सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ललित निबंध और अष्टभुजा शुक्ल

राजाराम भादू

ललित निबंध सिर्फ विचार- मंथन ही नहीं, वहाँ कल्पना की उन्मुक्त उड़ान भी है। कल्पना की उड़ान तो उन्मुक्त ही होगी, तो क्या फिर कल्पना का भी क्षरण हो गया? उसके पर कतर दिये गये या उसे उन्मुक्त उड़ान भरने को आकाश ही नहीं बचा है?

यह सही है कि हमारी जीवन- शैली में अभूतपूर्व बदलाव आया है। हम एक कठोर अनुशासित और यांत्रिक जिन्दगी जी रहे हैं। यहाँ विकल्प के चयन की गुंजाइश नहीं, बाध्यता है। कथित विकास ने हमारी जीवन- पद्धति को कंडीशंड बना दिया है। शायद इसी का प्रतिबिंबन साहित्य की विधाओं में है। जो विधाएं हमारी अनुकूलित जीवन- स्थितियों के अनुकूल हैं, वेे ही हमारा सृजन- क्षेत्र बनकर रह गयी हैं। अनुकूलित जीवन- पद्धति में चला आ रहा विचार खपता है। ढर्रे की जिन्दगी यथास्थिति का पोषण करती है। नया विचार वस्तुत: हमारे आभ्यन्तर में ही बैचेनी पैदा नहीं करता, वह हमारे जीवन में खलल पैदा करता है। वह अनुकूलन में विचलन उत्पन्न करता है। वह ठहरे हुए पानी में कंकड मारता है। अंग्रेजी का एक प्रसिद्ध निबंध है- आन डूइंग नथिंग यानी कुछ न करने पर- वह हमारी एकरस जीवनचर्या की निरर्थकता पर प्रश्न खडे करता है।

कल्पना ललित निबंध को पंख प्रदान करती है। यह हमारी जिन्दगी को ललित छटाएं देती है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का एक प्रसिद्ध निबंध है- लालित्य की भूख- मनुष्यता लालित्य की भूख के कारण ही विशिष्ट है। लालित्य कल्पना के बिना संभव नहीं। विचार और कल्पना का संयोग ललित निबंध का स्थापत्य गढता है। प्रसंग- दर- प्रसंग हम चिन्तन के सहयात्री बनते हैं, कल्पना की उड़ान का आनंद लेते हैं। यहाँ वर्णन की विविधता होती है।

ललित निबंध शायद उपन्यास के बाद ऐसी दूसरी विधा है जो साहित्य की और अनेक विधाओं को अपने भीतर समेट लेने की सामर्थ्य रखती है। उपन्यास में कथातत्व प्रबल है तो ललित निबंध में कविता को आत्मसात कर लेने की क्षमता है। गद्य- कविता के अनेक नमूने उत्कृष्ट ललित निबंधों में जहां- तहां मिल जायेंगे।

जीवन में नवोन्मेष चिन्तन के बिना संभव नहीं है। एक चिन्तन तो दर्शन का है। साहित्य में जीवन का चिन्तन कल्पना के पंखों पर सफर करता है। यह दर्शन की तुलना में कहीं अधिक समूर्त है। नवोन्मेष के बिना हम आगे नहीं बढ सकते, जडता टूटे बिना प्रगति संभव नहीं। ऐसा नहीं कि कविता और कहानी की नवोन्मेषकारी भूमिका नहीं है। इस मामले में तो कोई विवाद ही नहीं, लेकिन गद्य का भी कोई विकल्प नहीं है। कहानी के इतर गद्य के बिना हमारा साहित्यिक परिदृश्य बहुत रीता- रीता नज़र आयेगा। कभी हम चिंता करने लगते हैं कि इथर बेहतर उपन्यास नहीं आ रहे हैं। जो आ रहे हैं, उनमें ज्यादातर बोझिल हैं अथवा निरर्थक प्रयोग हैं। जबकि उपन्यास जीवन का वृहद आख्यान है। जब हम जीवन को सृजनात्मक दस्तावेज में दर्ज करने वाली दूसरी विधाओं से मुंह चुराने लगेंगे तो फिर कैसे महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आ सकेगा।

