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दस कहानियाँ-१ : अज्ञेय

दस कहानियाँ
:अज्ञेय-हीली- बोन् की बत्तखें

                                                   राजाराम भादू                     
1.
अज्ञेय जी ने साहित्य की कई विधाओं में विपुल लेखन किया है। ऐसा भी सुनने में आया कि वे एक से अधिक बार साहित्य के नोवेल के लिए भी नामांकित हुए। वे हिन्दी साहित्य में दशकों तक चर्चा में रहे हालांकि उन्हें लेकर होने वाली ज्यादातर चर्चाएँ गैर- रचनात्मक होती थीं। उनकी मुख्य छवि एक कवि की रही है। उसके बाद उपन्यास और उनके विचार, लेकिन उनकी कहानियाँ पता नहीं कब नेपथ्य में चली गयीं। वर्षों पहले उनकी संपूर्ण कहानियाँ दो खंडों में आयीं थीं। अब तो ये उनकी रचनावली का हिस्सा होंगी। कहना यह है कि इतनी कहानियाँ लिखने के बावजूद उनके कथाकार पक्ष पर बहुत गंभीर विमर्श नहीं मिलता ।

अज्ञेय की कहानियों में भी ज्यादा बात रोज पर ही होती है जिसे पहले ग्रेंग्रीन के शीर्षक से भी जाना गया है। इसके अलावा कोठरी की बात, पठार का धीरज या फिर पुलिस की सीटी को याद कर लिया जाता है। जबकि मैं ने उनकी कहानी- हीली बोन् की बत्तखें- की बात करते किसी को नहीं सुना। मुझे यह हिन्दी की ऐसी महत्वपूर्ण कहानियों में एक लगती रही है जिसे विश्व- स्तरीय रचनाओं के साथ रखा जा सकता है। मगर यह भी अभी तक मेरी समझ से बाहर रहा है कि आखिर इस पर हिन्दी में उतना ध्यान क्यों नहीं दिया गया।
हीली बोन ...अज्ञेय की बाकी सभी कहानियों से सर्वथा भिन्न है। हालांकि रोज के बारे में भी यही बात कही जाती है। लेकिन हीली बोन... रोज से भी अलग है, इसकी भाषा, विन्यास, शैली सब। हीली बोन का चरित्र, उसकी दुनिया और उसके जीवन का मानवीय रहस्य, घटना- परिघटना उसे समय की सीमाओं के पार ले जाते हैं। वह रहस्य, जो आपको लगता है कि आपके लिए खुल गया है लेकिन फिर भी आप आश्वस्त नहीं हो पाते। जो हमारी अपनी ही दुनिया का हमसे नया परिचय कराता है। जो मूल्यों के नैतिक और पारंपरिक रूपों को प्रश्नित कर देता है। इसके कथानक को किसी प्रचलित ढांचे में रखकर देख पाना कठिन नहीं बल्कि असंभव जैसा है ।
उस दौर की कहानियों में आये स्त्री- चरित्रों की तुलना में भी देखें तो हीली- बोन् अनुपम और अग्रगामी है। यह १९४७ में लिखी कहानी है, आजादी के पहले अथवा तुरंत पश्चात। तब तक गुलेरी जी की उसने कहा था आ चुकी थी, जिसकी नायिका एक बिंदास किशोरी की एक झलक के बाद स्त्री की परछाईं में बदल चुकी थी। अज्ञेय उत्तर छायावादी काल में आते हैं। प्रसाद इतिहास से मधूलिका जैसी उदात्त नायिका ( पुरस्कार) को ला रहे हैं, दूसरी ओर प्रेमचंद की दारुण कष्ट झेलती बूढी काकी और खाला हैं। जैनेन्द्र की स्त्रियाँ मध्यवर्गीय मर्यादा को लांघने के आरंभिक उपक्रम भर कर रही हैं जो अश्क जी वगैरह की कहानियों में आगे जारी रहता है।

इस प्रसंग में सुदूर सीमांत के जनजातीय पर्वतीय अंचल में हीली- बोन् सही मायने में ठोस यथार्थ की जमीन में सांस लेता और संघर्ष करता आधुनिक चरित्र है। ये चरित्र अपने साथ एक व्यक्ति की इयत्ता, नैसर्गिक जीवन से उसके संबंध और हस्तक्षेपकारी शक्तियों से उसके द्वंद्व को प्रामाणिक और प्रभावी तरीके के साथ लेकर आता है। संभवतः ये अज्ञेय की आरंभिक यायावरी के अनुभवों से उपजी कहानी है। यह कहानी एक सुबह से चलकर अगली सुबह तक के चौबीस घंटे में खत्म हो जाती है।
२. 
