सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं।

यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं।
अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।
                    प्रस्तुति- राजाराम भादू
                    अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४

मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं काफी मेहनत कर रही हूं लेकिन चित्र बहुत धीमी गति से विकसित हो रहे हैं क्योंकि काम के दौरान चिन्तन- क्रम भी चलता जाता है। मैं ने अंध- भाव से चित्र बनाना बंद कर दिया है- यानी सामने प्रस्तुत विषय का केवल अच्छी तरह अंकन भर करना। मैं कभी उसमें कुछ जोडती हूं, कभी कुछ हटा देती हूं, आशय यह है कि रचना, सृजन और चिन्तन कर रही हूं। चित्रांकन इसी तरह से किया जाना चाहिए। कितनी भयावह है यह बात कि मैं अब, इस वक्त यह खोज पायी कि सिर्फ अच्छा चित्रांकन कर लेना ही काफी नहीं है।


मां और पिता को : बुडापेस्ट, २४ सितम्बर, १९३४

मैं मूलतः अपने कलात्मक विकास के हित में भारत लौटना चाहती हूं। मुझे अब प्रेरणा के नये स्रोतों की जरूरत है ( और यहाँ आप देखेंगे डूसी कि आप किस कदर पूरी तौर पर गलत हैं। अब आप हमारी,  भारत में, उसकी संस्कृति, उसके लोगों और उसके साहित्य में रुचि न होने की बात करते हैं जिसमें कि मेरी गंभीर रुचि है और जिससे मैं गहरे रूप में परिचित होना चाहती हूं। ) मेरा खयाल है कि मैं प्रेरणा के नये स्रोतों को भारत में खोज लूंगी। यूरोप में लंबे समय तक के निवास ने मुझे भारत की खोज में सहायता दी है। आधुनिक कला ने मुझे भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला की समझ और आस्वाद की ओर अग्रसर किया है। यह विरोधाभासी लगता है, लेकिन मैं निश्चित रूप से जानती हूं कि यदि हम यूरोप नहीं आए होते तो संभवतः मैं कभी इस बात को नहीं जान पाती कि अजंता का भित्तिचित्र या मूसे गिमे के शिल्प का एक छोटा- सा टुकड़ा भी समूचे रेनेसां से कहीं अधिक मूल्यवान है।

मां और पिता को : हैदराबाद, ५ दिसम्बर, १९३६

अजंता में दो रात बिताने के बाद परसों तारीख तीन की सुबह हम यहाँ आ गये। अजंता अद्भुत था। भारत लौटने के बाद मैं ने पहली बार किसी दूसरे के सृजन से कुछ सीखा है।

 अमृता शेरगिल के कुछ पत्र-२

कार्ल खंडालावाला को  : हैदराबाद, २३ दिसम्बर, १९३६

एलोरा भव्य है। अजंता विस्मयकारी रूप से सूक्ष्म और ऐन्द्रजालिक चित्ताकर्षण से भरपूर...। मैं नहीं सोचती कि मैं ने कभी कोई ऐसी कृति देखी है, जो इसकी बराबरी कर सकती है, एकदम असाधारण, हालांकि मैं सन्देह नहीं करती कि उसने बंगाल स्कूल को जन्म दिया होगा। बिना आत्मसात किये अपने कलातंत्र में ग्रहण करने के लिए एक निहायत खतरनाक चीज। मैं दो शब्दों में अजंता और बंगाल स्कूल की चारित्रिकताओं का निरूपण कर सकती हूं। अजंता एक गिरीयुक्त या अन्तर्बीज वाली चित्रकला है, बंगाल स्कूल के पास सिर्फ एक बाहरी खोल या छिलका है- उसमें शून्य के चारों ओर बहुत- सी चीजों की बनावट है- बहुत- सी अनावश्यक चीजें और यदि उन अनावश्यक चीजों को उसमें से हटा दिया जाये, तो उसका अस्तित्व ही मिट जायेगा।

