सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जोस इमिलिओ पाचेको की कविताएँँ

भाषान्तर


मेक्सिको और विश्व कविता के अग्रणी कवि जोस इमिलिओ पाचेको की चौदह कविताएं :

(1)

राजद्रोह
––––––

मैं नहीं करता प्रेम अपने देश से
इसकी महिमा
निराकार, अमूर्त्त है
लेकिन (यह सुनने में ठीक नहीं लगता इसलिये)
मैं दे सकता हूं अपना जीवन
इसके दस स्थानों,
कुछ लोगों,
बन्दरगाहों, देवदार के वनों,
क़िलों, किसी उजाड़ शहर,
बेरंग, विशालाकार,
इतिहास की इसकी कुछ आकृतियों,
पर्वतों
(–और तीन-चार नदियों) के लिये।

(2)

कवि का प्यार
–––––––––
कविता की केवल एक ही वास्तविकता है : पीड़ा।
बोदलेयर ने इसकी पुष्टि की।
ओविड भी संस्तुति दे ही सकता है
ऐसे वक्तव्यों को।
और यह, एक तरह से गारंटी देती है
किसी ऐसी कला के 
संकटग्रस्त उत्तर-जीवन की भी
जिसे इने-गिने लोगों ने पढ़ा हो
और प्रत्यक्षत: तिरस्कृत किया हो
अधिकांश लोगों ने
अन्तश्चेतना का एक विकार मान कर,
एक पुरावशेष,
उस ज़माने का जो बहुत-बहुत प्राचीन है
हमारे ज़माने से,
विज्ञान का दावा है जिसके बारे में
कि सम्मोहन पर उसका एकाधिकार अन्तहीन है।

( सभी चित्र -अमित कल्ला )
(3)

झींगुर
––––––
(कविता का एक मोर्चा और दृष्टान्त)

मैं पुन: ग्रहण करता हूं
अर्थसंकेत झींगुरों से :
उनका कोलाहल निराशाजनक है,
उनके डैनों की अकुलाहट
निष्प्रयोजन सर्वथा।
यदि अब भी नहीं है उसमें कूट सन्देश
जिसे वे पहुंचाना चाहते हों एक-दूसरे तक
तो (झींगुरों के लिये) रात
रात नहीं हो सकती।

(4)

एक कुत्ते की ज़िन्दगी
––––––––––––
हम घृणा करते हैं कुत्तों से,
क्योंकि वे होने देते हैं प्रशिक्षित स्वयं को
आज्ञापालन के लिये।
कुत्ता संज्ञा में हम ही भरते हैं विद्वेष
एक-दूसरे का निरादर करने के लिये,
और घृणास्पद मानी जाती है कोई मौत
अगर वह मौत किसी कुत्ते-सी हो।
जबकि कुत्ते देख और सुन सकते हैं
वह भी जिसे हम देख-सुन नहीं पाते,
भाषा के बिना भी
(क्योंकि हम ऐसा मानते हैं)
उनके पास एक प्रतिभा है, 
जो हममें शर्तिया नहीं है।
और कोई शक नहीं कि 
वे सोचते और समझते भी हैं
इसलिये
सम्भव है कि घृणा करते हों वे भी हमसे
कोई स्वामी ढूंढने की हमारी आकांक्षा के लिये,
किसी ताक़तवर के प्रति हमारी वफ़ादारी के लिये भी।

(5)

कचरागाड़ी में
––––––––
सब कुछ चला जाता है कचरागाड़ी में :
बेकार वस्तुएं, प्लास्टिक के बरतन,
जीवन के भग्नावशेष, त्यक्त कृतज्ञताएं
ज्ञापित की गयीं किसी कालखंड की मृत्यु पर जो,
क़ाग़ज़ात, पत्र जो लिखे नहीं जायेंगे
अब कभी भी दोबारा,
और तस्वीरें बीते कल की।
हमारा सब कुछ इसीलिये बना है,
एक दिन कचरे में मिल जाने के लिये।

(6)


बुनियाद
–––––––
जब भी बसाया जाता है कोई शहर
तो सबसे पहले स्थापित करते हैं वे
सत्ता के मकाम :
राजमहल, व्यापारिक संस्थान
बाज़ार, गिरजाघर, सैन्यागार
अदालत, जेल और यातनाघर।
इसके बाद ही व्यवस्थित करते हैं वे
वेश्यालय, कब्रिस्तान और बूचड़ख़ाना।

(7)

शिष्टाचार
––––––
कितना दयालु है यह आदमख़ोर,
अपने खूंख़्वार पंजों से 
तहस-नहस कर डालता है मेरे चेहरे को।
विदीर्ण कर मेरे गले को
मेरी लाश से कहता है वह, "माफ़ करना।"

(8)

दुनिया का अंत
–––––––––
दुनिया का अंत होने में
वाकई बहुत लंबा वक़्त लगता है,
तमाम चीज़ें होती रहती हैं
बद से बदतरीन
पर समाप्त ही नहीं होतीं वे।