कहानी के शुरूआती परिवेश से ही हीली बोन के अकेले जीवन की वीरानी और कुछ अपघटित होने का संकेत मिल जाता है :
उसकी थकी- थकी- सी आंखें पिछवाड़े के गीली लाल मिट्टी के काई- ढंके किन्तु साफ फर्श पर टिक गयीं। काई जैसे लाल मिट्टी को दीखने देकर भी एक चिकनी झिल्ली से उसे छाये हुए थी ; वैसे ही हीली- बोन की आंखों पर कुछ छा गया जिसके पीछे आंगन के चांचों और तरतीब से सजे हुए जरेनियम के गमलों, दो रंगीन बेंत की कुर्सियों और रस्सी पर टंगे हुए तीन- चार धुले हुए कपडों  की प्रतिच्छवि रह कर भी न रही। और, कोई और गहरे देखता तो अनुभव करता कि सहसा उसके मन पर भी कुछ शिथिल और तन्द्रामय छा गया है, जिससे उसकी इन्द्रियों की ग्रहणशीलता तो ज्यों की त्यों रही है पर गृहीत छाप को मन तक पहुंचाने और मन को उद्वेलित करने की प्रणालियां रुद्ध हो गयी हैं।
सुबह के इस सिलसिले में हीली- बोन पाती है कि उसकी प्रिय बत्तखों में से आज फिर किसी बत्तख का शिकार हो गया है। ऐसा पिछले तीन- चार दिन से चल रहा था कि कोई जंगली जानवर उसकी प्रिय बत्तखों में से एक- दो को अपने जबडों में दबा कर ले जाता था। तभी कहानी में दूसरे पात्र कैप्टन दयाल का प्रवेश है जो उस समय बाडे के पीछे की पगडंडी से गुजर रहे थे और हीली को परेशान देखकर उससे बात करने लगते हैं। वे बाहर से आये हुए हैं, कुछ दिन वहाँ रुकने वाले हैं, बत्तखों के शिकारी का शिकार करने का हीली को प्रस्ताव देते हैं। आरंभिक संकोच के बाद हीली इसके लिए तैयार हो जाती है। रात को कैप्टन दयाल अपना मोर्चा संभाल लेते हैं। वे बत्तख का शिकार करने आयी लोमड़ी पर गोली भी चलाते हैं लेकिन वह भाग निकलती है। सुबह हीली- बोन अपने डाओ को हाथ में लिए कैप्टन के साथ घायल लोमड़ी को ढूंढने झरने की ओर निकलती है जो कैप्टन दयाल के अनुसार बहुत देर तक जीवित रहने वाली नहीं है।
और वह उन्हें मिलती है : हीली ने स्थिर दृष्टि से देखा। करारे में मिट्टी खोदकर बनायी हुई खोह में- या कि खोह की देहरी पर- नर लोमड़ी का प्राणहीन आकार दुबका पड़ा था- कांस के फूल के झाडू- सी पूंछ उसकी रानों को ढंक रही थी, जहां गोली का जख्म होगा। भीतर शिथिल-गत लोमड़ी उस शव पर झुकी थी, शव के सिर लोमड़ी के पांवों से उलझते हुए तीन छोटे- छोटे बच्चे कुममुना रहे थे।
इस दृश्य पर कैप्टन दयाल कहते हैं, यह भी तो डाकू होगी-...वे प्रस्ताव करते हैं, इसे भी मार दें...। लेकिन उन्हें प्रत्युत्तर नहीं मिलता, हीली- बोन वहाँ से लौट चुकी है।
कहानी की सबसे अबूझ और जटिल परिघटना इसके बाद की है। वहाँ से लौटकर हीली अपने धारदार हथियार- डाओ- से एक- एक कर अपनी सभी ग्यारह बत्तखों को गला काट कर मार डालती है। कैप्टन दयाल को हीली की अनकही वापसी ही समझ नहीं आयी थी। जब उन्होंने लौटकर बत्तखों को मरे पड़ा पाया तो हीली से पूछा- यह क्या, मिस यिर्वा? और जबाव न पाकर फिर पूछा-  क्या हुआ, हीली ?... तो हीली की तिक्त और थर्राती आवाज सुनने को मिली - दूर रहो, हत्यारे !
