सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लोक-सृजन में कला- सौंदर्य -सुभाष सिंगाठिया

आलेख
लोक- जीवन में कला स्वत: स्फूर्त रूप में यत्र- तत्र बिखरी रहती है। वह इतनी सहज व्याप्त है कि उसकी कलात्मकता और सौंदर्य पर प्रायः हमारा ध्यान नहीं जाता। अक्सर उसके परिष्कृत रूप ही हमारे विमर्श में आते हैं। लोक- सृजन में निहित कला और सौंदर्य को अपने लेख में सुभाष सिंगाठिया ने बड़ी सूक्ष्मता से रेखांकित किया है।
 

                          

साहित्य और कला- सौंदर्य बोध से भरपूर अपनी खूबसूरती को समेटे हुए ये दोनों बेहद महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील घटक किसी भी समाज के यथार्थ से लबरेज ऐसे सजीव और जीवंत चेहरे हैं जो उसके साँस्कृतिक और कलात्मक अस्तित्व को सहेजे हुए रहते हैं- आवरण रहित बहुआयामी चेहरे। एस्थेटिक सेंस से लबालब  इन चेहरों को लोक कला में ढूँढें तो ये जीवन के और अधिक नजदीक महसूस होते हैं- जीवन की गहन अनुभूति लिए हुए। जिनमें जीवन, जीवन-संघर्ष, जीवन-आनंद और जीवन-उत्सव के व्यापक आयाम निहित हैं, यानि लोक-कला लोक-जीवन और लोक-मानस के ही सदृश है और इसका मूल उद्देश्य या लक्ष्य अंततः लोकहित ही होता है।

मैंने कहीं पढ़ा था कि- "शब्द जहाँ अपनी अभिव्यक्ति का सामर्थ्य खो देते हैं, ठीक वहीं से रंग और रेखाएँ बोलना शुरू होती हैं।" जब हम किसी बहुआयामी चित्र को देखते हैं, विशेषकर प्रतीकात्मक चित्रों को तो यह बात अक्षरशः सही साबित होती है, क्योंकि ये चित्र साक्षात् बतियाते हुए, संवाद करते हुए नजर आते हैं। यहाँ पर चित्रकार की सूक्ष्म दृष्टि और उसकी व्यूह रचना अपनी विशेष भूमिका निभा रही होती है, जो कि एक बिंदु से शुरू होकर क्षितिज के उस पार तक संपूर्ण ब्रह्मांड को देख पाने में सक्षम है। यह स्वभाव अकेले चित्रकला का ही नहीं बल्कि हर तरह की कला का होता है। गौरतलब है कि इस कला को एक आम घरेलू औरत की कशीदाकारी और उसके चौका पूरने से लेकर दुनिया के नामी-गिरामी चित्रकारों की तूलिका में से धरती, आकाश और प्रकृति के अनेकानेक घटकों को सृजित होते  हुए देखा जा सकता है- लोक से सतरंगी-इंद्रधनुषी-जुगलबंदी करते हुए। 

