सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बिजौलिया: जमीनी हालात

डायरी

बिजौलिया: जमीनी हालात

सरिता अरोड़ा



हम बूंदी जिले के तालेडा विकास खण्ड के डाबी क्षेत्र में एक समूह को अकादमिक सहयोग देने के सिलसिले में जाते रहते थे। इसके लिए पहले बूंदी से आना-जाना रहता था। फिर बिजौलिया में रुकने लगे। यह क्रम विगत दो-तीन वर्ष चलता रहा। इस दौरान हमने बिजौलिया के इर्द-गिर्द के जमीनी हालात देखने और वहां की समस्याओं को समझने की कोशिश की। बिजौलिया में महान नेता विजयसिंह पथिक की अगुवाई में स्वातंत्रय-संघर्ष के दौरान ख्यात किसान-आन्दोलन हुआ था। हमारी यह भी उत्सुकता थी कि अपने निकट इतिहास के प्रति लोगों के नजरिये को जाना जाये। वर्तमान में डाबी की तरह बिजौलिया भी खनन-क्षेत्र है। हमने पता करने की कोशिश की कि इससे स्थानीय लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जिंदगी पर क्या फर्क पडा है। साथ ही वे पारिस्थिकीय परिवर्तन को कैसे देख रहे हैं। यहां फील्ड डायरी के कुछ अंश प्रस्तुत हैंः

 20.01.2011 

मण्डौल बांध बूंदी रोड पर स्थित है। यह करीबन एक किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यह अरावली की उपत्यका में स्थित एक खूबसूरत जगह है। बांध का परास क्षेत्र पहाडियों से विपरीत दिशा में तीन किलोमीटर में विस्तारित है। इस तरफ चारागाह क्षेत्र में चट्टानों की एक श्रृंखला है।  इसे राॅक गार्डन की तरह विकसित किया जा सकता है जो इस क्षेत्र में पिकनिक स्पाॅट की कमी को पूरा कर सकता है। मेनाल प्रपात को जाने वाले पर्यटक भी यहां आ सकते है। इस क्षेत्र में ऐसी कोई सार्वजनिक जगह नहीं है जहां परिवार के लोग सुकून के लिए आ सकें। बांध के सामने फैली प्राकृतिक चट्टानों की इस अद्भुत श्रृंखला के समक्ष भी भू-माफियाओं के अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। 

मण्डौल बांध का पानी स्वच्छ और पारदर्शी है। इसी से बिजौलिया के लिए पेयजल की आपूति होती है। बांध से एक छोटी नहर के जरिये भगवतपुरा पंचायत के गांवों में सिंचाई के लिए भी पानी छोडा जाता है।

मण्डौल गांव बांध के तट पर बसा है। यह मीणा और भील आदिवासियों की छोटी-सी बसाहट है। गांव में घरों की हालात देखकर ही इनकी आर्थिकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। बांध के किनारे पर ही मण्डौल का राजकीय प्राथमिक विद्यालय है। हमने इस स्कूल का अवलोकन किया। ये एकल शिक्षक स्कूल है। हम पहुॅचे तब 18 बच्चे शिक्षक के आने और स्कूल के खुलने के प्रतीक्षा कर रहे थे। 11 लडके और 7 लडकियों में से कुछ बाहर खेल रहे थे। अभी पूर्वान्ह 10:45 am  हुए थे लेकिन शिक्षक नहीं आया था। बांध के सामने की तरफ बूंदी रोड से एक किलोमीटर अंदर लक्ष्मी खेडा गांव है। बूंदी रोड से अंदर की तरफ जो सडक जाती है वहां चाय की दूकान है। दूकान पर हमारी मुलाकात लक्ष्मी खेडा गांव के पन्नालाल धाकड (48) और छीतरमल से   होती है। वे बताते हैं कि इस क्षेत्र में धाकड समुदाय बहुसंख्यक है। धाकडों के यहां 72 गांव हैं। धाकड अन्य पिछडा वर्ग में आते हैं। पथिक जी के आन्दोलन में भी इन लोगों की मुख्य भूमिका थी। 

