सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लेखक जी तुम क्या लिखते हो

संस्मरण 
हिंदी में अपने तरह के अनोखे लेखक कृष्ण कल्पित का जन्मदिन है । मीमांसा के लिए लेखिका सोनू चौधरी उन्हें याद कर रही हैं , अपनी कैशौर्य स्मृति के साथ । एक युवा लेखक जब अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी के उस लेखक को याद करता है , जिसने उसका अनुराग आरंभिक अवस्था में साहित्य से स्थापित किया हो , तब दरअसल उस लेखक के साथ-साथ अतीत के टुकड़े से लिपटा समय और समाज भी वापस से जीवंत हो उठता है ।

    लेखक जी तुम क्या लिखते हो 

                                          सोनू चौधरी
 
हर बरस लिली का फूल अपना अलिखित निर्णय सुना देता है, अप्रेल में ही आऊंगा।
बारिश के बाद गीली मिट्टी पर तीखी धूप भी अपना कच्चा मन रख देती है। मानुष की रचनात्मकता भी अपने निश्चित समय पर प्रस्फुटित होती है । कला का हर रूप साधना के जल से सिंचित होता है। संगीत की ढेर सारी लोकप्रिय सिम्फनी सुनने के बाद नव्य गढ़ने का विचार आता है । नये चित्रकार की प्रेरणा स्त्रोत प्रकृति के साथ ही पूर्ववर्ती कलाकारों के यादगार चित्र होते हैं और कलम पकड़ने से पहले किताब थामने वाले हाथ ही सिरजते हैं अप्रतिम रचना ।

मेरी लेखन यात्रा का यही आधार रहा ,जो अब तक ज़ारी है । ये मन प्रेमचंद,शरतचन्द्र,महाश्वेता देवी ,महादेवी ,मैथलीशरण गुप्त ,दिनकर ,कबीर,शिवानी ,कृष्णा सोबती ,घनानंद ,धूमिल ,पाश ,श्रीकांत वर्मा ,रघुवीर सहाय ,त्रिलोचन ,असद जैदी ,अज्ञेय ,मुक्तिबोध,परसाई,मंटो ,विनोबा भावे,रवींद्रनाथ टैगोर,कुसुमाग्रज,नागार्जुन ,रांगेय राघव,कन्हैयालाल सेठिया,हजारी प्रसाद दिवेदी,शैलेन्द्र मटियानी, रामचंद्र शुक्ल ,चेखव ,ब्रेख्त ,पाब्लो ,काफ्का और भी न जाने कितने महत्वपूर्ण नामों की सारी रचनाओं को खोज-खोज कर जज्ब करना चाहता है ।जैसे प्यासा जल की खोज में जंगल -पर्वत-घाटी पार करता जाता है। ये मन आज अपने सामने दिख रहे दिग्गजों को भी पढ़ना चाहता है । ये यात्रा ज़ारी है। कहा भी गया है न कि मण भर अच्छा साहित्य पढ़ना कण भर लिखने के लिए जरूरी है । शायद तभी पुस्तकालय मेरे लिए किसी मन्दिर से कम नहीं रहे।
आईये शुरू से बताती हूँ कि साहित्यिक नींव की मिट्टी कहाँ से मिली .... 
  
11 बरस की अबोध उम्र अल्हड़पन की बलैयां लेने की उम्र होती है !!
सब आपके कद और चोटी की लम्बाई से आपको बड़ा मान रहे होते हैं पर यकीनन आप उतने बड़े भी नही होते ! 
रैक के सबसे ऊपर पड़ी किताबों और पत्रिकाओं को लेने की जुगत में दो बार स्टूल से गिर चुके होते हो और अगले दिन थोड़ा लंगड़ा कर चलने के बावजूद किसी की पुचकार नहीं मिलती और ध्यान दिलाने पर याद दिलाया जाता है कि ध्यान से हर काम करो क्योंकि अब आप उतने छोटे भी नहीं रहे।
तीसरी बार स्टूल पर चढ़ते ही पीछे से बड़ा भाई आकर धौल जमाते ही पूछता है क्या चाहिए ? आप संतुलन सम्भालते हुए अपने से दस साल बड़े भाई के सामने याचक दृष्टि से बोलते हो 'धर्मयुग '

