सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वास्तविकता में विन्यस्त कविताएँ - मंजुला बिष्ट

समीक्षा
विशाखा मुलमुले की कविताएँ समालोचन से लेकर कई जगहों से प्रकाशित हुई हैं जिनमें मीमांसा भी शामिल है। उन्हे सर्वत्र लक्षित किया गया। बोधि प्रकाशन ने प्रतिष्ठित दीपक अरोड़ा पाण्डुलिपि प्रकाशन योजना में उनके पहले संकलन का चयन कर इसे प्रकाशित किया है। कवि- कहानीकार मंजुला बिष्ट द्वारा  लिखी गयी यह समीक्षा शायद पहली है जिससे विशाखा की कविताओं पर समीक्षा- संवाद शुरू होने जा रहा है।


विशाखा मुलमुले का कविता-संग्रह"पानी का पुल"बोधि प्रकाशन,जयपुर द्वारा आयोजित 'दीपक -अरोड़ा पांडुलिपि प्रकाशन योजना"के तहत चयनित है।संग्रह में कुल 71 कविताएँ हैं,जिनके बारे में निर्णायक मंडल की व्यक्तिगत टीप भी किताब में दर्ज है।कवि दीपक अरोड़ा की स्मृति में नए कलमकारों को सम्मान दिए जाने के इस साहित्यिक प्रयास हेतु बोधि प्रकाशन व मायामृग जी अवश्य ही बधाई के पात्र है।
  जैसा कि हर कवि की अपनी भावभूमि होती है और उसके ऊपर गहराता उसका अपना मन-आकाश,इस संग्रह में भी यह कविमन अपने सुगठित व्यवहारिक ताने-बाने के साथ प्रस्तुत होता है।विशाखा की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि उन्हें अपनी बात कहने का असीम धैर्य है,जिसे वे बेहद तार्किक तरीक़े से लोक में आवाजाही कराती है।संग्रह में यह आवाजाही वैविध्य विषयों की गहन पड़ताल करती है।व्यक्तिगत तौर पर कलमकार के अनुभूत सुख-दुःख..जब लोक से सम्पर्क करता है,सामंजस्य साधता है तो यह देखना दिलचस्प होता है कि कलमकार के भीतर यह प्रक्रिया किस हद तलक व किस तरीके से घटित हुई है..संवर्धित हुई है,यही रचना की ग्राह्यशीलता बनाती है।और रचना की ग्राह्यशीलता ..हर पाठक के भीतर उसकी व्यक्तिगत सामर्थ्य-रुचि पर निर्भर करती है।
  विशाखा की कविताओं में लोक से हुई उसकी अनुभूतियों का लेन-देन ..शाइस्तगी लेक़िन मजबूती से दर्ज हुई है ।कविता'गिरफ़्त' में वे अपने समय को शंकालु ,संकोची,कटीला,निष्ठुर और यहाँ तलक कि हमलावर रूप में भी देख रही है..जिसकी गिरफ्त में आज हर संवेदनशील मनुष्य है।

"इस निष्ठुर समय में
अन्नदाता के समर्थन में
बापू के देश में
जीभ की परतंत्रता में
एक रोज़ का भी उपवास साध न सकी"


"रोटी,रेणु और मैं''कविता में रोटी बनाती हुई गृह-स्वामिनी व झाडू बुहारती सहयोगिनी के बीच जो तानाबाना बुनता है..उसे अंत की जाते देखना सुखद है,उम्मीद है।
वहीं,रोटी..को केंद्रबिंदु बनाकर लिखी गई अन्य कविता"वजूद" में अंत अवाक कर जाता है।जीवन मे महज रोटी कमाने में स्वयं की चाहनाओं ,दमित सपनों की तिलांजलि देते मनुष्य का अंत मार्मिक है।इन दोनों कविताओं में आत्मा के झरोखों से 'रोटी 'को बिम्ब बनाकर ..जगत को देखने-समझने की प्रक्रिया में कवि मन की विवशता महसूस होती है।दोनों कविताओं के आसपास रहने पर महसूस होता है जैसे,सुख पकड़ते हुए मुट्ठी से छूट गया..और दुःख न चाहकर भी अंगुली थाम रहा हो।
संग्रह में स्त्री-मन,स्त्री की दुनिया..में झांकती कुछ बहुत सुंदर कविताएँ हैं जो स्वाभाविक है भी।"नदी के तीरे" कविता में किशोरवय बेटे के असमंजस पर मरहम रखती,समझाती हुई माँ ...

