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विभाजित अंधेरे

संभावना


लेखिका मंजुला बिष्ट के पास अत्यंत तरल भाषा एवं सूक्ष्म ऑब्जर्वेशंस हैं ,जो कहानी के कहन को प्रभावी तथा वातावरण को जीवंत बनाते हैं । चरित्रों के मनोविज्ञान की बारीक पकड़ , उनके अंतर्विरोधों को गहराई से रेखांकित करने में सहायक है । लेखिका अपनी इन सभी खूबियों का ' विभाजित अंधेरे' में स्त्री संसार के अंधेरे कोनों के मूक साझाकरण की प्रक्रिया में आए अवरोधों की पड़ताल में बेहद खूबसूरती से उपयोग करती हैं  ।
दूसरे फलक पर यह अस्तित्व के युद्ध की संवेदनहीन भूमि पर मानवीय भावनाओं के अंकुरण के लघु प्रयास की भी कहानी है । 
साथ ही यह स्त्री मनोभावों के दो अलग-अलग समांतर संसार के बीच की अंतः क्रिया की सीमाओं एवं शक्तियों को भी उजागर करती है ।

विभाजित अंधेरे

                                       मंजुला बिष्ट
           
  वह मई माह की एक ऊबी हुई दुपहरी थी।सूरज आदतन अपनी तासीर बढ़ा रहा था।खुले आसमान तले भावी तीख़ी तपन से बचने के लिए मुझे भी अपना काम निपटाने की जल्दी होने लगी थी।देहली गेट की सब्जी मंडी में रोज़ाना की तरह चहुँ तरफ़ा लोगों की आवाजाही बनी हुई थी।मुझे सब्जी-फल के बाद फूल भी खरीदने थे।दाएं कंधे पर लटकाये हुए भारी बैग को नीचे रखकर कुहनी में उठ रहे दर्द की लहर को रोका।फ़िर कुछ आराम की उम्मीद में बाजू झटक ही रही थी कि मेरे आँखों के सामने अचानक हरा झिलमिलाता अंधेरा छा गया।चिरपरिचित ताज़ी महक मेरी भूखी सोयी अंतड़ियों को जगाने लगीं।
   किसी अति उत्साही धनिया बेचने वाले ने मेरे चेहरे के बिल्कुल सामने धनिया की बड़ी गाँठ लहरा दी थी!इंसान हो या वस्तु एक वाज़िब दूरी से ही अपने स्पष्ट व सही रूप में समझ आते हैं।अति समीपता दृष्टिभरम देती है।नदी की शीतलता व विस्तीर्णता का निस्सीम सुख नदी में डूबते हुए नहीं,बल्कि उसके तट पर बैठकर महसूसने में है।
  गर्मी की बढ़ती तीखी चुभन व पसीने की बहती धारों के बीच यह हिमाक़त मुझे एकबारगी झुंझला गयी।ख़ैर,धनिया तो खरीदना ही था,सो उस हरे अंधेरें के प्रति जल्दी ही सामान्य हुई।वैसे भी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हम अजनबियों के प्रति जल्दी ही औपचारिकता की टाई अपने गले में लटकाकर विनम्र बनें रहने का अभिनय कर ही लेते हैं।ताज़ा देशी धनिया अपने गहरे-हरे छितरे पत्तों में बेतहाशा गमक रहा था।सब्जी-मंडी की संकरी गलियों से बने समकोणों व त्रिभुजों के बीच में गाहे-बगाहे ठसके लग ही जाते हैं।अपनी पसन्दीदा सब्जियों की तरफ इधर-उधर जाती भीड़ के उन अवांछित ठसकों से बचने के लिये मैंने खुद को दो स्टॉलनुमा दुकानों के बीच यथासम्भव सिकोड़ लिया था।
   उन स्टालों के बीच अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद मैंने हाथ बढ़ाकर हरी धनिया की उन छोटी-छोटी गमकती पुलियों को छूआ,जो अब तक मेरी आँखों के सामने से कुछ नीचे व अधिक दूरी पर पहुँच चुकी थी।वहाँ अब कोई दृष्टिभरम मौजूद नहीं था।वहाँ धनिया के कोमल डंठलों को सहेजे एक दुबली-पतली लड़की की अंगुलियाँ नजर आयी।सींक नुमा बाजुओं की हथेली के ऊपरी हिस्से की नीली नसें उभरी हुई थी।नाखून चटक लाल रंग के नेल-पेंट से रंगे हुए थे,जो अब कोनों से उखड़ने लगा था।