राजस्थान में देखा गया है कि जिस क्षेत्र में जो जाति समुदाय बहुसंख्यक है वही वर्चस्वशाली भी है। लेकिन धाकड समुदाय इसका अपवाद लगता है। ये अभी भी शिक्षा में पिछडे हुए हैं इसलिए इनका प्रशासन या उच्च सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व नहीं है। लक्ष्मी खेडा भी धाकडों का गांव है जहां तीन परिवार रैगर (दलित) समुदाय के हैं। गांव में सरकारी उच्च प्राथमिक स्कूल है। यदि कोई बच्चा इससे आगे पढ़ना चाहे तो उसके सामने यही विकल्प है कि वह बिजौलिया पढने जाये। लक्ष्मी खेडा से बिजौलिया की दूरी तीन किलोमीटर है।

भगवतपुरा गांव की आबादी ग्वाल, बंजारों, भील और बलाई समुदायों का सुदंर संयोजन है। खेराडिया गांव की आबादी भी मिश्रित  है। यहां गुर्जर, दरोगा और राजपूत जाति समुदाय हैं। जबकि देवरी की नून में केवल धाकड समुदाय के लोग हैं।

मंदाकिनी मंदिर बिजौलिया की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। यह केन्द्रीय पुरातत्व विभाग की ओर से 1956 से संरक्षित सम्पदाओं में  अधिसूचित है। लेकिन मंदाकिनी राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर नहीं है। इसे मेनाल प्रपात के पर्यटन मार्ग में सम्मिलित करना चाहिए।
गोविन्द सागर एक कृत्रिम बांध है जो बिजौलिया के उत्तर की ओर भीलवाडा रोड पर स्थित है। इसके एक तरफ विंध्यवासिनी माता का प्राचीन मंदिर है। बिजौलिया की राजमाता बिजासनी (विंध्ववासिनी) माता की भक्त थीं इसलिए उन्होने यह मंदिर स्थापित करवाया। राजमाता ने ही अकाल राहत कार्यों के रूप में गोविन्द सागर बांध बनवाया। बिजौलिया के विद्वान बैजनाथ शांडिल्य बताते हैं कि ये बांध विक्रमी संवत 1996 में बनवाया। अकाल के कारण जब लोग यहां से पलापन करने लगे तो राजमाता ने अपने गहने बेचकर राहत कार्य शुरु कराये और यह बांध बना। इसने बिजौलियाॅं की न केवल बाढ से सुरक्षा की है बल्कि इसके कारण बिजौलिया के कुएं-बावडियों का जल-स्तर भीषण गर्मियों में भी ऊपर रहता है और लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो जाता है। 
वर्तमान में गोविन्द सागर बांध प्रशासन की ओर से पूरी तरह उपेक्षित है। बांध के तट पर ही हिन्दुओं का श्मशान और मुस्लिमों का कब्रिस्तान है। बांध का पानी बुरी तरह प्रदूषित है। लेकिन जैसा कि कहा गया, इस बांध की बिजौलिया के पारिस्थिकी संतुलन में अहम् भूमिका है। बिजौलिया उत्तर-पश्चिमी ढाल में बसा है, इसके चलते तेज वर्षा होने पर पानी बहकर इधर ही आता था। बांध ने इस पानी को  रोक   दिया है। इसके चलते बिजौलिया का जल-स्तर ऊपर आ गया है और हरियाली  बढ़ गयी है। नजदीक ही स्थित रानी जी के बाग की खूबसूरत हरियाली के पीछे बांध की नमी है। बिजौलिया के बुजुर्ग दलपत सिंह (पूर्व सरपंच), किशन सिंह और राधेश्याम गोविन्द सागर को बिजौलिया के कुएं-बावडियों के लिए वरदान मानते हैं। 

