सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लेखक जी तुम क्या लिखते हो

संस्मरण 
हिंदी में अपने तरह के अनोखे लेखक कृष्ण कल्पित का जन्मदिन है । मीमांसा के लिए लेखिका सोनू चौधरी उन्हें याद कर रही हैं , अपनी कैशौर्य स्मृति के साथ । एक युवा लेखक जब अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी के उस लेखक को याद करता है , जिसने उसका अनुराग आरंभिक अवस्था में साहित्य से स्थापित किया हो , तब दरअसल उस लेखक के साथ-साथ अतीत के टुकड़े से लिपटा समय और समाज भी वापस से जीवंत हो उठता है ।

    लेखक जी तुम क्या लिखते हो 

                                          सोनू चौधरी
 
हर बरस लिली का फूल अपना अलिखित निर्णय सुना देता है, अप्रेल में ही आऊंगा।
बारिश के बाद गीली मिट्टी पर तीखी धूप भी अपना कच्चा मन रख देती है। मानुष की रचनात्मकता भी अपने निश्चित समय पर प्रस्फुटित होती है । कला का हर रूप साधना के जल से सिंचित होता है। संगीत की ढेर सारी लोकप्रिय सिम्फनी सुनने के बाद नव्य गढ़ने का विचार आता है । नये चित्रकार की प्रेरणा स्त्रोत प्रकृति के साथ ही पूर्ववर्ती कलाकारों के यादगार चित्र होते हैं और कलम पकड़ने से पहले किताब थामने वाले हाथ ही सिरजते हैं अप्रतिम रचना ।

मेरी लेखन यात्रा का यही आधार रहा ,जो अब तक ज़ारी है । ये मन प्रेमचंद,शरतचन्द्र,महाश्वेता देवी ,महादेवी ,मैथलीशरण गुप्त ,दिनकर ,कबीर,शिवानी ,कृष्णा सोबती ,घनानंद ,धूमिल ,पाश ,श्रीकांत वर्मा ,रघुवीर सहाय ,त्रिलोचन ,असद जैदी ,अज्ञेय ,मुक्तिबोध,परसाई,मंटो ,विनोबा भावे,रवींद्रनाथ टैगोर,कुसुमाग्रज,नागार्जुन ,रांगेय राघव,कन्हैयालाल सेठिया,हजारी प्रसाद दिवेदी,शैलेन्द्र मटियानी, रामचंद्र शुक्ल ,चेखव ,ब्रेख्त ,पाब्लो ,काफ्का और भी न जाने कितने महत्वपूर्ण नामों की सारी रचनाओं को खोज-खोज कर जज्ब करना चाहता है ।जैसे प्यासा जल की खोज में जंगल -पर्वत-घाटी पार करता जाता है। ये मन आज अपने सामने दिख रहे दिग्गजों को भी पढ़ना चाहता है । ये यात्रा ज़ारी है। कहा भी गया है न कि मण भर अच्छा साहित्य पढ़ना कण भर लिखने के लिए जरूरी है । शायद तभी पुस्तकालय मेरे लिए किसी मन्दिर से कम नहीं रहे।
आईये शुरू से बताती हूँ कि साहित्यिक नींव की मिट्टी कहाँ से मिली .... 
  
11 बरस की अबोध उम्र अल्हड़पन की बलैयां लेने की उम्र होती है !!
सब आपके कद और चोटी की लम्बाई से आपको बड़ा मान रहे होते हैं पर यकीनन आप उतने बड़े भी नही होते ! 
रैक के सबसे ऊपर पड़ी किताबों और पत्रिकाओं को लेने की जुगत में दो बार स्टूल से गिर चुके होते हो और अगले दिन थोड़ा लंगड़ा कर चलने के बावजूद किसी की पुचकार नहीं मिलती और ध्यान दिलाने पर याद दिलाया जाता है कि ध्यान से हर काम करो क्योंकि अब आप उतने छोटे भी नहीं रहे।
तीसरी बार स्टूल पर चढ़ते ही पीछे से बड़ा भाई आकर धौल जमाते ही पूछता है क्या चाहिए ? आप संतुलन सम्भालते हुए अपने से दस साल बड़े भाई के सामने याचक दृष्टि से बोलते हो 'धर्मयुग '

