मंगलवार, 29 जुलाई 2014

बिजौलिया: जमीनी हालात


बिजौलिया: जमीनी हालात

सरिता अरोड़ा



हम बूंदी जिले के तालेडा विकास खण्ड के डाबी क्षेत्र में एक समूह को अकादमिक सहयोग देने के सिलसिले में जाते रहते थे। इसके लिए पहले बूंदी से आना-जाना रहता था। फिर बिजौलिया में रुकने लगे। यह क्रम विगत दो-तीन वर्ष चलता रहा। इस दौरान हमने बिजौलिया के इर्द-गिर्द के जमीनी हालात देखने और वहां की समस्याओं को समझने की कोशिश की। बिजौलिया में महान नेता विजयसिंह पथिक की अगुवाई में स्वातंत्रय-संघर्ष के दौरान ख्यात किसान-आन्दोलन हुआ था। हमारी यह भी उत्सुकता थी कि अपने निकट इतिहास के प्रति लोगों के नजरिये को जाना जाये। वर्तमान में डाबी की तरह बिजौलिया भी खनन-क्षेत्र है। हमने पता करने की कोशिश की कि इससे स्थानीय लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जिंदगी पर क्या फर्क पडा है। साथ ही वे पारिस्थिकीय परिवर्तन को कैसे देख रहे हैं। यहां फील्ड डायरी के कुछ अंश प्रस्तुत हैंः

 20.01.2011 

मण्डौल बांध बूंदी रोड पर स्थित है। यह करीबन एक किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यह अरावली की उपत्यका में स्थित एक खूबसूरत जगह है। बांध का परास क्षेत्र पहाडियों से विपरीत दिशा में तीन किलोमीटर में विस्तारित है। इस तरफ चारागाह क्षेत्र में चट्टानों की एक श्रृंखला है।  इसे राॅक गार्डन की तरह विकसित किया जा सकता है जो इस क्षेत्र में पिकनिक स्पाॅट की कमी को पूरा कर सकता है। मेनाल प्रपात को जाने वाले पर्यटक भी यहां आ सकते है। इस क्षेत्र में ऐसी कोई सार्वजनिक जगह नहीं है जहां परिवार के लोग सुकून के लिए आ सकें। बांध के सामने फैली प्राकृतिक चट्टानों की इस अद्भुत श्रृंखला के समक्ष भी भू-माफियाओं के अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। 

मण्डौल बांध का पानी स्वच्छ और पारदर्शी है। इसी से बिजौलिया के लिए पेयजल की आपूति होती है। बांध से एक छोटी नहर के जरिये भगवतपुरा पंचायत के गांवों में सिंचाई के लिए भी पानी छोडा जाता है।

मण्डौल गांव बांध के तट पर बसा है। यह मीणा और भील आदिवासियों की छोटी-सी बसाहट है। गांव में घरों की हालात देखकर ही इनकी आर्थिकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। बांध के किनारे पर ही मण्डौल का राजकीय प्राथमिक विद्यालय है। हमने इस स्कूल का अवलोकन किया। ये एकल शिक्षक स्कूल है। हम पहुॅचे तब 18 बच्चे शिक्षक के आने और स्कूल के खुलने के प्रतीक्षा कर रहे थे। 11 लडके और 7 लडकियों में से कुछ बाहर खेल रहे थे। अभी पूर्वान्ह 10:45 am  हुए थे लेकिन शिक्षक नहीं आया था। बांध के सामने की तरफ बूंदी रोड से एक किलोमीटर अंदर लक्ष्मी खेडा गांव है। बूंदी रोड से अंदर की तरफ जो सडक जाती है वहां चाय की दूकान है। दूकान पर हमारी मुलाकात लक्ष्मी खेडा गांव के पन्नालाल धाकड (48) और छीतरमल से   होती है। वे बताते हैं कि इस क्षेत्र में धाकड समुदाय बहुसंख्यक है। धाकडों के यहां 72 गांव हैं। धाकड अन्य पिछडा वर्ग में आते हैं। पथिक जी के आन्दोलन में भी इन लोगों की मुख्य भूमिका थी। 

राजस्थान में देखा गया है कि जिस क्षेत्र में जो जाति समुदाय बहुसंख्यक है वही वर्चस्वशाली भी है। लेकिन धाकड समुदाय इसका अपवाद लगता है। ये अभी भी शिक्षा में पिछडे हुए हैं इसलिए इनका प्रशासन या उच्च सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व नहीं है। लक्ष्मी खेडा भी धाकडों का गांव है जहां तीन परिवार रैगर (दलित) समुदाय के हैं। गांव में सरकारी उच्च प्राथमिक स्कूल है। यदि कोई बच्चा इससे आगे पढ़ना चाहे तो उसके सामने यही विकल्प है कि वह बिजौलिया पढने जाये। लक्ष्मी खेडा से बिजौलिया की दूरी तीन किलोमीटर है।

भगवतपुरा गांव की आबादी ग्वाल, बंजारों, भील और बलाई समुदायों का सुदंर संयोजन है। खेराडिया गांव की आबादी भी मिश्रित  है। यहां गुर्जर, दरोगा और राजपूत जाति समुदाय हैं। जबकि देवरी की नून में केवल धाकड समुदाय के लोग हैं।

मंदाकिनी मंदिर बिजौलिया की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। यह केन्द्रीय पुरातत्व विभाग की ओर से 1956 से संरक्षित सम्पदाओं में  अधिसूचित है। लेकिन मंदाकिनी राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर नहीं है। इसे मेनाल प्रपात के पर्यटन मार्ग में सम्मिलित करना चाहिए।
गोविन्द सागर एक कृत्रिम बांध है जो बिजौलिया के उत्तर की ओर भीलवाडा रोड पर स्थित है। इसके एक तरफ विंध्यवासिनी माता का प्राचीन मंदिर है। बिजौलिया की राजमाता बिजासनी (विंध्ववासिनी) माता की भक्त थीं इसलिए उन्होने यह मंदिर स्थापित करवाया। राजमाता ने ही अकाल राहत कार्यों के रूप में गोविन्द सागर बांध बनवाया। बिजौलिया के विद्वान बैजनाथ शांडिल्य बताते हैं कि ये बांध विक्रमी संवत 1996 में बनवाया। अकाल के कारण जब लोग यहां से पलापन करने लगे तो राजमाता ने अपने गहने बेचकर राहत कार्य शुरु कराये और यह बांध बना। इसने बिजौलियाॅं की न केवल बाढ से सुरक्षा की है बल्कि इसके कारण बिजौलिया के कुएं-बावडियों का जल-स्तर भीषण गर्मियों में भी ऊपर रहता है और लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो जाता है। 
वर्तमान में गोविन्द सागर बांध प्रशासन की ओर से पूरी तरह उपेक्षित है। बांध के तट पर ही हिन्दुओं का श्मशान और मुस्लिमों का कब्रिस्तान है। बांध का पानी बुरी तरह प्रदूषित है। लेकिन जैसा कि कहा गया, इस बांध की बिजौलिया के पारिस्थिकी संतुलन में अहम् भूमिका है। बिजौलिया उत्तर-पश्चिमी ढाल में बसा है, इसके चलते तेज वर्षा होने पर पानी बहकर इधर ही आता था। बांध ने इस पानी को  रोक   दिया है। इसके चलते बिजौलिया का जल-स्तर ऊपर आ गया है और हरियाली  बढ़ गयी है। नजदीक ही स्थित रानी जी के बाग की खूबसूरत हरियाली के पीछे बांध की नमी है। बिजौलिया के बुजुर्ग दलपत सिंह (पूर्व सरपंच), किशन सिंह और राधेश्याम गोविन्द सागर को बिजौलिया के कुएं-बावडियों के लिए वरदान मानते हैं। 

यदि हम जनगणना के आंकडे और दूसरी सरकारी रिपोर्ट देखें तो बिजौलिया कलां में शिक्षा और विकास के आंकडे बेहतर नजर आयेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इन आंकडों से काफी भिन्न है। असल में बिजौलिया एक कस्बे के रूप तेजी से विकसित हो रहा है। यहां खनन क्षेत्र में बाहर से आने वाले विपन्न समुदायों की तादाद बढ़ती जा रही है। बिजौलिया के चारों तरफ हम ऐसी वंचित बस्तियों का फैलाव देख सकते हैं। इनमें से अधिकांश परिवारों के पास राशन कार्ड और बी.पी.एल.कार्ड नहीं हैं। इसके चलते ये लेाग गरीबों के लिए संचालित सरकारी योजनाओं के अन्तर्गत भी नहीं आते हैं। यहां तक कि इनकी बस्तियां भी तकनीकी रूप से अतिक्रमण ही हैं। ये बिजौलिया के बढ़ते शहरीकरण की मलिन बस्तियां हैं।

इन्दिरा नगर ऐसी ही एक कच्ची बस्ती है। यहां रैगर, लुहार और बावरी समुदाय के परिवार एक दशक से अधिक समय से रह रहे हैं। इस बस्ती से एक भी बच्चा स्कूल नहीं जा रहा है। इनमें से किसी को जमीन का आवासीय पट्टा नहीं मिला है। 

बिजौलिया के इर्द-गिर्द बसे अधिकांश गांवों में विभिन्न जाति समुदायों की आबादी है। मसलन बिजौलिया से पांच किलोमीटर दूर बसे केशव विलास गांव में राजपूत, भील, तेली, मीणा और किराड समुदाय हैं। जवादा गांव में रैगर, मीणा और धाकड समुदाय हैं। कुछ गांव इसके अपवाद भी हैं। कालबेलिया समुदाय का रामपुरिया ऐसा ही गांव है। कालबेलिया पारंपरिक रूप से सांप दिखाने के काम करने वाला घूमंतू समुदाय है। संगीत और नृत्य के हिसाब से इस समुदाय की समृद्ध परंपरा रही है। इस समय कालबेलिया समुदाय एक मुश्किल दौर से गुजर रहा है। रामपुरिया में इस समुदाय के लोग घास-फूंस की झोपंडियों में रह रहे हैं। यहां एक सरकारी प्राथमिक स्कूल है लेकिन शिक्षक की अनुपस्थिति के चलते यह बंद है। कालबेलिया समुदाय के वृद्व जन भीख मांगते हैं जबकि युवक युवतियों ने खान मजदूरी को अपना लिया है। हमने गायत्री  नगर, विक्रमपुरा, बनी, मानपुरा और थडोरा गांव का भी भ्रमण किया। थडोरा गांव में गोपाल जी (35) और जगदीश जी (34) से बात की। थडोरा ग्राम पंचायत है जिसमें एक सरकारी सैकन्डरी स्कूल है।

 02.02.2011

अगली बार पहले हम विक्रमपुरा गये। इस गांव में धाकड, गुर्जर, रैगर, भील और बरगी जातियों के करीबन सौ परिवार हैं। यहां हमने जैराम धाकड, रामलाल भील और पन्नालाल रैगर से बात की। इन्होने हमें गांव में सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय, आंगनबाडी केन्द्र, उप स्वास्थ्य केन्द्र और सहकारी समिति की स्थिति के बारे में बताया। उन्होने इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली केा लेकर अपने गुस्से का इजहार किया। गांव के लोगों के पास खेती के लिए जोत की भूमि बहुत कम है इसलिए अधिकांश लोग कृषि और खान मजदूरी पर निर्भर हैं। खानों में मिलने  वाला काम स्थायी नहीं हैं। नरेगा में भी इन्हे पर्याप्त कार्य दिवसों का काम नहीं मिलता है। गायत्री  नगर और लक्ष्मणपुरा विक्रमपुरा पंचायत में ही आने वाले छोटे गांव हैं।  जिनमे क्रमशः 40 और 60 परिवार रहते हैं। कामा विक्रमपुरा पंचायत का अपेक्षाकृत एक वडा गांव है। इसमें भील, गुर्जर, रैगर, बलाई, ब्राहमण और बैरागी जाति समुदायों के करीबन 120 परिवार हैं। यहां के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के छह शिक्षकों में एक महिला है। आंगनबाडी केन्द्र भी इसी स्कूल परिसर में स्थित है। इस स्कूल में 300 बच्चों का नामांकन है। हमारे वहां रहने तक (10:50 पूर्वान्ह) सिर्फ एक शिक्षक स्कूल पहुॅचा था।

हम उमाजी का खेडा गांव गये। बिजौलिया किसान आन्दोलन के इतिहास में इस गांव की महत्त्वपूर्ण जगह है। यह गांव विजय सिंह पथिक का मुख्यालय था। वैसे यह आदिवासी नेता माणिक्य लाल वर्मा का मूल गांव है। इस बडे गांव में धाकड, किराड, अहीर, भील और पुरोहित समुदाय के लोग रहते हैं। यहां हमने गांव की बाहरी सडक के दोनों तरफ स्थित दो सरकारी स्कूलों का अवलोकन किया। इनमें से एक सरकारी प्राथमिक स्कूल पास के उदयपुरिया गांव से सम्बद्ध है। यह एकल शिक्षक विद्यालय है। शिक्षक लीला पारासर बच्चों के साथ शिक्षण में सक्रिय थी। पोषाहार बनाने वाली कार्यकर्ता  भी उन्हे शैक्षणिक कार्यो में सहयोग कर रही थी। संयोग से दोनों ही स्कूलों में 42-42 बच्चे उपस्थित थे। उमा जी का खेडा में एक सरकारी माध्यमिक स्कूल है जिसमें दो-तीन किलोमीटर तक की दूरी से लडकियां भी पढ़ने आती है। शिक्षकों ने बातचीत में बताया कि अभी बहुत से बच्चे स्कूल से बाहर हैं या पढाई बीच में छोड कर खानों के काम में लग जाते हैं।

हम फिर से रामपुरिया कालबेलिया बस्ती में गये। रामपुरिया वस्तुत तीन बस्तियों में विभाजित हैः भैरों जी की पठारी (8 परिवार), किशनपुरिया (40 परिवार) और रामपुरिया (10 परिवार)। इनमें से केवल 8 परिवार बी.पी.एल. में चयनित हैं। इन्हे भी बी.पी.एल. के अन्तर्गत किसी सुविधा का शायद ही कोई लाभ मिला है। यहां कोई आंगनबाडी केन्द्र भी नहीं है। इनके पास राशन कार्ड हैं जिनसे इन्हे कभी-कभार केरोसीन तेल ही मिल पाता है। एक कालबेलिया महिला मोतिया बाई ने हमें बताया कि वे लोग पिछले 40 सालों से वोट डालते आ रहे हैं लेकिन उन्हे अभी तक कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं हैं। यहां लगे हैण्ड पंप में पानी नहीं आता है। हमने फिर से पाया कि स्कूल में शिक्षक अभी भी अनुपस्थित था और दो बच्चे वीणा (7) और चांद (6) दोपहर के भोजन की प्रतीक्षा में स्कूल के बाहर खडे थे। पता चलाकि इस स्कूल में 40 बच्चे नामांकित हैं।