और यहीं कहानी का अंत है। हीली- बोन द्वारा अपनी बत्तखों की इस तरह की गयी हत्या प्रश्न छोड जाती है जो आपका पीछा करता रहता है- आखिर उसने ऐसा क्यों किया ?
३.
इसके लिए जरा हीली के प्रोफाइल को समझने की कोशिश करें। हीली- बोन यिर्वा के पिता उस छोटे- से मांडलिक राज्य के दीवान रहे थे। हीली तीन संतानों में सबसे बड़ी थी, और अपनी दोनों बहिनों की अपेक्षा अधिक सुंदर भी। खासियों का जाति- संगठन स्त्री- प्रधान है, सामाजिक सत्ता स्त्री के हाथ है और वह अनुशासन में चलती नहीं, अनुशासन को चलाती है। हीली भी मानो नाड्- थ्लेम की अधिष्ठात्री थी। नाइक्रेम के नृत्योत्सव में, जब सभी मंडलों के स्त्री- पुरुष खासी जाति के अधिदेवता नगाधिपति को बलि देते थे और उसके मर्त्य प्रतिनिधि अपने सियेम का अभिनंदन करते थे, तब नृत्य- मंडली में हीली ही मौन- सर्वसम्मति से नेत्री हो जाती थी, और स्त्री- समुदाय उसी का अनुसरण करता हुआ झूमता  था, इधर और उधर, आगे और दांये और पीछे... नृत्य में अंग- संचालन की गति न द्रुत होती थी न विस्तीर्ण, लेकिन कम्पन ही सही, सिरहन ही सही, वह थी तो उसके पीछे- पीछे ; सारा समुद्र उसकी अंग- भंगिमा के साथ लहरें लेता था...।

अब वह चौंतीसवां वर्ष बिता रही है, उसकी दोनों बहिनें ब्याह करके अपने- अपने घर रहती हैं, पिता नहीं रहे और स्त्री- सत्ता के नियम अनुसार- उनकी सारी सम्पत्ति सबसे छोटी बहिन को मिल गयी। हीली के पास एक छोटा- सा घर और बगीचा है। इसमें भी वीरानी और उदासी व्याप्त है। पूरी कहानी चार हिस्सों में बंटी है और हर भाग में यह कुहिरल परिवेश हीली के आभ्यन्तर को भी प्रतिबिंबित करता है। इसके लिए ये अंश पढें जरा -
दिन में पहाड की हरियाली काली दीखती है, ललाई आग- सी दीप्त, पर सांझ के आलोक में जैसे लाल ही पहले काला पड जाता है। हीली देख रही थी ; बुरुस के वे इक्के- दुक्के गुच्छे न जाने कहां अंधकार- लीन हो गये हैं, जबकि चीड के वृक्षों के आकार अभी एक- दूसरे से अलग स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। क्यों रंग ही पहले बुझता है, फूल ही पहले ओझल होते हैं, जबकि परिपार्श्व की एकरूपता बनी रहती है ?