  उसकी गाढ़ी मटमैली पुतलियाँ जैसे मेरी आँखों पर ही अटक गई थी।वह मुझे एकटक देखे जा रही थी,उम्मीदों के कंपित जुगनू निमिष-भर में पलकों पर उठते व गिरते थे।उसकी उम्र करीब तेरह-चौदह वर्ष रही होगी।गले में लिपटे नेट के गोल्डन दुपट्टे को संभालने का कोई शऊर नहीं था,जिसकी वजह से दुपट्टा अपने साम्य में भी नहीं था।दुपट्टे का एक छोर ऊपर कुर्ती के आधा बाजू के पास व दूसरा जमीन को बस छूने ही वाला था।सुर्ख़ नीले रंग पर पीली सरसों के फूलों की छींट का सूट उसके गेहुएँ रंग को ख़ूब निखार रहा था।पैरों में काली वेल्वेट की स्ट्रिप वाली चप्पलें थी जिस पर गुलाबी रंग की बुँदियाँ चिपकी हुई थी।पैरों के आड़े-तिरछे कटे हुए नाखूनों पर भी उखड़ता लाल नेल पेंट अभी भी सजा हुआ था।
  मैं उस लड़की के वजूद में यूँ शामिल हुई कि एकबारगी गर्मी की तपन व दायीं कुहनी में उठती  दर्द की लहर को ही भूल गयी।मैं उसके काले-भूरे बालों की दुर्गति का जायज़ा लेने लगी जो रबरबैंड से टाइट जकड़कर एक पोनी में तब्दील थे।ऐसा लग रहा था जैसे उन्मुक्तता को एक बिंदु पर  बाँधकर झिझकती हवा की शक्ल में छोड़ दिया था।घने बाल जो उसे बेहद हसीन ओ मासूम दिखा सकतें थे,वे बस काढ़ लिए गए थे।उसके व्यक्तित्व में खुबसूरती एक अदद लापरवाही का सबब बन कर रह गयी थी,जो अलग आकर्षण पैदा कर रहा था।
  उसके गुलाबी होंठों पर हल्की बैंजनी रँगत चढ़ी हुई थी।माथे व चेहरे पर पसीने की बूंदे जैसे उसकी अल्हड़ लापरवाही पर शर्मिंदा हो गले पर बहती जा रही थी,जिसे वह दुपट्टे के जालीदार छोर तक से पोंछना भी जरूरी नहीं समझ रही थी।गले में काले धागे से लटकती एक छोटी लाल पोटली थी।जरूर, उसकी माँ अपनी सारी दुआओं व फिक्र का गण्डा बनाकर उसे ख़ुद से दूर भेजने के निरंतर अभ्यास में थी!
 उसकी वे कमउम्र आँखें !..वे आँखें मुझे बेचैन कर गयी...इस उम्र में तो बच्चियां थमना-रुकना जानती ही नहीं।और वह थी कि मुझे अथाह सब्र से देखे जा रही थी।उसे अवश्य ही मुझे लेकर एक संभावित ख़रीदार का कौतूहल रहा होगा जो उसके चेहरे की नमी को बनाये हुए था,"बाईजी! धनिया ले लो न!"अधिकारपूर्ण अनुनय!मेरी डीप ऑब्जर्वेशन करने की मुद्रा भंग हुई।स्वकल्पनाओं से निर्मित मूर्ति जैसे अनायास ही दरक गयी थी..!जैसे हाथ लगाते ही नरम चुम्बक टूट गया था कोई!चुम्बक के खिंचाव से छूटते ही मुझे माथे से बहते पसीने का भान हुआ।गर्म बहती हवा बहते पसीने को छूकर शीतल बूंदों का अहसास करा रही थी।
   पर्स से टॉवल निकालकर फटाफट पसीने को पोछा।इससे पहले कि मैं उसके हाथ से धनिया लूँ,एक दबंग महिला बासी पसीने की दहीली-गंध ओढ़े मेरे सामने आ खड़ी हुई।अच्छी लंबाई के साथ अगर ऊपर वाला किसी को भरपूर सेहत भी बख़्स दें तो वह एक पल के लिए सामने वाले को डरा सकता है।फ़िर वह तो एक अनुभवहीन किशोरी ही थी।वह उसे अपशब्द कहती हुई धकियाते हुए मुझे धनिया देने लगी।मुझसे उसकी वह दबंगई बर्दाश्त न हुई मैंने संयत लेक़िन उखड़कर कहा,"वह पहले आयी है न!"दूसरे पल वह मेरे जवाबी हमले से कुछ अचकचा तो गयी लेक़िन शरीर की भाषा अभी भी अपनी ढीठता बयान कर रही थी।वह हम दोनों के बीच से कुछ पीछे हटी।
  मैंने उसे कनखियों से देखा तो उसके तटस्थ चेहरे पर रुखाई की फांकें नज़र आयीं।उसने लड़की को कटखाई नजरों से देखा फ़िर उसे परे कर "ताजा देशी धनिया..पुदीना ले लो!"का भावविहीन ऊँचा नारा बोलती आगे बढ़ गयी।लेक़िन इसी बीच उसने लड़की पर अपशब्दों की मन्दिम बुहार छोड़ ही दी,प्रत्युत्तर में लड़की ने भी उसे निराश नहीं किया था।यक़ीनन,उस लड़की ने बुद्धि व विवेकानुसार अपनी अस्मिता के सम्मान के लिए और व्यवसाय में बने रहने के लिए प्रचलित मानसिक-हथियार चुनने शुरू कर दिए थे!
  सामने फल बेचने वाली महिला की निगाहें जब इस दृश्य को देखते हुए मुझसे टकराई तो वह लापरवाही से कंधे उचकाकर मुस्करा पड़ी।मुस्कराहट हमेशा उत्साह नहीं बढ़ाती है यह कई बार गलती का अहसास भी कराती है! वैसे भी यह तो किसी भी सब्जीमंडी की एक बहुत ही आम घटना थी,जहाँ ग्राहकों को आकर्षित करने व मान-मनोवल करने के विक्रेताओं के अपने तौर-तरीक़े थे।शायद मैंने ही ओवर रियेक्ट कर दिया था।