कालबेलिया समुदाय के पारंपरिक मुखिया कान्हानाथ, कालूनाथ और चितानाथ निष्क्रिय हैं। जुझारू महिला मोतिया बाई ही अब वास्तव में कालबेलिया समुदाय का नेतृत्व कर रही है। कुछ कालबेलिया परिवारों के पास नरेगा के जाॅब कार्ड हैं लेकिन इन्हे मनरेगा में 50 दिन के लिए भी काम नहीं मिला है। हमने बिजौलिया के सरपंच चांदमल जैन से बात की। उन्होने क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर अपने प्रयासों के बारे में बताया। उनके सचिव ने हमें इनसे सम्बन्धित आंकडे प्रस्तुत किये। सरपंच ने हमें अपनी समस्याएं बताईं और कहां कि प्रशासन ने इस क्षेत्र को पूरी तरह से उपेक्षित कर रखा है। खनन कार्य ने क्षेत्र में कई नयी समस्याएं पैदा की हैं। लेकिन इन समस्याओं को निपटाने के लिए पंचायत के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। हम सरकार से लगातार यहां एक सरकारी काॅलेज खोलने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए हमने पर्याप्त भूमि का आवंटन भी कर रखा है। बिजौलिया में एक बडे अस्पताल की भी जरूरत है।

हमने उन्हे सुझाव दिया कि बिजौलिया के शहरीकरण और आबादी को देखते हुए यहां नगरपालिका के लिए मांग क्यों नहीं उठायी जाती है। इसका सरपंच व सचिव दोनों ने विरोध किया। उनका कहना था कि ग्राम पंचायत को नगरपालिका से ज्यादा बजट मिलता है। हालांकि वे इससे सहमत थे कि उन्हे कस्बे के विस्तार के मद्देनजर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त बजट का आवंटन नहीं किया जाता है। ऐसे में सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की तो बात ही बेमानी है। बिजौलिया के एक प्रमुख बुद्विजीवी विजयनाथ सनाढ्य ने हमें यहां के इतिहास, पारिस्थिकी और मौजूदा चुनौतियों पर विस्तार से जानकारी दी। उनका मत था कि हमें बिजौलिया की पुनप्रतिष्ठा और विकास के लिए एक और जन आन्दोलन की आवश्यकता है। यही शायद इस चर्चा का निष्कर्ष था।

26.02.2011
इस बार हमने अमेरिकी नृतत्त्वशास्त्री एन.गोल्ड के साथ इस क्षेत्र का भ्रमण किया। एन.गोल्ड न्यूयार्क में एथिका की रहने वाली हैं और साराकास विश्वविद्यालय में नृत्वत्वशास्त्र की प्रोफेसर हैं। वे फुलब्राइट फैलोशिप के अन्तर्गत भीलवाडा के इस क्षेत्र की पारिस्थिकी और संस्कृति का अध्ययन कर रही हैं । जहाजपुर के रहने वाले सरकारी शिक्षक भोजूराम एन.गोल्ड को शोध में सहायता कर रहे हैं। वे भी हमारे साथ मौजूद थे। हम लोगों ने साथ में मंदाकिनी, मंदिर गोविन्द सागर और मण्डौल बांध, रानी का बाग और बिजौलिया किले का भ्रमण किया। एन.गोल्ड ने कस्बे की पारिस्थिकी प्रणाली की सराहना करते हुए इसके क्षरण में चिंता जाहिर की। उन्होने  बताया कि इससे गंभीर पर्यावरण असंतुलन पैदा हो सकता है। एन ने इन्दिरा नगर और कालबेलिया बस्ती को भी देखा और मोतिया बाई से मिलीं। उनके साथ हमने बिजौलिया और भगवतपुरा के सरपंच से मिलकर प्राकृतिकं चट्टानों के संरक्षण पर लम्बी बात की। हालांकि दोनों जन प्रतिनिधि अपनी हताशा ही जाहिर कर रहे थे।


 बूंदी की तरह बिजौलिया में भी लघु चित्रकला की समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन किसी तरह के सहयोग और समर्थन के अभाव में यह मूल्यवान कला भी पृष्ठभूमि में जा रही है। बिजौलिया की  गलियों में मिनियेचर कला के स्टुडियों में काम करते कलाकारों की उदासी और चिंता हमारे पर भी तारी होकर रह जाती है। 

(सरिता अरोडा समान्तर में कार्यरत हैं। इन यात्राओं में राजाराम भादू और कभी-कभी बूंदी के रामसिंह भी उनके साथ रहे।) 

शिक्षा का अधिकार: एक आकलन


शिक्षा का अधिकार: एक आकलन

अम्बरीश राय




शिक्षा का अधिकार मंच (RTE Forum)शिक्षा में प्रणालीगत सुधार की नीयत से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय करीबन 10 हजार संस्थाओं-संगठनों सामूहिक राष्ट्रीय नेटवर्क हैं- जिसमें शिक्षकों और शिक्षाविदों के संगठन भी शामिल हैं। भारत की संघीय संरचना के मद्देनजर राज्यों के मंच साझा अभियान की दिशा में मिलकर राष्ट्रीय मंच के तौर पर कार्य करते हैं। देश के 14 राज्यों में राज्य स्तर के मंच सक्रिय हैं जिनमें दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, उडीसा, आंध प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पण्डिचेरी शामिल हैं। इनके अतिरिक्त आसाम, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के संगठनों /संस्थाओ के राष्ट्रीय फोरम से अनौपचारिक रिश्ते हैं।

राष्ट्रीय मंच का जोर शिक्षा के अधिकार कानून के देश भर में प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर रहा है। मंच के सदस्यों ने राज्य सरकार के साथ आलोचनात्मक सम्बद्धता स्थापित की है ताकि शिक्षा को एक राजनीतिक एजेन्डा के तौर पर सामने लाया जा सके। साथ ही सामुदायिक सक्रियता और जागरूकता के लिए राज्य स्तर पर सकारात्मक दिशा में दबाव बनाने का प्रयास किया गया है। मंच के सदस्य प्रति वर्ष इकट्ठा होकर शिक्षा के अधिकार के क्रियान्वयन का राष्ट्रीय स्तर पर आकलन करते हैं। साझा संवाद के 2014 के सम्मेलन में देश के 19 राज्यों के करीब 600 संभागियों ने विमर्श में हिस्सेदारी की। तत्कालीन राजनीतिक माहौल को देखते हुए, इस बार शिक्षा के लिए एक जन अभियान की शुरूआत की गयी। यहां शिक्षा के अधिकार को राष्ट्रीय मंच संयोजक अम्बरीश  राय द्वारा कानून के क्रियान्वयन की ताजा स्थिति पर एक समेकित टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।
- संपादक


निश्चय ही शिक्षा का अधिकार कानून भारत के इतिहास में एक बडा प्रस्थान बिन्दु था तथापि इसकी कुछ गंभीर सीमाएं हैं। उदाहरण के लिए, यह सिर्फ छह से चौदह  साल तक के बच्चों तक ही सीमित है, छह वर्ष से छोटे और चौदह वर्ष से बडे बच्चे इससे बाहर रह गये हैं। इसी भांति, कानून में यह खुलासा नहीं किया गया कि अधिनियम में किये गये विभिन्न प्रावधानों के लिए जरूरी वित्तीय संसाधनों का स्रोत  क्या होगा। सार्वजनिक शिक्षा की ऐसी राष्ट्रीय  प्रणाली जो शैक्षिक गुणवत्ता को सुनिश्चित करती हो, उसके नियम और मानदण्ड तब तक अधूरे रहेंगे जब तक कि समान स्कूल प्रणाली का गठन नहीं किया जाये जिसके लिए 1968 और 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों ने अनुशंसा की है।

बहरहाल, अभी तक अधिनियम संसद द्वारा निर्धारित किये आवधिक लक्ष्यों (इसकी क्रियान्विति और कानून के मापदण्डों के अनुसार स्कूलों के सुधार को अर्जित करने में असफल रहा है।) अधिनियम के अनुसार अब आखिरी अवधि 2015 है जब तक सभी शिक्षकों को व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान कर दिया जाना हैं। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम की प्रत्याशा में स्कूलों और वृहद् शैक्षिक ढ़ांचे में जो आमूलचूल रूपान्तरण होना था, वह अभी तक नहीं हुआ है। इस लिहाज से वैधानिक और संवैधानिक प्रतिबद्धिता के लिहाज से खुद राज्य की यह व्यापक असफलता चिंतनीय है। सरकार द्वारा जब 2013 तक के लिए निर्धारित लक्ष्य अर्जित नहीं किये गये तो 2015 तक के लिए निर्धारित लक्ष्य भी खतरे में पडे दिखते हैं।

बेशक विभिन्न राज्यों में (राज्यों की विशिष्ट बाधाओं के संदर्भ में) शिक्षा के अधिकार के अन्तर्गत मापदण्डों की शत-प्रतिशत उपलब्धि की स्थिति का स्तर अलग-अलग है। जबकि देश के सभी हिस्सों के समूचे शैक्षिक ढांचे में एक संकट समान रूप से मौजूद है। वर्तमान में किसी भी राज्य ने शिक्षा के अधिकार कानून के समग्र क्रियान्वयन के प्रति प्रतिबद्धिता का ठोस इजहार नहीं किया है।

शिक्षा का अधिकार मंच के इस बार के राष्ट्रीय साझा संवाद का जोर यह देखने पर था कि अधिनियम के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए राज्यों में किस हद तक आवश्यक संस्थागत तंत्र विकसित किया गया है। जबकि अधिनियम की आखिरी समय सीमा एक साल बाद समाप्त हो रही है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम में बच्चों  के  पडौस में सम्पूर्ण संरचना के  साथ  विद्यालयों की स्थापना, छात्र-शिक्षक अनुपात और अधिनियम की अनुसूची में वर्णित सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए तीन साल की अवधि (2013) निर्धारित की गयी थी। जबकि शिक्षकों को चयन और प्रशिक्षण के लिए पांच साल का समय (2015) प्रदान किया गया था।

शिक्षा का अधिकार मंच द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संवाद में प्रस्तुत प्रतिवेदन सरकारी सूचनाओं, शोध-अध्ययनों, मंच की राज्य इकाइयों द्वारा तैयार रिपोटों, क्षेत्र कार्य के दौरान प्राप्त अनुभवों और अखबार की खबरों जैसी स्रोत  सामग्री से तैयार किया गया था। इसके बावजूद किसी खुले और ठोस सूचना स्रोत  के बिना देश भर में अधिनियम के क्रियान्वयन की स्थिति का आकलन करना बहुत मुश्किल है।

शिक्षा का अधिकार मंच के कार्रवाई पक्षों की संगति में प्रतिवेदन को निम्न व्यापक मुद्दों पर आधारित किया गया है -

  •  प्रणालीगत विकास और शिकायत निवारण तंत्र
  •  सामुदायिक सहभागिता
  •  शिक्षकों से सम्बद्ध मुद्दे
  •  गुणवत्ता
  •  निजी क्षेत्र
  •  जोखिम और आपात स्थितियों में  बच्चे
  •  सामाजिक समावेशन

रिपोर्टों के अनुसार सभी राज्य और संघ शासित प्रदेश अधिनियम की अधिसूचना जारी कर चुके हैं जबकि 32 राज्य और संघ शासित प्रदेशों ने ही अधिनियम के  प्रावधानों के अनुरूप क्रियान्वयन की निगरानी के लिए निकायों का गठन किया है। विगत चार वर्षाे में हालांकि शिक्षा के बजट में लगातार बढोतरी हुई है लेकिन अभी भी यह 12वीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाया है। बच्चे से जुडे पहलुओं, जैसे-उन्हे भयभीत नहीं करने, शारीरिक दण्ड नहीं देने, बोर्ड परीक्षा आयोजित न करने, निजी ट्यूशन पर रोक, भर्ती प्रक्रिया और केपीटेशन फीस पर रोक से सम्बन्धित प्रावधानों को अधिसूचित कर दिया गया है। क्रियाकलापों के संचालन और प्रबंधन के लिए देश भर के 88 प्रतिशत स्कूलों में शाला प्रबंध समितियां गठित की जा चुकी हैं। इससे जुडी अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टी.ए.टी.) की संस्थागत प्रणाली विकसित करना, शिक्षक भर्ती के नियमों से संशोधन और प्रारंभिक शिक्षा के लिए 8 वर्षीय अवधि का पाठ्यक्रम शामिल हैं। शिक्षक प्रशिक्षण प्रणाली और अकादमिक समर्थन तंत्र में में सुधारों की पहल की गयी है। इसके बावजूद किसी ने राज्य भी शिक्षा के अधिकार के मापदण्डों को समग्रता से उपलब्ध नहीं किया है। अधिनियम के सभी 10 संकेतकों का पूरी तरह निवर्हन करने  वाले स्कूल केवल 8 प्रतिशत हैं।

प्रणालीगत विकास 

शिक्षा के लिए आवंटित बजट अधिनियम की सुचारु क्रियान्विति के लिए आवश्यक अनुमानित संसाधनों की तुलना में अभी भी बहुत कम है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 2013-2014 में 50 हजार करोड रूपये  की मांग की थी लेकिन इसे 27.248 करोड रूपये ही वास्तव में आवंटित किये गये। विगत वित्तीय वर्ष के दौरान बजट में कटौती कर दी गयी, अगले वर्ष में भी अतिरिक्त कटौती लक्षित की गयी। बजट राशि देर से जारी की जाती है और व्यय किये जाने की रफ्तार भी धीमी रही। एक अध्ययन (पी.एल.आई. एस.ए. 2012) के अनुसार भारत में सर्व शिक्षा अभियान के बजट की विगत वर्ष 70 प्रतिशत की तुलना में 62 प्रतिशत राशि ही खर्च की गयी।

हालांकि अनेक राज्यों में अधिनियम के अन्तर्गत शिकायत निवारण तंत्र की अधिसूचना जारी कर दी गयी है लेकिन एक ऐसे शिकायत निवारण तंत्र की तत्काल आवश्यकता है जो स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक सक्रिय हो। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग सहित राज्योें के बाल अधिकार आयोगों की क्षमता पर भी इस वर्ष सवाल खडे हुए हैं। संघर्ष के क्षेत्रों में मुश्किल हालातों की वजह से अधिनियम क्रियान्वित नहीं हो पाता है। अनुशंसा है कि -