हीली का मन उदास होकर अपने में सिमट आया। सामने फैला हुआ नाड्- थ्लेम का पर्वतीय सौंदर्य जैसे भाप बनकर उड गया, चीड और बुरुंस, चट्टानें, पूर्व पुरुषों और स्त्रियों की खडी और पडी स्मारक शिलाएं, घास की टीलों- सी लहरें, दूर नीचे पहाड़ी नदी का ताम्र- मुकुट, मखमली चादर में रेशमी डोरे- सी झलकती हुई पगडंडी- सब मूर्त आकार पीछे हटकर तिरोहित हो गये। हीली की खुली आंखें भीतर को ही देखने लगीं- जहाँ भावनाएँ ही साकार थीं, और अनुभूतियाँ ही मूर्त...

कथाकार अपनी ओर से वर्णन में इस प्रश्न को उठाता है - यह कैसे हुआ कि वह नाइक्रेम की रानी, आज अपने चौंतीसवें वर्ष में इस कुटी के जरेनियम के गमले संवारती बैठी है, और अपने जीवन में ही नहीं, अपने सारे गाँव में अकेली है ? और इसका एक उत्तर आता है- अभिमान; लेकिन हीली इस उत्तर से खुद को सहमत नहीं पाती है। लोग कहते थे कि हीली सुंदर है, पर स्त्री नहीं है। वह बांबी क्या, जिसमें सांप नहीं बसता ? ... हीली की आंखें सहसा और घनी हो आयीं- नहीं, इससे आगे वह नहीं सोचना चाहती ! व्यथा मरकर भी व्यथा से अन्य कुछ हो जाती है ? बिना सांप की बांबी- अपरूप, अनर्थक मिट्टी का ढूह ! 
किन्तु यहां तक के वृत्तान्त से तो हीली की विषष्णता के ही कुछ संकेत मिलते हैं। हमें तो हीली के भीतर जमे उस लावे की टोह लेनी है जो फूटकर उसकी बत्तखों के ऊपर फैल गया था। इसके लिए हीली के द्वंद्व को समझने की कोशिश करें, वहाँ कहे हुए के पीछे काफी कुछ अनकहा है। ... वह याद करना चाहती तो याद करने को कुछ था- बहुत- कुछ था- प्यार उसने पाया था और उसने सोचा भी था कि- ... नहीं कुछ नहीं सोचा था। जो प्यार करता है, जो प्यार पाता है, वह क्या कुछ सोचता है ? सोच सब बाद में होता है, जब सोचने को कुछ नहीं होता। ...और यह हीली का बाद का जीवन है। इससे पहले बहुत कुछ है जो वह खो चुकी है।
उसके खोये हुए का अनुमान भी उसके वर्तमान से ही लगाया जा सकता है। आगन्तुक कैप्टन दयाल कहते हैं, आपका मकान बहुत साफ और सुंदर है। इस पर हीली का जबाव है, हां, यहां कोई कचरा फैलाने वाला जो नहीं है। अकेली रहती हूं। ...इसी तरह, जरेनियम, जो गमले में लगा लो तो फूल हैं, नहीं तो जंगली बूटी...  यह हीली का चुना हुआ अकेलापन है। अन्यथा इस अंश को देखें :
