सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

एक चिथड़ा समय की कहानियांँ

पत्रिकाएँँ

पहल का प्रकाशन 1973 के उत्तरार्ध में आरंभ हुआ था । चार दशकों से हिंदी साहित्य की साहित्यिक पत्रिकाओं के संसार में पहल का नाम महत्वपूर्ण है । पहल ने कुछ महत्वपूर्ण विशेषांक निकाले हैं यथा समकालीन कवितांक, कहानी अंक , चीन का समकालीन साहित्य ,इतिहास अंक आदि । ज्ञानरंजन अपनी संपादकीय टिप्पणी में कहते हैं -'देश में आदमी की दलेल और दुर्गति का ठिकाना नहीं है । हम इससे परे नहीं हैं । कहानीकारों ने अपना सर्वोत्तम लिखकर हमें भेजा । ये कहानियां मात्र छुटपुट प्रयास नहीं है बल्कि समय का संपूर्ण कथानक है । इसमें कई कहानियां ऐसी हैं जिनमें उपन्यास के लक्षण है ।वे एक संदिग्ध और हत्यारे संसार में प्रवेश करती हैं । उनमें प्रतिरोध ,आलोचना, व्यंग्य है और औपन्यासिक ढांचा है । ये कहानियां उपन्यास को छूकर लौटती हैं और समय के पार जाती है । हमें भरोसा है कि इन्हें 2020 में रेखांकित किया जाएगा ।'


'कारोबारी विकास और विकास का कारोबार ' युवा आलोचक शशिभूषण मिश्र का कहानी अंक का पहला विमर्श है । यह इक्कीसवीं सदी की हिंदी कहानी के बहाने कारोबारी विकास के गर्भ से उपजे उन विचारणीय बिंदुओं को तलाशने की कोशिश में लिखा गया है जिनका संबंध हमारे समकाल से है । यह लेख 21वीं सदी की उन कहानियों की पड़ताल करता है ; जिनमें बाजारीकरण की प्रक्रिया को समझने और उसके मूल में काम कर रही शक्तियों की मंशा को चिन्हित करने का प्रयास किया गया हैं । वैश्वीकरण के बाद ग्लोबल और स्थानीय शक्तियों का 'बाजार' के साथ बदलता रिश्ता किन त्रासद परिस्थितियों को जन्म देता है यह आलेख उस पर विस्तार से बात करता है ।

'इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक' के अपने दावे के अनुसार पाठकों में वैज्ञानिक अभिरुचि एवं समझ के विस्तार के लिए डॉ स्कंद शुक्ल का लेख ' महामारी , मानव और मशीन : यह राह कहाँ जाती है ? ' महत्वपूर्ण है ।

'लातिन अमेरिका डायरी मोटरसाइकिल पर जीवन -'अर्नेस्टो' के साथ !' में जितेंद्र भाटिया अविस्मरणीय यात्रा वृतांत के साथ-साथ एक संवेदनशील व्यक्ति के युगनायक बनने की कहानी को आधुनिक संदर्भ में पाठक के साथ साझा करते हैं ।

'प्लेन और कवारंटेन' राजेंद्र सिंह बेदी की यह पुरानी कहानी आज के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो उठी है । इस दुर्लभ और गुमी हुई कहानी को पुनः पाठकों तक पहुंचाना पहल के इस अंक की एक उपलब्धि है । इस अंक में तीन लंबी कहानियां है मनोज रूपड़ा की 'दहन' , एस आर हरनोट की 'एक नदी तड़फती है' और गौरीनाथ की 'हिंदू' । तीनों ही कहानियां जैसा संपादकीय में कहा गया है , औपन्यासिक विन्यास को छूकर निकल जाती है और आज के समय की भयावहता को अतीत की सुरंग से जोड़ती हैं ।

इन तीन लंबी कहानियों के साथ-साथ दस अन्य कहानियां है , जो अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ-साथ वर्तमान समय की त्रासदी की चित्कार दर्ज करती हैं । 'कहानी में ऐसे पात्रों का वातावरण हमेशा बना रहता है जो समाज से बहिष्कृत हैं और समाज के सीमांतों पर भटकते रहते हैं ।' फ्रैंक ओ कोन्नोर का यह वाक्य इन सभी कहानियों की पृष्ठभूमि में गूंजता रहता है ।

 मीमांसा के लिए पहल के इस कहानी अंक पर त्वरित टिप्पणी की है  लेखक एवं पत्रकार कुमार मुकुल ने ।