  मैंने लड़की को दस रुपये देकर धनिया खरीदा।उसने जल्दी से उस नोट को दोनों पलकों पर लगाकर माथे से नवायां तो मुझे उसके कंधे से लटके छोटे काले झोले की रिक्तिकता का अहसास हुआ।जिम्मेदारियाँ जैसे वहाँ उसका मुख ताक रही थी,जो बोहनी देखकर जरूर आश्वस्त हुई होगी।"दो और दे दो..चटनी बनाऊँगी!'मैंने उसकी सूखे होंठों को देखते हुए कहा।वहाँ निष्कलुष स्मित मुस्कान की मुझे प्रतीक्षा थी,जो मुझे बेलौस मिली भी।मैंने जमीन की तरफ गिरते उसके दुपट्टे के छोर की तरफ इशारा किया व मौन रवानगी ली।वह अपने समूह के पास चली गयी,जो शायद उसके ही क्षेत्र के परिचित लोग थे।
  घर आने के बाद भी मैं उन दोनों के बीच के उस आपसी पेशेवर तनाव व प्रतिस्पर्धा को भूल नही पायी।न जाने क्यों..उन दोनों के बीच आँखों की मूक तीख़ी तक़रार मुझे असहज व बेचैन बना रही थी।हालाँकि वह धकेलना और वह शाब्दिक-फूहड़ता उस दबंग दिखती महिला की कोई बेअदबी नहीं थी,वह महज़ उसके दैनिक व्यापार का एक व्यवहारिक हिस्सा भर ही था।हम सब भी तो जीवनभर यही करते हैं।सुविधानुसार रिश्तों की सीमाओं को व्यापार में बदल देते हैं।कभी अपनी जरूरत के नाम पर, कभी शर्तों के नाम पर झुकाना,कभी छद्म भावनाओं के जाल बिछाकर तो कभी सार्वजनिक तौर पर निर्मम न्यायाधीश बनकर भी।
   कुकर की लगातार बजती सीटियों ने मुझे ध्यान दिलाया कि मैं फिर से अपनी रौ में बहे जा रही हूँ।इस तरह के अप्रत्याशित मानवीय व्यवहार के प्रति मेरे भीतर एक बेचैनी आकार लेने लगती है,जो एकांत पाते ही आत्मसंवाद में बदल जाती है।इस सतत संवाद में विचारों का टूटना असम्भव जान पड़ता है,फिर कोई वर्तमान घटना ही मुझे उस विचार-शृंखला से मुक्त करती है।डिनर पर इस घटना का ज़िक्र होते-होते रह गया।बेटी के डिबेट कम्पटीशन की चर्चा पर पिता-पुत्री दुनिया से बेखबर थे।मैं व बेटा भी उनके साथ शामिल हो गए..उन्हें ध्यान से देखने- सुनने लगें।पिता को संततियों के दोस्त के रूप में देखना भी अलग ही सुकूँ व सुरक्षा देता है।
  वक़्त के साथ सब्जीमंडी की वह घटना तो मेरे ज़ेहन से धूमिल होती चली गई लेकिन वह लड़की नहीं!उदयपुर शहर के देहली-गेट क्षेत्र की वह सब्जीमंडी शहर की दूसरी मुख्य सब्जीमंडी है,जो मेरे घर से बहुत दूर पड़ती है सो दैनिक ख़रीदारी के लिए वहाँ नहीं जा पाती हूँ।मेरे क्षेत्र में भी भरपूर ताज़ी सब्जियाँ उपलब्ध हैं,कभी मार्केट के अन्य काम होते तो ही लगे हाथों उस सब्जीमंडी की तरफ़ भी जाना होता है।
  उस क्षणिक मुलाक़ात के बाद उस सब्जीमंडी की तरफ बढ़ते कदम मेरी पुतलियों को अपने उद्देश्य से कुछ भटकाने लगते थे।हम दोनों के बीच एक अबोला लेकिन सहज सम्बन्ध जैसे आप ही बनता चला गया।हरे धनिया के अलावा अब उसके बड़े लाल बैग में पुदीना,हरा लहसुन,मैथी,हरी मिर्च,नींबू व पालक भी मौसम के अनुसार मिलने लगा था।
  कई बार मन हुआ पूछुं कि क्या वह स्कूल नहीं जाती है,कहाँ रहती है आदि।लेक़िन अगले ही पल सोचने लगती ..अगर वह स्कूल नहीं जाती होगी तो मैं क्या विशेष कर लूँगी।मुझे अपनी अति भावुकता पर यथासम्भव नियंत्रण रखना चाहिए।महीने के अंत तक पति की निश्चित आय को कैसे सन्तुलित करती हूँ...यह मैं ही जानती हूँ।
  फ्लैट की मासिक क़िस्त की देनदारी के अलावा दो बच्चों व माँ-बाबूजी के स्वास्थ्य का ध्यान रखना हमारे लिए कोई इजी टास्क नहीं था।अगर उसकी पढ़ाई के लिए कुछ बन्दोबस्त भी कर दूँगी तो घरवालों के सहयोग के बिन यह बच्ची क्या कर लेगी!अगर घरवाले इसे पढ़ाने के इच्छुक होते तो वह पढ़ने-लिखने की उम्र में यूँ अजनबियों के बीच जिंदगी के सौदे नहीं सीख रही होती!
  कई बार सोचती कि उसे अपनी सोसाइटी में काम दिला दूँ,ताकि एक बंधी हुई रकम उसे हर माह मिल जाएं।यह योजना भी अगले ही पल पति की कड़क व्यवहारिक सीख पर रुक जाती ,"उसे कितना व कब से जानती हो..जानती तो हो कि जमाना बहुत खराब है,हमारे घर पर जो बाई जी आती हैं वे पड़ोसी की बाई की रिश्तेदार हैं।उसका मुहल्ला ,गली तक हम जानते हैं,इसलिए पीठ पीछे भी निश्चित रहते हैं।"सब्जी खरीदती हुई अगर मैं अकेली होती तो हमारे बीच का यह लोक- व्यवहार सहज होता लेकिन अगर कोई पड़ोसन साथ होती तो स्थिति कुछ हास-परिहास की होने लगती।"क्या यह तुम्हारी रिश्तेदार है जो उसी को खोजती हो!"मैं निरूत्तर हो जाती।हर रिश्ता,हर अहसास अपनी पहचान भी तो नहीं बता पाता है।
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  वह अक्टूबर की एक गुनगुनी-गुलाबी ढलती दुपहरी थी,जिसे मैं गणगौर-घाट किनारे बने 'अमराई'रेस्तरां की झरोखेनुमा खिड़की के पास बैठ गर्म कॉफी के साथ घूँट-घूँट गटक रही थी।इस रेस्तरां की बनावट खुले आँगन का अहसास देता है,जो झील की तलहटी से उठती नीरवता व रेस्तरां की गुनगुनाहट के बीच भी हमारे हिस्से का एकांत हमें थमा देता है।उस दुपहरी,मैं सखियों द्वारा आयोजित एक मिनी लंच-पार्टी का हिस्सा थी।मैं सखियों के लतीफ़ों-ठहाकों से नजरें चुराकर रेस्तरां की उस खिड़की से झील की बहकती चमकदार लहरों में गोते लगा लेती थी।जहाँ अब धीरे-धीरे  सूरज की सुनहली किरणों की लौ कम हो रही थी।लंच-पार्टी शाम क़रीब साढ़े चार बजे खत्म हुई।