भाई हँसते हुए आपको धर्मयुग पकड़ाते हुए कहता है नीचे मेज पर नंदन, ट्विंकल पढ़ ।
बड़ों की मैगजीन क्यों पढ़ रही है ? 
अच्छा जी, जब मचलो किसी नन्हीं जिद पर तो मैं बड़ी और धर्मयुग पढना हो तो छोटी ! ,पर ये बड़े छोटे भाई- बहन किसी देवदूत से कम नहीं होते  ,ऐन मौके पर श्वेत-श्याम जिन्दगी को रंगबिरंगी कर देते हैं।
मैं नीचे फर्श पर अपनी फ्राक फैला कर बैठी हूँ और मेरी छोटी सी गोद में बड़ी सी धर्मयुग हैं .धर्मयुग ही क्यों कादम्बिनी और मनोरमा भी अपने बड़े आकार के साथ उस दशक में लोकप्रिय थी । 
यह 1980 का युग था ये धर्म युग था ऐसा नही कह सकती क्योंकि 1980 कई उलट पुलट घटनाओं का गवाह था ।
मैं अखबार पढ़ती थी और किशोरवय की विद्रोही उम्र के करीब यह पहेली बूझती थी कि लड़ाई प्यार से ज्यादा जरूरी है और प्यार पाने के लिए भी ,माँ की गोद की उम्र नही थी पर लाड़ लड़ाने की तो थी ।अपने से 5 साल की छोटी बहन (जिसे दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती हूँ )को माँ और स्नेहिल बड़ी बहन के पास देखते ही लड़ने दौड़ पड़ती.पर जल्द ही उसकी प्यारी शरारतों में खो जाती ।
अख़बारों में ही नहीं धर्मयुग में खबरों के विश्लेषण आते थे पर अल्हड़पन में कुछ हेडलाइन ,डब्बू जी,कविता,गीत और चित्रांकन ही धर्मयुग की ओर खींचता था।कभी कभी  माँ का अस्फुट स्वर सुनाई देता जब वे धारावाहिक कहानी पढ़ने में इतनी तन्मय हो जाती कि पात्रों के साथ जुड़ कर बोलने लगती .या फिर हम खिलंदड़ इतना शोर मचाते कि उन्हें बोल बोल कर उस रोचक कहानी को पूरा करना होता ,तब उस रात मेरा उनसे यही आग्रह रहता कि वे वो ही कहानी सुनाएँ पर वे मुझे नन्हीं मान टाल जाती और कोई बच्चों की कहानी सुनाती। उन्हें क्या पता कि मैं भी बिना पल्ले पड़े कहानी को पढ़ चुकी होती थी।फणीश्वर नाथ रेणु ,महाश्वेता देवी पर आये आलेखों पर बड़ा भाई और बहन चर्चा करते ,कुछ राजनैतिक मसलों पर भी परिवार में संवाद होता .इन सब अनौपचारिक वार्तालापों ने मुझ पर बहुत असर डाला .परिवार में हिंदी को विशेष प्रोत्साहन मेरे भीतर हिंदी में अत्यधिक रूचि उपजने का एक मुख्य कारण बना .पर इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा था. 

