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विजयदशमी - रेखा चटर्जी

कहानी

नयी सभ्यता द्वारा प्रदत्त संघातिक बीमारियों और उनके महंगे उपचार अल्प- आय वर्ग के परिवारों को तबाही की ओर धकेल रहे हैं। इसके विरुद्ध भी महिलाएं ही असीम धैर्य और अदम्य जिजीविषा से लड रही हैं। रेखा चटर्जी की कहानी में यह यथार्थ मार्मिकता में उभरता है, साथ ही बहनापा ( सिस्टरहुड ) भी  रूप  एक शक्ति के  रूप में उद्घाटित होता है। मीमांसा में स्वागत है रेखा !
दुर्गा माँ के बोधोन के साथ ही आज से दुर्गा पूजा शुरू हो गयी थी। हर बंगाली परिवार के घर में उल्लास का माहौल था, लेकिन भाव्या के लिए यह दिन पिछले कई दिनों की तरह भारी था। सौरभ की किडनी की बीमारी ने उसके परिवार के उत्साह और उल्लास को जैसे नजर लगा दी हो। कब सौरभ की दोनों किडनी खराब हो गयीं पता ही नहीं चला। सौरभ में तो कोई ऐब भी नहीं था। उसने शराब, गुटखा या सिगरेट के कभी हाथ भी नहीं लगाया, फिर ऐसा कैसे हुआ। लेकिन हकीकत यही थी कि सौरभ की दोनों किडनी डैमेज हो चुकी थीं और आज वो अस्पताल में जिन्दगी और मौत से संघर्ष करते हुए डायलिसिस के भरोसे एक नई जिन्दगी की पाने की उम्मीद में जी रहा था।
ऐसे में भी भाव्या अस्पताल में भर्ती पति के इलाज में खर्च हो रही भारी भरकम रकम जुटाने के साथ ही बूढ़े ससुर और बेटे टूटूल की भी जिम्मेदारी को पूरा करने में जी जान से जुटी हुई थी। ससुर सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। रिटायरमेंट में जो पैसा मिला वो सारा पैसा सौरभ के इलाज में लग चुका था। पति की देखभाल के साथ-साथ भाव्या पार्ट टाइम जाॅब भी कर रही थी, लेकिन उससे उसे कितना सहारा मिल सकता था। इन हालातों में उसको समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।



‘माँ, बाबा (पापा) घर कब चलेंगे।’ टूटूल ने भाव्या से पूछा।
‘बेटा जल्दी चलेंगे।’ भाव्या ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

वैसे तो बच्चे को अस्पताल नहीं लाना चाहती थी, लेकिन टूटूल को छोड़ती भी तो कहाँ? यह समस्या उसके सामने मौजूद थी। कहने को घर पर बूढ़े ससुर थे, मगर वो टूटूल और घर को भला कितना संभाल पाते। सास की मृत्यु तो बहुत पहले ही हो चुकी थी। उसके बाद श्वसुर ने ही घर संभाला था अब तक।



‘कुछ खाया नहीं तुमने सुबह से भूखी हो। जाओ पहले कुछ खा आओ। तुम्हें मेरी कसम वर्ना मेरा ध्यान कैसे रखोगी मैडम।’ प्यार से मनुहार करते हुए बिस्तर पर पड़े सौरभ ने भाव्या से कहा।
पति की प्यार भरी मनुहार के बाद भी उसका मन तो नहीं था, लेकिन सौरभ का मन रखने के लिये उसने अनमने मन से अपनी सहमति जताते हुए थोड़ी देर में खाने की बात कही।
थोड़ी देर बाद जब सौरभ ने दोबारा उसे खाने के लिये कहा तो वह इनकार नहीं कर सकी और अस्पताल में मौजूद कैंटीन की ओर उसके कदम अनायास ही बढ़ चले।



‘भानु कहाँ जा रही है।’ एक चिर परिचित आवाज भाव्या के कानों पर पड़ते ही उसकी सोच को विराम लग गया। उसने पलट कर देखा।
‘अरे रत्ना बोउदी आप! (बांगला भाषा में भाभी को बोउदी कहते हैं)’
‘हां मैं और तुम!’ रत्ना बोली।
‘बोउदी, सौरभ की तबीयत ठीक नहीं डाॅक्टर ने...’ कहते-कहते भाव्या के शब्द अटक गए और आँखों के कोर भीग गए। रत्ना ने अपना हाथ भाव्या के कंधे पर रख कर उसे तसल्ली दी।
‘सब ठीक हो जाएगा, चिंता मत कर। अगर मन हो तो चलो कैंटीन में काॅफी पीते हैं।’ रत्ना बोली।
अचानक रत्ना बोउदी के मिलने और हमदर्दी दिखाने से उसे कुछ राहत सी महसूस हुई। संकट की घड़ी में किसी के दो मीठे बोले और सांत्वना बहुत तसल्ली देते हैं। भाव्या इस समय कुछ ऐसा ही महसूस कर रही थी।

‘दादा कैसे हैं।’ बैठते हुए भाव्या ने धीरे से रत्ना से पूछा।
‘वैसे ही है भानु। कोई फरक नहीं। पर मैं भी तो उनकी जीवन संगिनी हूँ, जब तक वे मुझे छोड़ कर नहीं जाएंगे उनको रोकने की पूरी कोशिश करूंगी।’ एक फीकी सी हंसी के साथ रत्ना बोउदी ने अपनी पीड़ा को मन से निकाला था।