  खिड़की से आती शीतल बयार ने हमारे गर्म कपड़ों को कुर्सियों की पीठ से उठाकर अपनी पीठ पर लादने की सलाह दी।हमने रेस्तरां से निकलकर दूधतलाई झील के चक्कर काटते हुए पिछोला झील किनारे कुछ अतिरिक्त समय गुज़ारने का फैसला किया। उस मौजभरी मुलाक़ात को खत्म करने की कोशिशों में हमारी बातों के अंतिम सिरें और अधिक बंटते जा रहे थे।एक लंबे समय के बाद हुई उस स्नेह-मिलन में भागते समय का भान नदारद हो चुका था।लेकिन जब सूरज क्षितिज पर गाढ़ा-पीला होने लगा तो सखियाँ घर जाने के लिए उद्दत हुई।लेक़िन मैं डूबते सूरज को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाई।
  दोनों बच्चे उस शनिवार की रात नानी के घर पर थे और हसबैंड टूर पर।सो मैं अगली शाम तक कुछ जरूरी जिम्मेदारियों से एक तरह से फ्री थी,इसका अहसास सखियों को बखूबी था।तो किसी ने लम्बी आह भरकर तो किसी ने सामान्य हो मुझे 'टेक केअर,डार्लिंग!"कहकर विदा ली।नहीं, मुझे कहना चाहिए अधिक 'सावधान' करके चली गयी।मैं बेंच से उठकर झील किनारे बनी बंशियों के सहारे खड़ी हो सामने सूरज को देखने लगी।कुदरत ने कुछेक नामचीन झीलें मेरे  शहर के दिल की शक्ल में भेंट की हैं,इन झीलों के रुके गहरे पानी के भीतर डूबते सूरज को देखना जिंदगी को महसूसना है,सुकूँ तलाशना है।
  हल्की ठंड को ओढे वह शाम जल्दी ही उदास अकेली रात में बदलने वाली थी।मैंने वूलन स्टॉल को पर्स से निकालकर कानों को ढकते हुए लोंग-कार्डिगन के भीतर व्यवस्थित किया।फ़िर बंशियों पर पीठ कर दोनों कुहनियाँ टिका दी।अब मेरे सामने सीमितता में बंधी दूधतलाई झील व पीठ पीछे विस्तीर्णता का अहसास कराती पीछोला झील थी,जिसकी गहरी गोद में अब बोटिंग होने लगी थी।इन दो झीलों के बीच की आयताकार नुमा सड़कों पर पर्यटकों व स्थानीय लोगों की आवाजाही खूब बनी रहती है।
   सामने करणीमाता मन्दिर की ओर जाती सड़क पर कामगारों की तेज़ चलती टोलियाँ दिन भर की थकन को बतकहियों में लादे अपने गंतव्य को लौट रही थी।केबल-कार के द्वारा करणीमाता दर्शन से लौटे श्रद्धालुओं के समूह भी दोनों झीलों के इर्दगिर्द जमा होने लगें थे।शहर के झील-प्रेमियों का झीलों की तरफ़ जब-तब दौड़ पड़ना भले ही एक आम रवायत हो,लेक़िन यही प्रेम इस शहर का मुख्य चुम्बकीय आकर्षण है जो उस धुंधलाती शाम में भी दर्ज़ होने लगा था।
   सूरज की गति को मनुष्यों से बेहतर पशु-पक्षी समझते हैं।वे भी अपने नीड़ों की तरफ मुख़ातिब थे।दूधतलाई झील के ऊपर झुके घने दरख़्तों के झुंड किसी मायावी स्याह घटाटोप का भरम पैदा कर रहे थे।इन दरख़्तों के चारों ओर उड़ते चमकादड़ों की तीखी आवाजें पहाड़ों से टकराकर अनुगूँज पैदा कर रही थी,जो डालियों पर रेन बसेरे हेतु कब्जे की एक आम जद्दोजहद थी।जिसकी जितनी अधिक शारीरिक सामर्थ्य व त्वरा निर्णय की कूवत...उतनी ही जल्दी रेन -बसेरा पाने में सफलता मिलना भी उन पाखियों के संसार का अघोषित नियम है।
   घनी होती रात के साथ ही ये सब काले पतंग से दिखते जीव धीरे-धीरे आसमान से गायब हो जाएंगे।दरख़्तों की डालियां भी बखूबी समझने लगीं थी कि ये परिंदे पूरी रात कब्जेदारी के इरादे से पधारे हैं,सो उन्होंने भी अधिक झुककर जैसे आत्मसमपर्ण कर दिया था।इंसानों की सभ्य बस्ती हो बस्ती से इतर सभी चरों की अनदेखी दुनिया..हर जगह शक्ति प्रदर्शन के बगैर क्या कोई हुकूमत करें,क्या कोई सहज समर्पण स्वीकार करें!बगैर संघर्ष के तो कोई भी प्राणशक्ति इस संसार में जन्म भी नहीं ले सकती है,फिर जीवन-यापन कैसे सरल व सहज हो!
    मैंने अपनी पीठ की दिशा बदल ली।सामने पीछोला झील के ऊपर पीतवर्णी सूरज देखते ही देखते बहुप्रतीक्षित स्वर्णमयी सूरज में बदला गया।उसकी चमकीली पीली किरणें काले बादलों के झुरमुटों के मध्य स्वर्णभस्म सा बिखेर रही थी।कैसा तो तिलिस्म उभर रहा था दूर आसमान में!!धीरे-धीरे डूबता सूरज नारंगी-लाल बिंदी की मानिंद क्षितिज में दमक रहा था।एकबारगी लगा जैसे किसी सद्यः विवाहिता ने पहली बार अपने उजले भाल को सुहाग चिह्न से आलोकित किया हो।मैं डूबते सूरज के सम्मोहन में इस कदर डूबी थी कि चिड़ियों की कम होती चहचहाहट की तरफ कोई ध्यान ही न रहा।