भाई हँसते हुए आपको धर्मयुग पकड़ाते हुए कहता है नीचे मेज पर नंदन, ट्विंकल पढ़ ।
बड़ों की मैगजीन क्यों पढ़ रही है ? 
अच्छा जी, जब मचलो किसी नन्हीं जिद पर तो मैं बड़ी और धर्मयुग पढना हो तो छोटी ! ,पर ये बड़े छोटे भाई- बहन किसी देवदूत से कम नहीं होते  ,ऐन मौके पर श्वेत-श्याम जिन्दगी को रंगबिरंगी कर देते हैं।
मैं नीचे फर्श पर अपनी फ्राक फैला कर बैठी हूँ और मेरी छोटी सी गोद में बड़ी सी धर्मयुग हैं .धर्मयुग ही क्यों कादम्बिनी और मनोरमा भी अपने बड़े आकार के साथ उस दशक में लोकप्रिय थी । 
यह 1980 का युग था ये धर्म युग था ऐसा नही कह सकती क्योंकि 1980 कई उलट पुलट घटनाओं का गवाह था ।
मैं अखबार पढ़ती थी और किशोरवय की विद्रोही उम्र के करीब यह पहेली बूझती थी कि लड़ाई प्यार से ज्यादा जरूरी है और प्यार पाने के लिए भी ,माँ की गोद की उम्र नही थी पर लाड़ लड़ाने की तो थी ।अपने से 5 साल की छोटी बहन (जिसे दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती हूँ )को माँ और स्नेहिल बड़ी बहन के पास देखते ही लड़ने दौड़ पड़ती.पर जल्द ही उसकी प्यारी शरारतों में खो जाती ।
अख़बारों में ही नहीं धर्मयुग में खबरों के विश्लेषण आते थे पर अल्हड़पन में कुछ हेडलाइन ,डब्बू जी,कविता,गीत और चित्रांकन ही धर्मयुग की ओर खींचता था।कभी कभी  माँ का अस्फुट स्वर सुनाई देता जब वे धारावाहिक कहानी पढ़ने में इतनी तन्मय हो जाती कि पात्रों के साथ जुड़ कर बोलने लगती .या फिर हम खिलंदड़ इतना शोर मचाते कि उन्हें बोल बोल कर उस रोचक कहानी को पूरा करना होता ,तब उस रात मेरा उनसे यही आग्रह रहता कि वे वो ही कहानी सुनाएँ पर वे मुझे नन्हीं मान टाल जाती और कोई बच्चों की कहानी सुनाती। उन्हें क्या पता कि मैं भी बिना पल्ले पड़े कहानी को पढ़ चुकी होती थी।फणीश्वर नाथ रेणु ,महाश्वेता देवी पर आये आलेखों पर बड़ा भाई और बहन चर्चा करते ,कुछ राजनैतिक मसलों पर भी परिवार में संवाद होता .इन सब अनौपचारिक वार्तालापों ने मुझ पर बहुत असर डाला .परिवार में हिंदी को विशेष प्रोत्साहन मेरे भीतर हिंदी में अत्यधिक रूचि उपजने का एक मुख्य कारण बना .पर इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा था. 