शायद इसी को नियती कहते हैं। रत्ना, भाव्या की दूर के रिश्ते में भाभी लगती थी। भाव्या, नोबेन्द्र दादा की बहुत लाडली थी। आखिर छोटी भी तो कितनी थी। दादा हमेशा उसकी सारी इच्छा पूरी करते थे। हाँ, रत्ना बोउदी के आने के बाद उसको गिफ्ट्स कम मिलने लगे थे, पर जब भी मौका लगता दादा कुछ न कुछ ले ही आते थे। पता नहीं क्या हुआ, अचानक नोबेन्द्र दादा को ब्रेन हेमरेज हुआ और तब से करीब महीना बीतने को आया कोमा में पड़े हैं। सबकी नजरों में तेज तर्रार कही जाने वाली रत्ना बोउदी आज बिल्कुल शांत दिख रही थीं।

भाव्या को पहली बार बोउदी के स्पर्श में अपनापन महसूस हुआ। उसे पहली बार अच्छा लगा।

‘बोउदी मैं चलती हूं, सौरभ अकेला है। फिर डाॅक्टर से भी मिलना है।’ भाव्या उठते हुए बोली।
‘क्या कह रहे हैं डाॅक्टर।’ रत्ना ने पूछा।
‘इनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी है। सोच रही हूँ मैं अपनी एक किडनी दे दंू।
भाव्या की बात सुनकर रत्ना दिलासा देते हुए बोली ‘माँ दुर्गा पर भरोसा रख रास्ता अपने आप मिलेगा।’
‘पता नहीं माँ क्या करेंगी, लेकिन अपने सुहाग को बचाने के लिए अब मैं यह कदम जरूर उठाउंगी’’, भाव्या बोली।

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सौरभ को किडनी डोनेट करने के लिए भाव्या ने जो टेस्ट कराया था उसकी रिपोर्ट आ चुकी थी। जब नर्स ने आकर कहा कि डाॅक्टर साहब बुला रहे हैं तो वह दौड़ी-दौड़ी डाॅक्टर के केबिन में पहुँची। ‘‘मिसेज सौरभ हम आपको कल ही  अस्पताल में भर्ती कर लेंगे।’’

‘आपकी किडनी मिस्टर सौरभ को जितना जल्दी लगेगा उतना ही उनके शरीर के लिए ठीक होगा।’

डाॅक्टर की बात सुनने के बाद भाव्या के चेहरे पर तनाव और राहत के मिश्रित भाव झलक रहे थे। डाॅक्टर के केबिन से बाहर आने के बाद वह सोच रही थी कि अब वह क्या करे। किडनी तो लग जाएगी, लेकिन खर्च की भी चिन्ता उसे खाई जा रही थी।

भाव्या इस उधेड़बुन से निकल भी नहीं सकी थी कि एक बार फिर सामने रत्ना आ खड़ी हुई।

‘अरे भाव्या क्या हुआ, ले नवमी का प्रसाद खा। अभी माँ को नवमी की पूजा देकर आ रही हूँ।’ रत्ना ऐसे बोली जैसे प्रसाद न होकर सौरभ को किडनी देने वाला डोनर हो।

‘बोउदी अभी मन ठीक नहीं।’

‘अरे पगली मना नहीं करते। माँ सबकी सुनती है।’

रत्ना के आग्रह को भाव्या टाल नहीं सकी और अनमने मन से प्रसाद का टुकड़ा मुंह में रख लिया।

शाम को भाव्या नोबेन्द्र दादा के कमरे की ओर बढ़ चली। दादा आज सीरियस थे। ऐसा लगा शायद आखिरी सांसे गिन रहे हो। रत्ना बोउदी का क्रंदन रोके नहीं रूक रहा था, उनका बेटा उन्हें संभालने की पूरी कोशिश कर रहा था। ऐसे में भव्या को वहाँ खड़ा रहना मुश्किल लगने लगा। वह भागकर सौरभ के कमरे में आ गई। सुबह पता चला दादा ने रात को अंतिम सांस ले ली थी। इस खबर से भाव्या अंदर तक झकझोर दिया।

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डाॅक्टर राॅय ही राउंड पर आये भाव्या की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें साफ-साफ झलक उठीं। लेकिन हमेशा धीर-गंभीर रहने वाले डाॅक्टर राॅय आज थोड़ा बेफिक्र लगे। सौरभ के बैड के नजदीक आते ही वो बोले-
‘गुड न्यूज मिसेज सौरभ, हमें एक सीक्रेट डोनर मिल गया है।’
‘सीक्रेट डोनर!’ भाव्या असमंजस में बोली।
‘हाँ, उन्होंने अपना नाम बताने से इंकार किया है। बस वो अपने रिश्तेदार का ओर्गन डोनेट करना चाहती थीं।’’ इतना कह वे बाहर चले गए। 

तभी ढाक की आवाज बाहर से सुनाई दी। आज विजयदशमी है।

‘शायद दुर्गा माँ की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जा रहे हैं। जाओ दर्शन कर लो।’ सौरभ ने कहा।
‘हाँ।’ कहते हुए भाव्या बाहर की ओर भागी और खिड़की पर खड़ी होकर मन ही मन उस सीक्रेट दानदाता को कोटि-कोटि धन्यवाद देने लगी।

तभी वहाँ से जाते हुए हेड नर्स की आवाज उसके कानों में पड़ी-

‘अरे बाबा मिस्टर नोबेन्दू का किडनी ही लगेगी मिस्टर सौरभ को। उनकी पत्नी मिसेज रत्ना ने पहले ही सारी कागजी कार्यवाही कर दी थी।’ 

 रेखा चटर्जी
5 फरवरी जयपुर में
अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर
 गैर सरकारी संगठन में कार्यरत
हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। कहानी, आर्टिकल, ब्लाॅग छपते रहे हैं। 
निवास: 10/672 कावेरी पथ मानसरोवर जयपुर-302020
संपर्क - 95715 05814
chatterjeerekha9@gmail.com






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