उपन्यास आज भी एपिकल आर्ट है। नाटक का महाकाव्यात्मक रूप तिरोहित हो गया, फिर भी दुनिया में कभी न कभी कहीं न कहीं कोई महाकाव्यात्मक नाटक निकल ही आता है। हिन्दी में बडे उपन्यास इधर हर साल नहीं आ पाते, ज्यादा समय लगता है, लेकिन दुनिया की और भाषाओं में एपिकल नावेल बराबर आ रहे हैं। बल्कि अंग्रेजी में तो कहा गया था कि नैरेटिव ( वर्णन) की वापसी हो रही है। वर्णन ही तो वह चीज थी जिसके लिए कहा गया था कि अब इसकी जरूरत नहीं। पाठक के पास वक्त कहां जो वह इस नीरस गद्य में खपा सके। कविता तो महाकाव्य को क्या खंडकाव्य को भी कभी का अलविदा कह चुकी। इधर लंबी कविताएँ भी नज़र नहीं आ रही हैं। यह सही है कि पुराने चलन के महाकाव्य- खंडकाव्यों की अब जरूरत भी नहीं, मौजूदा यथार्थ की जटिलता, संश्लिष्टता और संस्तर इस तरह व्यक्त नहीं किये जा सकते, लेकिन इसे बेहतर तरीके से व्यक्त करने के लिए हमने पद्य और गद्य की इतनी विधाएं ईजाद की हैं। हमारे समय का महाकाव्य अनेक रचनाकार अनेक विधाओं में सामूहिक तौर पर रच सकेंगे, पृथक- पृथक और एक ही तरह नहीं। इसके लिए हमें विधाओं के संकीर्ण घेरे को भी तोडना होगा।

रेणु कथाकार थे- उन्होने श्रेष्ठ रिपोर्ताज लिखे हैं। उनसे भी पहले महादेवी जी लब्धप्रतिष्ठ कवि थीं, लेकिन उन्होंने यादगार रेखाचित्र लिखे हैं। मुक्तिबोध एक नये तरह का सौंदर्य- चिन्तन कर रहे थे, इसके लिए उन्होंने अलग ही तरह की डायरी विधा चुनी। इसी तरह निर्मल वर्मा के यात्रा संस्मरण और हरिशंकर परसाई व शरद जोशी के व्यंग्य- ऐसे रचनाकारों की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने अपनी एक चुनिंदा विधा में पर्याप्त ख्याति अर्जित करने के बाद दूसरी गद्य विधाओं में सृजन किया। यहां ये भी दर्ज करना जरूरी है कि ऐसा इन्होंने सिर्फ हाथ आजमाई के लिए नहीं किया बल्कि उनके पास ऐसी अनुभव संपदा थी जिसे वे अपनी चयनित विधा में व्यक्त नहीं कर सकते थे, जिसके लिए किसी और विधा की जरूरत थी- यह अन्तर्वस्तु का स्वाभाविक दबाव था।

यह सब विचार करने पर एकबारगी तो यह लगने लगता है कि वाकई गद्य पर अधिकार पाये बगैर शायद बेहतर कवि या कथाकार हो पाना संभव नहीं है। अतीत तो कुछ ऐसा ही निष्कर्ष भी देता है। हां, ललित निबंध की अपनी अपेक्षाएं हैं लेकिन जो आलोचना के क्षेत्र में काम कर रहे हैं- वे क्या साहित्य के सवालों को इतना रूखा मानते हैं? सौंदर्यशास्त्र की अपनी मौज उन्हें विचार और कल्पना की उन्मुक्त उड़ान के लिए प्रेरित नहीं करती या उन्होंने लेखन की अपनी अनुकूलित जिन्दगी को सहज स्वीकार कर लिया है? असल में यह उड़ान कहने भर को उन्मुक्त है, वरना खतरा तो उन्मुक्त उड़ान में ही है, लेकिन नवोन्मेष के लिए संधान जरूरी है और संधान के लिए उन्मुक्त उड़ान। उड़ान के तयशुदा मार्ग तो वहीं ले जाते हैं, जहाँ अनेक यात्री पहले ही पहुँच चुके हैं। ललित निबंध चीजों को नयी दृष्टि से उद्भासित करने के लिए नये क्षितिजों का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