एक चिथड़ा समय की कहानियां मुकम्‍मल क्‍यों हों – कुमार मुकुल

पहल के कहानी अंक 122  को पढते लगा कि वे मुकम्‍मल नहीं हैं, फिर सोचा कि यह समय ही कहां मुकम्‍म्‍ल हैफिर यह चीजों को मुकम्‍म्‍ल शक्‍लें क्‍यों लेने देगा भला! यह समय  जो हमें जड़ें जमाने के पहले ही उखाड़ दे रहा। अगर हत्‍यारों की कहानी का कोई शीर्षक नहीं होता तो फिर हत्‍यारे समय की कहानियां ही क्‍यों मुकम्‍मल हों ! इस संकलन की अधिकांश कहानियों में बिखराव है और ये इस बिखरे समय का दस्‍तवेज हैं, जिनमें इस चिथड़ा समय की धजिज्‍यां दर्ज हैं।


मनोज रूपड़ा की लंबी कहानी दहन में एक अराजक माहौल का चित्रण हैएक युवक के अराजक विकास की कहानी है यह। यह विकास उसके अंतरमन को नये ढंग से गढ़ता है, जिसमें समय की क्रूरता उसके छुपे चेहरे की तरह पैबस्‍त है। कहानी के आरंभ में लगता है कि एक बिल्‍ली के बच्‍चे का भोलापन मनुष्‍यों के एक परिवार को और मानवीय और भोला बनाएगा। पर होता कुछ और है। मनुष्‍यों के भीतर अपने अपने समय से मिली और पैबस्‍त होती जाती क्रूरता उस बिल्‍ली को तो नहीं ही बख्‍श्‍ती उस परिवार और उसके परिवेश का भी विनाश कर डालती है। यह नया समय है, इस आत्‍मघाती होते जाते समय को कहानी अपने भीतर समेटने की कोशिश करती है।

गौरीनाथ की कहानी हिंदू परंपरागत ग्रामीण भारतीय परिवार की कहानी है जो जब गांव से महानगर की जमीन पर आता है तो गांव के भोले कहे जाने वाले लोग उसके साथ भाले सा व्‍यवहार आरंभ कर देते हैं और भाई के साथ भाई महाभारतीय व्‍यवहार शुरू कर देता है जो सहज हिंदू व्‍यवहार है। कहानी का शीर्षक हिंदू बस चौंकाता है। कहानी अपने हिंदू समय के सहज परिणामों को दर्शाने की कोशिश करती है। इस कहानी का आरंभ और अंत कुछ फिल्‍मी किस्‍म की तेजी लिए हुए है जबकि कहानी के बीच का हिस्‍सा मंथर भारतीय ढंग से आगे बढता है।

सुभाष पंत की कहानी हिंदू बनेगा या मुसलमान बनेगा, वाले इंसान की विडंबना को दर्शाती है, कि नये भारत में अब पुराने इंसान के लिए सांस लेना कितना और कैसा दूभर होता जा रहा है। वह अपनी व्‍यथा कहे तो किससे कहे कि यह समय अब हिंदू व मुसलमान में बंट सा गया है। इंसानों का समय अब शायद कहानियों के हवाले कर दिया गया हैदेखें वहां भी वह बचता है कि फना हो जाता है।

मनोज रूपड़ा की कहानी दहन की तरह मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानी भी इस आभासी कलिकाल में विकसित हो रहे एक युवा की और अपने समय की क्रूरताओं द्वारा गढ़े जा रहे नये इंसान की कहानी है। जिसे अपने समय की चोटें धीरे-धीरे आदमी से एक हथियार में बदलती जा रही हैं। एक ऐसा हथियार जो दिखता तो आदमी है पर जिसका इंसानी मस्तिष्‍क सिकुड़ता हुआ काले धब्‍बे सा बचा रह गया है। जिसकी परछाइयां उसे अपने वर्तमान में दफ्न होने को मजबूर करती हैं।

एस आर हरनोट की लंबी कहानी एक नदी तड़फती है एक बिखरी कहानी है जिसमें नदी व नदी सी संघर्षशील स्‍त्री से लेकर वर्तमान कोरोना काल तक की पदचापें हैं। इसका स्‍त्री चरित्र आंरभ में मेधा पाटकर सा लगता है। कहानी के मध्‍य में मिथकों से ली गयी कथा पैबस्‍त है। यह कथा कम डायरी ज्‍यादा लग रही।