मेरा जन्म शिवालिक पहाड़ियों से आच्छादित हनुमानगढ़ में हुआ .यह राजस्थान के उत्तर में बहने वाली घग्गर नदी के किनारों पर बसा एक छोटा सा ऐतिहासिक कस्बा था जो गंगानगर से अलग होकर 1994 में एक स्वतंत्र जिला बना. सदियों पहले यहाँ सरस्वती नदी बहती थी और यह जगह भटनेर कहलाती थी .भटनेर का विख्यात किला जैसलमेर के भाटी राजा भूपत सिंह ने बड़ी खूबसूरती से बनवाया था पर बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने मंगलवार के दिन इसे जीत कर इसका नाम रखा हनुमानगढ़ ! 5000 वर्ष पुरानी सिन्धु घाटी सभ्यता का केंद्र कालीबंगा,पीलीबंगा  रंगमहल ,गोगामेड़ी ,भद्रकाली का मन्दिर हनुमानगढ़ की मंत्रमुग्ध कर देने वाली विरासतें हैं जिन पर मुझे गर्व है .यहाँ एक मीठे पानी की झील है तलवाड़ा ,कहते हैं यहाँ पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का युद्ध हुआ था .
  तो हुआ यूं कि मेरे जन्म से कुछ समय पूर्व ही पिता का स्थानान्तरण जयपुर से हनुमानगढ़ हुआ.अंग्रेजी स्कूल में पढ़े मेरे भाई-बहन के लिए इस कस्बे का हिंदी माध्यम का स्कूल किसी युद्धक्षेत्र से कम न था तब परिवार में यह निर्णय लिया गया कि हिंदी के नये वाक्यों और शब्दों को अधिक से अधिक पढ़ा-सुना-बोला जाए.हमारे घर में हिंदी का सम्मान और भाषा की शुद्धता पर शुरू से ही आग्रह था क्योंकि पिता और माँ दोनों को पढ़ने लिखने का शौक था। कुल मिला कर हिंदी की ये नींव मजबूत इमारत बना गयी। .धर्मयुग का हर अंक घर भर में पढ़ा सहेजा जाता रहा ,जो बाद में काल कलवित हो गया .बहुत वर्षों तक पुराने अंकों को पुनःपुनः चाव से पढ़ा जाता . 11 से 16 बरस की उम्र को धर्मयुग के पंख लगे थे .धर्मवीर भारती की रचनाएँ और सम्पादकीय को पढ़ना गजब था। गुनाहों के देवता घर घर पहुंच गाए थे। .कादम्बिनी या मनोरमा में महादेवी वर्मा और शिवानी की कहानियाँ भी अगले कई बरस पढ़ी मैने । दिन पंख लगा कर उड़ते थे ।बड़े साहित्यिक नामों को जानना और पढ़ना बेहद सुखद था । बाद में मक्सिम गोर्की को पढ़ना किसी अथाह नदी में डुबकी लगाने जैसा था । मेरा बचपन और माँ उपन्यास को कितनी ही बार पढ़ा, रूस और लेनिन को तब गोर्की के माध्यम से ही जाना।
मुझसे कुछ टूटी फूटी कहानी  कविताएँ अपनी नन्हीं बहन पर रोब जमाने के लिए बननी शुरू हो गयी थी ।
1980 का साल बड़े घटनाक्रमों का साक्षी बना .संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत ,इंदिरा गांधी का इस दुखद घड़ी में अपने जज्बातों पर काबू, जहाँ विमान गिरा था उस जगह पर इंदिरा जी का कुछ खोजना भी फोटो सहित धर्मयुग में सलेटी बॉक्स में छपा था , धुंधली सी याद है मुझे। 
टेलीविजन नेटवर्क का प्रसारण ,प्रेमचंद के निर्मला उपन्यास का दूरदर्शन पर रूपांतरण,शकुंतला देवी का कैलकुलेटर से तेज दिमाग जिन्होंने 13 अंकों को अल्प समय में गुणा करने की परीक्षा में सफल होकर विश्व भर में उसी साल अपना लोहा मनवाया । मदर टेरेसा के सेवा कार्य   ,पृथ्वी की कक्षा में रोहिणी उपग्रह (उस समय लगता था सबकी कक्षा लगती है ) 
ये सब 1980 के साल की कभी न भूलने वाली घटनाएँ थी पर मेरे व्यक्तित्व पर असर डालने वाली ,मुझे लिखने के लिए प्रेरित करने वाली पहली रचना थी एक गीत जो इसी 1980 के बरस धर्मयुग में छपा .मैने उसे इतनी बार पढ़ा कि यह आधा अधूरा याद में दर्ज हो गया।इस गीत की पहली पंक्ति "लेखकजी तुम क्या लिखते हो" कहते हुए मैं सारे घर में दौड़ लगाती, रुक कर चिड़ियों को देखती और लिखती --
देखो कितना सुंदर गाती  
ची ची चिड़िया पंख फैलाती
जब देखो तब माँ भी
फुर्र फुर्र कह के इन्हें उड़ाती 
कौन देगा दाना पानी की इनको मीठी सौगात
कौन बनेगा साथी इनका ,कौन करेगा बात
ये अल्हड़ बीज थे लेखन के ।
1981 में आई बाढ़ धर्मयुग और कई सारी पत्रिकाओं के कुछ सहेजे अंक अपने साथ ले गयी पर छोड़ गयी वे अमिट यादें ...लेखक जी तुम क्या लिखते हो   
अभी हाल ही में समालोचन के एक अंक में इस गीत को आदरणीय कृष्ण कल्पित सर के लेख के साथ पूरा पढ़ने पर न जाने कितने बरस पुरानी  आस की तृप्ति हुई और उस वक्त की एक -एक घटना जेहन में तिर गयी। 

