॉल्स हाउस(1879)’,’घोस्ट्स’ (1881) तथा ‘ए...

गांव की स्मृतियाँ - ज्ञान चंद बागड़ी

भूमंलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों ने गाँव, कृषि और पारंपरिक उद्यमों का भयावह हाशियाकरण किया है। कथाकार ज्ञानचंद बागडी अपनी स्मृतियों के गाँव को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि अतीत का वह गाँव कोई आदर्श था लेकिन जिस तरह बदलाव आया, वह भी सहज नहीं कहा जा सकता। इसी संदर्भ में ये संस्मरण- लेख मीमांसा में प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरा गाँव मेरे लिए दुनिया की सबसे सुंदर जगह है , जहां मेरा बचपन बीता था । गाँव और बचपन की स्मृतियाँ  मुझे रोमांचित कर देती हैं । दिल करता है कि उड़कर गाँव पहुंच जाऊं । यही कारण है कि समय निकालकर वहां जाता रहता हूँ । वहां बिताये हुए कुछ ही दिन मुझे पूरे साल के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं । मेरे लिए गाँव का मतलब है प्रकृति का साथ , खेत-खलिहान ,  जहाँ सुबह आपकी आँख मुर्गे की बांग या किसी पशु के रंभाने से खुले , जहां मोर नाचते हों , झिंगुरों की आवाज सुनी जा सके , रात में एक-एक तारा साफ दिखाई दे , अंधेरे का संगीत और सन्नाटा सुनाई दे , साझी विरासत हो और साझी ही बहन-बेटियां , सहयोग हो , सामाजिकता हो , सादा खाना हो , मोटा पहनावा हो । ऐसा ही तो था मेरा गाँव , सरल औ...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...