"मैं कहती हूँ , पिता है पर्वत समान 
जो खाते है बाहरी थपेड़े 
रहते हैं मौन गम्भीर 
देते हैं तुम्हें धीर

मैं उस पर्वत की बंकिम नदी 
टटोलती हूँ तुम्हारे समस्त भूभाग 
आजकल की नहीं यह बात 
इतिहास में है वर्णित 
सभ्यताएं पनपती है नदी के तीरे !"

एक कविता है जिसे पढ़कर पाठक मुस्कराते हुए अचानक चुप हो सकते हैं।" गधापच्चीसी" कविता में कवि जब घोड़े व गधे के जीवन और उनके कार्य-व्यवहार पर नजर रखती है तो अहसास होने लगता है कि यह दरअसल सदियों से चले आ रहे स्वभाव के आधार पर बरते जा रहे भेदभाव पर प्रहार है।समाज में जोर से चिल्लाती आवाज़ें,समयानुसार बदलती मानसिकता ही अवसर पाती है..किसी नियत रास्ते पर चलते लकीर के फकीर नहीं।यह कविता बहुत धीमी आहट से दिलोदिमाग में प्रवेश कर वर्षों से लगी सांखल को खटखटा जाती है।शानदार कविता है यह,प्रभावी शिल्प के साथ

"गधों ने स्वीकार किया गधा होना 
तो वह ढोता रहा माल - असबाब , आदेश 
घोड़ा रहा चालाक 
सीखता गया नित नई चाल 
ठुमक , लयबद्ध , तिरछी , कभी मौके पर अढाई घर 
-----
-----
------
उन्हें मालूम है घोड़ों की हिनहिनाहट से गूँजती है वादी
उनकी ठसक पर निहाल होती बहुसंख्यक आबादी 
बोझ तो आखिर में उन्हें ही ढोना है 
गधा तो आरम्भ से उन्हें ही होना है ।"

  एक शब्द पूरी कविता का केंद्र-बिंदु बनकर अपने पूरे प्रभाव में मौजूद रह सकता है ,यह कविता" पीछे" पढ़कर जाना जा सकता है।कलम यहाँ भी भावातिरेक में लंबे-गहरे व्याख्यान नहीं देकर सुगठित-सुचिंतित पंक्तियों के जरिये अपने उद्देश्य को पाती दिखती है,जो विशाखा की कलम की विशेषता भी है।यह कविता कवि के जीवन-मीमांसा की एक झलक प्रस्तुत करती है।
   कोरोना महामारी के इस समय में 'संक्रमण -काल' किसी वायरस से उपजे नैराश्य,अवसाद संताप व हाहाकार को नहीं बताती है,वरन यह कविता मानवीय रिश्तों में घुसपैठ कर चुकी शीतलता का  रिपोर्ट-कार्ड दिखाती है।यह एक पठनीय कविता है।
संग्रह में एक अति महत्वपूर्ण कविता बार-बार मेरा ध्यान खींचती है.."और स्वतंत्रता फिर हाथ से निकल गई"।यह कविता पाठक से धैर्य व समय की मांग करती है..स्त्री-स्वतन्त्रता जो देश को स्वंतत्रता मिलने के इतने वर्षों बाद भी सिर उठाकर किसी सहयोग की आशा में मुँह छिपा रही है।यह कविता भीतर धँसती है..बेचैनी पैदा करती है।यहाँ कवि बदलते समय के तेवर पर नहीं बल्कि स्त्री देह के स्वयं के भीतर सिमटने पर सजग निगरानी रखती है..जो प्रभावित करता है।यहाँ कलम आधुनिक-शिक्षित स्त्री को कच्छप गति से मिल रही सुविधाओं/सुरक्षा के लिए एक आवश्यक गम्भीर विमर्श की सम्भावना दिखाती है।

"परतंत्रता हमारे गुणसूत्रों में क्या कुंडली मार पैठ गई 
जबकि , जब बापू चल रहे थे लाठी टेक 
नमक सत्याग्रह का था वह समय 
हम दौड़ रहीं थी पीछे ख़ून का नमक किये 
बापू की लाठी न होने पर , बनी हम लाठी , दिया अपना कंधा 
एक दिन भाग ही गए विदेशी देश छोड़ 
बच्चे , बूढे , जवान सबको मिली स्वतंत्रता 
मवेशी , हवा , पंछी तो पहले ही थे स्वतंत्र 