अष्टभुजा शुक्ल समकालीन कविता में अपने ठेठ कथ्य और खास तेवर के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी एक और विशिष्ट पहचान उनके ललित निबंधों के कारण है। " मिठऊवा" के बाद इनका दूसरा संचयन आया है- पानी पर पटकथा। पुस्तक की भूमिका में विश्वनाथ त्रिपाठी विशेष उल्लेख करते हैं कि वे हिन्दी के पहले कवि  ललित निबंधकार हैं। अष्टभुजा ने यह पुस्तक इस परंपरा के पुरोधा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को समर्पित की है। भूमिका में विश्वनाथ त्रिपाठी उन्हें संस्कृत- हिन्दी की परंपरा से जोडते हुए लिखते हैं: अष्टभुजा शुक्ल के ललित निबंध सिर्फ ललित नहीं। ललित तो विधा या  काव्यरूप बोधक है। अन्तर्वस्तु में तो ये पाठक को हमारे समय की असाध्य, दुस्साध्य समस्याओं, जीवन के जटिल और बीहड पथों पर ले जाते हैं। इस बीहडता में सर्वत्र प्रायः हाशिए पर स्थित वंचित व्यक्ति, स्पष्टतः निम्नवर्गीय और निम्नवर्णीय भारतीय जन की जीवन कथा है।

अपनी बात में अष्टभुजा ने इस विधा की चिंताजनक हालत पर चर्चा करते हुए  इस पर विचार करने का प्रस्ताव किया है। यहां हमने पहले वही करने की कोशिश की है। इस पुस्तक को छपने के संघर्ष से भी गुजरना पडा। पहले मैं ने एक प्रकाशक से बात की थी। वह राजी हो गया था। प्रेस कापी भी तैयार हो गयी लेकिन फिर टालने लगा। तंग आकर अष्टभुजा जी ने ही उसे मना करवा दिया। लेकिन तब से एक तरह की ग्लानि मुझ पर तारी थी। अब उससे मुक्त हुआ। यह अच्छा हुआ, भले ही देर लगी लेकिन किताब भारतीय ज्ञानपीठ जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन से आयी। बधाई अष्टभुजा शुक्ल!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन

कला- जगत में लगभग बिसरा दी गयी शिल्पकार हिमा कौल पर राजाराम भादू ने पूरी किताब लिखी है जिसमें उनके कलात्मक विकास और वैयक्तिक संघर्ष का संवेदनशील और जीवंत चित्रण किया है। अपराजित: शिल्पकार हिमा कौल शीर्षक यह पुस्तक रजा फैलोशिप के अन्तर्गत लिखी गयी थी। कला- मर्मज्ञ हेमंत शेष ने इस पर बड़ी गहराई से लिखा है। अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन समीक्षक : हेमंत शेष अपराजित : शिल्पकार हिमा कौल एक नियमित जीवनी से कहीं अधिक है; यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का एक कार्य है। राजाराम भादू ने ऐतिहासिक उपेक्षा की छाया से एक उग्र, संवेदनशील कलात्मक विरासत को सफलतापूर्वक बाहर निकाला है। कला-इतिहासकारों, आलोचकों और आधुनिक भारतीय दृश्य संस्कृति में रुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए, यह पुस्तक एक ऐसी कलाकार का एक प्रभावशाली प्रमाण है, जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को स्थायी मूर्त रूप में बदल दिया। भारतीय कला-इतिहास और आलोचनात्मक साहित्य में, कई परिवर्तनकारी आवाज़ें अक्सर दुखद गुमनामी में चली गई हैं, जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श से बाहर कर दिया गया। दिवंगत मूर्तिकार हिमा कौल ऐसी ही एक गहन, फिर भी कम प्रलेखित उपस्थिति का ...