यह मत सोचिएगा कि मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं ( जैसा कभी पहले आपने संकेतित किया था। ) कि मैं भारतीय कला के प्रति पूर्वाग्रही हूं। यह इसलिए कि मैं सोचती हूं कि भारतीय कला में इतनी अधिक संभावनाएँ निहित हैं कि मैं शब्दशः उन लोगों के खिलाफ हूं, जिन्होने इन संभावनाओं का अन्वेषण नहीं किया है और उन लोगों को दोषी मानती हूं जिन्होंने चित्रात्मक रूप में उसे गलत समझा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, प्रिय कार्ल, कि मैं भारतीय शैली का एक सचमुच अच्छा चित्र देखने के लिए तीव्र आकांक्षा से बैचेन, लालायित हूं। मूलतः मैं उत्साही हूं और मुझे एक बुरे चित्र की निंदा करने की अपेक्षा एक अच्छे चित्र का आनंद लेने में अधिक रस मिलता है।


कार्ल खंडालावाला को : दिल्ली, १३ फरवरी, १९३७

लखनऊ स्कूल के प्राचार्य असित हालदार ( जिनका काम, जब वह असंतुष्ट अजंता नहीं हैं, तो पिकासो के अनुपस्थित अन्वेषणों का दोहन हैं, यह भी असंपृक्त ) ने इस बात पर दुख प्रकट किया कि मेरे भारतीय पिता होने के बावजूद मेरे काम में पश्चिम की गंध है। वे भारतीय कला के क्षेत्र में मेरी दखलंदाजी से भी नाराज हैं, क्योंकि भारतीय ( निश्चय ही, जिनका प्रतिनिधित्व वे करते हैं। ) एक और सालोमन, अपने ऊपर लादे जाना नहीं चाहते ( यही उनके मूल शब्द थे, लेकिन सीधे मुझसे मुखातिब होकर नहीं )। बराड उकील घोषित करते हैं कि मेरा काम आम आदमी की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वे संभवतः अनुमान लगाते हैं कि चूंकि उनका काम कुछ मध्यवर्गीय भारतीयों की ह्रासोन्मुख रुचि को पसंद आता है, इसलिए वे आम आदमी की भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं...।

आपने अनेक बार मुझसे पूछा कि क्या मुझे मुगल, राजपूत और कांगड़ा स्कूल पसंद हैं। आपको शायद यह सुनकर हैरानी होगी कि मैं उनकी मुरीद हूं ( यह अहसास मुझे अभी हुआ है, जबकि मैं ने उनके कुछ अच्छे नमूने देखे )। वे छोटे- छोटे चित्र आश्चर्यजनक रूप से श्रेष्ठ हैं।...

क्या मैं आपको बताऊं कि मैं कभी- कभी कठोर आलोचना में क्यों विश्वास करती हूं ? क्योंकि मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से यह कह सकती हूं कि मुझे अन्ततः अपने प्रोफेसरों की तार्किक और समझदार आलोचना से इतना लाभ नहीं हुआ जितना अपने सहपाठियों की विध्वसंक और क्रूर समीक्षा से हुआ। सही समय पर की जाने वाली क्रूर आलोचना किसी व्यक्ति को पूरे  तौर पर कलात्मक नव- चैतन्य से अनुप्राणित कर सकती है। यद्यपि मैं यह भी स्वीकार करती हूंं कि यही गलत समय पर थोडा नुकसान भी पहुंचा सकती है- लेकिन यह खतरा तो उठाना ही पड़ता है।

कार्ल खंडालावाला को : नयी दिल्ली, ५ मार्च, १९३७

आप हमेशा की तरह सही हैं। कामावेगपूरित शिल्प और चित्र धार्मिक भावना से प्रेरित नहीं हो सकते। दरअसल, मैं सोचती हूं कि सारी कला और धार्मिक कला भी शामिल है, ऐन्द्रिकता के द्वारा ही अस्तित्व में आयी है, एक ऐसी उद्दाम ऐन्द्रिकता, जो मात्र पार्थिव सीमाओं के पार प्रवाहित हो जाती है।

