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दुष्यंत की राजो... जयश्री शर्मा

स्मृतिशेष
हालांकि दुष्यंत कुमार की लोकप्रियता उनकी उत्प्रेरक गजलों के कारण है। लेकिन वे अपनी ही शैली के कवि- कथाकार भी थे। उनकी सहधर्मिणी राजेश्वरी की उनके जीवन में तो अहम् जगह थी ही, उनके बाद भी बड़ी शिद्दत से उन्होंने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया।
संस्मरणकार कांतिकुमार जैन ने दुष्यंत- राजेश्वरी के रागात्मक संबंधों का बडा जीवंत चित्रण किया है। हमने मीमांसा के लिए जयश्री शर्मा से राजेश्वरी की स्मृति में लिखवाया है जिन्होने दुष्यंत कुमार के सृजन पर गंभीर शोध किया है। उनका राजेश्वरी जी से हाल तक संपर्क व संवाद था।

राजेश्वरी सहारनपुर जिले के डंगेटा गाँव के सूरजभान कौशिक की पुत्री थीं जिनका विवाह दुष्यन्त कुमार के साथ 30 नवंबर 1949 को हुआ था। विवाह के समय दुष्यन्त कुमार की उम्र 18 वर्ष और राजेश्वरी की उम्र 16 वर्ष की थी। शादी के समय दुष्यन्त कुमार इंटर पास थे जबकि राजेश्वरी हाई स्कूल पास थीं। राजेश्वरी की माँ सोना देवी गृहणी तथा सूरजभान कौशिक सरकारी विभाग में कानूनगो थे। राजेश्वरी के दो भाई और एक बहन थी।
जिस प्रकार छोटी उम्र के प्यार की आयु लम्बी होती है, उसी तरह छोटी उम्र के विवाह की आयु भी लम्बी होती है! देखा जाए तो छोटी उम्र के इस अरेंज मैरिज से उत्पन्न छोटी उम्र के प्यार ने हीं दुष्यन्त को दुष्यन्त कुमार बनाया था। विवाह से पहले दोनों न एक दूसरे को जानते थे और न ही एक दूसरे से मिले थे। दरअसल उन दोनों का विवाह पढ़ने वाले दो विद्यार्थियों का विवाह था। जिसे आज के बुद्धिजीवी नासमझी ही समझेंगे।
जैसा कि चलन है विवाह के बाद सुहागरात को पति अपनी नव ब्याहता पत्नी को तोहफा भेंट करता है। लेकिन दुष्यन्त कुमार को समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी को क्या भेंट करें? फिर भी शादी के दूसरे दिन यानी 1 दिसंबर 1949 को दुष्यन्त ने छत पर बैठकर तोहफे के रुप में एक ऐसी कविता लिखी थी, जिसमें राजेश्वरी जी का चित्र उभारा गया है। इस तरह जो काव्यमय चित्र राजेश्वरी को तोहफे के रुप में भेंट किया गया वह इस प्रकार है -
‘वह चपल बालिका भोली थी
कर रही लाज का भार वहन
झीने घूँघट पट से चमके
दो लाज भरे सुरमई नयन
निर्माल्य अछूता अधरों पर
गंगा - यमुना सा बहता था
सुंदरवन का कौमाय सुधार 
यौवन की घातें सहता था
परिचय विहीन होकर भी हम
लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों।

भला इससे सुन्दर तोहफा और प्रेम गीत और क्या होगा? और कमाल देखिए दोनों विवाह के बाद भी पढ़ते रहे। उच्च शिक्षा के लिए एक-दूसरे को प्रेरित करते रहे। दुष्यन्त कुमार की प्रेरणा से दसवीं पास राजेश्वरी ने आगे चलकर बी.ए और बी.एड की डिग्री प्राप्त की। उसके बाद हिन्दी और मनोविज्ञान में डबल एम.ए किया।प्रारंभ से ही राजेश्वरी ने तय कर लिया था कि वह नौकरी करेगीं। घर चलाने में पति का हाथ बँटायेगी। केवल गृहणी बनकर ही चारदीवारी में अब नहीं रहेंगी। यही वजह थी कि राजेश्वरी ने कुछ समय 1962 में बरहानपुर में एक प्राइवेट काॅलेज में हिन्दी प्राध्यापिका के रूप में कार्य किया। तदोपरान्त तात्या टोपे नगर, भोपाल के आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय में स्थाई 
रूप से हिन्दी की व्याख्याता नियुक्त हुई । उसके बाद राजेश्वरी ने घर का पूरा मोर्चा संभाल लिया था। वह दुष्यन्त कुमार को घर के छोटे-मोटे कार्य और लेन-देन की किसी पचड़े में नहीं पड़ने देती थीं।
बच्चों की शिक्षा दीक्षा और लालन-पालन में भी उन्हें एकदम मुक्त कर दिया था ताकि वे एकाग्रचित्त होकर लिखें।.दरअसल राजेश्वरी ही दुष्यन्त कुमार की प्रथम श्रोता और आलोचक रही हैं। हिन्दी साहित्य में एम.ए होने के नाते उन्होंने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई है। इतना ही नहीं मनोविज्ञान में एम.ए होने के नाते पति की मानसिक शक्तियों और कमजोरियों को सृजनात्मक धरातल की ओर 
उन्मुख करने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि दुष्यन्त कुमार का दाम्पत्य जीवन सरस और जीवन्त रहा। उन्होंने पत्नी को पूरा मान-सम्मान और प्यार दिया। वे राजेश्वरी को प्यार से राजो कहते थे। दुष्यन्त कुमार के चले जाने के बाद भी राजेश्वरी ने अपने दमखम से ही घर को संभाला। बेटों की शादियां कीं, उन्हें सेटल किया।मेरा सौभाग्य है कि मैंने कालजयी कवि दुष्यन्त कुमार के सम्पूर्ण साहित्य पर शोध कार्य किया। शोध के सिलसिले में पारिवारिक जानकारी प्राप्त करने के लिए मैंने राजेश्वरी जी को पत्र लिखा था। उस पत्र के जवाब में जो कुछ उन्होंने लिखा वह इस प्रकार है -

