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कविता की जरूरत

 कविता की जरूरत


असुंवन जल सींच सींच

प्रेमबेलि बोई,

अब तो बेलि फैल गई

होवे सो होई।


यह मीरा के एक पद का छंद है। मुझे किसी क्षण सहसा स्मरण हो आया। बार- बार स्मृति में उभरता रहा। यह कविता है। एक आत्यंतिक अनुभूति की समूर्त अभिव्यक्ति। एक जीवंत बिम्ब और निर्भय वक्तव्य- होवे सो होई। क्या यह सिर्फ भक्ति- भाव है। नहीं, यह सामंती पतनशीलता और जकड़न का तीव्र प्रतिकार है। असुंवन जल सींच -सींच, वेदना का आर्तराग। शताब्दी गुजर गयी, इतिहास का गर्द- गुबार बार-बार उठा और बैठ गया। मीरा की प्रेम- बेलि अभी तक हरी- भरी है, सदाबहार है।


लेकिन प्रश्न यह है कि कोई कविता मैं क्यों पढता हूं? यदि कविता में मेरी किंचित दखलंदाजी न हो तो भी क्या मैं कविता पढूंगा? इस तरह यह प्रश्न देखेंगे तो हमें बहुत काम की बात नहीं मिलेगी। रचनाकार चूंकि सृजन का सोच- विचार कर चुनाव करते हैं, अतः कविताएँ पढना एक तो उनके अध्ययन का हिस्सा है, दूसरे उनकी उत्सुकता का विषय। मसलन, अपने रचनाकार का विकास करने के लिए वे अपने पूर्ववर्तियों और क्लासिकों का अध्ययन करते हैं। उत्सुकतावश समकालीनों का और प्रायः राय- मशविरा देने के लिए नये रचनाकारों का।


यहाँ सृजन की दुनिया के सदस्य से इतर हमें अपनी निजी रुचियों में झांकना होगा। हमारी रुचि की कविताएँ और पसंद के कवि। क्या यह सिर्फ रुचि और पसंद का शौकिया मामला है या जरूरत? नहीं, इतना सरल- सीधा प्रश्न नहीं है। हमारे भीतर कोई कोना रीतता है और वह कविता की मांग करता है। कोई कविता हमारे सामने आती है और सहसा अंतर में प्रवेश कर अपनी कोई जगह बना लेती है। मुझे याद आता है, मेरी मां की मृत्यु हो गयी थी। मौहल्ले- पडौस की औरतें उन्हें अंतिम- संस्कार के लिए तैयार करने लगीं। मैं कठोर ह्रदय एक तरफ चुपचाप बैठा था। परिवार के सब लोग रो रहे थे। पर पता नहीं क्यों मुझे रोना नहीं आ रहा था। शायद लोगों का इस बात पर ध्यान भी जा रहा था। इससे मुझे और असजता हो रही थी। औरतों ने मां के शव को नहलाते हुए एक गीत गाना शुरू किया- तू तो गयी री सखी माटी के मोल री। अब एक यही बोल याद रह गया है। इसमें कहा है, तूने जीवन में जद्दोजहद कर इतना कुछ जुटाया। क्या नहीं था तेरे पास, फिर भी हे सखी, तू माटी के मोल चली गयी। ये बोल मुझे भीतर तक हिला गये और मैं फूट- फूटकर रोने लगा। यह मेरे तब तक के जीवन में सुना सर्वश्रेष्ठ गीत था।


"और तभी से मेरी ग्रामीण स्त्रियों द्वारा गाये जाने वाले गीतों में रुचि उत्पन्न हुई। पता चला शोक और कई बार धार्मिक अवसरों पर स्त्रियाँ ऐसे गीत गाती हैं। राजस्थान के बहुत बड़े क्षेत्र में इन्हें निरगुन कहा जाता है। मतलब सिर्फ कबीर और कुछ संतों तक ही निर्गुण काव्य सीमित नहीं है। काश, इन गीतों का संचयन कर सांस्कृतिक अध्ययन हो पाता। "