  •  शिक्षा पर बजट में बढोतरी (जी.डी.पी. का 6 प्रतिशत तक) करना ताकि शिक्षा के अधिकार कानून की क्रियान्विति के लिए अनुमानित जरूरी राशि का आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। 
  •  एक सक्रिय शिकायत निवारण तंत्र के गठन की फोंरी आवश्यकता है।
  •  राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य आयोगों की शक्तियों और क्षमताओं में वृद्धि की आवश्यकता है ताकि ये प्राप्त शिकायतों को तार्किक परिणति तक पहुॅचा सकें।
  •  शिक्षा का अधिकार अधिनियम को लेकर मध्यम स्तर के शिक्षा अधिकारियों के आमुखीकरण की आवश्यकता है ताकि वे इस संदर्भ में बेहतर भूमिका निभा सकें। 

सामुदायिक सहभागिता

इस अधिनियम की सफलता के लिए सामुदायिक सहभागिता की अहम् भूमिका है। स्कूल प्रबंध समितियों को लेकर वास्तविक आंकडे तो मिलते नहीं है। डी.आई.एस.ई. 2012-13 के अनुसार 88.37 प्रतिशत स्कूलों में शाला प्रबंध समितियां हैं। (इनमें दिल्ली में इनके गठन के लिए अधिसूचना ही मार्च, 2013 में जारी की गयी है और 6.93 प्रतिशत स्कूलों में ही शलाा प्रबंध समितियां गठित की गयी हैं। जबकि लक्षद्वीप में इनका शत-प्रतिशत गठन हो गया है।) सचाई यह है कि अधिकतर स्कूलों में शाला प्रबंध समितियां केवल कागजों पर बनी हैं और कार्यशील नहीं हैं। ऐसी स्थिति में वहां स्कूल विकास योजना और उसके क्रियान्वयन में जन सहभागिता की कल्पना ही नहीं की जा सकती और स्थानीय समूहों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो सकती। शाला  प्रबंध समितियों और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मध्य वृहद अन्तराल है। इस प्रक्रिया में स्थानीय स्वशासी निकायों की सम्बद्धता को नकारा गया है। अतः  

  •  शाला प्रबंध समितियों को सुद्वढ करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करायें जायें। इनकी क्रियाशीलता पारदर्शी हो और इन्हे आगे लाने के लिए उपयुक्त तंत्र विकसित किया जाये।
  •  स्थानीय स्वशासी निकायों को शाला प्रबंध समीति से सम्बद्ध करने और हर स्तर पर इनके क्षमता वर्धन के लिए कार्य किया जाये।
  •  स्कूलों के संचालन और प्रबंधन में शाला प्रबंध समितियों की सक्रिय सहभागिता के लिए उन्हे सक्षम बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए आदिवासी और अनुसूचित जाति बहुल क्षेत्रों और उत्तर पूर्वी राज्यों में  स्थानीय स्वशासी प्रणाली पर इस संदर्भ में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

शिक्षकों के मुद्दे

वर्तमान में शिक्षकों के पांच लाख स्वीकृत पद खाली हैं और 6.6 लाख कार्यरत शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाना है। ऐसे 37 प्रतिशत प्राथमिक स्तर के स्कूल हैं जिनमें छात्र-शिक्षक अनुपात राष्ट्रीय मापदण्ड 1:30 के विपरीत है। देश भर में छात्र-शिक्षक अनुपात में भारी विभिन्नता है, अण्डमान-निकोबार द्वीप में ये 1:10 है तो बिहार में 1:53 है। अभी भी देश में करीब 10 प्रतिशत स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है जो कि शिक्षा का अधिकार का खुला उल्लंघन है। शिक्षकों को अभी भी गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता है। हालांकि शिक्षक प्रशिक्षण के लिए पहल की गयी है जिसमें शिक्षक प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा अभिदान शामिल है तथापि शिक्षण प्रशिक्षण प्रक्रियाओं में व्यापक बदलाव की जरूरत है। इधर केन्द्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा में एक प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है।
  •  ये फोंरी तौर पर सुनिश्चित किया जाये कि कोई स्कूल एक शिक्षक का नहीं रहे। प्रधानाध्यपकों के साथ शिक्षकों की नियुक्ति पर विशेष ध्यान दिया जाये ताकि छात्र-शिक्षक अनुपात को अधिनियम की संगति में लाया जा सके। ये भी सुनिश्चित किया जाना है कि सभी शिक्षक प्रशिक्षित हों। 
  •  शिक्षक शिक्षा अभियान को गति और विस्तार देने की आवश्यकता है, साथ ही इसमें सेवा-पूर्व प्रशिक्षण प्रक्रियाओं को भी समाहित किया जाये। 
  •  शिक्षकों की इस पेशे में दीर्घकालिक प्रतिबद्धिता के लिए उनकी कार्य-स्थितियों में  सुधार पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
  •  शिक्षकों को अन्य शिक्षणेतर कार्यों से पूरी तहर मुक्त करने की जरूरत है ताकि वे पूरा ध्यान पढ़ाई पर दे पायें। उन्हे रिकार्ड संधारण और आवश्यक प्रशासनिक कार्यों में सक्षम बनाने के लिए सहयोग देने की जरूरत है। 
  •  शिक्षण विधियों, कक्षा अनुभव को समृद्ध बनाने और बेहतर नतीजे अर्जित करने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण की रूपरेखा, संदर्भ व्यक्तियों की तैयारी, स्तरीय प्रशिक्षण  संदर्भ सामग्री और प्रभावी मूल्यांकन में विशेष निवेश की जरूरत है। गुणवत्ता शिक्षा के लक्ष्य को सर्वांगीण रूप से प्राप्त करने के लिए शिक्षक की भूमिका में  गुणात्मक बदलाव की आवश्यकता है।

सामाजिक समावेशन

स्कूल से बाहर रहे कुल 22 लाख बच्चों में से 2013-14 में केवल 44 प्रतिशत बच्चों को ही स्कूल से जोडा जा सका। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2013 तक कुल 32.19 लाख विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान की गयी थी। इनमें से 27.64 लाख बच्चे स्कूलों में नामांकित हो चुके हैं जिनके लिए 18358 संदर्भ शिक्षकों को नियुक्त किये जाने की आवश्यकता है। अभी भी स्कूलों में भेदभाव की प्रवृति कहीं न कहीं विद्यमान है जबकि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय इसके विरूद्ध परिपत्र जारी कर चुका है। हिंसाग्रस्त और संघर्ष के क्षेत्रों में बच्चे स्कूल के बाहर रह जाने के लिए मजबूर हैं। अतएव-
  •  प्रत्येक बच्चे के शिक्षा के मूल अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए स्कूल से बाहर रहे बच्चे को सुस्पष्ट रूप से परिभाषित करने, उसके मानचित्रण और सतत् सम्पर्क बनाये रखने की जरूरत है।
  •  शिक्षा तंत्र में भेदभाव के रूपों की पहचान करने और इन्हे समाप्त करने के लिए शिक्षकों को इन पहलुओं पर सचेत करते हुए एक आचार संहिता लागू करने की आवश्यकता है।
  •  भदेभाव और बहिष्करण के मसलों को सम्बोधित करने के लिए जरूरी है कि स्कूल से सम्बद्ध अन्य भागीदारों के साथ वंचित समूहों के प्रतिनिधियों को भी महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में शामिल किया जाये। 
  •  बच्चों के विभिन्न समूहों की समता और समावेशन से सम्बद्ध मांगों को स्कूल विकास योजना में सम्मिलित करने और इनके लिए जरूरी प्रावधान करने की जरूरत है। प्रत्येक बच्चे की शैक्षणिक जरूरतों को शिक्षा का अधिकार पूरी करे- इस अवधारणा से ही समता को सुनिश्चित किया जा सकता है।
  •  सरकार को ऐसी जगहों पर नजर दौडाने की जरूरत है जहां बच्चे बाल श्रम में नहीं लगे होने पर भी स्कूल से बाहर हैं।

शिक्षा में निजी क्षेत्र

निजी स्कूलों की संख्या में निरंतर बढोतरी हो रही हैं। असर 2013 (ग्रामीण भारत) रिपोर्ट के अनुसार निजी स्कूलों में कुल बच्चों का नामांकन त्रिपुरा में 6.6 प्रतिशत से मणिपुर में 70.5 प्रतिशत के बीच है। 

हालांकि कुछ राज्यों में निजी स्कूलों के नियंत्रण के लिए सख्त नियम हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम में तय मापदण्डों के उल्लंघन पर निजी स्कूलों की शिकायतों के लिए कोई तंत्र स्थापित नहीं किया गया है। देश के 25 राज्यों ने निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत आरक्षण बाबत अधिसूचना जारी कर दी थी। इनमें से 16 राज्यों की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013-14 में वहां 25 प्रतिशत ने इसकी अनुपालना की है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा राज्यों में व्यय के पुनर्भरण की वित्तीय आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए व्यय वित्त समिति का  गठन किया गया है। कुछ राज्यों में सरकारी स्कूलों के निजी क्षेत्र में हस्तान्तरण की खबरें हैं जिनमें मुम्बई, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली शामिल हैं। शोध रपटों में आय और निजी स्कूल के बीच एक सहसम्बन्ध उजागर हुआ है। यदि किसी परिवार की आय बढ जाती है तो वह अपने बच्चे को निजी स्कूल में भेजता है। ऐसे में गरीब  बच्चे सरकारी स्कूलों में ही बने रहते हैं। इस क्रम में निजी स्कूलों का ‘शिक्षा बाजार’ उत्तरोत्तर फैलता जा रहा है जो पिछले वित्त वर्ष में 3.83 लाख करोड रूपये तक पहुॅच चुका है। इस विस्तृत बाजार के नियंत्रण के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत राज्य स्तर पर नियमन तंत्र की अपेक्षा की जाती है। जरूरी है कि-

  •  निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मापदण्डों की अनुपालना के लिए, यथा- समता के लिए 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को प्रवेश और भर्ती व फीस नियमन आदि को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नियमन प्रणाली विकसित  की जाये। 
  •  सरकारी स्कूलों के निजी क्षेत्र में हस्तान्तरण पर तुरंत रोक लगायी जाये, साथ ही शिक्षा की सार्वजनिक प्रणाली को सुद्वढ बनाने पर पूरा ध्यान दिया जाये। स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में बेहतरी के लिए शिक्षक और अभिभावक संगठित रूप से आगे  आयें। 

शिक्षा की गुणवत्ता

निश्चय ही भारत में प्रारंभिक शिक्षा की उपलब्धता (आज ग्रामीण भारत में 95 प्रतिशत आबादी के लिए एक किलोमीटर की परिधि में प्राथमिक स्कूल उपलब्ध है।) में उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित की है, नामांकन के लक्ष्यों की ओर भी बढ़े हैं लेकिन यह सब गुणवत्ता की कीमत पर है। केवल 10 प्रतिशत स्कूल ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम के सभी मापदण्डों को पूरा करते हैं। समग्र एवं सतत् मूल्यांकन (सी.सी.ई.) को लेकर समझ स्पष्ट नहीं है और इसकी क्रियान्विति आधी अधूरी है। विशेष शिक्षण के उपक्रम प्रभावी नहीं रहे। पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति विलंब से की जाती है। पाठयक्रम और पाठ्यपुस्तकों में सुधारों की दिशा में अभी कुछ भी नहीं हुआ है।   इसलिए अनुशंसा है कि -

  •  देश भर के सभी स्कूल अधिनियम के मापदण्डों की अनुपालना में अपने आधारभूत ढांचे को विकसित करें और इसमें पिछडे जिलों पर विशेष ध्यान दिया जाये। स्कूलों से सभी मापदण्डों के आधार पर रिपोर्ट मंगवायी जायें।
  •  गुणवत्तापूर्ण शिक्षण प्रक्रियाओं के लिए पाठयपुस्तकों व शिक्षण सामग्री की सत्रारंभ में पहुॅंच सुनिश्चित करना जरूरी है।
  •  समग्र एवं सतत् मूल्यांकन (सी.सी.ई.) को पद्धतियों की समीक्षा जरूरी है। इसे लेकर शिक्षकों की तैयारी अनिवार्य है। इस मूल्यांकन को लेकर एक व्यापक समझ और सर्वसम्मति बनाकर आगे बढना आवश्यक है।
  •  विशेष शिक्षण के लिए आवश्यकता और तरीकों के हिसाब से वित्तीय प्रावधान भिन्न हो सकते हैं। लेकिन राज्य शिक्षा व्यय अथवा सर्वशिक्षा अभियान की गाइड लाइन में ऐसे खर्च के लिए जरूरी और उचित प्रावधान होने चाहिए। 

ऐसा कोई अग्रणी राज्य उभर कर नहीं आया है जिसने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के सभी मापदण्डों को अर्जित कर लिया है। किसी भी राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने भारतीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के संकल्प को मूर्त  रूप देने की कोशिश नहीं दर्शायी है। ऐसे में अभी तक प्राप्त सफलताओं के नींव पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए जमीन तैयार करनी होगी। इसके लिए राष्ट्रीय जन अभियान की जरूरत है। बच्चों को स्कूलों की सार्वजनीन उपलब्धता, ठहराव और गुणवत्ता पूर्व शिक्षा से ही प्रांरभिक शिक्षा का सार्वजनीकरण संभव है जो लिगं, सामाजिक श्रेणी और क्षेत्र की सापेक्षता में है। इस प्रतिवेदन में दी गयी अनुशंसाएं  कुछ जरूरी पहलुओं को इंगित करती हैं जिनकी जमीनी स्तर पर समीक्षा करते रहने की आवश्यकता है। इस जन अभियान में जन समूहों, नागरिक समाज और सरकार के बीच अनवरत् संवाद और सहकार की दरकार है।           







समान्तर का एक दशक


समान्तर का एक दशक

राजाराम भादू 




समान्तर ने अपनी विधिवत् शुरूआत से अब तक एक दशक की यात्रा पूरी कर ली है। हालांकि अनौपचारिक रूप से तो समान्तर की सक्रियता का समय और भी ज्यादा है। इस अवसर पर लगता है कि हम अपने कामों का एक संक्षिप्त विवरण आपके समक्ष प्रस्तुत करें। 

समान्तर ने अपनी सक्रियता को संस्कृति के इर्द-गिर्द रखा है जो वैसे तो अपने अर्थ में बहुत व्यापक है और बहुत सारी चीजों को अपने में समाहित किये हुए है। विगत दशकों-से देश ही नहीं बल्कि दुनिया एक गहरे सांस्कृतिक संक्रमण से गुजर रही है। ऐसे में सबसे ज्यादा बहसें और मत भिन्नता भी इसी क्षेत्र में है। वर्चस्व की संस्कृति और इसके विरुद्ध प्रतिरोध के प्रश्न इस दौर में  तीखे हुए है। हम इसमें क्या कर रहे हैं? हमारा मानना है कि समाज जिस तरह कई समुदायों की सम्मिलित संरचना है जिसमें एक परंपरा नहीं बल्कि कई परंपराएं हैं, उसी तरह कई संस्कृतियां भी हैं। ऐसा माना जाता है कि मुख्यधारा की संस्कृति ही वर्चस्व की संस्कृति है।