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र-३

पंडित जवाहरलाल नेहरू को : ६ नवम्बर, १९३७

सिद्धान्तत: मैं जीवन- वृत्त और आत्मकथाओं को नापसंद करती हूं। उनमें झूंठ ध्वनित होता है। बडप्पन का भाव या प्रदर्शन- प्रियता। लेकिन मेरा खयाल है कि मैं आपकी आत्मकथा पसंद करूंगी। आप कभी- कभी अपने प्रभा- मंडल को छोड सकने में समर्थ होते हैं। आप यह कह पाते हैं कि जब मैं ने समुद्र को पहली बार देखा, जबकि दूसरे लोग कहेंगे कि जब समुद्र ने मुझे पहली बार देखा।

मैं उन लोगों के प्रति आकृष्ट होती हूं, जो इतने पर्याप्त सुसंगठित और पूर्ण होते हैं कि बिखराव के बिना अस्थिर हो सकते हैं और जो अपने पीछे पश्चाताप के चिपचिपे धागों के घिसटते चिन्ह नहीं छोडते चलते।

मैं नहीं सोचती कि जीवन की दहलीज पर ही व्यक्ति अराजकता महसूस करता है, वरन वह जीवन की दहलीज पार कर चुका होता है, तब वह यह अन्वेषित करता है कि चीजें, जो सरल दिखाई देती हैं, अनन्त रूप से त्रासदायी और जटिल हैं। यह कि केवल अस्थिरता में ही कोई स्थिरता है। 


अमृता शेरगिल के कुछ पत्र-४

कार्ल खंडालावाला को : शिमला, १७ अप्रैल, १९३७

मैं दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू से मिली। मुझे उनसे मिलने की तीव्र इच्छा थी। मेरा खयाल है कि उन्होंने मुझे पसंद किया, उतना ही जितना मैं ने उन्हें। वे मेरी चित्र- प्रदर्शनी में आये और हमारी लंबी बातचीत हुई। कुछ समय पूर्व उन्होंने मुझे लिखा था- मुझे तुम्हारे चित्र अच्छे लगे क्योंकि उनमें शक्ति और दृष्टि दिखाई देती है। तुममें ये दोनों गुण हैं। ये चित्र इन जीवनहीन प्रयत्नों से कितने अलग हैं, जो हम अक्सर हिन्दुस्तान में देखते हैं।

और जीवनहीन प्रयत्नों से मुझे याद आता है कि कुछ समय पहले आपने मुझसे पूछा था कि क्या मैं ने त्रावणकोर की नयी आर्ट गैलरी देखी है ? जरूर देखी है। आधी से अधिक गैलरी रवि वर्मा के चित्रों से भरी है और आधी भारतीय चित्रकला के नाम पर छद्म प्रदर्शन करने वाले निकृष्ट कोटि के प्रतिनिधि संकलन से। बिना किसी अतिशयोक्ति या कहिये अवमूल्यन के, उस पूरे संग्रह में केवल एक चित्र था जिसे अच्छा कहा जा सकता था- वह था जैमिनी राय का बनाया एक पोर्ट्रेट। यहाँ तक कि नंदलाल बोस के चित्र निराशाजनक थे। मैं ने सचमुच पहले कभी नहीं सोचा कि नंदलाल बोस इतने कामन हैं। लगता है कि कजिन्स में हर एक के काम के सबसे खराब नमूने चुन लेने की एक विशेष क्षमता है।