हरियश राय की कहानी महफिल में मौजूदा निजाम में लंगा गायकों की नरक होती जिंदगी का विवरण है। कहानी पढ सवाल उठता है कि लोकतंत्र में ऐसी महफिलों की जगह क्‍योंकर होसवाल यह भी है कि अगर ये महफिलें ना हों तो ये गायक किस दिशा का रूख करें कि उनका दाना-पानी चल सके। कहानी में जिस तरह से लंगा गायक का भुक्‍खड़पन उभारा गया है वह उन्‍हें शर्मिंदा करता सा लगता है। हालांकि कथाकार उसके प्रति दया का व्‍यवहार दिखाने वाला पात्र उसके साथ दिखाता है पर कहानी जिस तरह लंगा समाज के प्रतिनिधि की दयनीयता दिखाता है उस मुकाबले उसके शोषकों की गलाजत को उभार नहीं पाता।

एक कहावत है – माले मु्फ्त दिले बेरहम। इसका जो भी अर्थ हो पर शंकर की कहानी एक बटा एक बतलाती है कि मुफ्त का माल बड़ी बेरहमी से हमारा दिल तोड़ता है। हमारी मुफ्तखोरी की मानसिकता को बढ़ावा देता बाजार कैसे हमारा दोहन करता है हमारी जेबें तराशता है यही इस कहानी का थीम है। जिसमें आधुनिकता का बट्टा अलग से लगता जाता है।

हरि भटनागर की कहानी छाया अपने कथ्‍य से लेकर प्रस्‍तुति तक इस कहानी अंक की बाकी कहानियों से अलग है। उसका वर्ग अलग है। यूं विषय ऐसा है कि किसी भी वर्ग में अपनी छाया वह छोड़ता नहीं। पर हाशिये पर टिके श्रमिक वर्ग में उसकी झुर्रियां अलग से दिखती हैं।

कैलाश वनवासी की कहानी में गेट जैसी कठिन परीक्षा में असफलता के बाद पिता-पुत्र के अंतरद्वंद्व व परस्‍पर के दबावों का मार्मिक चित्रण है। कहानी दिखाती है कि किसी तरह बेटे को परीक्षा में असफलता के दबाव से मुक्‍त करने की कोशिश करता पिता खुद सामाजिक व्‍यवस्‍था के दबाव में घिरता चला जाता है। यह एक यथार्थवादी कहानी है जिसमें जीवन है अपने त्रास व पीड़ा के साथ अभिव्‍यक्‍त हुआ है।

प्रज्ञा की कहानी बुरा आदमी व्‍यक्ति के मनोविज्ञान की पड़ताल करती रोचक कहानी है जो बताती है कि बुरे और अच्‍छे आदमी के बीच की दरार बहुत पतली होती है, मनुष्‍यता और पशुता की बारीक फांक की तरह।

नवनीत नीरव की कहानी दुश्‍मन एक पर्यटन रपट सी है। पर्यटन के दौरान पर्यटकों को जंगल में अपने पथ-प्रदर्शक की त्रासद जीवन गाथा सुनने को मिलती है। जिस एडवेंचर की खोज में वे जंगल की सैर को आए थे वह तो कुछ खास नहीं मिलता पर उसके गाइड की जीवन गाथा साक्षात एडवेंचर साबित होती है। कैसी विडंबना है कि आदमी पशु जीवन में एडवेंचर खोजता है पर आर्थिक और जातिगत विषमताएं आदमी आदमी के बीच की फांक में न जाने कितने एडवेंचर छुपाए रखती हैं।

शहादत की कहानी आबादगारी दहेज की विडंबना को दर्शाती बताती है कि हिंदू समाज की तरह मुसलमान समाज को भी इसने उसी तरह ग्रस रखा है। युग चाहे मोबाइल हो पर स्त्रियों के लिए उसकी आग राममोहन राय के जमाने वाली ही है।

प्रदीप जिलवाने की कहानी भ्रम एक जादुई किस्‍से के बहाने जल-प्रदूषण के यथार्थ को सामने रखने की कोशिश करती है। यूं जल प्रदूषण के खिलाफ इस देश में कई बुजुर्ग अपनी जान दे चुके हैं जिन्‍हें हम बाबा आदि कह-मान कर भी बिसरा देते हैं। इन बाबाओं की कहानी को जानने कहने की कोशिश भी होनी चाहिए।

इस अंक की कहानियों से गुजरते लगा कि जैसे अब पहले की तुलना में कहानी लिखना आसान हो गया है और वह एक रपट की तरह आंखन देखी में सीमित होती जा रही है। कुल मिलाकर पहल के इस कहानी अंक की उपलब्धि जिलवाने की कहानी की जलपरी की तरह है जो दिमाग में चाहे जो रूप लिये हो पर अंत में हमें मिलती वह प्रदूषण और समय की विक्रितियों की मारी एक अधेड़ व बदसूरत स्‍त्री के रूप में ही है।