हमारा जोर आधुनिक संस्कृति पर है जिसका ताना बाना समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और मानवीय गरिमा जैसे जनतांत्रिक मूल्यों से बुना गया है। इस आधुनिक संस्कृति का आलोचनात्मक विमर्श करते हुए क्षैतिजिक विस्तार किया जाये। दूसरी ओर जो समुदाय इसके हाशिये पर या उसके भी परे हैं उन्हे इसके दायरे में  लाया जाये। जाहिर है कि सवाल्टर्न सांस्कृतिक समुदायों का सामाजिक समावेशन और बहुलवादी अवधारणाओं की मदद से ही आधुनिक संस्कृति की मुख्यधारा में लाया जा सकता है। समान्तर की रणनीति यही है कि एक ओर इन समुदायों के बीच काम करते हुए उन अनुभवों को व्यापक मंच पर शेयर किया जाये, दूसरी ओर रेडिकल सांस्कृतिक अवधारणाओं को व्यवहार के धरातल पर उतारा जाये। निश्चय ही यह एक लघु और प्रायोगिक उपक्रम है।

जमीनी काम के लिए समान्तर ने पूर्वी राजस्थान के भरतपुर और गंगापुर (सवाई माधोपुर) के शहरी क्षेत्रा में अपने फील्ड सेंटर स्थापित कर काम शुरू किया। भरतपुर में जाति और गंगापुर में सम्प्रदाय के आधार पर द्वन्द्व रहे हैं जिनसे वंचित समुदाय ही ज्यादा प्रभावित रहे हैं। भरतपुर के वंचित समुदाय के बच्चों में पढ़ने की संस्कृति को विकसित करने के लिए बाल पुस्तकालय व गतिविधि केन्द्र शुरू किये गये। रूम टू रीड की मदद से शुरू में (दिसम्बर 2004 से जून 2007) ऐसे 10 केन्द्र शुरू किये गये, बाद में (जून 2006-जून 2009) 10 और नये केन्द्र खोलकर इस कार्यक्रम का विस्तार किया गया। सामुदायिक चेतना केन्द्र नाम से कुछ इसी तरह के केन्द्र गंगापुर सिटी की वंचित बस्तियों में संचालित किये गये। राजीव गांधी फाउन्डेशन की मदद से इन केन्द्रों (जनवरी 2006-दिसम्बर 2009) से समुदाय को भी जोडा गया।

इसका एक असर यह हुआ कि बच्चों और उसके अभिभावकों में स्कूली शिक्षा के प्रति सम्मान बना और नयी आकांक्षाए जगीं। हम जानते हैं कि संस्कृति के घेरे में  मुख्यतः स्त्रियां रहती हैं, ऐसे में  बालिकाओं और किशोरियों की स्थितियों का सहज अनुमान कर सकते हैं जो संस्कृतिकरण की कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया से गुजरती हैं। भरतपुर में हमने बालिका व किशोरियों को केन्द्र में रखकर काम शुरू किया। यहां रूम टू रीड के सहयोग से बालिका शिक्षा कार्यक्रम(सितम्बर 2009 - जून 2015) और सर दौराबजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से बालिका सशक्तीकरण परियोजना (अप्रैल 2010-सितम्बर 2013) संचालित की गयीं। इनसे बालिका-किशोरियों की मुखर और आत्मविश्वास से भरी कतार निकलकर आयी। हमें लगा कि इस प्रक्रिया को तार्किक परिणति तक पहुॅचाने के लिए इन्हे व्यावसायिक सामर्थ्य  प्रदान करना भी जरूरी है। उनमें ऐसी क्षमताएं विकसित करने का एक प्रयोगात्मक कार्यक्रम (2006) हम चला चुके थे। उसे ही बंगलोर के फाउन्डेशन फोर वोकेशनल ट्रेनिंग एंड रिसर्च संस्थान की मदद से व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण योजना (अक्टूबर 2011-अक्टूबर 2012) के रूप में विस्तार दिया। स्वाभाविक रूप से आर्थिक आत्मनिर्भरता किसी भी स्त्री  की वैयक्तिक गरिमा को सुनिश्चित करती है।

प्रारंभिक शिक्षा में हमारे यहां कुछ उल्लेखनीय नवाचार हुए हैं। हम ऐसी सीखों को संस्कृति के परिक्षेत्र में परीक्षित करना चाहते थे। गंगापुर सिटी में चेतनाशाला के नाम से एक प्रायोगिक स्कूल चलाया गया जिसमें भिन्न जाति-धर्म समुदायों के बच्चों के साथ आलोचनात्मक शिक्षण शास्त्र की पद्धतियों को कुछ और प्रयोगों के साथ आजमाया गया। चेतना शाला (अप्रैल  2007-जून 2009) के दो सजों के काम को निरंतर समुदायों और सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की नजर में रखा गया और उनसे लगातार संवाद किया गया। हमारा मानना है कि मुख्यधारा शिक्षा (सरकारी स्कूल) प्रणाली को बेहतर और जबावदेह बनाने की जरूरत है क्योंकि ये अब वस्तुतः गरीबों के स्कूल हैं। मुहिम परियोजना के माध्यम से (अप्रैल 2009-मार्च 2012) हमने गंगापुर सिटी के 10 सरकारी स्कूलों में चेतनाशाला की सीखों और अनुभवों को लागू किया। न्यू एजुकेशन ग्रुप, दिल्ली की मदद से अगले चरण में कस्बे (गंगापुर सिटी) के सभी प्राथमिक-उच्च प्राथमिक स्कूलों को इस परियोजना में सम्मिलित कर लिया। इन स्कूलों से सम्बद्व समुदायों के साथ अन्तक्रिया और संवाद की प्रक्रिया भी निरंतर चलती रही है। साथ ही समुदायों में स्थित आंगनवाडी केन्द्रों पर भी स्कूल पूर्व शिक्षा की प्रक्रियाओं में सहयोग किया जा रहा है। 


संस्कृति के मुद्दों को सम्बोधित करने के लिए शोध एक अनिवार्य कार्यवाही है। समान्तर के एजेन्डे में शोध आरंभ से रहा है। बल्कि इसकी शुरूआत ही मेवात पर किये गये एक सांस्कृतिक अध्ययन (2003-2005) से हुई। अमन, दिल्ली के साथ मिलकर किये गये इस अध्ययन की प्रस्तुतियां जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद में की गयीं। सबसे अहम् यह है कि यह शोध मेवात में सहभागी और क्रियात्मक पद्धति से किया गया था। वहां हिन्दु-मेव के सवाल को इतिहास, संस्कृति और विकास के आयामों से जोडकर देखा गया था। शोध के लिए सदैव संसाधनों का अभाव रहा है, फिर भी समान्तर द्वारा कुछ लघु शोध-अध्ययन किये गये हें। बालिकाओं की शिक्षा पर एक अध्ययन (सी.ए.सी.एल. 2005) की अनुशंसाओं को कई जिलों में सर्वशिक्षा अभियान में शामिल किया गया। इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट नयी दिल्ली के सामाजिक द्वन्द्वों पर एक अध्ययन श्रृंखला में समान्तर शामिल रहा। रजमेरू-कासा के लिए उदयपुर के झाडौल में मनरेगा में समुदाय की भूमिका पर एक अध्ययन किया गया।

समान्तर ने बच्चों को भी शोध की प्रक्रियाओं में जोडा है। समुदाय में वनस्पति, बीमारी, नशे जैसी समस्याओं और बालक व महिलाओं के कामों पर बच्चों ने दिलचस्प अध्ययन किये हैं। एक-दो जगह तो बच्चों ने अपने समुदाय के इतिहास को चीन्हने की कोशिश की है।

समान्तर ने दूसरे संगठन/संख्याओं के लिए प्रशिक्षण व क्षमता वर्धन कार्यक्रम भी किये हैं। राजीव गांधी फाउन्डेशन ने छत्तीसगढ़ के कोटा (बिलासपुर) और उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में स्थित संख्याओं के लिए समान्तर से प्रशिक्षण आयोजित कराये। न्यू एजुकेशन ग्रुप (NEG-FIRE) ने भी ऐसी ही प्रशिक्षण कार्यशालाओं में समान्तर की संदर्भ सेवाएं ली हैं। बल्कि बूंदी जिले के तालेडा में खनन् क्षेत्रा में संचालित न्यू एजुकेशन ग्रुप की एक शिक्षा परियोजना के लिए समान्तर ने दीर्घकालिक (अप्रैल 2009- मार्च, 2013) क्षमतावर्धन सहयोग प्रदान किया है। समान्तर कई तरह से ऐसी सेवाएं देता रहा है जिसमें उदाहरणार्थ शिक्षा के अधिकार पर यूनीसेफ के स्टाफ आमुखीकरण से लेकर पुलिस अकादमी में प्रतिवेदन लेखन पर सत्रों का उल्लेख किया जा सकता है।

समान्तर ने अपनी शुरूआत एक सांस्कृतिक मंच से की थी जो विचार-गोष्ठियों और संवाद के आयोजन करता था। जैसाकि कहा गया समान्तर की रणनीति शीर्ष और जमीनी स्तर पर द्वन्द्वात्मक अन्तक्रिया  करने की है। इसलिए समान्तर विचार गोष्ठियों और विमर्श के आयोजन लगातार करता रहा है। एक दशक में इस सिलसिले  में कोई अंतराल नहीं आया। इन आयोजनों में देश के कई ख्यात विद्वानों ने शिरकत की है।

समान्तर की ओर से स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के मानव अधिकार संगठनों और नेटवर्कों में सक्रिय हिस्सेदारी की जाती है। इसने हमें सतत् रूप से समृद्ध और प्रेरित किया है। अकादमी और विश्वविद्यालयों से भी समान्तर का कम ही सही एक  सम्बन्ध और सहकार रहा है।
एक संस्कृति पत्रिका या बुलेटिन का प्रकाशन समान्तर के शुरूआती उद्देश्य में शामिल था। शुरू में अमन (दिल्ली) के सहयोग से संस्कृति पर ‘दिशाबोध’ पत्रिका निकाली गयी। तकनीकी कारणों से हमें यह शीर्षक छोडना पडा। इस बीच संसाधन भी कम हुए। तब एक सांस्कृतिक बुलेटिन के तौर पर ‘मीमांसा’ को शुरू किया गया जिसका प्रकाशन विलंबित गति से जारी है। ‘मीमांसा’ ने समान्तर के ध्येय के अनुरूप सबालटर्न  समुदायों के सांस्कृतिक सवालों को उठाया हैं। इसके अन्तक्रियामूलक और विमर्शात्मक स्वरूप की सराहना की गयी है। इसके इतर भी हमने अपने काम के दस्तावेजीकरण का एक प्रयास किया है जिसमें समान्तर की एक दशक की यात्रा का एक संक्षिप्त प्रतिवेदन और कुछ पुस्तिकाओं के प्रकाशन शामिल हैं।

समान्तर को आगे की दिशा हाशिये के उन्ही समुदायों पर केन्द्रित है जो सदियों से अलगाव आपदाओं में जी रहे हैं। दुर्भाग्य से जिनकी भाषा और संस्कृति ही नहीं कला और कौशल भी ओझल और विलुप्त होते जा रहे हैं। यह एक चुनौती भरा कार्यभार है जिसके लिए नागरिक समाज के बडे सहकार की दरकार है। 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

पानसिंह तोमर और दस्यु फिल्में


                                                   पानसिंह तोमर और दस्यु फिल्में
                                                                                                               राजाराम भादू 