युद्ध की अशान्ति के इन तीन- चार वर्षों में कितने ही अपरिचित चेहरे दीखे थे, अनोखे रूप, उल्लसित, उच्छवासित, लोलुप, गर्वित, याचक, पाप- संकुचित, दर्प- स्फीत मुद्राएँ... और वह जानती थी कि इन चेहरों और मुद्राओं के साथ उसके गाँव की कई स्त्रियों के सुख- दुख, तृप्ति और अशान्ति, वासना और वेदना, आकांक्षा और संताप उलझ गये थे, यहां तक कि वहाँ के वातावरण में एक पराया और दूषित तनाव आ गया था। किन्तु वह उससे अछूती ही रही थी। यह नहीं कि उसने इसके लिए कुछ उद्योग किया था या कि उसे गुमान था- नहीं, यह जैसे उसके निकट कभी यथार्थ ही नहीं हुआ था।... जब कैप्टन दयाल हीली के जरा नजदीक आना चाहते हैं तो पाते हैं कि वह अपनी शालीन मुद्रा में सिमिट चुकी है।

असल में किसी बंद अध्याय के बाद हीली का लगाव अपनी बत्तखों के प्रति उमगा। इतनी बड़ी, इतनी सुंदर बत्तखें खासिया प्रदेश में और कहीं नहीं  थीं। स्वयं सियेम के पास भी नहीं, इसलिए सारे मंडल के गाँव उसकी बत्तखों से ईर्ष्या करते थे। ये बत्तखें उसकी आजीविका का भी जरिया थीं। इसलिए जब उसकी प्यारी बत्तखों का शिकार होने लगा तो वह दुख से भर गयी। इसी के चलते वह उस डाकू से छुटकारे के लिए तैयार हो गयी। लेकिन जब उसने मृत नर लोमड़ी के शव से सटी मादा और मासूम शिशुओं को विचरते देखा तो वह भीतर से हिल गयी-  ... उस कुनमुनाने में भूख की आतुरता नहीं थी, न वे बच्चे लोमड़ी के पेट के नीचे घुसड- पुसड करते हुए उसके थनों को ही खोज रहे थे... मां और बच्चों में किसी को ध्यान नहीं था कि गैर और दुश्मन की आंखें उस गोपन घरेलू दृश्य को देख रही हैं।
असल में यह निर्णय इस दृश्य से निकला है।... उसके तूफानी वेग से चौंककर बत्तखें पहले तो बिखर गयीं, पर जब वह एक कोने में जाकर बाडे के सहारे टिककर खडी अपलक उन्हें देखने लगी तब वे गरदनें लंबी करके उचकती हुई- सी उसके चारों ओर जुट गयीं और क-क् ! क-क् करने लगीं।... वह अधैर्य हीली को छू न सका, जैसे चेतना के बाहर से फिसलकर गिर गया। हीली शून्य दृष्टि से बत्तखों को ताकती रही।... अनदेखते अचूक निश्चय से हीली ने जब डाओ चलाया तो उसके मुंह से निकला- अभागिन! 
क्या यह प्रतिहिंसा है ? नहीं। हीली- बोन ने इस तरह एक बार और अपने ही एक हिस्से को फिर से मारा है। अपने एक बड़े हिस्से को मारकर तो वह पहले ही अपने आस- पास से असंपृक्त हो गयी थी। अब देखा, बत्तखों के साथ उसके प्यार ने एक प्राणी परिवार को आघात पहुंचाया। जब वह कैप्टन दयाल को हत्यारा कहती है तो उसमें कहीं एक आवृत्ति छुपी हुई है। इस कहानी की सबसे रचनात्मक शक्ति यही है कि हिंसक चित्रण के बावजूद यह हिंसा के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करती है और हीली- बोन एक अपराधी नहीं, बल्कि त्रासद नायिका की तरह अविस्मरणीय हो जाती है।
४.