लोक की यही खूबसूरती और खासियत है कि प्रकृति और प्रकृति से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जुड़ी चीजों के बिना उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती- बेल, फूल, वृक्ष, पशु-पक्षियों आदि का चित्रण लोकगीतों से लेकर लोक कला से संबद्ध चित्रों और अन्य कलाओं में होता है, जो यह बताता है कि लोक की जीवंतता प्रकृति और प्राणी मात्र पर आश्रित हैं और कोई भी कला इन्हीं घटकों के अवलंबन से सृजित होती है- और स्वयं लोक भी। घरों में विभिन्न अवसरों पर बनाए जाने वाले भित्ति चित्रों के रूप में माँडणा और फर्श पर अल्पना और रंगोली लोककला से सृजित चित्र होते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि में लोक से जुड़ी कोई ना कोई कथा-कहानी होती है। ये चित्र बिलकुल साधारण, सादा और प्राकृतिक रूप से बनाए जाते हैं-  बिना किसी जोड़-तोड़ या मिलावट के।  इन चित्रों में भले ही लालित्य ना हों, बावजूद इसके लोक की सौंधी खुशबू उन्हें बेहद आकर्षक और मनभावक बना देती है जो कि लोक और उसकी कला की ही तासीर है। खुशी के विशेष अवसरों पर  घरों के प्रवेश द्वार पर दाएँ-बाएँ गोबर से बनाए जाने वाले माँडणा और हिरमच (गहरा महरून रंग)  से बनाए जाने वाले साँखिया (स्वास्तिक चिह्न) लोक कला की बेहतरीन बानगी है। घर में प्रवेश करते समय उन पर नजर पड़ते ही उनकी सकारात्मक वाईब्रेशन से मन उल्लास से भर जाता है। यह लोक कला का ही प्रभाव या मनोविज्ञान है जो यह बताता है कि वह सामाजिक और साँस्कृतिक सरोकारों से भरपूर है और उसके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति पर वह अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहता।
हालांकि विश्वभर की कलाएँ कभी इस आरोपण से मुक्त नहीं रह पाईं कि उनमें लोक नदारद रहता है और इसके साथ-साथ  उन पर कभी विदेशी प्रभाव का आरोप लगता आया है तो कभी दरबारी होने का, बावजूद इसके प्रामाणिक पुष्टि के आधार पर यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि कला का मूल ओरिजन लोक ही है- वह लोक जो साँस्कृतिक वैक्यूम को शिद्दत से भर सकने में सक्षम है। परिवार-समाज में समय-समय पर होने वाले  विवाह सरीखे महत्वपूर्ण अवसरों, पारिवारिक संस्कारों, त्योहारों, पर्वों पर अर्चना-आराधना में  कला से जुड़े अद्भुत उत्कृष्ट चित्रों का समावेश- कहीं पटचित्रों के माध्यम से फूल-पत्तियों का अंकन, कहीं भित्ति चित्रों से साँस्कृतिक विकास को दर्शाता हुआ अलंकरण- माँडणा आदि, तो कहीं प्रेम प्रतीक के रूप में देहचित्र के माध्यम से मोर, पपीहा, तोता आदि का चित्रण। शुभ-शकुन वाले अवसरों पर लड़कियों और महिलाओं के हाथों और पैरों पर लगाई जाने वाली मेहंदी भी देहचित्रण का एक उदाहरण है। 

दरअसल यही वह ठेठ लोक है, जो जन्म से मृत्यु तक आजीवन किसी न किसी रूप में हमारे साथ रहता है, जिसमें ना तो दरबारी कला का कोई  प्रभाव या दबाव है और ना ही विदेशी कला से कोई आयातित अंश- यहाँ तक कि मितांश भी नहीं। उल्लेखनीय है कि ये लोक-कला के चित्र-प्रतीक जिस भी परिवेश में मौजूद रहते हैं अपने आसपास ताज़गी, उल्लास और खुशियों का संचार करने में सक्षम हैं- और यकीनन जब ऐसा घटता है तब यह भावनाओं से ओतप्रोत लोक कला का सामाजिक और साँस्कृतिक सरोकार बोल रहा होता हैं- जिसे दिल की अतल गहराइयों तक बखूबी महसूसा जा सकता है। प्रकृति का छोटे से छोटा हिस्सा- बेल, फूल, वृक्ष और प्राणी मात्र लोक के आलंबन हैं और लोक के बिना प्रकृति भी अधूरी-अधूरी-सी लगती है। लोक कला के संपर्क में आते ही ये तमाम घटक जैसे महक उठते हैं।  लोक कला खुद भी प्रकृति के संपर्क में आने से निखर-निखर जाती है । यहाँ यह कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लोक कला और प्रकृति परस्पर पूरक हैं। बल्कि यह कहा जा सकता है कि  इसी पूरकता में ही समाज का साँस्कृतिक और कलात्मक विकास संभव है- जो एक-दूसरे  की महक से ही गतिमान रहते हैं ।


लोक जीवन के मर्म को समझने वाले विद्वान आचार्य डाॅ. हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि- "लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली वह समुची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियों नहीं हैं । ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचि-संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त  होते हैं और परिष्कृत रुचि  वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएँ होती हैं उनको उत्पन्न करते हैं।"