(9)

हवा के परामर्शदाता
––––––––––
जब भी सोचता हूं कि महत्वपूर्ण हूं मैं
एक मक्खी चली आती है कहती हुई,
"कुछ भी नहीं हो तुम।"

(10)

राख़
–––––
राख़ नहीं करती किसी से क्षमा-याचना
बस घुल जाती है वह अनस्तित्व में,
एकाकार हो जाती है गहन उदासी के साथ।

राख़ धुआं है जिसे छू सकते हो तुम,
आग ख़ुद एक सन्ताप है।

हमारी यह हवा जो प्रज्ज्वलित हुई थी कभी,
अब नहीं धधकेगी वह कभी फिर से।


(11)

बीते हुए दिन हमारे
–––––––––––
मैं अंकित करता हूं 
यहां-वहां उड़ती रेत पर
न लौटने का कोई शब्द।

एक दूसरा शब्द 
उत्कीर्ण किया था जिसे पत्थर पर मैंने
उस पर जम गयी है काई।
समय के साथ कितने ही अवयवों ने
डाल दिया है आवरण उस पर।
और अब मुझे मालूम ही नहीं
कि उसका आशय क्या होगा
जब मैं पढ़ूंगा इसे दोबारा।

(12)

दीमकें
–––––
और दीमकों से उनके स्वामी ने कहा :
नीचे गिरा दो उस घर को।
और वे लगातार जुटी हैं इस काम में
जाने कितनी ही पीढ़ियों से,
सूराख़ें बनातीं, अन्तहीन खुदाई में तल्लीन।

किसी दुष्टात्मा की तरह
निर्दोषिता का स्वांग किये,
पीले मुख वाली चीटियां,
विवेकहीन, गुमनाम दास,
किये जा रही हैं अपना काम
दायित्व समझ कर,
फ़र्श के नीचे
किसी वाहवाही या शाबासी की अपेक्षा किये बिना ही :
उनमें से हर एक सन्तुष्ट भी है,
अपना बेहद मामूली पारिश्रमिक लेकर।

(13)

मार्ग में
–––––
समय कहीं नहीं जाता :
वह यहीं रहता है
हम गुज़र जाते हैं।

केवल हम ही हो जाते हैं अतीत।

प्रवासी पक्षी आते हैं जैसे 
हमारे सिरों के ऊपर
और धीरे-धीरे
ओझल हो जाते हैं नज़रों से
सुदूर किसी छोर की तरफ़।

(14)

कवियों का जीवन
––––––––––
कविता में कोई सुखद अंत नहीं है,
कवि समाप्त हो जाते हैं
अपना पागलपन जीते हुए।
वे बंटे हुए हैं मवेशियों की तरह खेमों में
(यही तो हुआ दारियो के साथ भी)।
वे पत्थर हो गये हैं, चुक गये हैं 
समुद्र की तरफ़ ढकेलते हुए ख़ुद को,
या सायनाइड दबा कर अपने मुंह में।
कुछ अन्य मर गये
शराब, नशीली दवाओं और ग़रीबी से।
कुछ और भी वाहियात : प्राधिकृत कवि
किसी मक़बरे के चिड़चिड़े निवासी
काम पूरा करने के लिये प्रतिबद्ध।

(अंग्रेज़ी से अनुवाद– राजेश चन्द्र।)

जोस इमिलिओ पाचेको

जन्म- 30 जून 1939
निधन- 26 जनवरी 2014
जन्म स्थान - मैक्सिको सिटी, मैक्सिको

प्रमुख कृतियाँ :

रात में हालात (1963), बाक़ी बची आग (1966), मुझसे मत पूछो कि समय कैसा चल रहा है (1970), जाकर आप वापस नहीं आएँगे (1973), तब से (1979), समुद्र (1983), पृथ्वी पर एक नज़र (1987), मेरी यादों का शहर (1990), गुपचुप चाँद (1996), पिछली सदी (2000) और अन्धेरे की उम्र (2009) आदि कुल अट्ठारह कविता संग्रह। इनके अलावा ढेरों कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे हैं।

विविध :

लातिनी अमरीका के सबसे महत्वपूर्ण समकालीन कवि के रूप में प्रतिष्ठित। विश्व सेरवान्तेस काव्य पुरस्कार (2009) । 

राजेश चन्द्र

विगत 27 वर्षों से कविता, रंगकर्म, समीक्षा, संपादन, पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में निरन्तर सक्रिय। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों एवं जनान्दोलनों के साथ जुड़ाव। रंगमंच पर केन्द्रित एकमात्र गैर-सांस्थानिक पत्रिका
समकालीन रंगमंच का 2013 से संपादन-प्रकाशन।
संपर्क : 9599346329.

टिप्पणियाँ

  1. मीमांसा के ब्लॉग पर बहुत स्तरीय और पठनीय साहित्य प्रकाशित हो रही है।
    बेहद अच्छी कविताओं का अच्छा अनुवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत संदर कविताओं का सुंदर अनुवाद .

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...