बहरहाल, हम कविताएँ पढते हैं लेकिन सिर्फ वे ही नहीं हैं जो कुछ पत्र- पत्रिकाओं में छपती हैं। हमारे देश का बहुलांश इस प्रिंट ( और अब सोशल) मीडिया की परिधि से परे है। इस बहुलांश जनता का भी एक बड़ा हिस्सा निरक्षर है। इसलिए पत्र -पत्रिकाओं (और सोशल मीडिया) में छपने वाली कविताओं के आधार पर दिये गये निष्कर्षों से इस देश की जनता की काव्य- अभिरुचि और कविता के प्रयोजन की बहुत दरिद्र और निराशाजनक तसवीर सामने आयेगी। जबकि कविता इस देश के सुदूर अंचलों में बसी मेहनतकश जनता के जीवन और संवाद में रची- बसी है। वहाँ लोक- सृजन की समृद्ध धारा बहती रही है ( जो अब क्षीण होने लगी है।)। इसलिए पढी जाने वाली मुद्रित कविता के बारे में कोई सार्थक सोच- विचार करना है तो हमें लोक- सृजन को बराबर ध्यान में रखना होगा। फिर यह प्रश्न बेमानी है कि कोई कविता मैं क्यों पढता हूं। पढता ही नहीं क्योंकि पढना आता ही नहीं। मैं तो सुनता हूं- अवधूत जीवन की गति न्यारी !     

      


कविता से मेरी अपेक्षाएं क्या हैं ? एक समीक्षक के नाते नहीं, एक लेखक के रूप में नहीं और एक सुधी पाठक के रूप में भी नहीं।‌ सुधी पाठक वह व्यक्ति है जो प्रायः रचनाकारों के संसर्ग में रहता है, उन्ही जैसी भाषा बोलता है किन्तु दुर्योग से खुद रचनाकार न हो सका है। यह पहले जमाने का सह्रदय नहीं है जिसके मन में कवि- लेखक होने की कोई प्रच्छन्न अथवा दमित आकांक्षा नहीं होती  थी, जो सिर्फ रचनाओं का निर्मल आस्वादन करता था। बहरहाल, मैं एक साधारण मनुष्य के रूप में कविता की अपेक्षाएं टटोलना चाहता हूँ। आषाढ की किसी दोपहर को कुछ खेतिहर इकट्ठा होते हैं। अपने दुख- दर्द की बात करते हैं। बढते कष्ट और मुक्ति की कोई राह नहीं। यही है जीवन- जूझना ही होगा। फिर एक खेतिहर के मुंह से इसी अभिप्राय के बोल फूट पडते हैं। यह कबीर, तुलसी या किसी और कवि की पंक्ति हैं। फिर खेतिहरों की संवाद- भाषा बदल जाती है। आधा गद्य और आधा पद्य। पद्य इनका नहीं है- हमारे संत कवियों का है। लोक कवियों का है। लेकिन हमारे इन मेहनतकशों की श्रमरत जिंदगी और भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्ति दे रहा है। दोपहर खत्म हुई और खेतिहर पुनः उत्साह से अपने कठिन काम में जुट गए।


देहाती जिंदगी से एक और उदाहरण। हमारे अपने गाँव में तो कोई कवि नहीं था। एक आशु- कवि जरूर थे पर उसकी बात फिर कभी। आसपास के गाँव में तीन कवि थे। एक बगधारी गाँव के बुद्धा ठाकुर थे जिनकी बारहमासी और बाढ पर लिखी कविता बहुत मशहूर थी। बांसी के घनश्याम निडर अपने हास्य और छंद की खास विधा सपरी के कारण लोकप्रिय थे। तीसरे अंधियारी के भंवरस्वरूप भंवर थे। इन कवियों की बाकायदा राजनीतिक संबद्धताएं थी। बुद्धा ठाकुर और भंवर जी कांग्रेसी थे, जबकि निडर सोशलिस्ट थे। ब्रज भाषा अकादमी बनी तो उसने वरिष्ठ कवियों पर मोनोग्राफ निकालना तय किया। तब तक बुद्धा ठाकुर और निडर तो गुजर चुके थे, भंवर जी पर मोनोग्राफ के लिए मुझसे आग्रह किया गया। इस सिलसिले में मैं कई दिन उनसे संपर्क में रहा।


भंवर जी स्वतंत्रता सेनानी रहे, चूंकि गांधीवादी थे तो समाज- सुधारक भी। आज जैसी कि सच्चे गांधीवादियों की स्थिति है कि उन पर बहुत से लोग हंसते हैं, ये बनना शुरू हो गयी थी। भंवर अपने गाँव से कभी- कभार आसपास के गाँव में यूं ही घूमने निकलते। मैं भी उनके साथ हो लेता। एक बार खेतों के बीच पगडंडी से गुजर रहे थे। कुछ औरतें एक जगह इकट्ठी थीं। उन्होंने काका भंवर को आवाज देकर बुला लिया। वे हंस- हंस कर उनसे महतरानी वाली कविता सुनाने का आग्रह कर रही थीं। उन्होंने सुनाना शुरू किया-

नांय घर में टपकाऊ पानी

सबकै हा- हा खाय

कुआं पर खडी महतरानी...