मेरा जन्म शिवालिक पहाड़ियों से आच्छादित हनुमानगढ़ में हुआ .यह राजस्थान के उत्तर में बहने वाली घग्गर नदी के किनारों पर बसा एक छोटा सा ऐतिहासिक कस्बा था जो गंगानगर से अलग होकर 1994 में एक स्वतंत्र जिला बना. सदियों पहले यहाँ सरस्वती नदी बहती थी और यह जगह भटनेर कहलाती थी .भटनेर का विख्यात किला जैसलमेर के भाटी राजा भूपत सिंह ने बड़ी खूबसूरती से बनवाया था पर बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने मंगलवार के दिन इसे जीत कर इसका नाम रखा हनुमानगढ़ ! 5000 वर्ष पुरानी सिन्धु घाटी सभ्यता का केंद्र कालीबंगा,पीलीबंगा  रंगमहल ,गोगामेड़ी ,भद्रकाली का मन्दिर हनुमानगढ़ की मंत्रमुग्ध कर देने वाली विरासतें हैं जिन पर मुझे गर्व है .यहाँ एक मीठे पानी की झील है तलवाड़ा ,कहते हैं यहाँ पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का युद्ध हुआ था .
  तो हुआ यूं कि मेरे जन्म से कुछ समय पूर्व ही पिता का स्थानान्तरण जयपुर से हनुमानगढ़ हुआ.अंग्रेजी स्कूल में पढ़े मेरे भाई-बहन के लिए इस कस्बे का हिंदी माध्यम का स्कूल किसी युद्धक्षेत्र से कम न था तब परिवार में यह निर्णय लिया गया कि हिंदी के नये वाक्यों और शब्दों को अधिक से अधिक पढ़ा-सुना-बोला जाए.हमारे घर में हिंदी का सम्मान और भाषा की शुद्धता पर शुरू से ही आग्रह था क्योंकि पिता और माँ दोनों को पढ़ने लिखने का शौक था। कुल मिला कर हिंदी की ये नींव मजबूत इमारत बना गयी। .धर्मयुग का हर अंक घर भर में पढ़ा सहेजा जाता रहा ,जो बाद में काल कलवित हो गया .बहुत वर्षों तक पुराने अंकों को पुनःपुनः चाव से पढ़ा जाता . 11 से 16 बरस की उम्र को धर्मयुग के पंख लगे थे .धर्मवीर भारती की रचनाएँ और सम्पादकीय को पढ़ना गजब था। गुनाहों के देवता घर घर पहुंच गाए थे। .कादम्बिनी या मनोरमा में महादेवी वर्मा और शिवानी की कहानियाँ भी अगले कई बरस पढ़ी मैने । दिन पंख लगा कर उड़ते थे ।बड़े साहित्यिक नामों को जानना और पढ़ना बेहद सुखद था । बाद में मक्सिम गोर्की को पढ़ना किसी अथाह नदी में डुबकी लगाने जैसा था । मेरा बचपन और माँ उपन्यास को कितनी ही बार पढ़ा, रूस और लेनिन को तब गोर्की के माध्यम से ही जाना।
मुझसे कुछ टूटी फूटी कहानी  कविताएँ अपनी नन्हीं बहन पर रोब जमाने के लिए बननी शुरू हो गयी थी ।
1980 का साल बड़े घटनाक्रमों का साक्षी बना .संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत ,इंदिरा गांधी का इस दुखद घड़ी में अपने जज्बातों पर काबू, जहाँ विमान गिरा था उस जगह पर इंदिरा जी का कुछ खोजना भी फोटो सहित धर्मयुग में सलेटी बॉक्स में छपा था , धुंधली सी याद है मुझे। 
टेलीविजन नेटवर्क का प्रसारण ,प्रेमचंद के निर्मला उपन्यास का दूरदर्शन पर रूपांतरण,शकुंतला देवी का कैलकुलेटर से तेज दिमाग जिन्होंने 13 अंकों को अल्प समय में गुणा करने की परीक्षा में सफल होकर विश्व भर में उसी साल अपना लोहा मनवाया । मदर टेरेसा के सेवा कार्य   ,पृथ्वी की कक्षा में रोहिणी उपग्रह (उस समय लगता था सबकी कक्षा लगती है ) 
ये सब 1980 के साल की कभी न भूलने वाली घटनाएँ थी पर मेरे व्यक्तित्व पर असर डालने वाली ,मुझे लिखने के लिए प्रेरित करने वाली पहली रचना थी एक गीत जो इसी 1980 के बरस धर्मयुग में छपा .मैने उसे इतनी बार पढ़ा कि यह आधा अधूरा याद में दर्ज हो गया।इस गीत की पहली पंक्ति "लेखकजी तुम क्या लिखते हो" कहते हुए मैं सारे घर में दौड़ लगाती, रुक कर चिड़ियों को देखती और लिखती --
देखो कितना सुंदर गाती  
ची ची चिड़िया पंख फैलाती
जब देखो तब माँ भी
फुर्र फुर्र कह के इन्हें उड़ाती 
कौन देगा दाना पानी की इनको मीठी सौगात
कौन बनेगा साथी इनका ,कौन करेगा बात
ये अल्हड़ बीज थे लेखन के ।
1981 में आई बाढ़ धर्मयुग और कई सारी पत्रिकाओं के कुछ सहेजे अंक अपने साथ ले गयी पर छोड़ गयी वे अमिट यादें ...लेखक जी तुम क्या लिखते हो   
अभी हाल ही में समालोचन के एक अंक में इस गीत को आदरणीय कृष्ण कल्पित सर के लेख के साथ पूरा पढ़ने पर न जाने कितने बरस पुरानी  आस की तृप्ति हुई और उस वक्त की एक -एक घटना जेहन में तिर गयी। 