 अचानक लुप्तप्रायः सूरज पर गाढ़े लाल रंग की काली लकीरें सी उभरने लगी जो गहराती रात का संकेत था। अब डूब चुका सूरज अकेली महिलाओं को भी जल्दी घर पहुँचने की ताक़ीद करने लगा था।एकाएक मेरे भीतर सजगता ने जैसे करवट ली,मैंने भी अपनी राह पकड़ने में ही भलाई समझी।हम स्त्रियों के अकेले होने की सूचना मिलने पर शाम भी जैसे हिचकती हुई पास आने लगती है।रास्ते में फल-सब्जी खरीदते हुए शाम के सवा सात बज गए थे।अपने-अपने ठियां की तरफ लौटते वाशिंदों से लबरेज़ ट्रैफिक अपने पूरे शबाब पर था।सर्दियों की शाम कब एक अजनबी रात में बदल जाएं पता ही नहीं चलता है!
  देहली-गेट चौराहे पर हरी बत्ती हो जाने का इंतज़ार करते हुए मेरी निग़ाह सड़क के दायीं तरफ अनायास चली गयी।वहाँ खड़ी एक दुबली-पतली छोटी काया बेसब्री से इधर-उधर देख रही थी।दोनों कमज़ोर बाजुओं को अपनी दुबली देह के इर्दगिर्द भींचकर जैसे ख़ुद को हौसला दे रही थी।कँधे पर एक लगभग खाली हो चुका बड़ा झोला था।वह चौराहा उसी सब्जी-मंडी से पहले पड़ता था।अरे!यह तो वही लड़की थी!!कलाई से ऊपर खींचते छोटे स्वेटर के साथ शायद वही नीला सूट पहना हुआ था,सर्दी को आँख दिखाने की कोशिश करता हुआ गर्म शॉल सिर ढककर लपेट रखा था।वह चौकन्नी लेकिन सिमटी हुई थी।क्या वह अब इस गहराते अँधेरे को ज़्यादा समझने लगी थी जो इधर-उधर देखते हुए इस क़दर बेचैन थी ?..क्या वह बिल्कुल अकेली है?उसके समूह के लोग कहाँ हैं?–यह सब उधेड़बुन दिमाग में उपज ही रही थी कि पीछे से गाड़ियों के तेज हॉर्न मुझे घूरने लगें।
  मैंने अपनी कार किनारे लगा दी।वह दूसरी तरफ मंदिर के पास बहुत कम रोशनी में घबराई खड़ी थी।सो उसकी बेचैनियों को चेहरे के बनिस्बत उसकी देह पर मैं देख सकती थी।मैं उसे स्ट्रीट लाइट के उजाले से भरपूर पुंज में देखना चाहती थी,जो कुछ ही फलाँग की दूरी पर था।लेकिन शायद वह आज पहली बार अकेली इतनी देरी से घर जा रही थी तो अभी तक उस जगह विशेष के सुरक्षित बिंदुओं के प्रति सजग नहीं थी।मुझे लगा कि अब यूँ समय न बर्बाद करते हुए उसके पास पहुंच जाना चाहिए व उसका गन्तव्य पूछना चाहिए।मेरी सोच इससे पहले क्रियान्वित हो..एक मजबूत कद काठी की महिला का साया उसके समीप लहराकर आकर खड़ा हो गया!
   यह भी वही दबंग महिला थी!मेरी पुतलियाँ जो अब तक उस अँधेरे-उजाले के बीच अपने लक्ष्य के प्रति अपनी ग्राह्यशीलता विकसित कर चुकी थी,मुझे कौतूहल के साथ घबराहट देने लगी थी।महिला ने उसे देखा..उसने भी उसे देखा।दोनों के बीच एक अनमनी लहर उठकर फ़िर शांत हो गयी।महिला यंत्रचलित सी स्ट्रीट लाइट के नीचे जा खड़ी हो गयी..यह क्या! वह लड़की जैसे मंत्रविध सी उसके पीछे हो ली थी।
  भरपूर रोशनी के नीचे भी उन दोनों ने अपनी दूरी को व्यवसायिक-प्रतिद्वंदिता की तरह ही बरकरार रखा हुआ था।अब उनके चेहरे आती-जाती गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी में दिख रहे थे।लड़की ने उसे फिर देखा,लेक़िन बोल न फूटे !उनके बीच कोई फीकी मुस्कान तक की अदला-बदली नहीं हुई थी,रत्तीभर भी नहीं!दोनों के ही मुखमंडल पर अनिश्चितता के बादल थे।बातचीत की पहल के कोई भावी आसार नहीं।क्या पता,आज दिनभर में फिर दोनों ने न जाने कितनी बार एक दूसरे को कच्चा चबाने वाली नज़रों से देखा हो!दोनों ही अलग दिशाओं में देख रही थी..जैसे उनकी मंजिले भी अलग-अलग व बहुत दूरी पर थी।उनकी देहों के बीच एक तीखी असंबद्धता आकार ले रही थी।इतना जीवंत निर्विकार भाव !अब मेरी घबराहट मेरे कौतूहल पर भारी पड़ने लगी थी।