यदि हम जनगणना के आंकडे और दूसरी सरकारी रिपोर्ट देखें तो बिजौलिया कलां में शिक्षा और विकास के आंकडे बेहतर नजर आयेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इन आंकडों से काफी भिन्न है। असल में बिजौलिया एक कस्बे के रूप तेजी से विकसित हो रहा है। यहां खनन क्षेत्र में बाहर से आने वाले विपन्न समुदायों की तादाद बढ़ती जा रही है। बिजौलिया के चारों तरफ हम ऐसी वंचित बस्तियों का फैलाव देख सकते हैं। इनमें से अधिकांश परिवारों के पास राशन कार्ड और बी.पी.एल.कार्ड नहीं हैं। इसके चलते ये लेाग गरीबों के लिए संचालित सरकारी योजनाओं के अन्तर्गत भी नहीं आते हैं। यहां तक कि इनकी बस्तियां भी तकनीकी रूप से अतिक्रमण ही हैं। ये बिजौलिया के बढ़ते शहरीकरण की मलिन बस्तियां हैं।

इन्दिरा नगर ऐसी ही एक कच्ची बस्ती है। यहां रैगर, लुहार और बावरी समुदाय के परिवार एक दशक से अधिक समय से रह रहे हैं। इस बस्ती से एक भी बच्चा स्कूल नहीं जा रहा है। इनमें से किसी को जमीन का आवासीय पट्टा नहीं मिला है। 

बिजौलिया के इर्द-गिर्द बसे अधिकांश गांवों में विभिन्न जाति समुदायों की आबादी है। मसलन बिजौलिया से पांच किलोमीटर दूर बसे केशव विलास गांव में राजपूत, भील, तेली, मीणा और किराड समुदाय हैं। जवादा गांव में रैगर, मीणा और धाकड समुदाय हैं। कुछ गांव इसके अपवाद भी हैं। कालबेलिया समुदाय का रामपुरिया ऐसा ही गांव है। कालबेलिया पारंपरिक रूप से सांप दिखाने के काम करने वाला घूमंतू समुदाय है। संगीत और नृत्य के हिसाब से इस समुदाय की समृद्ध परंपरा रही है। इस समय कालबेलिया समुदाय एक मुश्किल दौर से गुजर रहा है। रामपुरिया में इस समुदाय के लोग घास-फूंस की झोपंडियों में रह रहे हैं। यहां एक सरकारी प्राथमिक स्कूल है लेकिन शिक्षक की अनुपस्थिति के चलते यह बंद है। कालबेलिया समुदाय के वृद्व जन भीख मांगते हैं जबकि युवक युवतियों ने खान मजदूरी को अपना लिया है। हमने गायत्री  नगर, विक्रमपुरा, बनी, मानपुरा और थडोरा गांव का भी भ्रमण किया। थडोरा गांव में गोपाल जी (35) और जगदीश जी (34) से बात की। थडोरा ग्राम पंचायत है जिसमें एक सरकारी सैकन्डरी स्कूल है।

 02.02.2011

अगली बार पहले हम विक्रमपुरा गये। इस गांव में धाकड, गुर्जर, रैगर, भील और बरगी जातियों के करीबन सौ परिवार हैं। यहां हमने जैराम धाकड, रामलाल भील और पन्नालाल रैगर से बात की। इन्होने हमें गांव में सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय, आंगनबाडी केन्द्र, उप स्वास्थ्य केन्द्र और सहकारी समिति की स्थिति के बारे में बताया। उन्होने इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली केा लेकर अपने गुस्से का इजहार किया। गांव के लोगों के पास खेती के लिए जोत की भूमि बहुत कम है इसलिए अधिकांश लोग कृषि और खान मजदूरी पर निर्भर हैं। खानों में मिलने  वाला काम स्थायी नहीं हैं। नरेगा में भी इन्हे पर्याप्त कार्य दिवसों का काम नहीं मिलता है। गायत्री  नगर और लक्ष्मणपुरा विक्रमपुरा पंचायत में ही आने वाले छोटे गांव हैं।  जिनमे क्रमशः 40 और 60 परिवार रहते हैं। कामा विक्रमपुरा पंचायत का अपेक्षाकृत एक वडा गांव है। इसमें भील, गुर्जर, रैगर, बलाई, ब्राहमण और बैरागी जाति समुदायों के करीबन 120 परिवार हैं। यहां के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के छह शिक्षकों में एक महिला है। आंगनबाडी केन्द्र भी इसी स्कूल परिसर में स्थित है। इस स्कूल में 300 बच्चों का नामांकन है। हमारे वहां रहने तक (10:50 पूर्वान्ह) सिर्फ एक शिक्षक स्कूल पहुॅचा था।