       तिग्मांषु धूलिया एक मेधावी फिल्मकार हैं। उनकी फिल्में पहले भी चर्चा में रही हैं। इसलिए उनकी पिछले दिनों प्रदर्षित फिल्म ‘पानसिंह तोमर’ का भी चर्चा में आना स्वाभाविक है। हाल ही में इसे मिले उत्कृष्ट फिल्म में राष्ट्रीय पुरस्कार और अभिनेता इरफान को श्रेष्ठ अभिनय के लिए मिले राष्ट्रीय पुरस्कार ने इसकी प्रतिष्ठा और स्थापित कर दी है। लेकिन इस फिल्म ने सिने विषेषज्ञों को अपनी बाॅक्स आॅफिस सफलता के कारण ज्यादा चैंकाया। इसलिए कि दस्यु फिल्म होते हुए भी इसमें कोई मुम्बइया लोकप्रियतावादी फाॅर्मूला नहीं अपनाया गया था। यह फिल्म एक ओर सिने दर्षकों के आस्वाद में आये परिवर्तन का संकेत देती है, वहीं हिन्दी सिनेमा में साहसी और परिपक्व निर्देषकों के आगाज की भी सूचना देती है। इस प्रसंग में हम हिन्दी की दस्युओं पर केन्द्रित फिल्मों की कुछ प्रवृत्तियों पर विचार कर रहे हैं।
डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आंरम से ही किस्से कहानियां रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने-सुनाये जाते रहे होंगे। तदनन्तर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र-पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राॅबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेषों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में ‘किस्सा तोता मैंना’ और ‘चार दरवेष’ के साथ ‘सुल्ताना डाकू’ पुस्तक भी बिका करती थी। हिन्दी में डाकुओं पर सैकडों फिल्में बनी हैं जिनमें ‘सुल्ताना डाकू’,‘पुतली बाई’ और ‘गंगा-जमना’ जैसी फिल्मों ने बाॅक्स आॅफिस पर भी रिकार्ड सफलता पायी है।
जन सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच को लेकर अनुसंधान की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी ओर उन से जुडे किस्सांे कंे प्रति जबर्दस्त उत्सुकता रहती है। हालांकि डाकुओं में भी अंतर रहा है और जन सामान्य की ओर से सभी को नायकत्व नहीं हासिल नहीं हुआ। जन श्रुतियों के अनुसार ऐसे डाकू रहे हैं जो गरीबों के प्रति संवेदनषील थे। सुल्तान डाकू जैसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे अमीरों को लूटकर उनका धन गरीबों में बांट देते थे। स्त्रियों को लेकर भी डाकुओं की मान-मर्यादा पर चर्चा होती है। पुतली बाई जैसी महिला दस्यु को भी जन सामान्य में नायकत्व का दर्जा हासिल है। 
हिन्दी प्रदेषों के दस्यु प्रभावित क्षेत्र दूर-दराज के पिछडे हुए इलाके हैं जहां एक ओर सामंती सामाजिक दांचा बरकरार है तो दूसरी ओर आधुनिक सभ्यता की पहुंच नाम मात्र रही है। जन समुदायों में यह सामान्य अवधारणा है कि कोई शौक से डाकू नहीं बनता बल्कि मजबूरियों के चलते इस राह पर चल पडता है। इसे उनकी नजर में बगावत माना जाता है और इसीलिए उन अंचलों में डाकू को बागी कहा जाता है।इस प्रकार यह विद्रोह का ही एक पूर्व आधुनिक रूप रहा है। जो लोग वर्चस्व के तले स्वयं उत्पीडित अवस्था में रहते हैं, वे विद्रोहियों के प्रति एक तरह का सम्मान भाव रखते हैं। इन अंचलों में डाकूओं को जाति समुदायों से जोडकर भी देखा गया है। इनके बारे में तथ्यपरक और पासंागिक जानकारी के अभाव में अतिरंजना बढती गयी है।
मुम्बइया फिल्मों का मुनाफे से गहरा रिष्ता रहा है। वहां कहानी गढी जाती है और इसका एक रूढ ढांचा बना रहता है। दस्यु कथाओं पर बनी फिल्मों का भी वहां रूढ ढांचा रहा है। जो फिल्में ज्यादा लोकप्रिय रही हैं, प्रायः उनकी संरचना का अनुकरण किया जाता है। वहां दस्यु कथा में डाकू नायक त्रासदी के चरित्र की तरह रहा है। वह धीरोदात्त है लेकिन सामाजिक नैतिकी के अतिक्रमण के कारण दुखद अंत को प्राप्त होता है। अन्यथा फिर एक अच्छा और बुरा डाकू है। अच्छा डाकू मरने से पहले बुरे का खात्मा कर जाता है। जाहिर है कि ऐसी कथाओं का वास्तव जगत से शायद ही कोई सम्बन्ध रहा हो। ये जनश्रुतियों के इर्दगिर्द रची फन्तासी हैं। हिन्दी सिनेमा में दस्यु जीवन को एक सीमा तक यथार्थवादी तरीके से चित्रित करने की कोषिषों का भी एक इतिहास रहा है। कथा फिल्मों के शताब्दी वर्ष में ऐसी फिल्मों का आलोचनात्मक विहंगावलोकन होना चाहिए। ऐसी फिल्मों का ‘मदर इंडिया’ से लेकर ‘मुझे जीने दो’ तक एक धुधला और बिखरा-सा क्रम है। लेकिन अधिक लोकप्रियता तो ‘मेरा गांव मेरा देष’, कच्चकधागे’ और ‘चत्बल की कसम ’ जैसी फिल्मों को ही मिली है। ऐसी फिल्मों में घोडे दौडते रहते हैं जो पुलिस की जीपों को भी छकाते रहते हैं। डाकूओं के अडडे पर मुजरे होते रहते हैं या कब्बालियां होती हैं। इस सबके साथ रोमांस तो है ही। सत्तर के दषक के बाद तस्कर और माफियाओं ने डाकुओं को हिन्दी सिनेमा से अपदस्था कर दिया। इसके बाद वे आते भी हैं तो काफी हास्यास्पद लगते रहे हैं।
‘बैंडिट क्वीन’ हिन्दी सिनेमा में दस्यु जीवन पर बनी फिल्मों में एक युगान्तर है। यद्यपि शेखर कपूर ने यह फिल्म विष्व सिनेमा को ध्यान में रखकर बनायी थी और इसे वैसी ख्याति मिली भी, लेकिन इसने दस्यु फिल्मों के मुम्बइया फाॅर्मूले को सदैव के लिए ध्वस्त कर दिया। शेखर कपूर ने इसमें नुसरत फतेह अली खान की गायकी और एक लोक गीत को इस्तेमाल किया था। लेकिन मुझे यह फिल्म देखते समय अलीगढ़ के ख्यात कब्बाल हबीव पेन्टर की एक कब्वाली याद आती थी ‘ फूलन जलती चिता है ये दुनिया दोजरव की पगडंडी’। उल्लेखनीय है कि हबीव साहब इस कब्बाली को तब से सुनाते थे जब बीहडों में फूलन का आतंक था। शेखर की फिल्म निर्माण के समय फूलन जेल में थी।उसने फिल्म के एवज में निर्माता निर्देषकों से भी धन अर्जित किया। फिल्म की अपार सफलता से फूलन को और लोकप्रियता मिली। जेल के बाद वह संसद तक पहुची। अतंतः प्रतिषोध की हिंसा की भेंट चढ गयी।
मैं अक्सर हबीव साब की इस कब्बाली के बोलों के अर्थ को समझने की कोषिष किया करता था। मुझे लगता है कि हबीव साब के सूफियाना अंदाज में हिंसा और प्रतिहिंसा के दुष्चक्र को प्रष्नित किया गया है। वैयक्तिक प्रतिहिंसा अंततः एक सामंती प्रवृत्ति है जिसकी अनिवार्यतः आवृत्ति होती है। विडम्वना यह है कि प्राकआधुनिक समुदायों में इसे भी प्रतिरोध का एक सम्मानित दर्जा हासिल रहा है। किन्तु इसकी दुर्बलता यह है कि इससे व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था को वैयक्तिक हिंसा से कोई खतरा नहीं है। यह इसका दमन कर सकती है अन्यता अनुकूलन। फूलन के समय तक सामंती तत्वों का नयी तरह की (लोकतांत्रिक) राज्य सत्ता से गठजोड हो चुका था। उसे प्रतिंिहसा और फिल्म के ग्लैमर से जो नायकत्व मिला, सामाजवादी पार्टी ने उसे सामायोजित कर इसका राजनीतिक लाभ अर्जित किया। चूंकि सामती अवषेष अभी भी सक्रिय थे इसलिए वह पुनः प्रतिहिंसा का षिकार हो गयी।
व्यवस्था से लडने का कारगर रास्ता तो सामूहिक प्रतिरोध से ही निकल सकता है। इसके लिए कई बार लोग मुख्य मार्ग छोडकर बीहडों का रास्ता अपनाते हैं (मसलन नक्सलवाडी आन्दोलन), उस पर विचार किया जाना चाहिए कि यह कितना सही है। कई बार प्रतिरोध में प्रतिहिंसा को शामिल कर लिया जाता है और बाबा नागार्जुन जैसे कवि इसका महिमा मंडन करते रहे हैं ‘ प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का’। इस पर भी वस्तुपरक ढंग से चिंतन करने की आवष्यकता है। सामूहिक प्रतिरोध से भी कई बार वैयक्तिक नायक को निकाल लिया जाता है तो व्यवस्था उसे समायोजित कर लेती है। ऐसे में प्रतिहिंसा और प्रतिरोध के सर्जनात्मक विस्तारों को गंभीरता से देखने की जरूरत है।
वैयक्तिक प्रतिहिंसा में स्त्रियां लक्षित की जाती रहीं हैं। शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ का एक दृष्य है। सामूहिक बलात्कार के बाद फूलन को नग्न अवस्था में एक कुएं से पानी लाने को कहा जाता है। एक अन्य दृष्य में तब की उत्पीडित फूलन डाकू के रूप में उसी बस्ती में बदला लेने आयी है। वहीं कुआं है और उसके घाट पर एक नंगी बच्ची गोलियों की आवाज सुनकर डर से रो रही है। ‘बैंडिट क्वीन’ पर भी सेक्स के चित्रण को लेकर आरोप लगे थे। पता नहीं दर्षकों ने इस पर कितना सोचा कि फूलन की चुनौती पूर्ण भूमिका को सीमा विष्वास ने स्वीकारा और उसे बेहतर अभिनीत किया। लेकिन फूलन पर बलात्कार वाले दृष्य उसकी डुप्लीकेट पर फिल्माये गये।क्या हमारे दर्षक इस डुप्लीकेट के प्रति संवेदनषील हो सकते हैं? स्त्रियों के प्रति हिंसा प्रतिहिंसा पितृसत्ता, सांमती सोच और संवेदनहीनता से उपजती है।
बहरहाल, शेखर कपूर की इस फिल्म ने हमें उस यथार्थ से रूबरू कराया था जिसमें लोग विपथगामी बनते हैं। वहां वर्चस्व और उत्पीडन का सतत् द्वन्द्व है जिसमें मौन की संस्कृति में जी रहे हाषिये के समुदाय संत्रास झेल रहे हैं। बगावत एक बार इस संत्रास से निकलने का अहसास कराती हैं लेकिन बाकी जीवन के अपने घात प्रतिघात और भयावह चुनौतियां हैं। ‘बैडिट क्बीन’ इस बीहड यथार्थ को इसकी बहुस्तरीय जटिलता और अंतर्विरोधों के साथ प्रस्तुत करती है। फिल्म अततः दृष्य माध्यम है और वहां कथा का प्रवाह बनाने के लिए निर्देषकीय प्रविधियां इस्तेमाल की जाती हैं। लेकिन एक निर्देषक का कौषल यही है कि  यथार्थ को ये चीजें पीछे नहीं धकेलती और उसी तरह कला अन्तर्वस्तु के प्रभाव को कहीं तिरोहित नहीं होने देती।
एक बेहतर और सार्थक फिल्म बनाने के लिए एक अच्छी कहानी पूर्व शर्त है। पहले जो दस्यु फिल्में सफल रहीं, उसमें भी कथावस्तु की निणयिक भूमिका थी। भले ही यह अतिरंजित और रोमांचक हो। दस्यु जीवन पर यथार्थवादी नजरिये से लिखी गयी कथाओं के नाम पर लगभग शून्य है। यह जानकर एक तरह की हैरत होती है कि प्रगतिषील कथाधारा में भी दस्यु आधारित कथानक गायब है। यदि यह बगावत का पूर्व आधुनिक रूप था तो इसे कथा के जरिये समझने की कोषिष होनी चाहिए थी। सामाजिक शोध में संलग्न संस्थानों ने भी दस्यु जीवन पर शायद ही कोई उल्लेखनीय अनुसंधान किया है। ऐसे में मुक्तिबोध की लम्बी कविता ‘चंबल की घाटी में’ एक अपवाद की तरह है। यह कविता इस बीहड जीवन के प्रष्नों को प्रतिरोध  की व्यापक चेतना से जोडने का कलात्मक उपक्रम है।
फूलन देवी पर एक पत्रकार माला सेन ने लम्बे समय तक शोध किया। उन्होने एक ओर फूलन से लम्बे-लम्बे साक्षात्कार लेकर उसका जीवन वृत्त तैयार किया, वहीं उस क्षेत्र में भ्रमण व स्थानीय लोगों से संवाद करके इसकी प्रामाणिकता को पुष्ट किया। यह भी उल्लेखनीय है कि फूलन पर लिखी माला सेन की पुस्तक ‘बेंडिट क्वीन’ फिल्म से पहले ही एक बेस्ट सेलर का दर्जा हासिल कर चुकी थी। मुझे लगता है कि अगर यह किताब नहीं होती तो यह फिल्म भी संभव नहीं होती। कहना न होगा कि यह किताब अंग्रेजी में लिखी गयी।
हिन्दी में मनमोहन कुमार तमन्ना ने जरूर चम्बल के डाकूओं पर यथार्थवादी नजरिये से लिखने की कोषिष की थी। दुर्भाग्य से उनकी पुस्तकें पाॅकेट बुक प्रकाषनों से छपीं, हालाकि उन्हे अच्छी व्यावसायिक सफलता मिली। यहां प्रसंगवष बताना जरूरी है कि पाॅकेट बुक प्रकाषनों से डाकुओं पर उपनयास आते रहे हैं। असल में ये पुराने फुटपाथी बाजार के नये संस्करण थे। इनमें कुषवाहा कान्त से वेदप्रकाष काम्बोज तक दस्यु कथाएं लिखी गयीं। लेकिन तमन्ना के उपन्यास काफी भिन्न थे। उनमें चम्बल के बीहड, डांग क्षेत्र, हिंसा के अंधेरे पक्ष और पिछडेपन के दंष साफ झलकते थे। जहां तक मुझे याद है उनके मोहर सिंह माधोसिंह की पृष्ठभूमि पर लिखे उपनयास पर फिल्म भी बनीं। लेकिन वहां काफी कुछ फिल्मी हो गया था।
‘पानसिंह तोमर’ इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह दस्यु जीवन की पृष्ठभूमि और उस अंचल में सक्रिय सांमती अवषेषों के घात प्रतिघातों का निर्ममता से चित्रण करती हैं। तिग्मांषु धूलिया ’बेंडिट क्वीन’ में शेखर कपूर के सहायक थे। उस अनुभव का लाभ उन्होने लिया है। लेकिन पानसिंह पर फिल्म अपने आप में भी चुनौती थी। वहां यौन उत्पीडन के सहारे ही सही चित्रित हुए सेक्सदृष्यों से फिल्म की बाॅक्स आॅफिस सफलता में किसी हद तक मदद मिली थी यह एक सचाई है। वहा कबीलाई प्रतिषोध कथा भी थी जो हिन्दी के लोकप्रिय सिनेमा की एक स्थापित रूढि है। कहानी में सस्पेंस और थ्रिल के लिए गुंजाइष थी।
पानसिंह एक तरह से सरल रैखिक कथा है फिर भी यह दर्षक को बांधे रहती है तो इसके पीछे कथा के ताने बाने और निर्देषकीय दृष्टि ही निर्णयक है। तिग्मांषु ने खुद एक सहयोगी के साथ कथा पटकथा तैयार की है। पानसिंह की जीवन कथा किसी अजूबे संसार में नहीं घटित हो रही। उसकी सभी घटना परिघटनाएं हमारी राज्य व्यवस्था के ऐन बीच में घटित हो रही हैं। इसमें नौकरषाही पुलिस के बहुप्रचारित गठजोड के साथ सैन्यतंत्र के अन्तर्विरोधों को भी उद्घाटित किया है। इस अर्थ में यह एक दस्यु के बहाने राजनीतिक फिल्म है।
यह फिल्म पानंिसंह तोमर को खुलकर नायकत्व प्रदान करती है। बेषक यह नायकत्व भी रूढ मुम्बइया फिल्मों के नायकत्व से भिन्न है। यह नायकत्व उसे स्थानीय जनता तो पहले ही प्रदान कर चुकी थी। इस रूप में तिग्मांषु ने इस फिल्म के बहाने सबाल्टर्न नजरिये से सामुदायिक इतिहास की एक किंवदंति का संधान और कलात्मक विष्लेषण किया है। निष्चय ही अभिनेता इरफान ने पानसिंह के चरित्र को जीवंत कर दिया है। आप देखेंगे कि एक धावक के रूप में पानंिसह के विकास में फिल्म के काफी दृष्य खर्च किये गये हैं। फिर आप पानसिंह के एक राष्ट्रीय धावक के रूप में स्थापित होते समय राष्ट्र से उसके भावात्मक तादाम्य को देखते हैं। दूसरी ओर उसी राष्ट्र के प्रति कुछ सैन्य अधिकारियों, नौकरषाहों और पुलिस का नजरिया भी एक कंट्रास्ट की तरह प्रस्तुत है। पानसिंह के विचलन में उसके तमगे का अपमान एक त्रासद स्थिति उत्पन्न करता है। अंततः वह एक त्रास्दी के नायक की परिणति तक पहुंचता है। फिर भी देष, समाज और विपन्नों के प्रति उसकी संवेदनाएं आखिर तक कायम रहती हैं।
इसी संदर्भ में हम दस्यु जीवन पर हाल ही में प्रकाषित कथाकार पुन्नीसिंह के उपन्यास ‘वह जो धाटी ने कहा’ का उल्लेख करना चाहेगें। इस उपन्यास की रचना के पीछे कथाकार पुन्नीसिंह का लम्बा शोध और श्रम है। यह चम्बल की घाटी में फैले डांग क्षेत्र के पिछडेपन और इस अंचल की उपेक्षा की कथा भी है। डांग क्षेत्र तीन राज्यों-मध्य प्रदेष, राजस्थान और उत्तर प्रदेष की सीमाओं से घिरा है। ये भौगोलिक रूप से सीमांत नहीं है बल्कि हाषिये के अर्थ में भी सीमांत है। इसीलिए यहां सामंती मूल्य संरचना आज भी सक्रिय है।
पुन्नसिंह का यह उपल्यास किसी अतीत कथा अथवा किंवदति पर आधारित नहीं है। यह डांग क्षेत्र के वर्तमान का वृत्तान्त है। साथ ही स्थानीय जीवन में व्याप्त उन असंगतियों, शक्ति-संचनाओं और वर्चस्व के जनविरोधी रूपों को उद्घाटित करता है जो दस्यु उन्मूलन नहीं बल्कि दस्युओं के अस्तित्व में अपने निहित स्वार्थ देखते हैं। इस उपन्यास का वितान और कथा-भाषा आपको एक ऐसे यथार्थ से रूबरू कराती है जो सच में अभी तक लगभग अन् उद्घाटित है। इसमें पात्रों की बाह्य और आभ्यंतर दुनिया को पूरी संवेदनषीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। तीन सौ पृष्ठ के इस उपन्यास की पठनीयता ऐसी है कि इसे बीच में छोडना मुषिकल होता है।  

