सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

विजयदशमी - रेखा चटर्जी

कहानी

नयी सभ्यता द्वारा प्रदत्त संघातिक बीमारियों और उनके महंगे उपचार अल्प- आय वर्ग के परिवारों को तबाही की ओर धकेल रहे हैं। इसके विरुद्ध भी महिलाएं ही असीम धैर्य और अदम्य जिजीविषा से लड रही हैं। रेखा चटर्जी की कहानी में यह यथार्थ मार्मिकता में उभरता है, साथ ही बहनापा ( सिस्टरहुड ) भी  रूप  एक शक्ति के  रूप में उद्घाटित होता है। मीमांसा में स्वागत है रेखा !
दुर्गा माँ के बोधोन के साथ ही आज से दुर्गा पूजा शुरू हो गयी थी। हर बंगाली परिवार के घर में उल्लास का माहौल था, लेकिन भाव्या के लिए यह दिन पिछले कई दिनों की तरह भारी था। सौरभ की किडनी की बीमारी ने उसके परिवार के उत्साह और उल्लास को जैसे नजर लगा दी हो। कब सौरभ की दोनों किडनी खराब हो गयीं पता ही नहीं चला। सौरभ में तो कोई ऐब भी नहीं था। उसने शराब, गुटखा या सिगरेट के कभी हाथ भी नहीं लगाया, फिर ऐसा कैसे हुआ। लेकिन हकीकत यही थी कि सौरभ की दोनों किडनी डैमेज हो चुकी थीं और आज वो अस्पताल में जिन्दगी और मौत से संघर्ष करते हुए डायलिसिस के भरोसे एक नई जिन्दगी की पाने की उम्मीद में जी रहा था।
ऐसे में भी भाव्या अस्पताल में भर्ती पति के इलाज में खर्च हो रही भारी भरकम रकम जुटाने के साथ ही बूढ़े ससुर और बेटे टूटूल की भी जिम्मेदारी को पूरा करने में जी जान से जुटी हुई थी। ससुर सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। रिटायरमेंट में जो पैसा मिला वो सारा पैसा सौरभ के इलाज में लग चुका था। पति की देखभाल के साथ-साथ भाव्या पार्ट टाइम जाॅब भी कर रही थी, लेकिन उससे उसे कितना सहारा मिल सकता था। इन हालातों में उसको समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।



‘माँ, बाबा (पापा) घर कब चलेंगे।’ टूटूल ने भाव्या से पूछा।
‘बेटा जल्दी चलेंगे।’ भाव्या ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

वैसे तो बच्चे को अस्पताल नहीं लाना चाहती थी, लेकिन टूटूल को छोड़ती भी तो कहाँ? यह समस्या उसके सामने मौजूद थी। कहने को घर पर बूढ़े ससुर थे, मगर वो टूटूल और घर को भला कितना संभाल पाते। सास की मृत्यु तो बहुत पहले ही हो चुकी थी। उसके बाद श्वसुर ने ही घर संभाला था अब तक।



‘कुछ खाया नहीं तुमने सुबह से भूखी हो। जाओ पहले कुछ खा आओ। तुम्हें मेरी कसम वर्ना मेरा ध्यान कैसे रखोगी मैडम।’ प्यार से मनुहार करते हुए बिस्तर पर पड़े सौरभ ने भाव्या से कहा।
पति की प्यार भरी मनुहार के बाद भी उसका मन तो नहीं था, लेकिन सौरभ का मन रखने के लिये उसने अनमने मन से अपनी सहमति जताते हुए थोड़ी देर में खाने की बात कही।
थोड़ी देर बाद जब सौरभ ने दोबारा उसे खाने के लिये कहा तो वह इनकार नहीं कर सकी और अस्पताल में मौजूद कैंटीन की ओर उसके कदम अनायास ही बढ़ चले।



‘भानु कहाँ जा रही है।’ एक चिर परिचित आवाज भाव्या के कानों पर पड़ते ही उसकी सोच को विराम लग गया। उसने पलट कर देखा।
‘अरे रत्ना बोउदी आप! (बांगला भाषा में भाभी को बोउदी कहते हैं)’
‘हां मैं और तुम!’ रत्ना बोली।
‘बोउदी, सौरभ की तबीयत ठीक नहीं डाॅक्टर ने...’ कहते-कहते भाव्या के शब्द अटक गए और आँखों के कोर भीग गए। रत्ना ने अपना हाथ भाव्या के कंधे पर रख कर उसे तसल्ली दी।
‘सब ठीक हो जाएगा, चिंता मत कर। अगर मन हो तो चलो कैंटीन में काॅफी पीते हैं।’ रत्ना बोली।
अचानक रत्ना बोउदी के मिलने और हमदर्दी दिखाने से उसे कुछ राहत सी महसूस हुई। संकट की घड़ी में किसी के दो मीठे बोले और सांत्वना बहुत तसल्ली देते हैं। भाव्या इस समय कुछ ऐसा ही महसूस कर रही थी।

‘दादा कैसे हैं।’ बैठते हुए भाव्या ने धीरे से रत्ना से पूछा।
‘वैसे ही है भानु। कोई फरक नहीं। पर मैं भी तो उनकी जीवन संगिनी हूँ, जब तक वे मुझे छोड़ कर नहीं जाएंगे उनको रोकने की पूरी कोशिश करूंगी।’ एक फीकी सी हंसी के साथ रत्ना बोउदी ने अपनी पीड़ा को मन से निकाला था।