हम भारत माता की जय में अटक गईं
हम सोने की चारदीवारी में देवी 
मिट्टी की चारदीवारी में बनी रहीं भोग्या 
चारों खानों से चित्त हुईं हम 
अचानक ही कच्छपों में बदलने लगी 
समेटने लगी ख़ुद को अपनी ही देह में 
और स्वतंत्रता दाएँ - बाएँ से गुज़र गई"

"पानी पर पुल" शीर्षक कविता प्रेमिल कविताओं की कोमल लेकिन सशक्त भावनाओं का संधिस्थल है।प्रेम से बावस्ता हो चुके मन से बेहतर कौन जानता -समझता होगा कि प्रेम में" अनिद्रा" का कितना मोल होता है!कविता में प्रेम की उनींदी तरंगों की छुवन महसूस होती है..

"तुम्हारे प्रेम में संक्रमित हो चुका जीवन 
आज अर्धरात्रि तुम्हारी निद्रा का संक्रमण चाह रहा
  - --
  - ----
शिशु के समीप से आती है जैसे दुग्ध की सुगन्ध 
तुम्हारे सामिप्य में मुझे मिलती गहन निद्रा की गंध 
अनिद्रा में गिनती हूँ तुम्हारे हृदय का एक - एक स्पंदन 
और रैन बीतते न बीतते  मेरे नैन लग जाते हैं ।"

 आज के मौजूद राजैनतिक-आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य में,सुव्यवस्था और आम आदमी जैसे दो विपरीत ध्रुव सिद्ध हैं।"आंकड़ा"कविता सीधी-सपाट भाषा में लेक़िन,विचारणीय प्रश्न करती है..इसे पढ़ते हुए कवि के सामाजिक सरोकारों के प्रति जिम्मेदारी को समझा जा सकता है,यही साहित्य के मुख्य उद्देश्यों में से एक है।मौजूद राजनीतिक-सामाजिक उठापटक और जनपक्षधरता की हिमायत करती हुई यह एक सशक्त सृजन है..जिसे पढ़ते हुए बिसराए हुए किसी अख़बार की सुर्खियों पर ध्यान जाने लगता है।

 "पार्षद के चुनाव में दो सौ 
विधायक के चुनाव में पांच सौ 
थोड़े और बड़े चुनाव में 
उसका अंगूठा हजार तक में बिका 

इस तरह अठारह से साठ की उम्र तक 
पहुँचते - पहुँचते 
गर जीवित रहता तो
तकरीबन जमा लेता वह बीस हजार रुपये"

'उसके जाने के बाद' कविता नागर जीवन में किरायेदार के चले जाने के बाद पसरे निचाट सन्नाटे के बहाने मानवीय सम्बन्धों पर बहुत सुंदर कविता है ।कविता में चली आई इन सहज अभिव्यक्ति इंसानी रिश्तों में उपस्थित सीमित व्यवहार की ओर कचोट पैदा करती है..अनमने से उद्वेग जैसे अन्तर्मन को टीस देती चली जाती है,विदाई से उपजे नैराश्य को पुकारती है।

"जब घर हरा भरा था 
तब उसकी एक चाबी मेरे पास रहा करती थी 
आज जब घर खाली है 
तब उस घर की सारी चाबियां मेरे पास है---
----
----
घर से नहीं घरवालों से मेरा सम्बंध था 
उनके स्थानांतरण के बाद
चाबियां होकर भी 
उस घर का दरवाजा मेरे लिए बंद था "

 विशाखा एक ही शब्द/भाव के ज़रिए अचानक ही अन्य लोक में ले जाकर जब छोड़ देती है तो एक पाठक के तौर पर देखना दिलचस्प होता है कि कोई भी शब्द/भाव ...अपने साथ एक विहंगम दृश्य लेकर उपस्थित हो सकता है।संग्रह में यदि पहली कविता में कोई किरायेदार स्थानांतरण होकर स्थान छोड़कर चला गया तो दूसरी कविता" किरायेदार"में पिता-पुत्र के मध्य सँवाद के जरिये देह को 'किराए की'कहा गया है वह कवि की आध्यात्म में रुचि व मानवीय जीवन के प्रति संवेदनशील सलंग्नता को बताता है।यह सलंग्नता कविमन के बदलते दृश्य पर थमी नजर को देखते हुए सुखद आश्चर्य भी देती है तो अपने वातावरण के प्रति सजग भी करती है।

