सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कालबेलिया-नागरिकता का सवाल

नवीन नारायण ने जे.एन.यू. नयी दिल्ली से उच्च शिक्षा ली है। वे दलित मुद्दों पर लिखते रहे हैं। फिलहाल एक्शन एड इंडिया जयपुर में कार्यरत है।
मोबाइल: 9413340889
ई-मेल: navin.narayan@actionaid.org
 
 
राजस्थान का कालबेलिया समुदाय पारंपरिक रुप से दो कामों से जुडा रहा है- सांप दिखाना और पत्थर घिसाई। इस पेशे की प्रकृति के हिसाब से ये लोग गांव-गांव घूमते रहते, ग्रामीणों का मनोरंजन करते। इसके बदले, अपनी आजीविका की दो मुख्य आवश्यकताओं के लिए गांव वाले इन्हें रोटी (जो प्रायः बासी या बची हुई होती) और कपडे (जो उतरन होते) दे देते थे। इस तरह, पूरा परिवार समूहों में घुम्मकड जीवन बिताता रहा और कहीं एक जगह ठिकाना बनाकर नहीं रहा।

कालान्तर में मनोरंजन के सामाजिक रुपों में परिवर्तन आया। मनोरंजन के पारंपरिक रुपों की जगह नये टेलिविजन और सिनेमा जैसे सशक्त माध्यमों ने ले ली। इन दिनों समाज में पारंपरिक कलाओं का दर्शक वर्ग कहीं खो गया। इस परिवर्तन का कालबेलिया समुदाय पर दो तरह से असर हुआ। एक तरफ वे अपना पारंपरिक पेशा छोडने पर विवश हुए और दूसरी ओर उन्हे भीख मांगने के लिए मजबूर होना पडा। इसके नतीजे में वे एक जगह स्थायी रुप से बसने के लिए कठिन प्रयास करने लगे और साथ ही आजीविका के लिए भी स्थायी काम ढूंढ़ने लगे। किन्तु चीजें भौतिक और सामाजिक रुप से उनके इन प्रयासों के पक्ष में नहीं थीं। एक तरफ यह समुदाय भयानक गरीबी से जूझ रहा है तो दूसरी ओर इन्हे समाज से अस्पृश्यता और जबर्दस्त भेदभाव का सामना करना पड रहा है। इस स्थिति ने इन्हें घोर निःशक्त बना दिया है और ये लोग किसी भी प्रकार के सामुदायिक संसाधनों से वंचित हैं। शीर्ष स्तर पर ये लोग राज्य की ओर से उपेक्षित हैं।

समाज के भेदपरक दृष्टिकोण और राज्य की उपेक्षा ने मुख्यधारा में आने के कालबेलिया समुदाय के संघर्ष में बडी बाधा उत्पन्न की है। विकास के सभी संकेतकों, जैसे- शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, आवास, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, आजीविका- में इस समुदाय की अत्यंत धुंधली-सी उपस्थिति हैं।

एक अध्ययन से पता चला है कि यह समुदाय नागरिकता के बुनियादी अधिकारों से ही वंचित है जबकि इस समुदाय की अनेक पीढ़ियां सदियों से इसी देश में रहती आयी हैं।

किसी भी ग्रामीण (जो अन्य जाति का है) के लिए इसका कारण बहुत साफ है। कालबेलिया इधर-उधर घूमते रहे हैं, वे एक जगह पर कभी टिक कर नहीं रहे हैं। चूंकि इन्होंने पारंपरिक रुप से जमीन के किसी छोटे से टुकडे पर भी अपना स्वामित्व कायम नहीं किया, इसलिए वे अपने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित हैं। इन अधिकारों को प्रदान करने का आधार किसी का एक जगह स्थायी रुप से बास करना है।

इधर के वर्षों में इनके रहने के तरीके में अंतर आया है। इन्होंने गांवों के बाहर छोटे-छोटे स्थायी डेरे बनाकर रहना शुरु किया है। सरकार द्वारा इनकी बसाहटों को कानूनी दर्जा नहीं दिया गया है क्योंकि सरकारी अधिकारियों के दिमाग में यह धारणा बैठी हुई है कि कालबेलिया लोग कहीं स्थायी रुप से नहीं रहते।