   लेकिन कालांश के भीतर ही मेरे देखते-देखते वह निःशब्द-दृश्य जैसे करवट लेने लगा था!उनके बीच की दूरी को जैसे समय अजगर बनकर अपने आगोश में तेजी से ले रहा था।वह लड़की धीरे-धीरे उस महिला के समीप खिसकती जा रही थी और महिला उसके समीप!जैसे महिला अँधेरे में घूरती नजरों से उसे महफूज़ रखने की अंतिम कोशिश कर रही हो।अब वे दोनों एक ही दिशा को घूर रही थी।
  तभी एक ऑटो आया उस महिला ने ऑटो पर लिखे रूट-नम्बर को पढ़कर लड़की से कुछ पूछा।सिर्फ़ चंद अल्फ़ाज़ की निहायत ही औपचारिक तरीके से अदला-बदली हुई।महिला ने ऑटो वाले को दायीं तर्जनी से कुछ हिदायतें दी और ऑटो की रवानगी के साथ ही ख़ुद विपरीत दिशा में लम्बे डग भरती हुई चली गयी।पता नहीं,उस लड़की ने मुख से धन्यवाद भी फूटा था या नहीं।पर हाँ,ऑटो में प्रवेश करती हुई उसकी देह लहराकर स्थिर जरूर हुई थी।कुछ ही पलों में वहाँ छाता हुआ वह अंधेरा..वह डर एकदम नदारद था!किसी हमजात के पास आता अजनबी अंधेरा इस तरह से भी कम किया जा सकता है–इस विचार ने मेरी अँगुलियों की पकड़ को स्टेयरिंग पर अधिक मजबूत कर दिया।