"सोच में पड़ गए पिता 
देह भी तो किराए का मकान
जन्मते ही लग जाता है उपनाम 
एक रंग विशेष से जुड़ जाता है नाता 
लगती फिर उसी धर्म की कील 
टंगती उसी की तस्वीर "

 आध्यात्म और आत्मदर्शन की सुवास लिए अन्य कविताएँ..धम्मम शरणम गच्छामि,"तमसो मा ज्योतिर्गमय,और नृत्य हैं।' नृत्य' कविता बेहद ही खूबसुरती से सम्पूर्ण सृष्टि को नृत्यमय होते महसूस कराती है..जिसका समापन इन पंक्तियों पर जब होता है तो मन भीतर से भीजने लगता है..विश्रांति पैठ करने लगती है।नेत्र कुछ अधिक देखने की चाहनाएँ कुछ अधिक देर तलक मुलतवी कर सकते हैं...

"शिव के सम्मुख नृत्य है 

आकाश में नृत्य है ,
सूर्य , चंद्र , आकाशगंगाओं का 
नेपथ्य में भी चलता नृत्य है 
अलौकिक है  , असीम है ,
अनंत है , नृत्य है 

धरा पर भी नृत्य है ,
सूर्य किरणों का नृत्य है 
रज -रज में नृत्य है ,
कण -कण में नृत्य है 
--
----
--

हम भी है नृत्य में 
प्रकृति के हर कृत्य में 
देह के भीतर आत्मा का नृत्य है 
विदेह परमात्मा का नृत्य है 
सर्वत्र है ,
नृत्य है ..."

अपने रचना संसार को लेकर विशाखा की मनन-चिंतन शैली उनकी व्यक्तिगत है,जहाँ वे किसी भी वायवीय संसार में विचरण नहीं करती है न कराती है।उनकी कविताएं वास्तविकता का सन्धान करती है,संताप प्रकट करती है,उम्मीद जगाए रखती हैं और विचारणीय प्रश्न भी छोड़ देती हैं।कहते हैं न कि एक अच्छी कविता न सिर्फ़ स्वयं रची जाती है बल्कि अपने सृजक को भी रचती है और उसकी विचारशीलता का पता देती है।
 विशाखा के इस प्रथम-कविता संग्रह को पढ़ते हुए मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह विश्वास है कि उनके पास बगैर कोई भाषिक चमत्कार पैदा किए वे अपने समय व सच को ध्यान में रखते हुए सार्थक संवाद कायम करने में और व्यवहारिक दृष्टिकोण स्थापित करने में सफल हुई है।इस संसार में जब स्वयं को खोने का खतरा सबसे ज़्यादा होने लगा हो  तो कविताओं के इस व्यवहारिक पक्ष को पढ़ा जाना बेहद ज़रूरी हो जाता है।
 संग्रह में बहुआयामी और बहुसंदर्भी कविताएँ हैं जहाँ विशाखा अपने दृष्टिसम्पन्न और सामर्थ्यवान होने का परिचय देती हैं।विशाखा को प्रथम कविता संग्रह को महत्वपूर्ण प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित होने के लिए हार्दिक बधाई व भविष्य हेतु असीम शुभकामनाएं।मुझे उम्मीद है वे अधिक ऊर्जावान,सजग व संवेदनशील होकर सृजन पथ पर आगे बढ़ेंगी..इसी शुभेच्छा के साथ पुनश्च असीम मंगलकामनाएं।

मंजुला बिष्ट

वर्तमान में उदयपुर (राजस्थान) में निवास कर रही मंजुला बिष्ट की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं , साहित्यिक पोर्टल तथा ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी हैं ।

ईमेल आईडी-bistmanjula123@gmail.com

संपर्क : +91 94146 47315










टिप्पणियाँ

  1. विशाखा की कविताओं पर मंजुला ने बहुत समीचीन समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी है | विशाखा की कवितायें विभिन्न ब्लाग्स और और उनकी पोस्ट्स पर पढ़ता रहा हूँ | "पानी का पुल" के लिये विशाखा को बधाई और समीक्षात्मक टिप्पणी के लिये मंजुला विष्ट को साधुवाद |
    मीमांसा और विशेष रूप से राजाराम भादू को बहुत बहुत धन्यवाद कि नई पीढ़ी के रचनाकारों और अध्येता समीक्षकों को वे मंच उपलब्ध करा रहे हैं |

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...