   

सोमवार, 2 जुलाई 2012

जयपुर साहित्य उत्सवः कितना साहित्य -कैसा उत्सव?

भारतीय संदभों में साहित्य उत्सव की क्या और कैसी परिक्रल्पना रही है? यह सवाल मेरे जेहन में पिछले कुछ  वर्षो से लगातार उन दिनों षिद्दत से उठता है जब जयपुर में साहित्य उत्सव मनाया जाता है। मुझे तो कम से कम साहित्य से जुडे उल्लास और उत्सव के कोई बहुत संदर्भ नहीं मिलते। भारत में एक नैसर्गिक प्रकृति-चक्र है जो विभिन्न पर्व-त्यौहारों से सजा-धजा प्रति वर्ष आवृत्तिमूलक रूप से घूमता रहता है। वहां प्रकृति और सृजन की देवी सरस्वती से जुडी ऋतु वसंत है जो उत्सवधर्मिता का किंचित आभास कराती है। लेकिन मेरे किशोर दिनों की एक स्मृति है जब वसंत पंचमी के दिनों बहुत सारे लोग श्रीहिन्दी साहित्य समिति में इकट्ठा होते थे और कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की चर्चा करते थे। हम देखते थे कि कवि निराला पर चर्चा करते-करते वक्ता एक तरह के जोश  और आक्रोश  से भर उठते थे। उत्सव-धर्मिता की भावना वहां कहीं बिला जाती थी। फिर स्मृति रहती थी होली के आसपास के हास्य-कवि सम्मेलन की जिसमें करीब-करीब पूरी रात सैकडों श्रोता चुटीली और तिरछे व्यंग्य वाली काव्योक्तियों पर सर्मवेत ठहाके लगाते रहते थे। विभिन्न शहरों-अंचलों में तीन से पांच दिन के साहित्य-समारोहों में भी हम शरीक हुए हैं। इन समारोहों में परिचित साहित्यकारों से मिलने जुलने, नये परिचय सम्बन्ध स्थापित करने और विभिन्न सृजनात्मक पहलुओं पर संवाद के अवसर रहे हैं। वहां किसी सत्र में एकाएक तीखी बहस हो उठती और उसकी चर्चा यत्र-तत्र कई दिन बनी रहती।
इसके इतर साहित्य उत्सव के और आयोजन हमारी समृति में नहीं है। और हैं तो फिर पुस्तक मेले और प्रदशनियां हैं जो एक स्कूल या छोटे कस्बे से दिल्ली के विशव पुस्तक मेले तक विस्तारित हैं। इनमें भी नये प्रकाशनों के लोकार्पण, नयी किताबों की चर्चा और परस्पर मेल-मिलाप की गहमा-गहमी रहती है। भारत जैसे मौखिक परंपरा से लिखित प्रवृत्तियों में सक्रंमित होते समाज में पुस्तक को प्रचारित-प्रतिष्ठित करने में इन मेलों और प्रदशनियों की अहम् भूमिका है। ये लेखक और पाठकों के बीच सार्थक संवादों के अवसर भी उपलब्ध कराती हैं। 
क्या इनसे इतर कोई और तरह के आयोजन नहीं हो सकते या होने नहीं चाहिए? यह प्रतिप्रष्न प्रासंगिक और उचित है। सृजन की दुनिया में संभावना सदैव और सब जगह है। सृजन अपनी मूल प्रकृति और प्रयोजन में ही संवादधर्मी और अन्तक्र्रिया-मूलक है। फिर भारतीय भाषाओं और हिन्दी समाज में तो साहित्य को समाज के बीच जरूरी जगह दिलाने के लिए बहुत तरह के और बहुत सारे सामूहिक उपक्रमों की आवष्यकता है। वहां कुछ भी नया और महत्वपूर्ण होता है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन जो हो रहा है उसे आलोचनात्मक नजरिये से देखने में हर्ज क्या है? जी हां, आलोचनात्मक नजरिया जिसमें वैज्ञानिक आधार से उद्भूत क्या, क्यों, कैसे किस लिए वाले सवाल हो सकते हैं। क्या वास्तव में यह साहित्य का उत्सव है? इससे सृजन को समुन्नत और समृद्ध करने की दिश  में कोई मदद मिल रही है? क्या वाकई इससे सृजन को नये आयाम या क्षितिज मिल रहे हैं? क्या है मूलतः यह सामूहिकता और सामाजिकता पर टिका है? अन्यथा इसके पीछे कोई निहित स्वार्थ और षडयंत्र तो काम नहीं कर रहे?
चर्चा को आगे बढाने से पहले जरा एक छोटी सी झलक जयपुर साहित्य उत्सव की देखे   (हम इसे ‘उत्सव’ कह रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी में इसके लिए ‘फेस्टिवल’ कहा गया है जबकि यहां का मीडिया इसे ‘समारोह’ कहता रहा है)ः
‘यह उत्सव है साहित्य का। बारह हजार से ज्यादा लोग दाखिल हो चुके हैं डिग्गी पैलेस में। एक रेला सा चल रहा है। मुम्बई के मेट्रो स्टेशनों जैसा। इतनी भीड है कि लोग मुगल टेंट  के वजाय फ्रंट लोन में पहुंच जाते है। लोगों  के धक्के से। यहां चर्चा है कबीर, मीरा और टाॅलस्टाय की। अरब मुल्कों की क्रान्तियों की। बहस करने वालों में अरूणा राय, एम. जे. अकबर और बरखा दत्त। गुलजार, प्रसून जो, चेतन भगत और विनोद मेहता। पर जाने क्यों, अपनी हिन्दी के ज्यादातर नामी-गिरामी आलोचक, साहित्य सृजक, कथाकार और उपन्यासकार यहं नजर नहीं आ रहे। वही हैं जो ब्रंाड हैं। अंग्रेजी की रेसिपी में हिन्दी वाले सिर्फ छौंक भर हैं। खुशबू के लिए। खुशनुमा माहौल है। दोपहर की गुनगुनी धूप में ही वाइन और बीयर की चुस्कियों के बीच दिलचस्प बहस है।’
यह पत्रकार सुधीर मिश्र की फेस्टिवल डायरी का एक अशं  है जो उत्सव के दिनों में दैनिक भास्कर में छपती रही। उल्लेखनीय है कि भास्कर इस उत्सव के सहयोगियों में शामिल था और करीबन आधे हिन्दी साहित्यकार पत्रकार उत्सव के सत्रों में भास्कर की मेहरवानी से ही जगह पा सके थे। हिन्दी साहित्य का मात्रात्मक अनुपात तो इस टिप्पणी में आ ही गया, कुल साहित्य मात्र की उपस्थिति फिल्म और फैशन की दुनिया के अभिनेता अभिनेत्री और माॅडलों के बीच आधी से भी काफी कम रही। कहना था न होगा कि उसमें भी वर्चस्व की स्थिति अंगे्रजी की रही हर जगह, हर वक्त और लगभग सर्वत्र।
तीसरी दुनिया के देशों का साहित्य उपनिवेशवाद के विरूद्ध संघर्ष और प्रतिरोध से नाभिनालबद्ध है। इस क्रम में साहित्य ने सौदर्यशस्त्र, मूल्यांकन और आस्वादन के क्षेत्र में नये मापदण्ड स्थापित किये हैं। भारत सहित इन देशों  के मुक्त होने और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हाने की प्रक्रिया में भी साहित्य ने अपनी तरह की अहम् भूमिका निभायी है। इससे और पीछे जायें तो खुद यूरोप के देशों  में नवजागरण और प्रबोधन काल में साहित्य की ऐतिहासिक भूमिका सामने आयी थी। लोकतांत्रिक सोच और प्रणाली की व्यावकता के साथ साहित्य की सर्वजनीनता के उपक्रम भी सामने आये। हम देखते हैं कि कला के लिए कला वाले शुद्ध सौदर्यवादी पक्ष को यूरोप में भी कोई बहुत प्रतिष्ठित जगह नहीं मिली। इस सोच का गंभीर और सौंदर्यषास्त्रीय पक्ष भी ठीक वहीं से उभरा।
यह सही है कि विगत दषकों में तीसरी दुनिया के देषों के साहित्य और संस्कृति में कुछ समय के लिए एक तरह की ठिठक और ठहराव था। ये सोवियत संघ के पतन, दुनिया के एक ध्रुवीय हो जाने और भूमंडलीकरण की परिघटना से उत्पन्न संक्रमण का दौर था। तथापि यह स्थिति बहुत देर नहीं रही। तीसरी दुनिया की आंख ने देख लिया कि साम्राज्यवाद अब नयी शक्ति और नये तरीकों से मनुष्यता के विरोध में आ रहा है। अब यह प्रत्यक्ष राजनीतिक सत्ता के द्वारा नहीं, पंूजी के जरिये वर्चस्व और दोहन में उतरा है। इसके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का संजाल फेला है जिसे उच्च तकनीकी से लैंस प्रचार माध्यम सहयोग प्रदान कर रहे हैं। इस सबसे प्रतिरोध के नये क्षेत्र खुले और साहित्य और संस्कृति ने वर्चस्व के विरूद्ध फिर अपना मोर्चा खोल दिया -एक ऐतिहासिक कार्यभार की तरह।
अब जरा जयपुर साहित्य उत्सव के उद्भव और विकास को संक्षिप्त रूप  में देखें। यह उत्सव पहली बार 2006 में शुरू हुआ था आमेर के किले से और फिर डिग्गी पैलेस में प्रविष्ट हुआ। यहां एक ब्रिटिष मूल की महिला हैं फेथ सिंह। उन्होने एक राजस्थानी से विवाह किया है इसलिए सिंह हैं। फेथ के पति किसी रियासती राजपूत घराने से ताल्लुक रखते हैं।  जयपुर के दो ऐसे पारंपरिक व्यवसाय हैं जो नये जमाने में ढ़लकर और अधिक फलते फूलते गये हैं। ये हैं रत्न व्यवसाय और रेडीमेड कपडों का कारोबार। फेथसिंह ने रेडीमेड कपडों का कारोबार अनपाया और जल्दी ही अपनी फर्म अनोखी को ऊचाइयों तक पहुंचा दिया। उनमें गहरा सौंदर्यबोध हैं लेकिन अंततः वे ब्रिटिश  आभिजात्य महिला हैं और (ब्रिटिश  राज) के प्रति वे जबर्दस्त रूप से अनुरक्त हैं। इसी के चलते उन्होने अपने व्यवसाय में जिस तरह से नये डिजाइन और शैली को प्रयुक्त किया, उसे बाजार में भारी सफलता मिली। बी. बी. सी. ने इस बारे में उनका एक लम्बा साक्षात्कार प्रसारित किया।
हमने ऊपर जिन दो कारोबारों का जिक्र किया है उनका पर्यटन से गहरा सम्बन्ध है। चूंकि फेथ खुद ब्रिटिष हैं और जयपुर की बहू हैं तो इन्हे व्यवसाय में इसका लाभ मिलना ही था। जयपुर के अभिजात्य तबके में उनकी अच्छी जगह बन गयी थी। राजस्थान आने वाले पर्यटक की दिलचस्पी में मुख्यतः यहां की दो तीन चीजें होती हैं। एक यहां का सामंती इतिहास और उसके अवषेष, दूसरा यहां की लोक संस्कृति और लोकजीवन। यूरोप और ब्रिटिष मूल के पर्यटक यहां ‘राज’ के दिनों की स्मृतियों में भी जाना पसंद करते हैं। फेथ सिंह ने भी यहां की लोक संस्कृति का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में वे पाष्चात्य अध्येताओं के सम्पर्क में भी आयीं। पिछली गहलोत सरकार के दिनों में उन्होने एक गैर-सरकारी संस्था बनायी-विरासत फाउन्डेषन। इसका मकसद था। जयपुर की विरासत का संरक्षण और राजस्थान की लोक कलाओं का अध्ययन। इस क्रम में जयपुर विरासत समारोह मनाने का सिलसिला शुरू किया जिसे तत्कालीन सरकार से भी आर्थिक सहयोग मिला। जयपुर साहित्य उत्सव-2006 इसी समारोह की कडी था। इस उत्सव को मौजूदा परिणति की ओर लायीं नमिता गोखले। हालांकि विलियम डेलरिम्पल तो पहले ही उत्सव से जुडे थे। इसकी एक परिणति तो यह हुई कि जयपुर साहित्य उत्सव विरासत समारोह से पृथक और स्वतंत्र हो गया। तद्नन्तर फेथसिंह का विरासत फाउन्डेषन भी जयपुर विरासत समारोह से अलग हो गया। जयपुर विरासत समारोह अब शुद्ध सरकारी आयोजन रह गया है और फेथ सिंह का विरासत फाउन्डेशन कहीं पृष्ठभूमि में चला गया है। इसके विपरित जयपुर साहित्य उत्सव भूमंडलीय पटल पर छा गया है। 
इसे उर्वर पृष्ठभूमि नयी आर्थिकी और बाजार केन्द्रित संस्कृति ने दी है। वसुंधरा राजे की सरकार के समय सामंती संस्कृति को पुनर्जीवन देने के सायास प्रयास किये गये। गणगौर की सवारी के समय राजपूत सरकार फिर से सजधज कर सवारी के साथ निकलने लगे। दशहरे पर वे अपने पुराने नये हथियारों का शस्त्र-पूजन करने लगे। मीडिया इसे प्रचारित करता था। उन दिनों राजस्थानी कुर्ते-शेरवानी और लहंगा चूनरी के विज्ञापनों के बडे-बडे होर्डिगं शहर में जगह जगह सज जाते थे। साफ तौर पर सामंती संस्कृति या कहें नयी आभिजात्य संस्कृति, बाजार और मीडिया की नयी जुगलीबंदी स्थापित हो चुकी थी। सत्ता ने इसे अपनी तरह से मान्यता दी। मसलन, पिछले साल मुख्यमंत्री गहलोत का इसमें आने का कोई कार्यक्रम नहीं था। जब कपिल सिब्वल का आने का तय हुआ तो वे आनन फानन में उनके साथ पहुचे गये। आयोजको की सोची-समझी रणनीति है कि इसमें राजनेताओं को भी पर्याप्त जगह दी जाये। जहां सेलब्रटी हैं वहां पहुचने में राजनेता प्रायः संकोच नहीं करते। तो इसे हिट आई. पी. एल. कहा जा रहा है और उस अर्थ में तो यह है भी। इसे प्रायोजित करने वालों की कोई कमी नहीं है। 