दृश्य यह है कि एक मेहतर ( वाल्मीकि समुदाय की) स्त्री कुंए पर खडी सभी स्त्री- पुरुषों से अपनी मटकी भर देने के लिए आग्रह कर रही है। ( गाँव में तब मेहतरों के लिए अलग कुआं नहीं था। और वे सामान्य कुंए पर चढकर पानी भर नहीं सकते थे।) पुरुष उसे डांट- डपट रहे हैं कि उसके सुअर उनकी खेती को नुकसान पहुंचाते हैं। कुछ लोग हर गंगे कहते नहा रहे हैं लेकिन महतरानी की ओर उनका ध्यान नहीं है जिसके घर में एक बूंद पानी नहीं है। अंत में एक बुढिया को उस पर दया आ जाती है। महतरानी पानी लेकर घर पहुंचती है तो उसका पति उसे गुस्से से डांटता है कि इतनी देरी क्यों लगायी, किस यार से बात कर रही थी।


कविता सुनाकर भंवर स्वरूप तो सहज हो गये। लेकिन उन औरतों के चेहरे पर विवश उदासी की छाया घिरी थी। एक- दो औरतों की तो आंखों में आसूं छलछला आये थे। हम वहाँ से चल दिये।


इस बार एक अलग गाँव था। एक छप्पर में कुछ लोग बैठे थे। वे पहले तो भंवर जी से हंसी- मजाक करते रहे। उनमें से कुछ ने मांग की- वो लुक्का काका वाली कविता सुनाओ। भंवरजी ने यह कुंडली सुनाना शुरू कर दिया- जब से भयो लुक्का काका सरपंच है। कुंडली का सार है कि जब से लुक्का काका सरपंच हुआ है, वह शराब पीने लगा है, मुर्गा खाता है, गुण्डों की जमात लगाये रखता है और प्रपंचों में लगा रहता है। कविता के बाद लोग मुझे उस सरपंच के निदंनीय प्रसंग सुनाने लगे जिन पर यह कविता आधारित थी।


इन कविताओं का एक परिणाम तो यह था कि गाँव वालों ने अपनी ओर से हरिजनों ( तब यह शब्द प्रचलन में था।) के लिए अलग से कुआं बनवा दिया और लुक्का काका अगली बार पंचायत चुनाव हार गए। लेकिन मैं यहां इन कविताओं को लोगों की अपेक्षाओं से जोडना चाहूँगा। क्या भंवर स्वरूप से लोगों को इन्हीं कविताओं की अपेक्षा थी। यदि भंवर स्वरूप लोगों से उनकी अपेक्षाएं पूछकर कविताएँ लिखते तो लोग उनसे टर्र कविता जैसी हास्य रचनाएँ लिखाते रहते। किंतु यह लोगों की वास्तविक अपेक्षाएं नहीं थीं। भंवर स्वरूप ने उक्त कविताएँ लिखीं और लोगों ने इनको अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप पाया। वस्तुतः ये लोगों की दमित अपेक्षाएं थीं, जो पहले उभर नहीं पायीं। कवि ने इन्हें पहचाना और उन्हें अभिव्यक्ति दी। भले ही हालात बदल गये हों। ये कविताएँ मेहतरानी और लुक्का काका जैसे चरित्रों को उम्र प्रदान करती हैं जो कल तक हमारे समाज का सच थे।


वैसे आज तो यह सोचना ही मुश्किल लगता है कि कोई  भंवर स्वरूप अपने गाँव में रहता हुआ वहाँ के किसी लुक्का काका पर ऐसी कविता लिखे , वहीं लोगों को सुनाए और सुरक्षित रह पायेगा ।