लेखकजी तुम क्या लिखते हो
हम मिट्टी के घर लिखते हैं
धरती पर बादल लिखते हैं
बादल में पानी लिखते हैं
मीरा के इकतारे पर हम
कबिरा की बानी लिखते हैं

सिंहासन की दीवारों पर
हम बाग़ी अक्षर लिखते हैं

काग़ज़ के सादे लिबास पर
स्याही की बूँदों का उत्सव
ठहर गया लोहू में जैसे
कोई खारा-खारा अनुभव

फूलों पर ख़ुशबू के लेखे
बंदूकों में डर लिखते हैं !


शुक्रिया आदरणीय कृष्ण कल्पित सर मेरे लेखन बीज के लिए !! इसे संयोग ही कहूंगी कि अब आपकी किताब कविता रहस्य मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक है । और अब तीव्र उत्कंठा है कि हिंदनामा पढूं !
जब भी लिखने बैठती हूँ , यही पहला कालजयी सवाल मेरे मन में कौंधता है
              “लेखक जी तुम क्या लिखते हो”

सोनू चौधरी 
राजस्थान के हनुमानगढ़ में जन्म।सूचना शिक्षा एवं संचार विशेषज्ञ  के रूप में सहायक निदेशक के पद पर जमीनी स्तर पर जुड़ कर कार्य करने का अनुभव।,विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं ,आकाशवाणी ,दूरदर्शन में विविध विधाओं में प्रकाशन,प्रसारण।वर्तमान में कविता,प्रोज,कहानी,शोध आदि में सक्रिय।


टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर लिखा । सोनू चौधरी और मीमांसा को धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं
  2. सोनू चौधरी जी बहुत सुंदर लिखा आपने। वही समय होता है जब बहुत सारा अंत: में समा जाता है। शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन

कला- जगत में लगभग बिसरा दी गयी शिल्पकार हिमा कौल पर राजाराम भादू ने पूरी किताब लिखी है जिसमें उनके कलात्मक विकास और वैयक्तिक संघर्ष का संवेदनशील और जीवंत चित्रण किया है। अपराजित: शिल्पकार हिमा कौल शीर्षक यह पुस्तक रजा फैलोशिप के अन्तर्गत लिखी गयी थी। कला- मर्मज्ञ हेमंत शेष ने इस पर बड़ी गहराई से लिखा है। अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन समीक्षक : हेमंत शेष अपराजित : शिल्पकार हिमा कौल एक नियमित जीवनी से कहीं अधिक है; यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का एक कार्य है। राजाराम भादू ने ऐतिहासिक उपेक्षा की छाया से एक उग्र, संवेदनशील कलात्मक विरासत को सफलतापूर्वक बाहर निकाला है। कला-इतिहासकारों, आलोचकों और आधुनिक भारतीय दृश्य संस्कृति में रुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए, यह पुस्तक एक ऐसी कलाकार का एक प्रभावशाली प्रमाण है, जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को स्थायी मूर्त रूप में बदल दिया। भारतीय कला-इतिहास और आलोचनात्मक साहित्य में, कई परिवर्तनकारी आवाज़ें अक्सर दुखद गुमनामी में चली गई हैं, जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श से बाहर कर दिया गया। दिवंगत मूर्तिकार हिमा कौल ऐसी ही एक गहन, फिर भी कम प्रलेखित उपस्थिति का ...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