हम उमाजी का खेडा गांव गये। बिजौलिया किसान आन्दोलन के इतिहास में इस गांव की महत्त्वपूर्ण जगह है। यह गांव विजय सिंह पथिक का मुख्यालय था। वैसे यह आदिवासी नेता माणिक्य लाल वर्मा का मूल गांव है। इस बडे गांव में धाकड, किराड, अहीर, भील और पुरोहित समुदाय के लोग रहते हैं। यहां हमने गांव की बाहरी सडक के दोनों तरफ स्थित दो सरकारी स्कूलों का अवलोकन किया। इनमें से एक सरकारी प्राथमिक स्कूल पास के उदयपुरिया गांव से सम्बद्ध है। यह एकल शिक्षक विद्यालय है। शिक्षक लीला पारासर बच्चों के साथ शिक्षण में सक्रिय थी। पोषाहार बनाने वाली कार्यकर्ता  भी उन्हे शैक्षणिक कार्यो में सहयोग कर रही थी। संयोग से दोनों ही स्कूलों में 42-42 बच्चे उपस्थित थे। उमा जी का खेडा में एक सरकारी माध्यमिक स्कूल है जिसमें दो-तीन किलोमीटर तक की दूरी से लडकियां भी पढ़ने आती है। शिक्षकों ने बातचीत में बताया कि अभी बहुत से बच्चे स्कूल से बाहर हैं या पढाई बीच में छोड कर खानों के काम में लग जाते हैं।

हम फिर से रामपुरिया कालबेलिया बस्ती में गये। रामपुरिया वस्तुत तीन बस्तियों में विभाजित हैः भैरों जी की पठारी (8 परिवार), किशनपुरिया (40 परिवार) और रामपुरिया (10 परिवार)। इनमें से केवल 8 परिवार बी.पी.एल. में चयनित हैं। इन्हे भी बी.पी.एल. के अन्तर्गत किसी सुविधा का शायद ही कोई लाभ मिला है। यहां कोई आंगनबाडी केन्द्र भी नहीं है। इनके पास राशन कार्ड हैं जिनसे इन्हे कभी-कभार केरोसीन तेल ही मिल पाता है। एक कालबेलिया महिला मोतिया बाई ने हमें बताया कि वे लोग पिछले 40 सालों से वोट डालते आ रहे हैं लेकिन उन्हे अभी तक कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं हैं। यहां लगे हैण्ड पंप में पानी नहीं आता है। हमने फिर से पाया कि स्कूल में शिक्षक अभी भी अनुपस्थित था और दो बच्चे वीणा (7) और चांद (6) दोपहर के भोजन की प्रतीक्षा में स्कूल के बाहर खडे थे। पता चलाकि इस स्कूल में 40 बच्चे नामांकित हैं।

कालबेलिया समुदाय के पारंपरिक मुखिया कान्हानाथ, कालूनाथ और चितानाथ निष्क्रिय हैं। जुझारू महिला मोतिया बाई ही अब वास्तव में कालबेलिया समुदाय का नेतृत्व कर रही है। कुछ कालबेलिया परिवारों के पास नरेगा के जाॅब कार्ड हैं लेकिन इन्हे मनरेगा में 50 दिन के लिए भी काम नहीं मिला है। हमने बिजौलिया के सरपंच चांदमल जैन से बात की। उन्होने क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर अपने प्रयासों के बारे में बताया। उनके सचिव ने हमें इनसे सम्बन्धित आंकडे प्रस्तुत किये। सरपंच ने हमें अपनी समस्याएं बताईं और कहां कि प्रशासन ने इस क्षेत्र को पूरी तरह से उपेक्षित कर रखा है। खनन कार्य ने क्षेत्र में कई नयी समस्याएं पैदा की हैं। लेकिन इन समस्याओं को निपटाने के लिए पंचायत के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। हम सरकार से लगातार यहां एक सरकारी काॅलेज खोलने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए हमने पर्याप्त भूमि का आवंटन भी कर रखा है। बिजौलिया में एक बडे अस्पताल की भी जरूरत है।