कविता से मेरी अपेक्षाएं क्या हैं ? एक समीक्षक के नाते नहीं, एक लेखक के रूप में नहीं और एक सुधी पाठक के रूप में भी नहीं।‌ सुधी पाठक वह व्यक्ति है जो प्रायः रचनाकारों के संसर्ग में रहता है, उन्ही जैसी भाषा बोलता है किन्तु दुर्योग से खुद रचनाकार न हो सका है। यह पहले जमाने का सह्रदय नहीं है जिसके मन में कवि- लेखक होने की कोई प्रच्छन्न अथवा दमित आकांक्षा नहीं होती  थी, जो सिर्फ रचनाओं का निर्मल आस्वादन करता था। बहरहाल, मैं एक साधारण मनुष्य के रूप में कविता की अपेक्षाएं टटोलना चाहता हूँ। आषाढ की किसी दोपहर को कुछ खेतिहर इकट्ठा होते हैं। अपने दुख- दर्द की बात करते हैं। बढते कष्ट और मुक्ति की कोई राह नहीं। यही है जीवन- जूझना ही होगा। फिर एक खेतिहर के मुंह से इसी अभिप्राय के बोल फूट पडते हैं। यह कबीर, तुलसी या किसी और कवि की पंक्ति हैं। फिर खेतिहरों की संवाद- भाषा बदल जाती है। आधा गद्य और आधा पद्य। पद्य इनका नहीं है- हमारे संत कवियों का है। लोक कवियों का है। लेकिन हमारे इन मेहनतकशों की श्रमरत जिंदगी और भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्ति दे रहा है। दोपहर खत्म हुई और खेतिहर पुनः उत्साह से अपने कठिन काम में जुट गए।


देहाती जिंदगी से एक और उदाहरण। हमारे अपने गाँव में तो कोई कवि नहीं था। एक आशु- कवि जरूर थे पर उसकी बात फिर कभी। आसपास के गाँव में तीन कवि थे। एक बगधारी गाँव के बुद्धा ठाकुर थे जिनकी बारहमासी और बाढ पर लिखी कविता बहुत मशहूर थी। बांसी के घनश्याम निडर अपने हास्य और छंद की खास विधा सपरी के कारण लोकप्रिय थे। तीसरे अंधियारी के भंवरस्वरूप भंवर थे। इन कवियों की बाकायदा राजनीतिक संबद्धताएं थी। बुद्धा ठाकुर और भंवर जी कांग्रेसी थे, जबकि निडर सोशलिस्ट थे। ब्रज भाषा अकादमी बनी तो उसने वरिष्ठ कवियों पर मोनोग्राफ निकालना तय किया। तब तक बुद्धा ठाकुर और निडर तो गुजर चुके थे, भंवर जी पर मोनोग्राफ के लिए मुझसे आग्रह किया गया। इस सिलसिले में मैं कई दिन उनसे संपर्क में रहा।


भंवर जी स्वतंत्रता सेनानी रहे, चूंकि गांधीवादी थे तो समाज- सुधारक भी। आज जैसी कि सच्चे गांधीवादियों की स्थिति है कि उन पर बहुत से लोग हंसते हैं, ये बनना शुरू हो गयी थी। भंवर अपने गाँव से कभी- कभार आसपास के गाँव में यूं ही घूमने निकलते। मैं भी उनके साथ हो लेता। एक बार खेतों के बीच पगडंडी से गुजर रहे थे। कुछ औरतें एक जगह इकट्ठी थीं। उन्होंने काका भंवर को आवाज देकर बुला लिया। वे हंस- हंस कर उनसे महतरानी वाली कविता सुनाने का आग्रह कर रही थीं। उन्होंने सुनाना शुरू किया-

नांय घर में टपकाऊ पानी

सबकै हा- हा खाय

कुआं पर खडी महतरानी...


दृश्य यह है कि एक मेहतर ( वाल्मीकि समुदाय की) स्त्री कुंए पर खडी सभी स्त्री- पुरुषों से अपनी मटकी भर देने के लिए आग्रह कर रही है। ( गाँव में तब मेहतरों के लिए अलग कुआं नहीं था। और वे सामान्य कुंए पर चढकर पानी भर नहीं सकते थे।) पुरुष उसे डांट- डपट रहे हैं कि उसके सुअर उनकी खेती को नुकसान पहुंचाते हैं। कुछ लोग हर गंगे कहते नहा रहे हैं लेकिन महतरानी की ओर उनका ध्यान नहीं है जिसके घर में एक बूंद पानी नहीं है। अंत में एक बुढिया को उस पर दया आ जाती है। महतरानी पानी लेकर घर पहुंचती है तो उसका पति उसे गुस्से से डांटता है कि इतनी देरी क्यों लगायी, किस यार से बात कर रही थी।