 ***
 अगली सुबह बॉलकनी में चिडियों की तीखी चहचहाट ने जगाया।वे दाना बिखेरने की याद दिला रही थी।रोज़ाना की तरह चाय लेकर उनसे नियत दूरी पर बैठ गयी।मैं देख रही थी कि एक मुटुल्ली बड़ी चिड़िया दूसरी सिकुड़ी छोटी चिड़िया को डाँटती हुई बिखरे दानों से परे कर रही थी।मैं हैरान थी कि संसार की सारी बोलियाँ अपने भीतर कितने अनबूझे संकेतो को छिपाए रहती हैं।मुझे उस वक़्त बहुत अफसोस हुआ कि शौकिया जर्मन भाषा सीखने में जो मैंने इतनी मेहनत व पति के पैसों का पेट्रोल जलाया था,वह निरर्थक ही रहा।उसके बदले में यदि किसी ने मुझे सभी चिड़ियों की भाषा सीखा दी होती तो आज यह जान पाती कि आखिर उस मुटुल्ली चिड़िया ने उस सिकुड़ी चिड़िया को ऐसा क्या धमकाया कि वह बेचारी दाना चुगना छोड़कर ऊपर की रैलिंग पर बैठ दूर शून्य को ताक रही थी।लेक़िन मुटुल्ली चिड़िया के हटते ही वह सिकुड़ी व अन्य दो अन्य छोटी चिड़ियाँ आकर बॉलकनी की उस चौड़ी दीवार पर काबिज हो जाती।मैं यह सब देख मुस्करा पड़ी।
  चिड़ियों की उन्मुक्त फरफराहटों के बीच वे दोनों स्त्रियाँ सड़क के कल रात के अंधेरे से निकलकर मेरे सामने फिर खड़ी हो गयी।कभी एक दूसरे की ओर आती हुई..गुर्राती हुई..कभी ढिठाई से पीठ दिखाती हुई।ख़तरे की गंध पर अबोलापन अचानक इस कदर मुखर हो सकता है,यह पहली बार साक्षात महसूस हुआ था।उस लड़की व महिला का अनायास ही अँधेरे में खामोशी से समीप चले आना,महिला का उसे सायास ओट देना,ऑटो के जाने तक पूरी सुरक्षा देना..सारे दृश्य चलचित्र की भाँति मेरे सामने से गुज़र गए।कल शाम के वे दृश्य मुझे मुस्कान के साथ सिहरन दे रहे थे।
   मुस्कान के साथ सिहरन!!हाँ!यही उस शाम का वह कटु सत्य था जो मुझे कचोटने लगा था।वे दो स्त्रियाँ जो दिन के उजाले में पेशेवर शत्रु की तरह थी ,एक दूसरे को कटखाई नज़रों से घूरने वाली,शाब्दिक फूहड़ता के चरम पर भी..लेकिन रात के अँधेरे में छिपे ख़तरे ने उन्हें एक कर दिया था।तब उनके देह की मूक भाषा एक हो चली थी।हर प्राणी की भावभंगिमा उसकी आत्मा की मूक बोली होती है।चाहे वह झील किनारे के दरख़्तों पर रेन बसेरे करते उन पक्षियों की हो जो कुछेक डालियों की अस्थायी साझेदारी में सुरक्षित थे।या ये तीनों सिकुड़ी चिड़ियाँ,जो दाने की विनम्र साझेदारी कर विजयी हैं।ये सभी मूक प्राणशक्तियां अपने अँधेरों में साझेदारी करके जीवन संघर्ष के सम्मान को अक्षत रखें हुई हैं..और हम स्त्रियाँ!!
  