ये एक विडम्बना है कि एक ही जैसे एक समुदाय का नामकरण ;दवउमदबसंजनतमद्ध अलग-अलग किया हुआ है। इन नामों के अनुसार राज्य द्वारा इनकी श्रेणियों का निर्धारण किया गया है। कालबेलिया और सपेरा अनुसूचित जाति (SC) हैं जबकि जोगी अन्य पिछडा वर्ग (OBC) में शामिल हैं। जबकि कनिपा नाथ समुदाय को किसी श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। समुदायों के नामों की भिन्नता ने सरकारी तंत्रा के लिए इन्हें और उपेक्षित कर दिया है। यह तथ्य जनगणना के आंकडों से भी पुष्ट होता है। 2001 की जनगणना के अनुसार कालबेलिया समुदाय की कुल जनसंख्या 75,118 है। इनमें 39,534 पुरुष और 35,584 स्त्रियां हैं। समुदाय की 9,620 आबादी कस्बों-शहरों के इर्द-गिर्द बसी है। कालबेलिया समुदाय की कुल आबादी में से 26.95 प्रतिशत 0 से 6 वर्ष आयु समूह का है। समुदाय में केवल 12.51 प्रतिशत साक्षरता है। कालबेलियाओं की 64.95 प्रतिशत आबादी गैर कामगार है। जबकि समुदाय से बातचीत से लगता है कि इनकी कुल आबादी एक लाख से भी ज्यादा है। कालबेलिया समुदाय मुख्यतः राजस्थान के पश्चिमी (बाडमेर, जैसलमेर और जोधपुर) तथा दक्षिणी (भीलवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर) हिस्सों में छितराये हुए हैं।

कुल मिलाकर, इन समुदायों की जो स्थिति उभरती है उसके अनुसार इनके पास स्थायी रुप से रहने के लिए जमीन का अपना एक टुकडा भी नहीं है। वे गांव के बाहर सामान्यतः खुले मंे बसे हुए हैं जहां किसी भी तरह की बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है। यहां भी इनका ठिकाना गांव के प्रभावशाली लोगों के रहमोकरम पर निर्भर है।

इनके पास अपने निवास स्थान का साबित करने का कोई प्रमाण नहीं है। यहां तक कि राशन कार्ड तक नहीं है। इसके बिना सरकारी योजनाओं; जैसे- सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनबाडी, मिड-डे मील अथवा किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा या पेंशन आदि का लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा है। इस तरह से ये बुनियादी नागरिकों हकों और अधिकारों से वंचित हैं। मतदाता सूची में दर्ज नहीं होने के कारण ये मतदान और दूसरे राजनीतिक अधिकारों के दायरे से बाहर हैं। आर्थिक व सामाजिक अधिकार भी इन्हें नहीं मिल पाते हैं। उदाहरण के लिए महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना (नरेगा) में इनके जॉब कार्ड ही नहीं बने। यहां तक कि उन्हें ऐसी किसी योजना की जानकारी नहीं है। जहां नरेगा का काम चल रहा है, वहां भी पंचायतों ने इन्हें उससे बाहर ही रखा है।

इन समुदायों में आज की पीढ़ी के बच्चे भी स्कूल नहीं जा रहे हैं। स्कूल इनकी बसाहटों से काफी दूर हैं। इनकी बस्तियों में बिजली-पानी का कोई इंतजाम नहीं है। शायद ही किसी कालबेलिया परिवार ने किसी सरकारी योजना का लाभ प्राप्त किया हो। इनकी औरतें और बच्चे अभी भी गांव में भीख मांगने जाते हैं। कई बार वे बेगार करने के लिए भी बाध्य किये जाते हैं। इन समुदायों से भेदभाव और अश्पृश्यता बरती जाती है। समुदाय सांप दिखाने जैसा अपना पारंपरिक पेशा छोड चुका है लेकिन मजदूरी जैसे किसी नये पेशे को अपनाने में भारी मुश्किलों से जूझ रहा है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