कविता सुनाकर भंवर स्वरूप तो सहज हो गये। लेकिन उन औरतों के चेहरे पर विवश उदासी की छाया घिरी थी। एक- दो औरतों की तो आंखों में आसूं छलछला आये थे। हम वहाँ से चल दिये।


इस बार एक अलग गाँव था। एक छप्पर में कुछ लोग बैठे थे। वे पहले तो भंवर जी से हंसी- मजाक करते रहे। उनमें से कुछ ने मांग की- वो लुक्का काका वाली कविता सुनाओ। भंवरजी ने यह कुंडली सुनाना शुरू कर दिया- जब से भयो लुक्का काका सरपंच है। कुंडली का सार है कि जब से लुक्का काका सरपंच हुआ है, वह शराब पीने लगा है, मुर्गा खाता है, गुण्डों की जमात लगाये रखता है और प्रपंचों में लगा रहता है। कविता के बाद लोग मुझे उस सरपंच के निदंनीय प्रसंग सुनाने लगे जिन पर यह कविता आधारित थी।


इन कविताओं का एक परिणाम तो यह था कि गाँव वालों ने अपनी ओर से हरिजनों ( तब यह शब्द प्रचलन में था।) के लिए अलग से कुआं बनवा दिया और लुक्का काका अगली बार पंचायत चुनाव हार गए। लेकिन मैं यहां इन कविताओं को लोगों की अपेक्षाओं से जोडना चाहूँगा। क्या भंवर स्वरूप से लोगों को इन्हीं कविताओं की अपेक्षा थी। यदि भंवर स्वरूप लोगों से उनकी अपेक्षाएं पूछकर कविताएँ लिखते तो लोग उनसे टर्र कविता जैसी हास्य रचनाएँ लिखाते रहते। किंतु यह लोगों की वास्तविक अपेक्षाएं नहीं थीं। भंवर स्वरूप ने उक्त कविताएँ लिखीं और लोगों ने इनको अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप पाया। वस्तुतः ये लोगों की दमित अपेक्षाएं थीं, जो पहले उभर नहीं पायीं। कवि ने इन्हें पहचाना और उन्हें अभिव्यक्ति दी। भले ही हालात बदल गये हों। ये कविताएँ मेहतरानी और लुक्का काका जैसे चरित्रों को उम्र प्रदान करती हैं जो कल तक हमारे समाज का सच थे।


वैसे आज तो यह सोचना ही मुश्किल लगता है कि कोई  भंवर स्वरूप अपने गाँव में रहता हुआ वहाँ के किसी लुक्का काका पर ऐसी कविता लिखे , वहीं लोगों को सुनाए और सुरक्षित रह पायेगा।


हमारे समाज के अनेक संस्तर हैं। मैं ने पीछे ग्रामीण कृषक जीवन से दो उदाहरण दिये। ऐसे ही हम श्रमिक जीवन में कविता को घुला- मिला पा सकते हैं। वहाँ शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की परिचित कविता का कोई न कोई अंश हमें आसानी से मिल जायेगा। हालांकि कामगारों का अपना सृजन भी इसमें समाहित होता है। फिर मध्यवर्ग का एक हिस्सा है जो अपने को अपसंस्कृति और मूल्य- क्षरण की आंधियों से बचाये है। यह निराला और मुक्तिबोध की कविता से परिचित है तो क्लासिकों को अपने सौंदर्य- जगत में संजाये है। मुझे नहीं लगता कि लोक- मानस के सौंदर्य- जगत में रिक्तता है। कहीं- कहीं रुग्णता हो सकती है। लेकिन इसके पीछे उन लोगों की सांस्कृतिक विपन्नता है जो घटिया सिनेमाई गीत और मंचीय कविता की कुछ पतनशील चीजों से तोष प्राप्त करते हैं।


