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शब्दों की दुनिया

राजाराम भादू

उत्तर आधुनिकता से अभिहित किये जाने वाले विमर्श में पाठ ( टेक्स्ट) बहुत महत्वपूर्ण हो उठा है। हिन्दी शब्द पाठ के दो अर्थ हो सकते हैं, एक पाठ्य- वस्तु और दूसरा पाठ ( रीडिंग)। कुछ उत्तर आधुनिक चिंतकों के अनुसार ज्ञान अथवा सृजन वास्तव जगत का पाठ ( टेक्स्ट) मात्र है। इस पाठ की व्याख्या भी  एक पाठ (रीडिंग) है। कुछ अन्य उत्तर आधुनिक व्याख्याकार समूची संस्कृति को पाठ और उप -पाठ बताते हैं। दूसरे कुछ चिंतक भाषा को ही वास्तव जगत का पाठ मानते हैं। भाषा वस्तु ( ऑब्जेक्ट) को संकेत, संकेतक और संकेतित ( साइन, सिग्नीफायर, सिग्नीफिकेन्ट) में परिवर्तित कर देती है। इन चिन्तकों का मानना है कि वास्तविक जगत और उसकी भाषिक सृष्टि के बीच एक बड़ा अंतराल रहता है जिसे हमारा कोई भी पाठ( रीडिंग) और व्याख्या पूरी तरह पाट नहीं सकती।

उत्तर आधुनिक चिन्तकों में से कुछ चिन्तक विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं को वृत्तांत ( नैरेटिव) मानते हैं।प्राचीन शास्त्रीय संस्कृतियां उनके लिए महा वृत्तांत ( मेगा नैरेटिव्स) हैं। देरिदा जैसे चिन्तक इन्हीं वृत्तान्तों के विखंडनात्मक पाठ ( डिकंस्ट्रक्टिव रीडिंग) की बात करते हैं ताकि इनके वर्चस्व से मुक्ति पायी जा सके। देरिदा के अनुसार इस पाठ में अंतराल के पाठ यानी वास्तव जगत और सांस्कृतिक संरचना के मध्य रिक्ति ( स्पेस) को भी पढने की जरूरत है। इस अंतराल में वे अनेक स्वर दबे पडे हैं जिन्हें अभिव्यक्ति के लिए एक पाठ्य संरचना के रूप में निर्मिति के लिए संकेतित अर्थात भाषाबद्ध नहीं किया गया। यह हाशिये पर खाली पड़े स्थान का पाठ भी होगा।

ज्ञान की तरह सृजन की सांस्कृतिक धाराओं में प्रभावशाली सभ्यताओं की जगह ज्यादा होती है। प्रभाव क्षेत्र के विस्तार में वर्चस्वशाली संस्कृतियाँ अग्रणी रहती हैं। इसे पिछले औपनिवेशिक दौर में साफ देख सकते हैं। वर्चस्व की संस्कृति दूसरी संस्कृति धाराओं को या तो हाशिये पर धकेल देती हैं अन्यथा उन्हें सांस्कृतिक अंतरण  ( कल्चरल कन्वर्जन) के जरिये अपने में समाहित कर लेती हैं। हम देखते हैं कि अनेक आदिम संस्कृतियां  इस प्रक्रिया में या तो विलुप्त हो चुकी हैं अथवा आन्तरिक उपनिवेशन की अवस्था में हैं। एक स्तर पर वर्चस्वशील दिखने वाली सांस्कृतिक धारा, दूसरे स्तर पर औपनिवेशिक चेतना से ग्रस्त हो सकती है। संस्कृति के अन्त: संघर्ष  और विभिन्न धाराओं के पारस्परिक द्वंद्व बहुधा साहित्यिक कृतियों में व्यक्त होते रहे हैं।

साहित्य गत्यात्मक संस्कृति का ही एक घटक है। इसकी कोई भी व्याख्या अंततः सांस्कृतिक प्रतिमानों ( कल्चरल पैराडाइम) के अन्तर्गत ही संभव होती है जिसमें व्याख्याकार की अन्तर्दृष्टि निर्णायक भूमिका निभाती है। यहां तक कि वह किस परिघटना ( फिनोमिना) को विश्लेषण के लिए चुनता है या किस कृति का विचार हेतु चयन करता है, यह भी उसकी सांस्कृतिक संहति और प्राथमिकताओं के आधार पर तय होता है। किसी परिघटना अथवा कृति की व्याख्या एक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य के बिना मुकम्मिल नहीं होती। कृति के निहितार्थ भी अन्ततः बाह्य संदर्भों में ही खुलते हैं। निश्चय ही कृति की संरचना में मूल्य चेतना बद्धमूल होती है, तथापि उसकी अवस्थिति कालक्रम में वही नहीं रहती। उसकी व्याख्या के प्रसंग और उसके संदर्भ बाहर खुलते हैं।