डायरी - रामानंद राठी

डायरी डायरी में प्रस्तुत है लेखक रामानंद राठी की डायरी के अंश । रामानंद राठी की चार दशकों में फैली रचना यात्रा पर टिप्पणी की है उनके सृजन के सहयात्री आलोचक मनु शर्मा ने । आलोचक मनु शर्मा की यह टिप्पणी न केवल लेखक रामानंद राठी के सृजन के सरोकारों पर दृष्टि डालती है अपितु उनकी रचना प्रक्रिया की समग्रता में गहराई से विवेचना भी करती है । रामानंद राठी की रचना प्रक्रिया                                                        ■    डॉ. मनु शर्मा रामानंद राठी ने कहानियों के अलावा शब्द चित्र , रिपोर्ताज ,नाटक, जीवन वृत्त, इतिहास और कला संस्कृति पर भी लिखा है । और इन सभी में उनकी रचनात्मकता के अलग-अलग पहलू प्रकट हुए हैं । अधिकतर रचनाओं में उनका पैतृक गांव गूंती महानायक की भांति मौजूद है। ऐसा महानायक जो निरंतर अपनी सीमाओं को लांघ कर विराट रूप में सामने आता है । जैसे 'पिंड में ब्रह्मांड '।  अपनी जड़ों की पहचान के दौरान राठी ने उन संदर्भों की खोज की...

कविताएँ : मनमोहन भारती

कविताएँ हम तो उसे मनमोहन भारती के नाम से ही जानते हैं। जिन दिनों मैं मुम्बई महानगर में ( अखबार में भी ) था, मनमोहन भारती और केसर सिंह बिष्ट दो युवा और साहसी रिपोर्टर थे। उन्होंने ही रातों की यात्राओं में मेरी बम्बई से कुछ पहचान करायी। बाद में धीर गंभीर प्रणव प्रियदर्शी इस टीम में आये। वापस आने पर भी मुझे महानगर के हालचाल मिलते रहे। इनमें मनमोहन किसी किस्से कहानियों का उदात्त चरित्र लगता है। जैसे लंबे संकोच के बाद प्रणव ने अपनी कहानियों के बारे में बताया। वे मीमांसा में और फिर दूसरी जगह आयीं और सराही गयीं। मनमोहन तो जितने साहसी हैं, उतने ही विनम्र और शर्मीले। उसने भी अपने भीतर एक कवि को जज्ब किया हुआ था। हमें खुशी है कि वह भी मीमांसा के जरिए बाहर आ रहा है। कविता कुछ लंबा रियाज चाहती है। आप इन्हें एक सच्चे, जज्बाती किन्तु निर्भय व्यक्ति के अंतस की शक्ति के रूप में भी पढ सकते हैं।               - राजाराम भादू 1. अंधेरों से हिस्से करने लगा हूं मैं जिंदगी तुम ही से डरने लगा हूं मैं अंधेरों में ही उजाले नजर आने लगे हैं अंधेरों से दीए जलाने लगा हूं मैं ...

नित्यानंद गायेन की कविताएँँ

कवि -कविता  जन सरोकारों से जुड़े कवि का नाम है नित्यानन्द गायेन                                                      ■  दिनकर कुमार रूस के एक प्रांत दागिस्तान के लोक कवि रसूल हमजातोव कहते हैं कि कभी-कभी मैं अपने से यह प्रश्न करता हूं कि क्या चीज कविता का स्थान ले सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि कविता के अलावा पहाड़ हैं, बर्फ और नदी -नाले हैं, बारिश और सितारे हैं, सूरज और अनाज के खेत हैं…। मगर क्या पहाड़ , बारिश, फूल और सूरज का कविता के बिना और कविता का इनके बिना काम चल सकता है? वे आगे कहते हैं -कविता के बिना पहाड़ पत्थर बन जाएंगे, बारिश परेशान करने वाले पानी और डबरों में बदल जाएगी और सूर्य गर्मी देने वाला अंतरिक्षीय पिंड बनकर रह जाएगा।   कवि नित्यानन्द गायेन की कविताएं काफी दिनों से पढ़ते हुए मैंने महसूस किया है कि वह जन सरोकारों से जुड़े हुए कवि हैं। आम लोगों के हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है। उनकी यही ईमानदारी और बेबाकी उनको य...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