तमाम मूल्यवान कलाओं की भांति कविता गंभीर चुनौतियां झेल रही है। पुनरुत्पादनवादियों की धूर्ततापूर्ण व्याख्याएं , सत्ता और धनिकों के प्रचार माध्यम गंभीर सृजन को हाशियाकृत कर रहे हैं। लेकिन घटियापन खरपतवार की तरह नष्ट हो जाता है। अंततः दुनिया बुरे नहीं भले मनुष्यों के भरोसे चल रही है। श्रेष्ठ कला मूल्यों की संवाहक है- वे मूल्य जो मनुष्यता को प्रतिष्ठित करते हैं। ये मूल्य हर जगह द्वंद्व उपस्थित कर देते हैं। सिनेमाई दुनिया में ही द्वंद्व देखें तो पायेंगे कि तीन दशक पुराना एक गीत तमाम घटिया गीतों की काई छिटका देता है। कविता इस जटिल समाज के हर मोर्चे पर लड़ाई लड रही है, सच को सच बनाये रखने की लड़ाई, हमारे बाहर- भीतर की लड़ाई। कविता का प्रयोजन अथवा कविता की जरूरत को लेकर बार- बार प्रश्न किये जाते हैं। ये प्रश्न सदैव शंकालु या हताश लोगों की ओर से नहीं होते। यदि ऐसे लोग ये प्रश्न उठाते हैं तो उन्हें कोई तर्क आश्वस्त नहीं कर सकते। मैं इस प्रश्न पर एक प्रतिप्रश्न के जरिए विचार करना चाहूँगा। क्या कविता- रहित जीवन की कल्पना की जा सकती है?


कविता को इसकी प्रक्रिया से अलग कर नहीं देखा जा सकता। कविता एक प्रतिफल है। वह मनुष्य की सृजनशीलता, कल्पना -शक्ति, रागात्मकता और संवाद- क्षमता की अभिव्यक्ति भी है। जो मनुष्य को जीव- जगत में श्रेष्ठतर बनाता है, वह सब कलाओं में प्रतिबिंबित होता है। मनुष्य समाज से कविता की अनुपस्थिति का अर्थ है- इन सब मूल्यवान चीजों का निःशेष हो जाना। और ऐसा दरिद्र और अंधेरा समाज हम में क्या उम्मीद जगा सकता है। यह अत्यंत प्रीतिकर सच है कि दुनिया में ऐसा समाज कहीं नहीं है, जहां कविता को निर्वासित कर दिया गया हो। क्या मनुष्यता को मनुष्य से निर्वासित किया जा सकता है? कविता मानव- जीवन की आवयविक अविभाज्यता है।


इसके बहुतेरे प्रमाण हैं। जार्ज थाम्पसन ने आदि- कबीलों का गहरा अध्ययन कर वहाँ कविता की जीवंत उपस्थिति का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। जब से संवाद जन्मा, तभी से  कविता। भाषा का प्रयाण पद्य से गद्य की ओर है। जीवन की जटिलता ने कविता को जटिल रूप दिया। लेकिन यह संश्लिष्टता है, शिल्प का सौंदर्य है जिसमें संवाद- सलिला प्रवाहित है। कौन जानता है कविता कब जन्मी?


एक बच्चे की किलकारी सुनी मैं ने

और टूट गयी मेरी उदासी

आज से जुड़ी है स्मृति

कल से सम्बद्ध हैं स्वप्न

आदिम स्वर शब्दों से ज्यादा प्राचीन हैं

अक्षरों से पुराने हैं चित्र

संवाद से जन्मी है भाषा

संवेगों से संवाद!

                                                        

      