कार्ल खंडालावाला को : सराया, १ जुलाई, १९४०

मुग़ल शैली ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। सही तौर से देखने पर मुग़ल पोर्ट्रेट वह सब कुछ सिखा सकते हैं जो जरूरी है। सूक्ष्म किन्तु फिर भी घनीभूत, आकृति की तीक्ष्णता, तीव्र और तटस्थ, कुछ- कुछ विडम्बनात्मक पर्यवेक्षण- ये सारी चीजें, जिनकी उस वक्त मुझे बेहद जरूरत थी, उन सबसे मेरी वाकफियत हुई। यह बड़ी मनोरंजक बात है कि मुझे ठीक वही सारी चीज़ें ऐन उसी मौके पर मिलती हैं जिस वक्त कि मुझे उनकी अधिक जरूरत होती है- बूल और रेनोअ ( रेनोअ को मैं अभी हाल तक तहेदिल से नापसंद करती रही )। हालांकि दोनों ऊपरी तौर पर इस कदर अलग दिखाई देते हैं, दरअसल अपने मूल रूप में दोनों में ही मुग़ल शैली के बहुत- से उभयनिष्ठ तत्व हैं और आखिरकार मैं ने अपने लाभ के लिए इस बात का अन्वेषण कर लिया है। समकालीन भारतीय चित्रकला का अध्ययन करते हुए, शायद यह बात बहुत गौरतलब है कि हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि मुग़ल शैली की अनुकृति करने वालों ने कभी इस कदर बुरे तौर पर गलतियाँ नहीं की हैं जितनी कि अजंता की अनुकृति करने वालों ने। भ्रान्त रूप से समझा गया अजंता ( और तथाकथित भारतीय चित्रकला में से किसी ने भी बहुत दूर से भी नहीं समझा है कि अजंता का मूल मर्म क्या है और वह किन तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है। ) निश्चित तौर पर एक वितृष्णामूलक असहनीय रुग्ण भावुकता और आकृति की कमजोरी की तरफ ले जाता है, विषयवस्तु की बात तो अलग है। मुग़ल शैली की अनुकृति करने वाले यद्यपि कमजोर और सीमित दायरे से बंधे हैं, लेकिन इस कदर बुरी रुचि के अपराधी कतई नहीं हैं। क्या आप ऐसा सोचते हैं ? मुग़ल शैली जिन खास चीजों का प्रतिनिधित्व करती है, ठीक उन्ही के जरिये वह आकृति की धारणा की अतिशय ह्रासोन्मुखता को रोक देती है। इसलिए आप मुझको एक मुगल प्रशंसक के रूप में परिवर्तित हुआ पाते हैं और मैं उसी तरह अपनी चित्रकला को विकसित होते देखने की उम्मीद करती हूं ( वह निश्चित ही विकसित होगी और लगातार विकसित हो रही है। )। मुझे ताज्जुब है कि आपने कोई विकास लक्ष्य नहीं किया।

टिप्पणियाँ

  1. समय समय पर राजाराम भादू द्वारा उध्दृत अमृता शेरगिल के ये पत्र पढ़ता रहा हूँ | इन पत्रों में उन महान कलाकार की भारत के प्रति सकारात्मक धारणा और यहाँ की परम्परागत चित्रकला के प्रति आकर्षण सिध्द होता है |अमृता जी के चित्रों में भी भारतीयता के मूल तत्त्व परिलक्षित होते हैं | संस्कृति मीमांसा को साधुवाद |

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सर्वेश्वर की भेडिया और हिंस्र शंक्लें - राजाराम भादू