साहित्य के लिहाज से देखें तो हम पाते हैं कि जिसे एंग्लो-इंडियन अंग्रेजी साहित्य कहते हैं उसके भारतीय भाषाओं के साथ कभी भी बंधुत्व वाले रिस्ते संभवतः थे ही नहीं। उनमें एक आरंभिक विजातीयपन है, वर्चस्व भाव है और अंग्रेजी मीडिया से मजबूत सम्बन्ध है। विगत दशकों में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ अंग्रेजी का बोलवाला भी बढा है। इसी के समानान्तर भारतीय अंग्रेजी में भी बेस्ट सेलर सामने आने लगे हैं। भूमंडलीकरण और इंटरनेट ने भारतीय उप महाद्वीप में अंग्रेजी का एक बडा पाठक वर्ग तैयार किया है जिसे जयपुर साहित्य उत्सव में हम धक्के खाते देख रहे हैं। ध्यान रहे कि इस साहित्य में सृजनात्मक साहित्य ही नहीं है, हर तरह का साहित्य इसमें शामिल हैं। बाॅडी फिटनेस पर लिखी सेलिब्रिटीज की किताबें भी उत्सव में रिलीज की गयी। फिक्षन को छोड दिया जाये तो साहित्य तो इस उत्सव में हाषिये पर ही था जो धूम-धडाके में किसी को महसूस ही नहीं हो रहा था। बल्कि ग्लैमर, बाजार और मीडिया मिलकर साहित्य के अनुकूलन की शक्ति अर्जित कर चुके हैं। 
अभी तक हमने इस उत्सव के उद्भव, उभार और मूल चरित्र की चर्चा की है। अब जरा देखें कि खुद हमारे साहित्य परिदृष्य पर इसके क्या असर रहे हैं। राजस्थान में सातवें-आठवें दशक में प्रगतिषील लेखक संघ का विशेष उभार सामने आया। राष्ट्रीय स्तर पर उस समय प्रगतिषील लेखक संघ में ज्ञानरंजन और इप्टा में भीष्म साहनी सक्रिय हुए थे। आपातकाल के बाद जनवादी लेखक संघ भी वजूद में आया और इसकी इकाई भी राजस्थान में स्थापित हुई। लेखकों की एक बडी जमात इन दोनों संगठनों के इर्द-गिर्द जमा थी। इनके बैनर तले गोष्ठियां संवाद आयोजित होते थे। ऐसे लेखकों की एक जमात अनने आप बन गयी जो इन दोनों ही संगठनों से बाहर थे। उन्हे प्रायः कलावादी कहा जाता है। जाहिर रूप से यह खेमेबंदी थी, इसके अपने वाद-विवाद और संवाद थे तथापि परिदृष्य में एक ऊष्मा और उर्वरता थी।
शताब्दी के आखिर में लेखकों के वैचारिक आग्रह ढीले पडने लगे। सभी रंगतों और शैलियों के लोग पास आने लगे। जयपुर का ही उदाहरण लें तों सभी रचनाकारों के बीच एक सामूहिकता और बन्धुत्व का ऐसा भाव स्थापित हो गया जो प्रायः सांस्कृतिक संकट की घडियों में बन जाया करता है। शहर में होने वाले आयोजनों में सभी लोग षिरकत करते। ऐसा नहीं था कि सबके बीच कोई व्यापक मतैक्य स्थापित हो गया था, मतभेद थे,लोगों ने अपनी शैली और विचारों की निजता को कायम रखा था लेकिन कटुता और संवादहीनता विलुप्त हो गयी थी। बाहर से आने वाले लेखक इस सामूहिकता को देखकर सुखद अहसास लेकर जाते थे। कमोवेष प्रदेष की स्थिति भी इससे बहुत भिन्न नहीं थें । 
इस माहौल में फर्क आया जयपुर साहित्य उत्सव के बाद। पहले उत्सव में चुपचाप से चार-पांच वरिष्ठ युवा लोगों को शामिल किया गया था। उसे लेकर एतराज और टीका-टिप्पणी होने लगी। आयोजकों ने अगली बार दूसरे चार-पांच लोग शामिल कर लिये। जो शामिल होते गये वे उत्सवधर्मी भाषा बोलते गये। ऐसे में एक और घटना हो गयी।
उत्सव में एक-दो लोग राजस्थानी के शामिल कर लिये गये थे। सत्र की समाप्ति के बावजूद एक राजस्थानी लेखक बोले जा रहे थे। अब तक दृष्य में नमिता गोखले आ चुकी थीं। उन्होने उन साहित्यकारों का लगभग डांट कर मंच से उतार दिया। यह मामला अखबारों में उछल गया। दैनिक भास्कर ने इस पर खास मुहिम चलायी। इसे राजस्थानी अस्मिता का मामला बना दिया गया। नमिता गोखले के राजस्थान आने पर पाबंदी लगाने और उसके साहित्य को जला डालने की बात होने लगी। ऐसे समय में हमीं कुछ लोगों ने उत्सव की संस्कृति और राजस्थानियों के अतिवाद को लेकर संयत चर्चा को आगे बढाया था। एकाध दिन बाद विक्रम सेठ शराब का गिलास लेकर सत्र में बैठ गये। अखबार ने फिर इसे मुद्दा बनाया। जब आयोजक उत्सव को आगे नहीं करने के निर्णय की ओर जाने वाले थे, तभी अखबार का आयोजकों से समझौता हो गया। अब दैनिक भास्कर भी आयोजकों में शामिल है और उत्सव का अतिरंजित प्रचार करता रहता है।
इस बार राजस्थानी के वही लेखक फिर उत्सव के मंच पर विराजमान थे। उन्हे देखकर कहीं लगता ही नहीं था कि अपने अपमान की बात को वे कहीं स्मृतियों में रखे हैं। वही क्या राजस्थान के साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों में भयानक प्रतिस्पर्धा है कि कैसे ही उत्सव में शामिल हो जायें। इसमें शामिल करने का कोई घोषित मापदण्ड या प्रक्रिया नहीं है। एक तरह से सब कुछ रहस्यमय है। जिन दो तीन आयोजकों के नाम प्रचारित है। उनमें कोई स्थानीय नहीं है और वे अंग्रेजी दां हैं। ऐसे में पता नहीं कैसे एप्रोच करके ये लोग सत्रों में शामिल होते हैं सब अपने स्तर पर प्रयासों में लगे रहते हैं और कोई नहीं चाहता कि दूसरों को उसके प्रयासों की जरा भी भनक लगे। एक बार ब्रोशर में नाम आने के बाद वह गर्व से प्रचार-प्रसार में लग जाता है। स्वाभाविक रूप से बाकी लोग ईष्र्या द्वेष से ग्रस्त हो जाते हैं। जैसाकि पूर्व में कहा गया, उत्सव में साहित्य का मतलब सब कुछ है तो अब वहां दूसरे अंग्रेजी दां लोग भी जगह पाते जा रहे हैं और लेखकों की जगह सिकुड रही है। इसकी परिणति यह है कि लेखक बिरादरी के स्वाभाविक बन्धुत्व के रिष्ते और संवाद की सहजता लगभग क्षरित हो चुकी है। 
इस बार उन्होने प्रवेश  की प्रक्रिया को आॅन लाइन कर दिया। वैसे तो पिछले दिनों करीबन सभी लेखक फेसबुक और दूसरी नेटवर्किंग साइटों पर सक्रिय हो चुके हैं। उत्सव में आॅन लाइन प्रवेश  ने बचे खुचों को भी आभासी संजाल की ओर खदेड दिया। दूसरे यह उत्सव पूरी तरह रूपंकर है दृष्य विधान पर इसमें बहुत जोर है क्योंकि पूरे सत्र की लाइव रिकार्डि़ंग की जाती है। मीडिया के कैमरे लगे रहते हैं। उत्सव के परिसर में कैमरे लगे हैं। तो सब अपने लुक के प्रति अतिरिक्त सचेतन हो गये हैं। केवल लेखक ही थे जिनकी रहन-सहन पहनने-ओढने की अपनी शैली थी और अधिकांश  इस मामले में लापरवाह थे। उनका अब सजधज कर आना हास्पास्पद सा लगता है। वहां दिन में ही बार चलता रहता है। बेचारे हिन्दी लेखक भी खुद को आधुनिक दिखाने के चक्कर में सेवन करते नजर आते हैं। 
इस बार के उत्सव का एक प्रकरण सलमान रुशदी के नाम है। रुशदी पहले भी आ चुके हैं, इस बार भी आने वाले थे। उन्हे लेकर पहला विरोध भाजपा समर्थित मुस्लिम संगठन की ओर से हुआ। इसके बाद कुछ और संगठनों ने भी उनके सुर में सुर मिला दिया। स्थानीय प्रषासन की कोषिष रही कि आयोजक खुद ही उनकी यात्रा को रद्द कर दें। आयोजक पसोपेष में रहे। इसी दौरान चार लेखकों-रूचिर जोषी, जीत थायिल, हरि कुंजरू और अमिताव कुमार ने रूशदी की प्रतिबंधित पुस्तक से अंषों का पाठ कर दिया। आयोजकों ने इन्हे उत्सव से चले जाने का निर्देष जारी कर दिया। आयोजक स्थानीय प्रषासन के सामने झुके हुए भी नहीं दिखना चाहते थे क्योंकि तब उनकी दुनिया के बौद्धिक और साहित्यिक तबके के सामने भद् होती। दूसरे वे चाहते भी नहीं थे कि रुशदी आयें और उत्सव का धंधा आगे के लिए बंद हो जाये। पहले वे लाइव वीडियो कान्फेस की बात करते रहे। आखिरी दिन उन्होने डिग्गी पैलेस के मालिक की प्रेस कांफेस करा दी जिन्होने मीडिया का कहा कि मेरी फैमिली यहां रहती है। यदि वीडियो कान्फें्रस के दौरान कोई उपद्रव होता है तो उनकी सुरक्षा को खतरा है इसलिए वे वीडियो कान्फ्रेस की अनुमति नहीं दे रहे हैं। 
सलमा प्रकरण से उत्सव को और अधिक कवरेज मिला। लेकिन सचाई यह है कि उत्सव के आयोजकों और लगभग सभी संभागियों को अभिव्यक्ति की आजादी अथवा एक पुस्तक की इयत्ता से कोई सरोकार नहीं था। जिन चार लोगों ने प्रतिबंधित पुस्तक से पाठ किया, उन्हे उत्सव से बाहर कर देना स्वयं इसका प्रमाण है। इससे उन्हे फायदा भी नहीं हुआ। इसे लेकर स्थानीय अदालत में वाद दर्ज करा दिया गया है जिसमें आयोजक भी आरोपी हैं। सलमान रुशदी को इससे कहीं ज्यादा प्रचार मिला अन्यथा वे आते-चले जाते तो कौन पूछता।
बहरहाल, उत्सव से यह सवाल उठ सकता था कि किसी पुस्तक को प्रतिबंधित करने के आखिर क्या मापदण्ड हो सकते हैं? दूसरे, क्या एक बार किसी पुस्तक पर लगा प्रतिबंध हमेशा  के लिए रहेगा? क्या इस पर समयान्तराल में पुनर्विचार नहीं होना चाहिए? तीसरे, आज के वैष्विक संजाल युग में क्या किसी ऐसे प्रतिबंध का कोई अर्थ रह गया है? अंत में यह कि प्रतिबंध के बाद भी सलमान रुशदी भारत आते रहे हैं फिर अब ही इस पर हाय तौबा क्यों? और सरकार अब क्यों उनको सुरक्षा देने की जिम्मेदारी से मुकर रही है।
उत्तर भारत में ही साहित्य सम्मेलनों और आयोजनों में ज्वलंत मुद्दों और सामाजिक प्रष्नों पर प्रस्ताव पारित करने की सुदीर्ध परंपरा रही है। आपातकाल के दिनों में हुए बांदा सम्मेलन में प्रलेसं की ओर से यह कोषिष हुई थी कि वहं आपातकाल के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया जाये। लेकिन अनेक लोगों ने इसका विरोध किया और इन लेखकों की एकजुटता ने ही आगे जाकर जनवादी लेखक संघ का रूप लिया। भारत भवन में भी उत्सव होते रहे हैं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद भी वहां एक विष्व कविता उत्सव हुआ जिसकी देश  भर में निंदा हुई और उसके खिलाफ लेखक और सांस्कृतिक संगठनों ने प्रस्ताव पारित किये। क्या जयपुर साहित्य उत्सव अभिव्यक्ति की आजादी पर एक प्रस्ताव पारित नहीं कर सकता था? वस्तुतः ऐसी कोई चिंता अथवा सरोकार इस आयोजन का मकसद ही नहीं है बल्कि इसके विपरीत मकसद है जो प्रच्छन्न और खतरनाक है।
हम यह जानते हैं कि हमारी राज्य सत्ता आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेन्ट की तरह काम कर रही है। वे जमीनों का लगभग जबरन अधिब्रहण कर उन्हे सौंपते हैं। उन्हें लाभ पहुचाने के लिए सत्ता में बैठे लोग कायदे कानूनों को ताक पर रख देते हैं। मीडिया भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर और उनके हितों का पैराकार हो गया है। इसके लिए वे विकास और भूमण्ड लीकरण की नयी शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं। हम पाते हैं कि यह हिन्दी का समकालीन साहित्य ही है जो विस्थापन के विरोध, बहुराष्ट्रीय पूंजी के वर्चस्व का प्रतिरोध और बाजार केन्द्रित सभ्यता से उत्पन्न मूल्य हस  का सृजनात्मक प्रतिपक्ष उपस्थित कर रहा है। हिन्दी की सैंकडों लघु पत्रिकाएं लगभग एक आन्दोलन की तरह जमीनी लडाई लड रही मेहनतकश  जनता के पक्ष में एक बौद्धिक और सांस्कृतिक अभियान चला रही है। केन्द्रीय साहित्य अकादमी के लिए एक बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा टैगोर पुरस्कार प्रायोजित करना और अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जयपुर साहित्य उत्सव को वित्तीय मदद करना इस प्रतिरोध से साहित्यकारों संस्कृतिकर्मियों का भडकाने का शडयंत्र है।
कहा जा रहा है कि जयपुर साहित्य उत्सव में हजारों लोगों की षिरकत प्रमाण है कि साहित्य और संस्कृति के प्रति लोगों में भारी अनुरक्ति उत्पन्न हो गयी है। इस उत्सव के अगले सप्ताह ही जयपुर फिल्म उत्सव आयोजित किया गया। इसे आयोजित करने वाला स्थानीय युवाओं का एक समूह था जो रंगमंच और फिल्मों में सक्रिय रहा है। यह उत्सव भी तीसरी बार हो रहा था। इसमें राजस्थान के कई लोगों, विशेषकर युवाओं की बनायी लघु और फीचर फिल्में थीं। तथापि इन फिल्मों के प्रदर्षन दर्षकों के लिए तरसते रहे। यदि सांस्कृतिक जागृति हुई है तो वह यहां भी नजर आनी चाहिए थी। इसके आयोजक भी प्रयोजकों के लिए संघर्ष करते रहे। जबकि फिल्म तो साहित्य से कहीं ज्यादा लोकप्रिय माध्यम है। तो मित्रों, जयपुर में साहित्य के उत्सव रूपी जन्नत की हकीकत कुछ और ही है।                              