इसी तरह भारतीय लोक को लेकर डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल कहते हैं- "कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए  भू-भाग पर पनपता हुआ मानव समाज भारतीय लोक है। भारतीय लोक हमारे सुदीर्घ  इतिहास का अमृत फल है। जो कुछ हमने सोचा, किया और सहा, उसका प्रकट रूप हमारा लोकजीवन है।  लोक राष्ट्र की अमूल्य निधि है। हमारे समाज में जो भी सुंदर तेजस्वी तत्व है,  वह लोक में कहीं न कहीं सुरक्षित है। हमारी कृषि, अर्थशास्त्र, ज्ञान, साहित्य, कला के नाना रूप, भाषाएँ  और शब्दों के भंडार,  जीवन के आनंदमय  पर्व-उत्सव, नृत्य, संगीत, कथा, वार्ताएँ, आचार विचार सभी कुछ भारतीय लोक में ओत-प्रोत है।"

लोक पर इन विद्वानों के दृष्टिकोण से एक बात पूरी तरह से स्पष्ट और पुष्ट हो जाती है कि लोक हमारे जीवन और समाज का आधार है। साँस्कृतिक और सौंदर्य-चेतना से युक्त  मजबूत आधार स्तंभ जिस पर यह समाज ना सिर्फ खड़ा है बल्कि बिना लोक के इस समाज और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। क्योंकि हमारे जीवन में, हमारे आस-पास जो कुछ भी सुंदर है, तेजस्वी है, कलात्मक है, साहित्यिक है, प्राकृतिक है, साँस्कृतिक है, वास्तविक है वह सब कहीं न कहीं, किसी ना किसी रूप में लोक में सुरक्षित है। लोक कथाएँ, लोक नृत्य, लोक गीत, लोक साहित्य, लोक नाट्य, लोक समाज इसके जीवंत उदाहरण हैं- इनमें लोक रूप और लोक समाज बसे और बचे हुए(संरक्षित) हैं। दरअसल इन कलाओं में कल्पना के लिए कोई जगह नहीं होती और ना ही यह सब मनोविनोद के लिए होते हैं  बल्कि इनमें जीवन से जुड़ी सच्चाई, संवेदना और जीवन की बारीकियाँ छिपी होती हैं, जिन पर जीवन आधारित होता है और इसी 'आधार' में लोक और इसकी कलाओं की महती भूमिका और संवेदना होती है-  बशर्ते कि  जीवन की अंतरंगता से जुड़ी इस कला में बसी संवेदना को उसी गहराई से अनुभूता जा सके।

करीबन 25 साल से सक्रिय पत्रकारिता। लगभग 10 साल तक श्रीगंगानगर से निकलने वाले' दैनिक  प्रशांत ज्योति' के रविवारीय का साहित्य संपादन।  पिछले 8 साल से साहित्यिक और वैचारिक पत्रिका ' पूर्वकथन' का संपादन।

हंस, समयांतर, मीमांसा, अभिव्यक्ति,  समय माजरा,  युद्धरत आम आदमी, नवभारत जैसे स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन और दिल्ली दूरदर्शन, जयपुर दूरदर्शन और आकाशवाणी से प्रसारण। 

जनवादी लेखक संघ श्रीगंगानगर का जिला महासचिव,  प्रदेश कार्यकारिणी में संयुक्त सचिव और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य।

संप्रति स्वतंत्र लेखन और भगवती गर्ल्स कॉलेज, लालगढ़ जाटान् में हिंदी साहित्य विभाग में अध्यापन।
संपर्क - 9829099479

टिप्पणियाँ

  1. लोक जीवन में कलायें अपनी अंतरंगता के रूप में विद्यमान रहती हैं | जिन लोगों ने बैलों द्वारा चड़स से पानी सींचने वाले गूणिये के दूहे सुने हैं वे समझ सकते हैं कि वहाँ कविता श्रम सौन्दर्य से एकरस हो जाती है | इसी प्रकार विवाहोत्सव या अन्य त्यौहारों के अवसर पर लिपे हुये आँगन में माँडणे, द्वार पर चित्रांकन या अहोई अष्टमी और दीवाली पूजन के कलात्मक चित्र सहजता से उकेरे जाते हैं | सुभाष सिंगाठिया ने पूरी तन्मयता से यह टिप्पणी लिखी है, उन्हें बधाई और मीमांसा को साधुवाद कि यह पढ़ने का अवसर दिया |

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...