पूर्वकथन : लीलाधर मंडलोई ने वर्तमान साहित्य के शताब्दी कविता विशेषांक ( मई- जून,२०००) का संपादन किया था। इसमें शताब्दी की कुछ चुनी हुई कविताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ व लेख हैं जो अलग- अलग लोगों से लिखवाये गये थे। मैं ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेडिया श्रृंखला पर लिखा था। इसे उलटते- पलटते लगा कि यह आज तो और भी मौजूं है। भगतसिंह की जेल में लिखी डायरी- ए मार्टायर्स नोटबुक ( इंडियन बुक क्रानिकल) का हिन्दी अनुवाद आ चुका है- शहीदे- आजम की जेल नोटबुक ( परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ)। इसमें भगतसिंह द्वारा मूल पृष्ठ ३९ में तिरछे लिखी ये पंक्तियां उद्धृत हैं- महान इसलिए महान हैं क्योंकि हम घुटनों पर हैं  आओ उठ खडे हों। पंक्तियों के लेखक का नाम नहीं है, बहुत संभव है ये स्वयं भगतसिंह की लिखी हों। सर्वेश्वर की इन कविताओं को पढते हुए मुझे लगता है, ये महानता के विरुद्ध साधारण जनों को उठ खडे होने के लिए आह्वान करती कविताएँ हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी काव्य- यात्रा सोच के जिस धरातल से शुरू की थी, बाद में वे लगभग उसके विपरीत छोर पर छोर पर पहुँच गये थे। यहां वे आततायी शक्तियों के प्रतिपक्...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

हाशिये के समुदाय तीन इतिवृत्त

हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में ब...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...
रंगमंच समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -2                                         राघवेन्द्र रावत  अंग्रेजों के आने के साथ साथ ही पाश्चात्य संस्कृति और साहित्य का प्रभाव भारतीय जनमानस पर पड़ने लगा था | जैसे जैसे औपनिवेशिक काल में औद्योगिक विकास होता गया मध्य वर्ग का उदय हुआ | जिसके पास ऊँचाइयाँ छूने के सपने थे तो असफलता से नीचे जाने का डर भी था | धार्मिक नगरों के रूप में बनारस, उज्जैन हरिद्वार आदि विकसित हुए वहीँ औद्योगिक नगरों के रूप में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास. भिलाई और जमशेदपुर जैसे नगर विकसित होते गए | इन नगरों में गाँव से मजदूर जीविकोपार्जन की तलाश में विस्थापित हुए | वहां उनके लिए जीविका के साथ साथ अपनी संस्कृति, बोली और घर की तलाश एक अहम् मुद्दा बन कर उभर रही थी |  यूरोप में नार्वे के प्रसिद्ध नाटककार हेनरिक इब्सन के नाटकों में यही मध्य वर्ग दिखाया जाने लगा | इब्सन के नाटकों में यथार्थवाद की अवधारणा का उदय हो चुका था | उनके नाटक ‘अ डॉल्स हाउस(1879)’,’घोस्ट्स’ (1881) तथा ‘ए...

गांव की स्मृतियाँ - ज्ञान चंद बागड़ी

भूमंलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों ने गाँव, कृषि और पारंपरिक उद्यमों का भयावह हाशियाकरण किया है। कथाकार ज्ञानचंद बागडी अपनी स्मृतियों के गाँव को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि अतीत का वह गाँव कोई आदर्श था लेकिन जिस तरह बदलाव आया, वह भी सहज नहीं कहा जा सकता। इसी संदर्भ में ये संस्मरण- लेख मीमांसा में प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरा गाँव मेरे लिए दुनिया की सबसे सुंदर जगह है , जहां मेरा बचपन बीता था । गाँव और बचपन की स्मृतियाँ  मुझे रोमांचित कर देती हैं । दिल करता है कि उड़कर गाँव पहुंच जाऊं । यही कारण है कि समय निकालकर वहां जाता रहता हूँ । वहां बिताये हुए कुछ ही दिन मुझे पूरे साल के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं । मेरे लिए गाँव का मतलब है प्रकृति का साथ , खेत-खलिहान ,  जहाँ सुबह आपकी आँख मुर्गे की बांग या किसी पशु के रंभाने से खुले , जहां मोर नाचते हों , झिंगुरों की आवाज सुनी जा सके , रात में एक-एक तारा साफ दिखाई दे , अंधेरे का संगीत और सन्नाटा सुनाई दे , साझी विरासत हो और साझी ही बहन-बेटियां , सहयोग हो , सामाजिकता हो , सादा खाना हो , मोटा पहनावा हो । ऐसा ही तो था मेरा गाँव , सरल औ...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...