प्रिय जयश्री जी,
नमस्कार!
आपका पत्र मिला। इससे पूर्व शायद दो या डेढ़ वर्ष पूर्व आपका मुझे एक पत्र और मिला था।आपने लिखा है कि आप मुझे कई पत्र डाल चुकी हैं। आपने शायद यह पत्र मेरे विद्यालय के पते पर भेजे होंगे इसलिए वह अवश्य ही इधर-उधर खो गए होंगे।इससे पहले मैंने आपसे आग्रह किया था आप भोपाल अवश्य आयें और मेरे पास आकर 
ठहरें।दुष्यन्त जी के बारे में आप जो कुछ जानना चाहती हैं वह सब मैं आपको बता दूंगी।अपने शोध के लिए आप मुझसे जो भी सहायता लेना चाहेंगी, मैं दूंगी। इसलिए आपसे आग्रह है कि आप भोपाल अवश्य आयें। मैं यहाँ भोपाल में एक सरकारी किन्तु छोटे ;जो मेरे लिए काफी है मकान में रहती हूँ और विद्यालय में नौकरी करती हूँ। आपको कोई कठिनाई नहीं होगी मेरे साथ ठहरने में। मेरे बच्चे बड़े हैं उन्हें अपनी नौकरियों पर रहना पड़ता है, इसलिए मैं ही यहाँ अकेली रहती हूँ।
मेरी तीन संताने हैं। सबसे बड़ी बेटी थी, जिसका विवाह दुष्यन्त जी के सामने एक इंजीनियर लड़के से हो गया था और वह स्वयं आकाशवाणी में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की पोस्ट पर यहाँ भोपाल में ही नियुक्त थी। मेरा दुर्भाग्य कि 1985 में एक कार एक्सीडेंट में मेरी बेटी और उसके पति दोनों की ही मृत्यु हो गई। बेटी का नाम अर्चना और दामाद का नाम राजकुमार था। उससे छोटे दो बेटे हैं। बड़ा बेटा आलोक स्टेट बैंक आँफ इंदौर में ब्रांच मैनेजर है जो आजकल दिल्ली में पोस्टेड है। उसकी शादी साहित्यकार कमलेश्वर जी की बेटी से हुई है। उसके दो बच्चे हैं - एक बेटा और एक बेटी। मेरा छोटा बेटा अपूर्व आर्मी में है। अभी मेजर बना है जो आजकल लद्दाख में पोस्टेड है। उसका विवाह मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भगवंतराव मंडलोई की नातिन से हुआ है। उसको भी एक बेटी है। अपने बच्चों के विषय में मैंने आपको पूरी जानकारी दे दी है। कुछ और अधिक यदि आप चाहेंगी तो दूंगी।
दुष्यन्त जी के अप्रकाशित साहित्य के विषय में मुझे स्वयं को पहले कुछ पता ना था कि कितना साहित्य अप्रकाशित है। कुछ साहित्य तो जो मैंने पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजा था उसमें से एकांकी नाटकों की एक अप्रकाशित पांडुलिपि तो खो गई है। मैं अगले सत्र में सेवानिवृत्त हो रही हूँ तभी उनकी रचना वली तैयार करके प्रकाशित कराऊंगी। दुष्यन्त जी की मृत्यु हुई तो मेरे दोनों बेटे पढ़ रहे थे। उनके अचानक चले जाने से मैंने अपना पूरा ध्यान बच्चों को सेटल करने में लगा दिया। एक के बाद कई जिम्मेदारियाँ विस्तार लेती रहीं और मैं उन्हें पूरा करती रही।
इस तरह 18 वर्ष बीतने को आ गए हैं और मैं दुष्यन्त जी के साहित्य से सम्बन्धित एक भी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाई। अब अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त होकर मैं अपना समय उनकी रचनावली में लगाऊंगी। आपने लिखा है कि आपकी कोशिश है कि दुष्यन्त जी को आप अपने शोध कार्य में ऐसा सही रूप प्रदान करना चाहती हैं जिससे साहित्य में उन्हें वह हक मिल सके, जिसके वे हकदार हैं।मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं - सरस्वती आपकी मदद करें। आशा है आप सब सानन्द होंगे।
भवदीया
राजेश्वरी दुष्यन्त कुमार
 और देखिए राजेश्वरी जी ने अपने इस पत्र में दुष्यन्त कुमार के समस्त साहित्य को प्रकाश में लाने की जो बात कही है उसे 2005 में विजय बहादुर सिंह के संपादन में दुष्यन्त कुमार रचनावली के नाम से चार खंडों में प्रकाशित कराकर ही दम लिया। ऐसी महान स्त्री रत्न राजेश्वरी जी के निधन से मेरी अपूर्णीय और निजी क्षति हुई है। राजेश्वरी जी से मैं मिली जरूर लेकिन पीएचडी पूरी होने के बाद। उन्होंने मुझे वह आम का पेड़ भी दिखाया जो दुष्यन्त जी ने लगाया था, वो सारी जगहें जहाँ दुष्यन्त जी अपनी रचनाए  लिखते थे। बहुत ही सुखद और अविस्मरणीय यादें रहीं जिसे मैंने राजेश्वरी जी से मिलने और उन्हें देख-सुनकर संजोया था। साहित्यकार प्रियदर्शी खैरा जी हम दोनों मेरे पति श्री बाबू खाण्डा को राजेश्वरी जी से मिलवाने लेकर गए थे।आज न तो वह सरकारी मकान रहा और न ही राजेश्वरी जी। उनके चले जाने से पहले ही वहां की सरकार ने दुष्यन्त जी के उस मकान को ढहा दिया विकास के लिए जिस का विरोध मैंने भी अपनी पत्रिका अनुकृति के जरिए किया था। शेष है सिर्फ यादें। यह मलाल ही रहा कि कोरोना की लाॅकबन्दी की वजह से मैं दोबारा उनके आग्रह के बावजूद भी ना जा सकी। कहाँ पता था कि वह एकाएक चली जाएंगी। अलविदा राजेश्वरी जी।