विभाजित अंधेरे

संभावना लेखिका मंजुला बिष्ट के पास अत्यंत तरल भाषा एवं सूक्ष्म ऑब्जर्वेशंस हैं ,जो कहानी के कहन को प्रभावी तथा वातावरण को जीवंत बनाते हैं । चरित्रों के मनोविज्ञान की बारीक पकड़ , उनके अंतर्विरोधों को गहराई से रेखांकित करने में सहायक है । लेखिका अपनी इन सभी खूबियों का ' विभाजित अंधेरे' में स्त्री संसार के अंधेरे कोनों के मूक साझाकरण की प्रक्रिया में आए अवरोधों की पड़ताल में बेहद खूबसूरती से उपयोग करती हैं  । दूसरे फलक पर यह अस्तित्व के युद्ध की संवेदनहीन भूमि पर मानवीय भावनाओं के अंकुरण के लघु प्रयास की भी कहानी है ।  साथ ही यह स्त्री मनोभावों के दो अलग-अलग समांतर संसार के बीच की अंतः क्रिया की सीमाओं एवं शक्तियों को भी उजागर करती है । विभाजित अंधेरे                                         मंजु ला बिष्ट               वह मई माह की एक ऊबी हुई दुपहरी थी।सूरज आदतन अपनी तासीर बढ़ा रहा था।खुले आसमान तले भावी तीख़ी तपन से बच...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

वे प्यार के दरिया में डूब कर चले गए...

कृति -चर्चा वे प्यार के दरिया में डूब कर चले गए... दो किताबें , दो लेखिकाएं, दोनों में सुनी जा सकती हैं दिलों की धड़कनें                                                  ■ ईशमधु तलवार प्यार में डूब कर आग का दरिया कैसे पार किया जाता है यह कोई हिंदी के संपादक- लेखक रवीन्द्र कालिया और अवधनारायण मुद्गल से पूछे ! लेकिन कैसे पूछें ? वे तो अब सितारों के उस पार जा चुके हैं ! लेकिन कहते हैं , जिस्म चला जाता है पर प्यार कभी नहीं मरता । वह हमेशा लहरों की तरह बहता रहता है । कागज पर रोशनाई की शक्ल में बहते इस प्यार को दो किताबों में देखा और महसूस किया जा सकता है । ममता कालिया की "रवि कथा" और चित्रा मुद्गल की "तिल भर जगह नहीं " में खूब जगह है - जीवन संघर्षों के बीच प्यार को बचाए रखने की । शायद इसीलिए ममता कालिया अपनी 'रवि कथा' में कहती हैं - "मैं रवि को अपने आसपास बोलते , उठते-बैठते और चलते-फिरते देख लेती हूं । यादों में बसे इस रवि से मेरा प्रेम उस जीते जागते रवि की तुलना में ...

शिक्षा विमर्श के नए आयाम खोलती 'किताब'

कृति चर्चा  प्राचार्य एवं  प्रशासक रहे डॉ आर.डी सैनी लगभग चालीस वर्षों से साहित्य संसार में सक्रिय हैं । कविता ,उपन्यास एवं कथेतर विधाओं से गुजरते हुए 'किताब' उनकी दसवीं पुस्तक है । 'विचार प्रक्रिया ' और 'संज्ञानात्मक बोध ' का बच्चों में विकास कैसे हो ? इसका व्यावहारिक धरातल पर समाधान यह पुस्तक प्रस्तुत करती है   । डॉ. ममता चतुर्वेदी प्राचार्य है , जो कि लंबे समय से पठन-पाठन के साथ-साथ शिक्षा के व्यापक सरोकारों से जुड़ी रही हैंं । एक शिक्षिका की दृष्टि से डॉ. आर.डी सैनी की 'किताब' की यह समीक्षा , पाठकों को शिक्षा से जुड़े उन मूलभूत प्रश्नों एवं समस्याओं के समाधान समझने में मदद करेगी , जिनका सफलतापूर्वक सामना लेखक ने स्वयं किया है ।  यह पुस्तक समीक्षा 'किताब' के सभी आयामों को दृष्टिपात करते हुए पाठक को किताब की दहलीज तक ले जाती है । एक पुस्तक के रूप में  'कुछ यूं रचती है हमें "किताब", शिक्षा व बाल मनोविज्ञान पर आधारित भाव प्रधान पुस्तक है । इसमें लेखक डॉ आर.डी सैनी ने मानव मूल्य , नैतिकता, कर्तव्य एवं घटनाओं का मार्मिक चित्रण किया है...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...