कुमार मुकुल 

जन्म : १९६६ आराबिहार  

दो कविता संग्रह,  कहानी तथा आलोचना में निरंतर सक्रिय ।
कविता की आलोचना पर कविता का नीलम आकाश  ।
 साहित्य पत्रकारिता एवं संपादन का लंबा अनुभव , वेदों पर लंबे समय तक काम करने के बाद वर्तमान में स्वतंत्र लेखन ।

ई पता ; kumarmukul07@gmail.com

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

कविताएँ : मनमोहन भारती

कविताएँ हम तो उसे मनमोहन भारती के नाम से ही जानते हैं। जिन दिनों मैं मुम्बई महानगर में ( अखबार में भी ) था, मनमोहन भारती और केसर सिंह बिष्ट दो युवा और साहसी रिपोर्टर थे। उन्होंने ही रातों की यात्राओं में मेरी बम्बई से कुछ पहचान करायी। बाद में धीर गंभीर प्रणव प्रियदर्शी इस टीम में आये। वापस आने पर भी मुझे महानगर के हालचाल मिलते रहे। इनमें मनमोहन किसी किस्से कहानियों का उदात्त चरित्र लगता है। जैसे लंबे संकोच के बाद प्रणव ने अपनी कहानियों के बारे में बताया। वे मीमांसा में और फिर दूसरी जगह आयीं और सराही गयीं। मनमोहन तो जितने साहसी हैं, उतने ही विनम्र और शर्मीले। उसने भी अपने भीतर एक कवि को जज्ब किया हुआ था। हमें खुशी है कि वह भी मीमांसा के जरिए बाहर आ रहा है। कविता कुछ लंबा रियाज चाहती है। आप इन्हें एक सच्चे, जज्बाती किन्तु निर्भय व्यक्ति के अंतस की शक्ति के रूप में भी पढ सकते हैं।               - राजाराम भादू 1. अंधेरों से हिस्से करने लगा हूं मैं जिंदगी तुम ही से डरने लगा हूं मैं अंधेरों में ही उजाले नजर आने लगे हैं अंधेरों से दीए जलाने लगा हूं मैं ...

उत्तर- आधुनिकता के अन्तर्विरोध

उत्तर- आधुनिकता को लेकर भारत में और विशेष रूप से हिन्दी- क्षेत्र में बहुत भ्रम और आकर्षण है। सामान्यतः हमारे पास इसको लेकर बहुत आधी- अधूरी सूचनाएं हैं। ज्यादातर तो उत्तर- आधुनिकता की चर्चा बतौर फैशन की जाती है, उसे लेकर कोई गंभीर चिंतन और चिंता हमारे यहां लगभग अनुपस्थित है। इस संदर्भ में हम इस खतरनाक भ्रम पर कुछ विचार करना चाहेंगे। वास्तव में, उत्तर- आधुनिकता कोई एक विशिष्ट चिंतन- सरणि या विचारणा नहीं है, यह उत्तर- आधुनिक पाश्चात्य समाजों की विभिन्न चिंतन- सरणियों के एक समग्र दौर का नाम है। यह समय- विभाजन को, उसमें आए समस्त परिवर्तनकारी कारकों के परिप्रेक्ष्य को ठीक से समझने के लिए दी गयी एक संज्ञा है। पिछले दशकों में यूरोप में चिंतन, संस्कृति और सृजनात्मकता के क्षेत्र में ढेर सारी प्रवृत्तियाँ उभरीं। इन प्रवृत्तियों को उत्तर आधुनिकता की संज्ञा से अभिहित किया गया। उत्तर- आधुनिकता यदि एक विशिष्ट जीवन- दृष्टि है तो इस अर्थ में कि इसमें उत्तर- औद्योगिक दौर की उन्नत सभ्यताओं की प्रमुख लाक्षणिकताएं- उच्च तकनीक, वैश्विक बाजार, नव- उपनिवेशवाद और आर्थिक उदारीकरण तथा विश्व स्तर पर संस्कृतियों क...