लेखकजी तुम क्या लिखते हो
हम मिट्टी के घर लिखते हैं
धरती पर बादल लिखते हैं
बादल में पानी लिखते हैं
मीरा के इकतारे पर हम
कबिरा की बानी लिखते हैं

सिंहासन की दीवारों पर
हम बाग़ी अक्षर लिखते हैं

काग़ज़ के सादे लिबास पर
स्याही की बूँदों का उत्सव
ठहर गया लोहू में जैसे
कोई खारा-खारा अनुभव

फूलों पर ख़ुशबू के लेखे
बंदूकों में डर लिखते हैं !


शुक्रिया आदरणीय कृष्ण कल्पित सर मेरे लेखन बीज के लिए !! इसे संयोग ही कहूंगी कि अब आपकी किताब कविता रहस्य मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक है । और अब तीव्र उत्कंठा है कि हिंदनामा पढूं !
जब भी लिखने बैठती हूँ , यही पहला कालजयी सवाल मेरे मन में कौंधता है
              “लेखक जी तुम क्या लिखते हो”

सोनू चौधरी 
राजस्थान के हनुमानगढ़ में जन्म।सूचना शिक्षा एवं संचार विशेषज्ञ  के रूप में सहायक निदेशक के पद पर जमीनी स्तर पर जुड़ कर कार्य करने का अनुभव।,विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं ,आकाशवाणी ,दूरदर्शन में विविध विधाओं में प्रकाशन,प्रसारण।वर्तमान में कविता,प्रोज,कहानी,शोध आदि में सक्रिय।


टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर लिखा । सोनू चौधरी और मीमांसा को धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं
  2. सोनू चौधरी जी बहुत सुंदर लिखा आपने। वही समय होता है जब बहुत सारा अंत: में समा जाता है। शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