कविताएँ : मनमोहन भारती

कविताएँ हम तो उसे मनमोहन भारती के नाम से ही जानते हैं। जिन दिनों मैं मुम्बई महानगर में ( अखबार में भी ) था, मनमोहन भारती और केसर सिंह बिष्ट दो युवा और साहसी रिपोर्टर थे। उन्होंने ही रातों की यात्राओं में मेरी बम्बई से कुछ पहचान करायी। बाद में धीर गंभीर प्रणव प्रियदर्शी इस टीम में आये। वापस आने पर भी मुझे महानगर के हालचाल मिलते रहे। इनमें मनमोहन किसी किस्से कहानियों का उदात्त चरित्र लगता है। जैसे लंबे संकोच के बाद प्रणव ने अपनी कहानियों के बारे में बताया। वे मीमांसा में और फिर दूसरी जगह आयीं और सराही गयीं। मनमोहन तो जितने साहसी हैं, उतने ही विनम्र और शर्मीले। उसने भी अपने भीतर एक कवि को जज्ब किया हुआ था। हमें खुशी है कि वह भी मीमांसा के जरिए बाहर आ रहा है। कविता कुछ लंबा रियाज चाहती है। आप इन्हें एक सच्चे, जज्बाती किन्तु निर्भय व्यक्ति के अंतस की शक्ति के रूप में भी पढ सकते हैं।               - राजाराम भादू 1. अंधेरों से हिस्से करने लगा हूं मैं जिंदगी तुम ही से डरने लगा हूं मैं अंधेरों में ही उजाले नजर आने लगे हैं अंधेरों से दीए जलाने लगा हूं मैं ...

उत्तर- आधुनिकता के अन्तर्विरोध

उत्तर- आधुनिकता को लेकर भारत में और विशेष रूप से हिन्दी- क्षेत्र में बहुत भ्रम और आकर्षण है। सामान्यतः हमारे पास इसको लेकर बहुत आधी- अधूरी सूचनाएं हैं। ज्यादातर तो उत्तर- आधुनिकता की चर्चा बतौर फैशन की जाती है, उसे लेकर कोई गंभीर चिंतन और चिंता हमारे यहां लगभग अनुपस्थित है। इस संदर्भ में हम इस खतरनाक भ्रम पर कुछ विचार करना चाहेंगे। वास्तव में, उत्तर- आधुनिकता कोई एक विशिष्ट चिंतन- सरणि या विचारणा नहीं है, यह उत्तर- आधुनिक पाश्चात्य समाजों की विभिन्न चिंतन- सरणियों के एक समग्र दौर का नाम है। यह समय- विभाजन को, उसमें आए समस्त परिवर्तनकारी कारकों के परिप्रेक्ष्य को ठीक से समझने के लिए दी गयी एक संज्ञा है। पिछले दशकों में यूरोप में चिंतन, संस्कृति और सृजनात्मकता के क्षेत्र में ढेर सारी प्रवृत्तियाँ उभरीं। इन प्रवृत्तियों को उत्तर आधुनिकता की संज्ञा से अभिहित किया गया। उत्तर- आधुनिकता यदि एक विशिष्ट जीवन- दृष्टि है तो इस अर्थ में कि इसमें उत्तर- औद्योगिक दौर की उन्नत सभ्यताओं की प्रमुख लाक्षणिकताएं- उच्च तकनीक, वैश्विक बाजार, नव- उपनिवेशवाद और आर्थिक उदारीकरण तथा विश्व स्तर पर संस्कृतियों क...