डाॅ जयश्री शर्मा
अध्यक्ष राजस्थान लेखिका संस्थान जयपुर 
प्रकाशित पुस्तकें:
कहानी संग्रह__शिवकोरी,शहीद की चिट्ठी।
आलोचनात्मक पुस्तक-
दुष्यंत कुमार:एक अध्ययन 
कविता संग्रह--गोधूलि का चाँद 
पंचदशी गजल संग्रह। 
सम्पादक कहिन 

कुल छ:प्रकाशित पुस्तकें
21वर्ष से अनुकृति त्रैमासिक का सम्पादन और प्रकाशन
स्त्री मुद्दों पर अनेक रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई।

14/एच/94, इन्दिरा गाँधी नगर,
पुलिस चैकी वाली गली,
जगतपुरा - 302017
जयपुर
मोबाईल - 9413418045


टिप्पणियाँ

  1. बहुत मार्मिक और संवेदनापूर्ण संस्मरण है | जय श्री जी को लिखे राजेश्वरी जी के पत्र से दुष्यंत जी के परिवार के बारे में पूरा पता चलता है |बेटी-दामाद के असामयिक निधन और दोनों बेटों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाने से ले कर "दुष्यंत कुमार रचनावली" के प्रकाशन तक के कार्य राजेश्वरी जी का दुष्यंत जी और परिवार के प्रति समर्पण ही कहा जायेगा | दुष्यंत कुमार के घर को सरकार द्वारा ढहा देना बताता है कि हमारे यहाँ की सरकारें साहित्यकारों के प्रति कितनी बेरुखी रखती हैं |
    इस संस्मरण को साझा करने के लिये जयश्री शर्मा और मीमांसा को साधुवाद |

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  2. दुष्यंत कुमार जी की कालजयी ग़ज़लें और शेर सर्वाधिक उद्धृत किए गए हैं, किये जाते रहेंगे। उनकी सहचरी के विषय में जानकर मन में श्रद्धा के भाव उमड़ पड़े।
    आपके माध्यम से हम स्त्री रत्न राजेश्वरी जी से परिचित हुए, आपका अभिनंदन आदरणीया।

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