कविताएँ : मनमोहन भारती

कविताएँ हम तो उसे मनमोहन भारती के नाम से ही जानते हैं। जिन दिनों मैं मुम्बई महानगर में ( अखबार में भी ) था, मनमोहन भारती और केसर सिंह बिष्ट दो युवा और साहसी रिपोर्टर थे। उन्होंने ही रातों की यात्राओं में मेरी बम्बई से कुछ पहचान करायी। बाद में धीर गंभीर प्रणव प्रियदर्शी इस टीम में आये। वापस आने पर भी मुझे महानगर के हालचाल मिलते रहे। इनमें मनमोहन किसी किस्से कहानियों का उदात्त चरित्र लगता है। जैसे लंबे संकोच के बाद प्रणव ने अपनी कहानियों के बारे में बताया। वे मीमांसा में और फिर दूसरी जगह आयीं और सराही गयीं। मनमोहन तो जितने साहसी हैं, उतने ही विनम्र और शर्मीले। उसने भी अपने भीतर एक कवि को जज्ब किया हुआ था। हमें खुशी है कि वह भी मीमांसा के जरिए बाहर आ रहा है। कविता कुछ लंबा रियाज चाहती है। आप इन्हें एक सच्चे, जज्बाती किन्तु निर्भय व्यक्ति के अंतस की शक्ति के रूप में भी पढ सकते हैं।               - राजाराम भादू 1. अंधेरों से हिस्से करने लगा हूं मैं जिंदगी तुम ही से डरने लगा हूं मैं अंधेरों में ही उजाले नजर आने लगे हैं अंधेरों से दीए जलाने लगा हूं मैं ...

उत्तर- आधुनिकता के अन्तर्विरोध

उत्तर- आधुनिकता को लेकर भारत में और विशेष रूप से हिन्दी- क्षेत्र में बहुत भ्रम और आकर्षण है। सामान्यतः हमारे पास इसको लेकर बहुत आधी- अधूरी सूचनाएं हैं। ज्यादातर तो उत्तर- आधुनिकता की चर्चा बतौर फैशन की जाती है, उसे लेकर कोई गंभीर चिंतन और चिंता हमारे यहां लगभग अनुपस्थित है। इस संदर्भ में हम इस खतरनाक भ्रम पर कुछ विचार करना चाहेंगे। वास्तव में, उत्तर- आधुनिकता कोई एक विशिष्ट चिंतन- सरणि या विचारणा नहीं है, यह उत्तर- आधुनिक पाश्चात्य समाजों की विभिन्न चिंतन- सरणियों के एक समग्र दौर का नाम है। यह समय- विभाजन को, उसमें आए समस्त परिवर्तनकारी कारकों के परिप्रेक्ष्य को ठीक से समझने के लिए दी गयी एक संज्ञा है। पिछले दशकों में यूरोप में चिंतन, संस्कृति और सृजनात्मकता के क्षेत्र में ढेर सारी प्रवृत्तियाँ उभरीं। इन प्रवृत्तियों को उत्तर आधुनिकता की संज्ञा से अभिहित किया गया। उत्तर- आधुनिकता यदि एक विशिष्ट जीवन- दृष्टि है तो इस अर्थ में कि इसमें उत्तर- औद्योगिक दौर की उन्नत सभ्यताओं की प्रमुख लाक्षणिकताएं- उच्च तकनीक, वैश्विक बाजार, नव- उपनिवेशवाद और आर्थिक उदारीकरण तथा विश्व स्तर पर संस्कृतियों क...