दस कहानियाँ-१ : अज्ञेय

दस कहानियाँ १ : अज्ञेय- हीली- बोन् की बत्तखें                                                     राजाराम भादू                      1. अज्ञेय जी ने साहित्य की कई विधाओं में विपुल लेखन किया है। ऐसा भी सुनने में आया कि वे एक से अधिक बार साहित्य के नोवेल के लिए भी नामांकित हुए। वे हिन्दी साहित्य में दशकों तक चर्चा में रहे हालांकि उन्हें लेकर होने वाली ज्यादातर चर्चाएँ गैर- रचनात्मक होती थीं। उनकी मुख्य छवि एक कवि की रही है। उसके बाद उपन्यास और उनके विचार, लेकिन उनकी कहानियाँ पता नहीं कब नेपथ्य में चली गयीं। वर्षों पहले उनकी संपूर्ण कहानियाँ दो खंडों में आयीं थीं। अब तो ये उनकी रचनावली का हिस्सा होंगी। कहना यह है कि इतनी कहानियाँ लिखने के बावजूद उनके कथाकार पक्ष पर बहुत गंभीर विमर्श नहीं मिलता । अज्ञेय की कहानियों में भी ज्यादा बात रोज पर ही होती है जिसे पहले ग्रेंग्रीन के शीर्षक से भी जाना गया है। इसके अला...

जुरहरा की रामलीला

"लोक में राम और जुरहरा की रामलीला " डॉ॰ जीवन सिंह द्वारा लिखित एक अलग तरह की किताब है। इसमें डेढ शताब्दी से भी अधिक समय से जुरहरा में होने वाली रामलीला का विस्तृत दस्तावेजीकरण है। जुरहरा गाँव के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के साथ रामलीला की शैली, अभिनय- प्रक्रिया और लीला- प्रबंधन का ऐतिहासिक विवरण है। इस रामलीला ने वहाँ साधारणता और सामूहिकता की भावना को ऊर्जस्विता प्रदान की है। जुरहरा राजस्थान के भरतपुर जिले का  सीमावर्ती गाँव है जो अब बड़े कस्बे का रूप ले चुका है। ये राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमाओं के मध्य स्थित है। करीबन पांच शताब्दी पूर्व बसे इस गाँव में हिन्दू, जैन और मेव मुस्लिमों की आबादी है। आंचलिक रूप से मेवात और सांस्कृतिक रूप से ब्रज- मेवाती भाषी इस कस्बे के हिन्दुओं में अनेक सवर्ण, पिछड़ी व दलित जातियाँ शामिल हैं। जीवन सिंह लिखते हैं कि आजादी के आन्दोलन के समय सुधारिणी सभा ने गाँव में साक्षरता के साथ वाचनालय- पुस्तकालय स्थापित किये लेकिन आज की तारीख में कस्बे में कोई पुस्तकालय नहीं है। रामलीला जुरहरा का ऐसा सांस्कृतिक अनुष्ठान है जो सभी तरह के लोगों को परस्...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

शिक्षा विमर्श के नए आयाम खोलती 'किताब'

कृति चर्चा  प्राचार्य एवं  प्रशासक रहे डॉ आर.डी सैनी लगभग चालीस वर्षों से साहित्य संसार में सक्रिय हैं । कविता ,उपन्यास एवं कथेतर विधाओं से गुजरते हुए 'किताब' उनकी दसवीं पुस्तक है । 'विचार प्रक्रिया ' और 'संज्ञानात्मक बोध ' का बच्चों में विकास कैसे हो ? इसका व्यावहारिक धरातल पर समाधान यह पुस्तक प्रस्तुत करती है   । डॉ. ममता चतुर्वेदी प्राचार्य है , जो कि लंबे समय से पठन-पाठन के साथ-साथ शिक्षा के व्यापक सरोकारों से जुड़ी रही हैंं । एक शिक्षिका की दृष्टि से डॉ. आर.डी सैनी की 'किताब' की यह समीक्षा , पाठकों को शिक्षा से जुड़े उन मूलभूत प्रश्नों एवं समस्याओं के समाधान समझने में मदद करेगी , जिनका सफलतापूर्वक सामना लेखक ने स्वयं किया है ।  यह पुस्तक समीक्षा 'किताब' के सभी आयामों को दृष्टिपात करते हुए पाठक को किताब की दहलीज तक ले जाती है । एक पुस्तक के रूप में  'कुछ यूं रचती है हमें "किताब", शिक्षा व बाल मनोविज्ञान पर आधारित भाव प्रधान पुस्तक है । इसमें लेखक डॉ आर.डी सैनी ने मानव मूल्य , नैतिकता, कर्तव्य एवं घटनाओं का मार्मिक चित्रण किया है...