शायद इसी को नियती कहते हैं। रत्ना, भाव्या की दूर के रिश्ते में भाभी लगती थी। भाव्या, नोबेन्द्र दादा की बहुत लाडली थी। आखिर छोटी भी तो कितनी थी। दादा हमेशा उसकी सारी इच्छा पूरी करते थे। हाँ, रत्ना बोउदी के आने के बाद उसको गिफ्ट्स कम मिलने लगे थे, पर जब भी मौका लगता दादा कुछ न कुछ ले ही आते थे। पता नहीं क्या हुआ, अचानक नोबेन्द्र दादा को ब्रेन हेमरेज हुआ और तब से करीब महीना बीतने को आया कोमा में पड़े हैं। सबकी नजरों में तेज तर्रार कही जाने वाली रत्ना बोउदी आज बिल्कुल शांत दिख रही थीं।

भाव्या को पहली बार बोउदी के स्पर्श में अपनापन महसूस हुआ। उसे पहली बार अच्छा लगा।

‘बोउदी मैं चलती हूं, सौरभ अकेला है। फिर डाॅक्टर से भी मिलना है।’ भाव्या उठते हुए बोली।
‘क्या कह रहे हैं डाॅक्टर।’ रत्ना ने पूछा।
‘इनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी है। सोच रही हूँ मैं अपनी एक किडनी दे दंू।
भाव्या की बात सुनकर रत्ना दिलासा देते हुए बोली ‘माँ दुर्गा पर भरोसा रख रास्ता अपने आप मिलेगा।’
‘पता नहीं माँ क्या करेंगी, लेकिन अपने सुहाग को बचाने के लिए अब मैं यह कदम जरूर उठाउंगी’’, भाव्या बोली।



सौरभ को किडनी डोनेट करने के लिए भाव्या ने जो टेस्ट कराया था उसकी रिपोर्ट आ चुकी थी। जब नर्स ने आकर कहा कि डाॅक्टर साहब बुला रहे हैं तो वह दौड़ी-दौड़ी डाॅक्टर के केबिन में पहुँची। ‘‘मिसेज सौरभ हम आपको कल ही  अस्पताल में भर्ती कर लेंगे।’’

‘आपकी किडनी मिस्टर सौरभ को जितना जल्दी लगेगा उतना ही उनके शरीर के लिए ठीक होगा।’

डाॅक्टर की बात सुनने के बाद भाव्या के चेहरे पर तनाव और राहत के मिश्रित भाव झलक रहे थे। डाॅक्टर के केबिन से बाहर आने के बाद वह सोच रही थी कि अब वह क्या करे। किडनी तो लग जाएगी, लेकिन खर्च की भी चिन्ता उसे खाई जा रही थी।

भाव्या इस उधेड़बुन से निकल भी नहीं सकी थी कि एक बार फिर सामने रत्ना आ खड़ी हुई।

‘अरे भाव्या क्या हुआ, ले नवमी का प्रसाद खा। अभी माँ को नवमी की पूजा देकर आ रही हूँ।’ रत्ना ऐसे बोली जैसे प्रसाद न होकर सौरभ को किडनी देने वाला डोनर हो।

‘बोउदी अभी मन ठीक नहीं।’

‘अरे पगली मना नहीं करते। माँ सबकी सुनती है।’

रत्ना के आग्रह को भाव्या टाल नहीं सकी और अनमने मन से प्रसाद का टुकड़ा मुंह में रख लिया।

शाम को भाव्या नोबेन्द्र दादा के कमरे की ओर बढ़ चली। दादा आज सीरियस थे। ऐसा लगा शायद आखिरी सांसे गिन रहे हो। रत्ना बोउदी का क्रंदन रोके नहीं रूक रहा था, उनका बेटा उन्हें संभालने की पूरी कोशिश कर रहा था। ऐसे में भव्या को वहाँ खड़ा रहना मुश्किल लगने लगा। वह भागकर सौरभ के कमरे में आ गई। सुबह पता चला दादा ने रात को अंतिम सांस ले ली थी। इस खबर से भाव्या अंदर तक झकझोर दिया।



डाॅक्टर राॅय ही राउंड पर आये भाव्या की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें साफ-साफ झलक उठीं। लेकिन हमेशा धीर-गंभीर रहने वाले डाॅक्टर राॅय आज थोड़ा बेफिक्र लगे। सौरभ के बैड के नजदीक आते ही वो बोले-
‘गुड न्यूज मिसेज सौरभ, हमें एक सीक्रेट डोनर मिल गया है।’
‘सीक्रेट डोनर!’ भाव्या असमंजस में बोली।
‘हाँ, उन्होंने अपना नाम बताने से इंकार किया है। बस वो अपने रिश्तेदार का ओर्गन डोनेट करना चाहती थीं।’’ इतना कह वे बाहर चले गए। 

तभी ढाक की आवाज बाहर से सुनाई दी। आज विजयदशमी है।

‘शायद दुर्गा माँ की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जा रहे हैं। जाओ दर्शन कर लो।’ सौरभ ने कहा।
‘हाँ।’ कहते हुए भाव्या बाहर की ओर भागी और खिड़की पर खड़ी होकर मन ही मन उस सीक्रेट दानदाता को कोटि-कोटि धन्यवाद देने लगी।

तभी वहाँ से जाते हुए हेड नर्स की आवाज उसके कानों में पड़ी-

‘अरे बाबा मिस्टर नोबेन्दू का किडनी ही लगेगी मिस्टर सौरभ को। उनकी पत्नी मिसेज रत्ना ने पहले ही सारी कागजी कार्यवाही कर दी थी।’ 

 रेखा चटर्जी
5 फरवरी जयपुर में
अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर
 गैर सरकारी संगठन में कार्यरत
हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। कहानी, आर्टिकल, ब्लाॅग छपते रहे हैं। 
निवास: 10/672 कावेरी पथ मानसरोवर जयपुर-302020
संपर्क - 95715 05814
chatterjeerekha9@gmail.com






टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...