कुकुछीना स्मृतियां - राजाराम भादू

प्रो. लालबहादुर वर्मा का असमय जाना बहुतों की तरह मेरे लिए भी वैयक्तिक क्षति है क्योंकि मेरे लिए भी वे मेन्टर व गाइड की तरह रहे, हालांकि मैं उनसे उतना संपर्क- संवाद में नहीं था। उनके साथ मेरी कुकुछीना की स्मृतियाँ अहम रही हैं, जहाँ मैं ने उन्हें कई रंगतों में देखा। वहाँ वे हरेक से व्यक्तिगत आत्मीय बातचीत कर रहे थे। सबसे हंसी- मजाक करते बोल- बतिया रहे थे तो कोरस में गा रहे थे और मधुर धुनों पर समूह- नृत्य में भी भागीदारी कर रहे थे। वे जितनी चिन्ता से प्रबंधन की छोटी- छोटी जिम्मेदारियां संभाल रहे थे तो उतनी ही गंभीरता से विभिन्न सत्रों का संयोजन देख रहे थे। उनके उद्बोधन तो सदा अनुप्राणित करने वाले होते ही थे। उत्तराखण्ड की दूनागिरि पर्वतमाला में यह सुरम्य स्थान वर्मा जी ने ही खोजा था। कभी यूं ही भ्रमण करते वे इधर आ निकले थे और यह जगह उन्हें इतनी भायी कि अगले वर्ष से यहां मित्रों का एक समागम करने का तय किया जो तीन बार आयोजित किया गया। इसे मूर्त रूप देने में कुकुछीना के नेत्र वल्लभ जोशी का विशेष योगदान रहा। कुकुछीना को दो तरफ से घेरे दूनागिरि पर्वत के एक सिरे पर महावतार बाबाजी की गुफा है जिस...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान-1

रंगमंच  समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -1                                         राघवेन्द्र रावत  समकालीन हिंदी रंगमंच के बारे में बात बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से भी की जा सकती थी लेकिन मुझे लगता है कि उससे पूर्व के भारतीय रंगमंच के परिवर्तन की प्रक्रिया पर दृष्टिपात कर लेना ठीक होगा | उसी तरह राजस्थान के समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करने से पहले भारतीय हिंदी रंगमंच पर चर्चा करना जरूरी है, और उससे भी पहले यह जानना भी आवश्यक है कि वस्तुतः रंगमंच क्या है ?और रंगमंच के बाद हिंदी रंगमंच और उसके बाद समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करना एक उचित क्रम होगा भले ही यह मेरे अध्ययन की गरज ही लगे | राजस्थान के रंगमंच पर बात करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इस पर हिंदी साहित्य की तरह चर्चा नहीं हुई चाहे वह आलोचना की दृष्टि से देखें या इसके इतिहास की नज़र से देखें | दो वर्ष पहले ‘जयरंगम’ नाट्य समारोह के एक सेशन में बोलते हुए वरिष्ठ रंग एवं फिल्म समीक्षक अजित राय ने कहा था-“ पता नहीं कौन सा नाटक...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

विजयदशमी - रेखा चटर्जी

कहानी नयी सभ्यता द्वारा प्रदत्त संघातिक बीमारियों और उनके महंगे उपचार अल्प- आय वर्ग के परिवारों को तबाही की ओर धकेल रहे हैं। इसके विरुद्ध भी महिलाएं ही असीम धैर्य और अदम्य जिजीविषा से लड रही हैं। रेखा चटर्जी की कहानी में यह यथार्थ मार्मिकता में उभरता है, साथ ही बहनापा ( सिस्टरहुड ) भी  रूप  एक शक्ति के   रूप में उद्घाटित होता है। मीमांसा में स्वागत है रेखा ! दुर्गा माँ के बोधोन के साथ ही आज से दुर्गा पूजा शुरू हो गयी थी। हर बंगाली परिवार के घर में उल्लास का माहौल था, लेकिन भाव्या के लिए यह दिन पिछले कई दिनों की तरह भारी था। सौरभ की किडनी की बीमारी ने उसके परिवार के उत्साह और उल्लास को जैसे नजर लगा दी हो। कब सौरभ की दोनों किडनी खराब हो गयीं पता ही नहीं चला। सौरभ में तो कोई ऐब भी नहीं था। उसने शराब, गुटखा या सिगरेट के कभी हाथ भी नहीं लगाया, फिर ऐसा कैसे हुआ। लेकिन हकीकत यही थी कि सौरभ की दोनों किडनी डैमेज हो चुकी थीं और आज वो अस्पताल में जिन्दगी और मौत से संघर्ष करते हुए डायलिसिस के भरोसे एक नई जिन्दगी की पाने की उम्मीद में जी रहा था। ऐसे में भी भाव्या अस्पताल में भर्ती पति...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...