कुकुछीना स्मृतियां - राजाराम भादू

प्रो. लालबहादुर वर्मा का असमय जाना बहुतों की तरह मेरे लिए भी वैयक्तिक क्षति है क्योंकि मेरे लिए भी वे मेन्टर व गाइड की तरह रहे, हालांकि मैं उनसे उतना संपर्क- संवाद में नहीं था। उनके साथ मेरी कुकुछीना की स्मृतियाँ अहम रही हैं, जहाँ मैं ने उन्हें कई रंगतों में देखा। वहाँ वे हरेक से व्यक्तिगत आत्मीय बातचीत कर रहे थे। सबसे हंसी- मजाक करते बोल- बतिया रहे थे तो कोरस में गा रहे थे और मधुर धुनों पर समूह- नृत्य में भी भागीदारी कर रहे थे। वे जितनी चिन्ता से प्रबंधन की छोटी- छोटी जिम्मेदारियां संभाल रहे थे तो उतनी ही गंभीरता से विभिन्न सत्रों का संयोजन देख रहे थे। उनके उद्बोधन तो सदा अनुप्राणित करने वाले होते ही थे। उत्तराखण्ड की दूनागिरि पर्वतमाला में यह सुरम्य स्थान वर्मा जी ने ही खोजा था। कभी यूं ही भ्रमण करते वे इधर आ निकले थे और यह जगह उन्हें इतनी भायी कि अगले वर्ष से यहां मित्रों का एक समागम करने का तय किया जो तीन बार आयोजित किया गया। इसे मूर्त रूप देने में कुकुछीना के नेत्र वल्लभ जोशी का विशेष योगदान रहा। कुकुछीना को दो तरफ से घेरे दूनागिरि पर्वत के एक सिरे पर महावतार बाबाजी की गुफा है जिस...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान-1

रंगमंच  समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -1                                         राघवेन्द्र रावत  समकालीन हिंदी रंगमंच के बारे में बात बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से भी की जा सकती थी लेकिन मुझे लगता है कि उससे पूर्व के भारतीय रंगमंच के परिवर्तन की प्रक्रिया पर दृष्टिपात कर लेना ठीक होगा | उसी तरह राजस्थान के समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करने से पहले भारतीय हिंदी रंगमंच पर चर्चा करना जरूरी है, और उससे भी पहले यह जानना भी आवश्यक है कि वस्तुतः रंगमंच क्या है ?और रंगमंच के बाद हिंदी रंगमंच और उसके बाद समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करना एक उचित क्रम होगा भले ही यह मेरे अध्ययन की गरज ही लगे | राजस्थान के रंगमंच पर बात करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इस पर हिंदी साहित्य की तरह चर्चा नहीं हुई चाहे वह आलोचना की दृष्टि से देखें या इसके इतिहास की नज़र से देखें | दो वर्ष पहले ‘जयरंगम’ नाट्य समारोह के एक सेशन में बोलते हुए वरिष्ठ रंग एवं फिल्म समीक्षक अजित राय ने कहा था-“ पता नहीं कौन सा नाटक...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

विजयदशमी - रेखा चटर्जी

कहानी नयी सभ्यता द्वारा प्रदत्त संघातिक बीमारियों और उनके महंगे उपचार अल्प- आय वर्ग के परिवारों को तबाही की ओर धकेल रहे हैं। इसके विरुद्ध भी महिलाएं ही असीम धैर्य और अदम्य जिजीविषा से लड रही हैं। रेखा चटर्जी की कहानी में यह यथार्थ मार्मिकता में उभरता है, साथ ही बहनापा ( सिस्टरहुड ) भी  रूप  एक शक्ति के   रूप में उद्घाटित होता है। मीमांसा में स्वागत है रेखा ! दुर्गा माँ के बोधोन के साथ ही आज से दुर्गा पूजा शुरू हो गयी थी। हर बंगाली परिवार के घर में उल्लास का माहौल था, लेकिन भाव्या के लिए यह दिन पिछले कई दिनों की तरह भारी था। सौरभ की किडनी की बीमारी ने उसके परिवार के उत्साह और उल्लास को जैसे नजर लगा दी हो। कब सौरभ की दोनों किडनी खराब हो गयीं पता ही नहीं चला। सौरभ में तो कोई ऐब भी नहीं था। उसने शराब, गुटखा या सिगरेट के कभी हाथ भी नहीं लगाया, फिर ऐसा कैसे हुआ। लेकिन हकीकत यही थी कि सौरभ की दोनों किडनी डैमेज हो चुकी थीं और आज वो अस्पताल में जिन्दगी और मौत से संघर्ष करते हुए डायलिसिस के भरोसे एक नई जिन्दगी की पाने की उम्मीद में जी रहा था। ऐसे में भी भाव्या अस्पताल में भर्ती पति...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...