कविता सिर्फ भाषा- अभिव्यक्ति नहीं है। भाषा कविता का माध्यम है। लेकिन वह भाषा के नियमों में बंधी नहीं। यह सहज और ऊर्जस्व अभिव्यक्ति है, जिसमें भाषा के अनुशासन का पालन करना संभव नहीं रह पाता। कविता व्याकरण का निषेध करती है। एक नया व्याकरण बना छंद- शास्त्र और शैली को नियोजित करने का अलंकार- शास्त्र जीवन में सतत् गतिमान हैं। वे अपना बंध तोडते रहते हैं। मनुष्य मुक्ति के नये मार्ग तलाश करता है। निराला ने कविता को नया शिल्प- विधान देते हुए घोषणा की : मनुष्य की मुक्ति की तरह ही कविता की मुक्ति होती है। कविता के लिए सरल- रेखीय वाक्य- विन्यास में किया गया विचलन विशेष अर्थ रखता है। कहा कहों कछु कहवे की नाहिं- यह सामान्य वाक्य विचलन नहीं, यह शब्दों के तीव्र बलाघात और अर्थ की लाक्षणिकता का मामला है। कविता वह कहती है जो व्याकरण की भाषा नहीं कहती। जहाँ गद्य की गति नहीं, निश्चय ही गद्य का अपना महत्व है। कविता नये भाषिक संधान के द्वार खोलती है, वह भाषा के कलेवर को व्यापक बनाती है और उसे प्रवाह देकर और निथारती है। शायद यही वजह है कि कोई कंप्यूटर कविता नहीं लिख सकता। कला सृजन यांत्रिक कार्य नहीं, हालांकि यंत्र उसमें मददगार हो सकते हैं। यह सिर्फ मस्तिष्क का कार्य भी नहीं, यहां मन सक्रिय है। कंप्यूटर में मन नहीं, उसका संवेदन रागात्मक नहीं, उसमें भाव- आवेग नहीं, इसलिए कविता मनुष्य का उपक्रम है। इसीलिए कविता का भविष्य है, जिसके नये क्षितिज खुल रहे हैं।


क्या कोई चीज कविता का विकल्प हो सकती है या कविता किसी चीज का विकल्प हो सकती है? मैं समझता हूँ, इस तरह विकल्पों के रूप में चीजों को देखना इनकी स्वतंत्र भूमिका को कम करके आंकना है। जैसा कि हमने पूर्व में देखा- हमारे जीवन में कविता की अहम् जगह है। यह सहज- स्वाभाविक है। तब हमारे हर सृजनशील प्रयास- वह श्रम हो, संघर्ष हो अथवा निर्माण, कविता उसमें मददगार साबित होगी। लेकिन कविता किसी का विकल्प नहीं हो सकती, न कोई और चीज कविता का विकल्प अथवा स्थानापन्न। यही कविता की स्वायत्तता है।


एक कविता मेरे  लिए क्या मायने रखती है ? मैं अपने रोजमर्रा के जीवन में खटता बार- बार अपने प्रिय कवियों की ओर लौटता हूं। यह मेरा संलाप है- न एकालाप न प्रलाप। कहते हैं कि काव्य- सृजन से कवि निरंतर अपना भी परिष्कार करता है। कविता पढकर मैं कुछ हल्का हो गया, या कुछ ताजे हवा के झौंके- सा सुखद लगा। मेरा मैल धुला, निष्कलुष हो गया। मेरी चेतना को और संबल मिला। 


एक कवि अपने क्लासिकों की ओर लौटता है। वह अपनी कविता की ओर लौटता है और हर बार कुछ और बदल जाता है। वह उस जन- समाज से संवाद करता है जो उस काव्य को जी रहा है। कवि त्रिलोचन कहते हैं-

ध्वनिग्राहक हूँ मैं, समाज में उठने वाली

ध्वनियाँ पकड लिया करता हूं,

और- 

लडता हुआ समाज, नयी आशा अभिलाषा

नये चित्र के साथ नयी देता हूँ भाषा

यह कवि- कर्म, यह सृजन उसकी जीवन- शैली का हिस्सा बन जाता है।


यह लडता हुआ समाज है- यह परिवर्तन की लड़ाई है, एक बेहतर समाज के निर्माण का संघर्ष नयी आशा- अभिलाषाएं हैं। कवि नये चित्र नयी भाषा में प्रस्तुत कर रहा है। कविता का सृजन इस नयेपन से जुड़ा है- अभिव्यक्ति, शिल्प और भाषा का नयापन। कविता वह कहती है जो अभी तक कहा नहीं गया। कविता हमें वह दिखाती है, जो हमारे भीतर था, हमारे आसपास था या हमसे बहुत परे था। लेकिन जिसे हमने अनदेखा कर दिया। वह हमारी प्रतीति बदल देती है।     




समय की क्रूरता हमें अकेला कर देती है। भीड भरे समाज की भागमभाग और आपदाओं के झंझावात हमें निरीह बना देते हैं। कविता हमारी दुनिया को बड़ा बनाती है। हमारा अकेलापन तोडती है। हम दूसरों के दुख और वेदना में साझा करते हैं। कविता उत्पीडितों में एका करने में मदद करती है। यह भावनात्मक एका है। यह मनुष्यता के धागे का नाजुक-सा बंधन है।