हमने उन्हे सुझाव दिया कि बिजौलिया के शहरीकरण और आबादी को देखते हुए यहां नगरपालिका के लिए मांग क्यों नहीं उठायी जाती है। इसका सरपंच व सचिव दोनों ने विरोध किया। उनका कहना था कि ग्राम पंचायत को नगरपालिका से ज्यादा बजट मिलता है। हालांकि वे इससे सहमत थे कि उन्हे कस्बे के विस्तार के मद्देनजर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त बजट का आवंटन नहीं किया जाता है। ऐसे में सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की तो बात ही बेमानी है। बिजौलिया के एक प्रमुख बुद्विजीवी विजयनाथ सनाढ्य ने हमें यहां के इतिहास, पारिस्थिकी और मौजूदा चुनौतियों पर विस्तार से जानकारी दी। उनका मत था कि हमें बिजौलिया की पुनप्रतिष्ठा और विकास के लिए एक और जन आन्दोलन की आवश्यकता है। यही शायद इस चर्चा का निष्कर्ष था।

26.02.2011
इस बार हमने अमेरिकी नृतत्त्वशास्त्री एन.गोल्ड के साथ इस क्षेत्र का भ्रमण किया। एन.गोल्ड न्यूयार्क में एथिका की रहने वाली हैं और साराकास विश्वविद्यालय में नृत्वत्वशास्त्र की प्रोफेसर हैं। वे फुलब्राइट फैलोशिप के अन्तर्गत भीलवाडा के इस क्षेत्र की पारिस्थिकी और संस्कृति का अध्ययन कर रही हैं । जहाजपुर के रहने वाले सरकारी शिक्षक भोजूराम एन.गोल्ड को शोध में सहायता कर रहे हैं। वे भी हमारे साथ मौजूद थे। हम लोगों ने साथ में मंदाकिनी, मंदिर गोविन्द सागर और मण्डौल बांध, रानी का बाग और बिजौलिया किले का भ्रमण किया। एन.गोल्ड ने कस्बे की पारिस्थिकी प्रणाली की सराहना करते हुए इसके क्षरण में चिंता जाहिर की। उन्होने  बताया कि इससे गंभीर पर्यावरण असंतुलन पैदा हो सकता है। एन ने इन्दिरा नगर और कालबेलिया बस्ती को भी देखा और मोतिया बाई से मिलीं। उनके साथ हमने बिजौलिया और भगवतपुरा के सरपंच से मिलकर प्राकृतिकं चट्टानों के संरक्षण पर लम्बी बात की। हालांकि दोनों जन प्रतिनिधि अपनी हताशा ही जाहिर कर रहे थे।
बूंदी की तरह बिजौलिया में भी लघु चित्रकला की समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन किसी तरह के सहयोग और समर्थन के अभाव में यह मूल्यवान कला भी पृष्ठभूमि में जा रही है। बिजौलिया की  गलियों में मिनियेचर कला के स्टुडियों में काम करते कलाकारों koकी उदासी और चिंता हमारे पर भी तारी होकर रह जाती है। 

(सरिता अरोडा समान्तर में कार्यरत हैं। इन यात्राओं में राजाराम
 भादू और कभी-कभी बूंदी के रामसिंह भी उनके साथ रहे।) 

सरिता अरोड़ा
सरिता अरोड़ा समाजशास्त्र में परास्नातक हैं। इन्होंने एक दशक से अधिक समय समान्तर में किशोरी सशक्तिकरण, प्रशिक्षण, संदर्भ- सामग्री निर्माण और प्रलेखन कार्य किया है। अभी बंगलौर के एक संस्थान के कार्यों का स्थानीय समन्वयन कर रही हैं। मीमांसा की मोडरेटर हैं।
संपर्क :8619725711
ईमेल arorasarita466@gmail.com







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...