डायरी - रामानंद राठी

डायरी डायरी में प्रस्तुत है लेखक रामानंद राठी की डायरी के अंश । रामानंद राठी की चार दशकों में फैली रचना यात्रा पर टिप्पणी की है उनके सृजन के सहयात्री आलोचक मनु शर्मा ने । आलोचक मनु शर्मा की यह टिप्पणी न केवल लेखक रामानंद राठी के सृजन के सरोकारों पर दृष्टि डालती है अपितु उनकी रचना प्रक्रिया की समग्रता में गहराई से विवेचना भी करती है । रामानंद राठी की रचना प्रक्रिया                                                        ■    डॉ. मनु शर्मा रामानंद राठी ने कहानियों के अलावा शब्द चित्र , रिपोर्ताज ,नाटक, जीवन वृत्त, इतिहास और कला संस्कृति पर भी लिखा है । और इन सभी में उनकी रचनात्मकता के अलग-अलग पहलू प्रकट हुए हैं । अधिकतर रचनाओं में उनका पैतृक गांव गूंती महानायक की भांति मौजूद है। ऐसा महानायक जो निरंतर अपनी सीमाओं को लांघ कर विराट रूप में सामने आता है । जैसे 'पिंड में ब्रह्मांड '।  अपनी जड़ों की पहचान के दौरान राठी ने उन संदर्भों की खोज की...

नित्यानंद गायेन की कविताएँँ

कवि -कविता  जन सरोकारों से जुड़े कवि का नाम है नित्यानन्द गायेन                                                      ■  दिनकर कुमार रूस के एक प्रांत दागिस्तान के लोक कवि रसूल हमजातोव कहते हैं कि कभी-कभी मैं अपने से यह प्रश्न करता हूं कि क्या चीज कविता का स्थान ले सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि कविता के अलावा पहाड़ हैं, बर्फ और नदी -नाले हैं, बारिश और सितारे हैं, सूरज और अनाज के खेत हैं…। मगर क्या पहाड़ , बारिश, फूल और सूरज का कविता के बिना और कविता का इनके बिना काम चल सकता है? वे आगे कहते हैं -कविता के बिना पहाड़ पत्थर बन जाएंगे, बारिश परेशान करने वाले पानी और डबरों में बदल जाएगी और सूर्य गर्मी देने वाला अंतरिक्षीय पिंड बनकर रह जाएगा।   कवि नित्यानन्द गायेन की कविताएं काफी दिनों से पढ़ते हुए मैंने महसूस किया है कि वह जन सरोकारों से जुड़े हुए कवि हैं। आम लोगों के हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है। उनकी यही ईमानदारी और बेबाकी उनको य...

कविताएं : सत्यदेव बारहठ

सत्यदेव बारहठ एक छुपे हुए कवि थे। लंबे छुपाव और संकोच के बाद वे इस रूप में प्रकट हुए हैं। उनके कवि का स्वागत करते हुए हम उनकी कविताएँ मीमांसा में प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही, कविताओं पर सत्यनारायण की टिप्पणी है। सत्यदेव बारहठ की कविताएं अपने समय, समाज और स्वयं से रूबरू कविताएं हैं। इन कविताओ ंका फलक तीन साढ़े तीन दशक के बीच फैला हुआ है। हालांकि इस बीच कवि के विचार और स्वभाव में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया बल्कि वह अधिक प्रौढ़़ और ज्यादा निखरकर सामने आया है। इसीलिए ये कविताएं आज भी बराबर विश्वसनीय बनी हुई हैंै। कवि को तब भी यह विश्वास था कि - ’’तार वीणा के बजेंग/ कर्ण स्वर आनंद लेंगे/ मधुर वेला की प्रतीक्षा हेतु/ अब यह जागरण है/ जागरण है/ जागरण है।’’ चार दशक पहले लिखी कविता के ये अंश हैं तो सन् दो हजार में लिखी कविता की पंक्तियां हैं - ’’मनुष्य होने का अर्थ तलाशते/ हमारे हाथ यह सत्य लगा है/ कि हम हारें नहीं/ अपनी पूरी सामथ्र्य से/ मुकाबला करें/ मनुष्य के खिलाफ खड़ी/ ताकतों का/ मनुष्य को/ विवेकहीन, दीन-हीन, कातर/ बना देने वाली ताकतों का।’’ लेकिन दो हजार पांच तक आते आते कवि को लगता है कि - ’’सत...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...