कुकुछीना स्मृतियां - राजाराम भादू

प्रो. लालबहादुर वर्मा का असमय जाना बहुतों की तरह मेरे लिए भी वैयक्तिक क्षति है क्योंकि मेरे लिए भी वे मेन्टर व गाइड की तरह रहे, हालांकि मैं उनसे उतना संपर्क- संवाद में नहीं था। उनके साथ मेरी कुकुछीना की स्मृतियाँ अहम रही हैं, जहाँ मैं ने उन्हें कई रंगतों में देखा। वहाँ वे हरेक से व्यक्तिगत आत्मीय बातचीत कर रहे थे। सबसे हंसी- मजाक करते बोल- बतिया रहे थे तो कोरस में गा रहे थे और मधुर धुनों पर समूह- नृत्य में भी भागीदारी कर रहे थे। वे जितनी चिन्ता से प्रबंधन की छोटी- छोटी जिम्मेदारियां संभाल रहे थे तो उतनी ही गंभीरता से विभिन्न सत्रों का संयोजन देख रहे थे। उनके उद्बोधन तो सदा अनुप्राणित करने वाले होते ही थे। उत्तराखण्ड की दूनागिरि पर्वतमाला में यह सुरम्य स्थान वर्मा जी ने ही खोजा था। कभी यूं ही भ्रमण करते वे इधर आ निकले थे और यह जगह उन्हें इतनी भायी कि अगले वर्ष से यहां मित्रों का एक समागम करने का तय किया जो तीन बार आयोजित किया गया। इसे मूर्त रूप देने में कुकुछीना के नेत्र वल्लभ जोशी का विशेष योगदान रहा। कुकुछीना को दो तरफ से घेरे दूनागिरि पर्वत के एक सिरे पर महावतार बाबाजी की गुफा है जिस...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान-1

रंगमंच  समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -1                                         राघवेन्द्र रावत  समकालीन हिंदी रंगमंच के बारे में बात बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से भी की जा सकती थी लेकिन मुझे लगता है कि उससे पूर्व के भारतीय रंगमंच के परिवर्तन की प्रक्रिया पर दृष्टिपात कर लेना ठीक होगा | उसी तरह राजस्थान के समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करने से पहले भारतीय हिंदी रंगमंच पर चर्चा करना जरूरी है, और उससे भी पहले यह जानना भी आवश्यक है कि वस्तुतः रंगमंच क्या है ?और रंगमंच के बाद हिंदी रंगमंच और उसके बाद समकालीन हिंदी रंगमंच पर बात करना एक उचित क्रम होगा भले ही यह मेरे अध्ययन की गरज ही लगे | राजस्थान के रंगमंच पर बात करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इस पर हिंदी साहित्य की तरह चर्चा नहीं हुई चाहे वह आलोचना की दृष्टि से देखें या इसके इतिहास की नज़र से देखें | दो वर्ष पहले ‘जयरंगम’ नाट्य समारोह के एक सेशन में बोलते हुए वरिष्ठ रंग एवं फिल्म समीक्षक अजित राय ने कहा था-“ पता नहीं कौन सा नाटक...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

विजयदशमी - रेखा चटर्जी

कहानी नयी सभ्यता द्वारा प्रदत्त संघातिक बीमारियों और उनके महंगे उपचार अल्प- आय वर्ग के परिवारों को तबाही की ओर धकेल रहे हैं। इसके विरुद्ध भी महिलाएं ही असीम धैर्य और अदम्य जिजीविषा से लड रही हैं। रेखा चटर्जी की कहानी में यह यथार्थ मार्मिकता में उभरता है, साथ ही बहनापा ( सिस्टरहुड ) भी  रूप  एक शक्ति के   रूप में उद्घाटित होता है। मीमांसा में स्वागत है रेखा ! दुर्गा माँ के बोधोन के साथ ही आज से दुर्गा पूजा शुरू हो गयी थी। हर बंगाली परिवार के घर में उल्लास का माहौल था, लेकिन भाव्या के लिए यह दिन पिछले कई दिनों की तरह भारी था। सौरभ की किडनी की बीमारी ने उसके परिवार के उत्साह और उल्लास को जैसे नजर लगा दी हो। कब सौरभ की दोनों किडनी खराब हो गयीं पता ही नहीं चला। सौरभ में तो कोई ऐब भी नहीं था। उसने शराब, गुटखा या सिगरेट के कभी हाथ भी नहीं लगाया, फिर ऐसा कैसे हुआ। लेकिन हकीकत यही थी कि सौरभ की दोनों किडनी डैमेज हो चुकी थीं और आज वो अस्पताल में जिन्दगी और मौत से संघर्ष करते हुए डायलिसिस के भरोसे एक नई जिन्दगी की पाने की उम्मीद में जी रहा था। ऐसे में भी भाव्या अस्पताल में भर्ती पति...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...