इस पुस्तक के लेखों में अन्तर्वस्तुगत वैविध्य है जो मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य की जटिलता और रचनात्मक अभिव्यक्ति रूपों की समृद्धि का ही द्योतक है। इन लेखों के मध्य एक तो व्याख्या के पीछे रही अन्तर्दृष्टि और उसके पद्धतिगत प्रतिमानों में साम्य है। विमर्श के लिए जिन परिघटनाओं और कृतियों का चयन किया गया है, वे समकालीन सांस्कृतिक संघर्ष, परिवर्तन प्रक्रिया या प्रतिरोध के रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। तीसरे, व्याख्या और विश्लेषण की तार्किक निष्पत्तियां भी इन लेखों के बीच अन्तःसूत्रता की एक कारक हो सकती हैं। कृति से वास्तव जगत के मध्य सेतु- निर्माण ( ऐसोसिएशन) का उपक्रम किया गया है और हाशिये पर विमर्श को भी प्रतिश्रुति का क्षेत्र बनाने की कोशिश की गयी है।

समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य में सर्जकों के सामूहिक हस्तक्षेप की संभावनाओं और उनकी वैयक्तिक भूमिकाओं पर विचार किया गया है। हाशिये पर रहे समुदायों की सृजनात्मक अभिव्यक्तियों और प्रतिरोध- संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश है। इस पर विचार किया है कि कलाओं के जनतंत्र में लघु सांस्कृतिक परंपराओं की क्या हैसियत है। कविता में मनुष्य के आभ्यन्तर की अनुभूतियों और बाह्य- जगत से टकराती चेतना अधिक मुखरित होती  है, अतएव कविता की परिधि में समकालीनता से चिन्हित परिवर्तन और प्रभावों के रेखांकन का प्रयास है। इसके लिए कुछ प्रश्नों को प्रस्तावित किया गया है।

भारत में सत्ता प्रतिष्ठान केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं। अर्थ- सत्ता यहां आरंभ से ही राज- सत्ता को प्रभावित करती रही है। विगत दो दशकों से धर्म सत्ता और सामाजिक सत्ता ( विशेषकर पदानुक्रमित हिंदू जाति- संरचना) भी प्रबलतर होती गयी है। अर्थ- सत्ता ने तो एक प्रकार से राजसत्ता पर नियंत्रण कायम कर लिया है। इस अर्थ-सत्ता में बहुराष्ट्रीय पूंजी की वर्चस्वशाली हैसियत है। हम देखते हैं कि जनतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थानों के क्षरण के समानांतर गैर- राजनीतिक सत्ताएं प्रभावी होती गयी हैं। देश में वंचित समुदायों- दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और स्त्रियों- का प्रतिरोध संघर्ष इन सत्ता केन्द्रों के बरक्स ही देखा जाना चाहिए। धर्म- सत्ता और पारंपरिक सांस्कृतिक सत्ता उनके विकास में प्रत्यक्ष अवरोध है तो देशज और औपनिवेशिक अर्थ- सत्ता परोक्ष अवरोध। बहुलवादी जनतांत्रिक राज्य प्रणाली में ही उनके लिए प्रगतिकारी संभावनाएँ हैं। वंचित समुदायों के अस्मिता- प्रश्न को इसी फ्रेमवर्क में समझना उचित माना गया है।

परिवर्तन की प्रक्रिया में मध्य वर्ग की एक समय अग्रगामी भूमिका मानी गयी थी। अब दुर्भाग्य से यह वर्ग  यथास्थिति का सबसे बड़ा पक्षधर है। चूंकि परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति ( चेंज एजेंट) प्रायः इसी वर्ग से आते रहे हैं, इसलिए इस वर्ग की मनःस्थिति को जानने की कोशिश की है। अंत में,  स्वतंत्रता के बाद के ऐसे इंकलाबी आन्दोलन का आकलन है जिससे विकट असहमति के बावजूद उसकी ईमानदार बलिदान- भावना और रेडिकलिज्म को नहीं नकारा जा सकता। बेशक, उसे एकमात्र और निर्दिष्ट विकल्प मानकर भी नहीं चला गया है। कोई भी स्थिति- विश्लेषण और कृति की व्याख्या अंतिम नहीं हो सकती। वह विमर्श के क्रम में अपनी सार्थकता तलाशती है। यह विमर्श खुद कृति- संस्कृति के अन्तर्संबंधों और सामाजिक उत्कर्ष की प्रक्रियाओं में इनकी भूमिका के सापेक्ष ही अपनी महत्ता प्रतिपादित करता है। शब्दों की यह दुनिया इसी वृहत्तर प्रक्रम को संबोधित है।


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