हम स्त्रियों के हिस्सों के उगते सूरज अलग-अलग अवश्य हो सकते हैं लेकिन चिर-परिचित राह हो या नितांत अपरिचित ..सभी पर ढलते सूरज की परछाई का रंग एक ही होता है।स्त्री-जीवन पर पड़ने वाली यह परछाई एक बहुरूपिये अंधेरे की तरह उपस्थित रहती है।स्त्री-जीवन से जुड़े सभी भय,आशंकाएँ हमेशा एक से ही होते हैं।तमाम हव्वाओं की चीख,बेबसी व घुटन की शक़्ल भी एक सी ही होती होंगी।सभ्यता के आरम्भ से ही इस बहुरूपिये अंधेरें की भाषा के सभी हिज्जे एक समान हैं,लेक़िन हमने हमेशा संकीर्ण हो इसकी तरफ भयभीत होकर पीठ की है।ये अंधेरे हम स्त्रियों के सामूहिक हैं,लेक़िन हम कभी कोशिश ही नहीं करती हैं कि अँधेरों के इन हिज्जों को सामूहिक रूप से पढ़ भी लें,एक बार कोशिश ही कर लें।

   स्त्री-विषयक हर छोटे-बड़े मुद्दे पर खेमों में बंटने वाली हम आज की स्त्रियाँ भी स्वयं की त्रिशंकु- स्थिति को कहाँ देख पाती हैं।एक दूसरे की अस्मिता व शुचिता का ख्याल रखना ही प्रत्येक स्त्री के लिए सही अर्थों में जागरूक व संवेदनशील होना है,यही आधुनिक स्त्री-विमर्श को सकारात्मक मंच दे सकता है।लेक़िन दुर्भाग्यवश अक्षर ज्ञान से वंचित व अपने अधिकारों के प्रति सजग न रह पाने वाली स्त्रियों की तो छोड़ो,मॉडर्न व हाईली एजुकेटेड कही जाने वाली स्त्रियाँ तक भी उजालों की तरह अपने हिस्से के इन सामूहिक-अँधेरों को भी विभाजित करके अधिक अकेली पड़ने लगती हैं,जबकि यह तो अधिकाधिक साझा किए जाने चाहिये।सामूहिक-अँधेरों के हिज्जों का सामुहिक-पाठन एक दूसरे के पोर को बस..छूकर ही तो करना होता है।संकीर्ण होकर नहीं,विस्तारित होकर ही।स्वार्थी होकर नही,दयालु होकर ही।प्रत्यक्ष न सही.. आभासी ही सही...!
  कुछ अनुभव आँखों से गुजरते भर नहीं हैं वे आत्मा में कहीं बहुत गहरे धँस जाते हैं।वे बार-बार जीने-समझने लायक होते हैं न कि याद रखने की कोशिशों में भूलने लायक।वह अनुभव भी मेरे लिए कुछ इसी तरह का था।मैं फ़िर अपने एकांत में आत्मसंवाद पर उतारू थी।मुझे अब धूप-छांव के नए रंग में उन दोनों के लगाव -दुराव को देखना था।क्या उन्होंने कल रात के बाद सामर्थ्यनुसार अपने सामूहिक-अँधेरों की साझेदारी में व्यक्तिगत भूमिका को रत्तीभर भी समझने की कोशिश की होगी!जानती थी कि जब वे दोनों फिर मिलेंगी तो मैं अपनी जिज्ञासा के बाबत संकोचवश उनसे कुछ नहीं पूछ पाऊँगी।हो सकता है वह गहराती शाम उनके लिए महज़ एक इत्तेफाक बनकर विलीन हो गयी हो।लेक़िन मुझे एक नयी उम्मीद से उन्हें जी भरके देखना था,मैं सब्जीमंडी की उन सँकरी गलियों में जाने के लिए उत्कंठित हो चली थी।


मंजुला बिष्ट





वर्तमान में उदयपुर (राजस्थान) में निवास कर रही मंजुला बिष्ट की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं , साहित्यिक पोर्टल तथा ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी हैं ।

ईमेल आईडी-bistmanjula123@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. स्त्रियों के सामूहिक अंधेरों को एकसाथ पढ़ने की कोशिश करनी ही होगी फिर चाहे मुटल्ली चिड़िया सूकड़ी चिड़िया पर कितना ही रौब जमाती हो!
    कहानी के अंत में आत्मसंवाद कुछ भारी हो गया !

    जवाब देंहटाएं
  2. कहानी अच्छी है मन्जुला जी। आपकी विषय पर पकड़ बनी रही। स्त्रियां एक भी होती हैं।
    किसी की अति समीपता वाकई उसका असली चेहरा नहीं दिखाती थोडी दूरी आवश्यक है।

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  3. आपको हार्दिक बधाई मन्जुला जी

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर कहानी है। मंजुला जी को बधाई और शुभकामनाएं 💐

    जवाब देंहटाएं

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