आज हिन्दी साहित्य में स्त्रीवाद और आदिवासी विमर्श उभार पर हैं। लेकिन पता नहीं तब भी लोगों को हीली- बोन की बत्तखें कहानी क्यों याद नहीं आती है ।
 यह कहानी कई स्त्री- प्रश्नों पर नये सिरे से सोचने को प्रेरित करती है। हीली- बोन मातृसत्तात्मक समुदाय से है। जब उसके मन में अपने अभिमान को लेकर मंथन चल रहा है तो विचार आता है, स्त्री का क्या अभिमान... वह तो है... केवल उत्तरदायिनी। इसका मतलब है कि मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी स्त्रियों के गरिमापूर्ण जीवन के लिए कोई गारंटी नहीं है।
हीली नर लोमड़ी की मौत और प्राणी परिवार के लिए इस आघात से आहत होती है। वह उन मूल्यों में जीती रही है जो प्रकृति और प्राणी- जगत के जीवन में कोई हस्तक्षेप करना अच्छा नहीं मानते। ठीक वैसे ही खुद अपने जीवन में, जहां वे प्रकृति के साहचर्य में जीवन बिताते आये हैं, बाहरी हस्तक्षेप को पसंद नहीं करते। जबकि ऐसा दखल उनके जीवन में हो रहा है और वहाँ पराया प्रदूषण बढता जा रहा है। कैप्टन दयाल ये स्वीकार करते हैं, नीचे वालों ने हमेशा पहाड वालों के साथ अन्याय ही किया है। समझ लीजिए कि पातालवासी शैतान देवताओं से बदला लेना चाहते हैं। जबकि हीली इस अंतर को अपनी मिथकीय दृष्टि से देखती है, हम लोग मानते हैं कि पृथ्वी और आकाश पहले एक थे- पर दोनों को जोडने वाली धमनी इंसान ने काट दी। तब से दोनों अलग हैं और पृथ्वी का घाव नहीं भरता। दृष्टिकोण का यह अंतर आगे दोनों के व्यवहार में प्रकट होता है। कैप्टन दयाल हीली और उसकी दुनिया को केवल बाहर से देखते हैं। हिंसा उनके लिए महज शगल है। नर लोमड़ी की हत्या से विचलित हीली का व्यवहार उन्हें अजीब लगता है जबकि हीली का कोई पुराना आघात उभर आया है, जिसमें उसके वर्तमान वीरान जीवन की जड़ें हैं, इसलिए वह मदद करने के बावजूद कैप्टन दयाल को तिक्तता से हत्यारा कहती है।

अज्ञेय की यह कहानी उत्तर- पूर्व के सीमांत की उस समस्या को आरंभिक स्तर पर चीन्हती है जो आगे चलकर विकराल होती गयी। वहां लागू सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून (AFSPAने सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार दे दिये जिसके चलते सबसे ज्यादा दमन और उत्पीड़न वहाँ की स्त्रियों को ही झेलना पड़ा। हालांकि उसका सबसे अधिक प्रतिकार भी उन्होंने ही किया है। इरोम शर्मिला ने इस जन- विरोधी कानून को हटाने और न्याय के लिए वर्षों अनशन किया। मणिपुर की महिलाओं ने सुरक्षा बलों द्वारा किये गये बलात्कार व अत्याचारों के विरुद्ध नग्न विरोध प्रदर्शन किया।
अज्ञेय ने इस कहानी में बड़े संवेदनशील तरीके से उस अंचल का पक्ष प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है : ... जिधर नयी धूप में चीड की हरियाली दुरंगी हो रही थी और बीच- बीच में बुरुंस के गुच्छे- गुच्छे गहरे लाल फूल मानो कह रहे थे- पहाड के भी ह्रदय है, जंगल के भी ह्रदय है....। हीली- बोन का चित्रण अत्यंत गरिमा- युक्त है। कहानी के अंत के ये अंश बहुत कुछ कहते हैं : कैप्टन दयाल ने आकर देखा, खंभे के सहारे एक अचल मूर्ति बैठी है जिसके हाथ लथपथ हैं और पैरों के पास खून से रंगी डाओ पडी है।... हीली की  आंखों में वह निर्व्याज सूनापन घना हो आया है जो कि पर्वत का चिरन्तन विजय सौंदर्य है ।

राजाराम भादू
 मानव शास्त्र से लेकर शिक्षा के क्षेत्र तक राजाराम भादूू का कार्यस्थल फैला हुआ है । संपादन , सामाजिक कार्यकर्ता समेत अनेक भूमिकाओं का सफल निर्वाहन । आलोचना के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय राजाराम भादू वर्तमान में समानांतर संस्थान के निदेशक हैंं ।



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अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...