      समान्तर- सेन्टर फोर कल्चरल एक्षन एण्ड रिसर्च 
      71/17, श्योपुर रोड़, प्रताप नगर, जयपुर-302033
      फोन न. 0141-2790899   
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मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

मीमांसा संस्कृति पर केन्द्रित बुलेटिन



वर्ष: दूसरा                  अंक: तीसरा                नवम्बर-दिसम्बर, 2010




किसी चित्रकार की कल्पना उसकी कला का प्राणतत्व होती है। वह जब संवेदनाओं के नैरन्तर्य से अनुभूत होता हुआ सृजन के चरम तक पहुँचता है तब क्रौचे के ‘कला कला के लिए’ सिद्धान्त के आसपास होता है। वे क्षण उसे कला की उस अनन्त रूपात्मक दुनिया में ले जाते हैं जहाँ उच्छृंखल सौन्दर्य परिभाषाओं के दायरों से बाहर जटिल-बिम्बों की प्रतिध्वनियों के साथ समवेत स्वर में अभिव्यंजित होता है। युवा चित्राकार वीनू बंसल के चित्रों का संसार भी ऐसी ही सृजन-प्रक्रिया से निर्मित है। एम.ए. के दौरान बीकानेर विश्वविद्यालय से ‘‘परम्परागत और आधुनिक चित्रकला में कृपाल सिंह शेखावत का योगदानः एक कलात्मक अध्ययन’’ विषय पर लघुशोध और राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में ड्राइंग एण्ड पेन्टिंग विभाग की अध्यक्ष (अब सेवानिवृत) रीता प्रताप अग्रवाल के निर्देशन में ‘‘भारतीय पत्र-पत्रिकाओं के प्रमुख व्यंग्य चित्रकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का समीक्षात्मक अध्ययन’’ विषय पर हाल ही में डॉक्टरेट करने वाली युवा चित्रकार वीनू बंसल ने राजस्थान ललित कला अकादमी, जयपुर द्वारा आयोजित छात्र कला प्रदर्शनी और कला मेले में अपनी कला कृतियों का प्रदर्शन किया। इन्होंने श्रीगंगानगर, जयपुर और धनबाद (बिहार) में चित्रों/कविता पोस्टर की एकल प्रदर्शनी आयोजित की। एम.ए. ड्राइंग एण्ड पेन्टिंग में बीकानेर विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान हासिल करने वाली इस चित्राकार ने जिला प्रशासन द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया। वीनू बंसल निरन्तर अपने कला-सृजन में रत हैं। इस अंक के आवरण पृष्ठों पर इनकी कृतियां प्रस्तुत हैं।

सम्पर्कः 15 नागपाल कॉलोनी, गली नं. 1, श्रीगंगानगर -335001 (राजस्थान)
मो.: 09314798099, ईमेल: poorvakathan@gmail.com




कविताएं - सुभाष सिंगाठिया

सुभाष सिंगाठिया ने शिक्षा में ‘हिन्दी साहित्यिक पत्राकारिता और स्त्री विमर्श’ पर लघु शोघ व ‘हिन्दी स्त्री-कविता में स्त्री-स्वरः एक विमर्श’ पर स्वतंत्र शोध किया। इनकी रचनाओं के दिल्ली दूरदर्शन, जयपुर दूरदर्शन एवं आकाशवाणी पर प्रसारण हुये हैं। सुभाष ने वर्षो ‘प्रशान्त ज्योति’ के साहित्यिक परिशिष्ट का संपादन किया। अभी तक साहित्यिक पाक्षिक ‘पूर्वकथन’ के संपादन में संलग्न हैं।
सम्पर्क: 15 नागपाल कॉलोनी, गली नं. 1, श्रीगंगानगर- 335001
मो.: 9829099479

 प्रसि( आलोचक स्व. शुकदेव सिंह ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कविता मूलतः और अंततः भाषा होती है। कवि सुभाष सिंगाठिया की कविता पढ़ते हुए यह बात बरबस याद आ गयी। हांलाकि शुकदेव सिंह ने अपनी बात को खोलते हुए इसी साक्षात्कार में कविता में विन्यस्त संवेदना, विचार, सौंदर्यशास्त्र आदि की भी बात की थी किंतु उनकी कही ये पंक्ति आज भी मेरे जेहन में कांेधती हैं। सोचता हूं कविता को अंततः और मूलतः भाषा मानना कविता की आलोचकीय दृष्टि के चलते कहां तक न्याय संगत है?



सुभाष सिंगाठिया की कविताओं में भाषा अपनी व्यावहारिकता में अंशिक सघन, गूढ़ और संस्कारित नजर आती है। वह कविता के मार्ग में, कविता में विन्यस्त विचार तक पहुंचने में कदम-कदम पर बाधाएं खड़ी करती है तो पाठकों का झुंझला उठना, खीज जाना स्वाभाविक प्रतीत होता है लेकिन वे इस प्रक्रिया में अपनी भाषा की सामर्थ्य और अर्थसंपदा से भी परिचित होते हैं। मगर इस मानसिक श्रम में कविता कहीं बिला जाती है। पाठक कविता तक कविता के लिए पहुंचता है ना कि भाषा के लिए, इसके लिए गद्य या शब्द कोष बेहतर काम कर सकते हैं।


सुभाष सिंगाठिया की कविताओं में कवि-सामर्थ्य होेने के बावजूद जो समस्या मौजूद है वो उनकी भाषा, उनकी कविता की नमी सोख लेती है। तो उनकी कविता में शब्द तो ताकतवर नजर आते हैं लेकिन विचार और संवेदना कमजोर लेकिन इसके बावजूद वे भाषा को कविता बनाने और मानने की कला पर दृढ़ हैं तो उनकी कविताएं भी कविता की दुनियां में अपनी पहचान बनाने को दृढ़ नजर आती हैं। लड़की और प्रेम उनकी कविता में, समकालीन कविता में स्थायी भाव की तरह ही मौजूद है। मगर यह भी सच है कि उनकी कविता इसी रास्ते से नये और अनदेखे की तलाश में जुटी है। उसकी खोज में वह बेचैनी है। उसके भीतर तड़प मौजूद है, इसी प्रक्रिया में वह कविता हो लेने की प्रक्रिया में भी लीन है, ऐसी कविता जो वर्तमान हिन्दी समकालीन कविता का चेहरा बनने में कामयाब होती है।
कविता, भाषा संवेदना व विचार सौंर्दर्य का यौगिक है तो सुभाष सिंगाठिया की कविता का यौगिक अपना संतुलन साध रहा है।
                                                                                                                                     - पवन करण


स्त्री-सत्ता की अभिव्यक्ति

(मेरी अकूत-सम्पदा दोनों सुन्दर बेटियों के लिए)

सम्भावनाओं की

अकाल मृत्यु ही तो है

बिम्बों का मर जाना

और बिम्बों का प्रतिबिम्बन

सम्भावनाओं का विस्तार

ऐसा है तो फिर

प्रतिबिम्बन की इस क्रिया को

स्त्रीलिंगी-संज्ञा मान लेने मेंध्कहाँ हर्ज है

जब इतना मान लेने भर से ही

तैरने लगते हैं इस पौरुषपूर्ण-समय में

स्त्री-सत्ता की अभिव्यक्ति के प्रतिबिम्ब

जैसे मेरी बेटियों की उन्मुक्त हँसी



प्रतिबिम्ब का विखण्डन
(प्रख्यात चित्राकार सैयद हैदर रजा के चित्र को देखते हुए)

किसी प्रतिबिम्ब से

अचानक विखण्डित हुए

प्रतिबिम्बों की असंख्य उपस्थिति से

भौचक हैं प्रतिबिम्बिय-संजाल

वह स्तब्ध-सा करता है पड़ताल

अपने अन्तर्सम्बन्धों की

अपने प्रतिमानों की

अपनी अन्तर्ध्वनियों की

और दूर .... क्षितिज के पार तक फैले

उस महासमुद्रीय-कैनवस की

जिस पर पलक झपकते ही उग आया है

प्रतिबिम्बों का बीहड़


कैसा मानचित्र है यह प्रेम का

अमूर्त-प्रतिबिम्बों की अनुगूँज में

दबी-घुटी-सिसकियों का जंगल

ओह ! चिथड़े-चिथड़े हुए रेशम सा

कैसा मानचित्रा है यह प्रेम का !

हालांकि ठीक से याद नहीं आ रहा

मगर इतना तो याद है ही कि

ऐसा तो नहीं लिखा था

प्रेम के उस अलिखित-मैनिफेस्टो में

..... और फिर सोचा भी किसने था

कि संवेदनाओं का गर्भपात यूँ होगा

खैर मूल प्रश्न यह नहीं है

पेण्डुलम-से झूलते प्रेम-दर्शन के सौन्दर्य-शास्त्रा की परिणति का

रास्ता लम्बा है अभी

इस आदि और अन्त के बीच फँसे

प्रेम के द्वन्द्वात्मक निर्णय

पसरते हैं किस शक्ल में

यह परिभाषित होना भी बाकी है

ठीक उस वर्तमान की तरह

जो अतीत की नींव पर

भविष्य की निर्मित में?

खोजता रहता है अपना अस्तित्व

ब्रह्यमाण्ड की परिक्रमा करता हुआ


प्रेम और उदात्त्ता

प्रेम उदात्त होता है

या उदात्तता में प्रेम

ठीक से कहा नहीं जा सकता

मगर दोनों के आसपास

रहता है कुछ ऐसा ही

परिभाषाओं के दायरों से बाहर

अपरिभाषित-सा

वह करता है विचरण

काव्य-शास्त्रियों के

गुणा-भाग से कहीं दूर

बहुत दूर .............

रूप-सौन्दर्य/भाव-सौन्दर्य

और कर्म-सौन्दर्य के

अतिवादी मानचित्रा का

अतिक्रमण करता हुआ

उदात्तता के उस पार तक

परिभाषाएँ और व्याकरण

कहाँ रहने देते हैं

प्रेम और उदात्तता को

उतने स्वच्छन्द/उतने उच्छृंखल

जितने होते हैं वे

किसी टूटते तारे-से



अपनी कविता की चौहद्दी में लड़की
(प्रभा खेतान व मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए)

हे पुरुष परमेश्वर!

(परमेश्वरी विशेषण तुम्हारी सत्ता का ‘अव्यय’ जो ठहरा)

कविता लिखती किसी लड़की को

कैसे जानोगे तुम

उसकी अपनी कविता के यथार्थवादी-कल्पनालोक में

कुछ भी करते हुए


कि अपनी प्रेमिल-कल्पनाओं की

लम्बी-भावुक उड़ानों में

कहाँ-कहाँ गई/क्या-क्या किया

सोयी-जागी किसके साथ

और तुम्हारी वर्जनाओं वाली

लक्ष्मण रेखा-सी देहरी लाँघती हुई

कब-कब उतरी ‘उस’ प्रेम में

जिससे खतरे में पड़ता आया है तुम्हारा ‘शुचिता आग्रह’


कि तुम्हारे लिए ‘उत्तम-रति’ का

‘सामान’ जुटाने वाली यह भोग्या

(तुम्हारी नज़र में)

अपने ‘स्त्री-धर्म’ की गठरी बाँध

उसे रखकर तुम्हारे घर के

किसी ऊँचे बने आले में

कब हो जाए उतनी स्वच्छन्द

(जितने तुम होते आए हो आज तक)

जिससे दरकने लगता है तुम्हारा वर्चस्व



कि तुम्हारी ‘सत्ता’ को सरेआम धत्ता बताते हुए

कब बोलने लग जाए उसकी खामोशी धाराप्रवाह

और बना ले अपनी कविता से एक ऐसी चौहद्दी

जिसमें हीगेल, नीत्शे और शंकराचार्य की

मान्यताओं वाली स्त्री के ठीक विपरीत

ऐतिहासिक और विकसित स्त्री

करती हो निर्भय निवास।