मनुष्य उन प्राणियों में से है जो स्वप्न देखते हैं। स्वप्न नया रचने, नयी सृष्टि करने की प्रेरणा है। हमारी खुली आंखों के सपने हैं, भले ही ये बार- बार टूट जाते हों। कविता हमारे इन स्वप्नों को जिंदा रखती है, इन्हें मरने नहीं देती। ये स्वप्न जो हमारे जीने का संबल हैं।


हमारे पास अनेकानेक स्मृतियाँ हैं। एक इतिहास है स्मृतियों का- कटु और मधुर स्मृतियाँ । हम इन्हें संजोए रखना चाहते हैं, इन्हें विलग नहीं होने देना चाहते। कविता इन स्मृतियों को उम्र प्रदान करती है।


हमारा आज का समय परिवर्तन के तीव्र दौर से गुजर रहा है। यह सारा परिवर्तन सकारात्मक नहीं, बहुत सारा अनचाहा भी है। अन्तर्राष्ट्रीय महाशक्तियां गरीब देशों पर अपनी प्रभु- सत्ताएं लाद रही हैं। वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श इस वैश्वीकरण ने ले लिया है। कार्पोरेट पूंजी को खुली छूट है और बाजारीकरण का अश्वमेधी घोडा छुट्टा घूम रहा है। हमारे समय के लव- कुश निरस्त्र हैं और वाल्मीकि संशयग्रस्त। बाजार व्यवस्था की ठंडी और अदृश्य क्रूरता अमानवीयकरण की प्रक्रिया को तेज कर देती है। इसके समक्ष लगता है, क्रौंच- वध की वेदना से फूटा श्लोक अरण्यरोदन है। यहाँ प्रतिरोध तो संगठित मानव- समूह को ही करना है। लेकिन प्रतिरोध करने वाली शक्तियाँ असंगठित और क्षीण हैं। हताशा के ऐसे समय में क्या कविता भी मनुष्य का साथ छोड देगी ?


बाजार की व्यवस्था कविता ही नहीं सभी कलाओं को पण्य वस्तु में बदल देना चाहती है। नव- धनाड्यों का ऐसा वर्ग अवतरित हो रहा है जो कला को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में कैद कर अपने आनंद की वस्तु बना लेना चाहता है। जो कैनवासों से अपने ड्राइंग रूम और गलियारों की दीवारें सजा लेना चाहता है। जो कविता की पुस्तकों से सिर्फ अपने रैक की शोभा बढाता रहा है। लेकिन क्या कविता ऐसा यांत्रिक उत्पाद है, ऐसी पण्य वस्तु है?


नहीं। लेकिन चुनौतियां नयी और भयावह हैं। आज का मनुष्य भीतर से रीतता जा रहा है। एक मूल्यहीन समाज, जो एक मरणधर्मा संस्कृति को ढोता रह सके, बनाने की साजिश है। कविता को इस रिक्तता, मनुष्य के नि:शेष होते आभ्यन्तर को आपूरित करना है, अदृश्य लड़ाई से जूझने में कलाओं पर हमें ज्यादा आश्रित होना है। मीडिया ने दूर- अंचलों में दखल कर हमारे लोक- सृजन पर भी आक्रमण कर दिया है। अब सिर्फ प्रतिक्रिया से काम नहीं चलने वाला, अन्त: क्रिया की जरूरत है।


हमारे गरीब देश में मेला लग रहा है। तमाम रंग- बिरंगी वस्तुओं से अंटी चमचमाती रोशनी में नहाई दुकानों, माल्स की कतार है, विक्रेताओं के विज्ञापन चौतरफ शोर कर रहे हैं। गरीब देश की नब्बे प्रतिशत विपन्न जनता इस नुमाइश में इधर से उधर घूमती है- अचंभित और उत्सुक, लेकिन कोई भी चीज तो उनके काम की नहीं, वह इन्हें खरीद कर भी क्या करें ! सब बेकार की चमक- दमक है, माया है। इस देश का गरीब जन इन वस्तुओं की व्यर्थता पर हंसता है। कविता है- जो निरर्थक नहीं है, जिसकी कोई कीमत नहीं चुकानी और हमारा यह जन किसी कवि की कोई कविता गुनगुनाने लगता है।

टिप्पणियाँ

  1. आज पहली बार इस पेज से जुड़ रहा हूँ । यहाँ जानने - सीखने के लिए बहुत कुछ है !

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मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...