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डायरी - रामानंद राठी

डायरी
डायरी में प्रस्तुत है लेखक रामानंद राठी की डायरी के अंश । रामानंद राठी की चार दशकों में फैली रचना यात्रा पर टिप्पणी की है उनके सृजन के सहयात्री आलोचक मनु शर्मा ने । आलोचक मनु शर्मा की यह टिप्पणी न केवल लेखक रामानंद राठी के सृजन के सरोकारों पर दृष्टि डालती है अपितु उनकी रचना प्रक्रिया की समग्रता में गहराई से विवेचना भी करती है ।
रामानंद राठी की रचना प्रक्रिया
                                                       ■   डॉ. मनु शर्मा
रामानंद राठी ने कहानियों के अलावा शब्द चित्र , रिपोर्ताज ,नाटक, जीवन वृत्त, इतिहास और कला संस्कृति पर भी लिखा है । और इन सभी में उनकी रचनात्मकता के अलग-अलग पहलू प्रकट हुए हैं । अधिकतर रचनाओं में उनका पैतृक गांव गूंती महानायक की भांति मौजूद है। ऐसा महानायक जो निरंतर अपनी सीमाओं को लांघ कर विराट रूप में सामने आता है । जैसे 'पिंड में ब्रह्मांड '।

 अपनी जड़ों की पहचान के दौरान राठी ने उन संदर्भों की खोज की है , जिनसे आजाद भारत के गांव में अप-संस्कृति , नैतिक पतन , मनुष्यता के लोप और उपभोक्ता संस्कृति के क्रूर चेहरे को अच्छी तरह पढ़ा जा सके । इन्हीं के चलते गांव की सहजता , सादगी , भोलापन और सामुदायिकता दुर्लभ होती चली गई ।

स्थानीयता ,भौगोलिक परिवेश, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के साथ सौंदर्य बोध ने भी राठी की रचनाओं में प्रमुखता से अपनी जगह बनाई है । एक कुशल फोटोग्राफर की तरह जीवन यथार्थ को पूरी गतिशीलता में ग्रहण करके शब्द चित्रों में कैद कर देना उनकी एक रचनात्मक प्रवृत्ति है । समृद्ध और सूक्ष्म पर्यवेक्षण राठी की रचना प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव है । अपने आसपास की वस्तुओं , व्यक्तियों , प्रकृति और समाज की छोटी से छोटी गतिविधि को पूरी शिद्दत से अनुभूत करते हुए अपनी संवेदनाओं को विस्तार देकर वह छोटे फलक की रचनाओं को भी बड़ी बना देता है ।
राठी की कहानियों का कलेवर ज्यादा विस्तृत नहीं होता । वह किसी विशेष अभिप्राय को कथानक के क्रम में ढालता है । कथानक की संरचना के लिए चरित्रों और घटनाओं की अपेक्षा वह परिवेश रचना पर खासा बल देता है  । भू-दृश्य, लोक व्यवहार और सांस्कृतिक संदर्भ उसकी परिवेश रचना के मुख्य घटक हैं । उसकी कहानियों और शब्द चित्रों में घटनाओं के स्थान पर परिवेश और मानवीय चरित्रों का राई रत्ती ब्यौरा मिलता है । संयोग तत्व और नाटकीयता  कहीं नाम मात्र को दिखाई पड़ती है । अपने अभिप्राय की सौंदर्यमूलक अभिव्यक्ति के लिए वह पहले लिखता है और फिर उसे बार-बार रचता है ।
अपने वैचारिक आग्रहों को राठी ने कहीं भी बंधे बंधाए सांचे में प्रस्तुत नहीं किया है । वे या तो चरित्र के स्वभाव का हिस्सा होते हैं या फिर उस परिवेश की उपज जिसमें चरित्र विकसित हुआ है । कुछ नहीं होते हुए भी बहुत कुछ होने की हेकड़ी को जीते हुए चरित्रों की बनावट में राठ अंचल का वह अक्खड़पन है जिसके लिए कहा गया है कि 'काठ नवे पर राठ नवे ना ।' व्यवस्था की विसंगतियों और जीवन मूल्यों के गहराते संकट की रचनात्मक अभिव्यक्ति को वह लेखककीय जिम्मेदारी मानता है ।
राठी की रचनाएं अन्तर्जगत और बाहरी दुनिया की मिली जुली प्रतिक्रिया है । स्मृतियां उनके लिए प्रेरक तत्व हैं । उल्लेखनीय है कि मौजूदा यथार्थ की क्रूरताओं से वह अपनी स्मृति को निरंतर बचाए रखता है । व्यवस्था की बनावट में जो खोट है , उसे अपनी कहानियों, शब्द चित्रों और रिपोर्ताज के जरिये पाठकों तक पहुंचाने में उसने कोई कसर नहीं उठा रखी ।
 स्थानीयता को वह इस तरह ग्रहण करता है, जैसे कोई बच्चा पहली बार अपने परिपार्श्व को देखकर चकित हो रहा होता है । स्थानीयता के लिए वैसी बाल सुलभ अन्तरंगता , लोगों से आत्मीय लगाव और परिपार्श्व में तल्लीनता के रहते ही स्थानीयता की प्रतिध्वनि उसके यहां कदम-कदम पर सुनाई पड़ती है ।
स्वतंत्र रूप से राठ का इतिहास लिखने के अलावा राठी ने कहानियों, शब्द चित्रों, जीवन वृत्तों में भी अपनी इतिहास दृष्टि का बड़ा रचनात्मक उपयोग किया है । लोक जीवन का अध्ययन करते हुए वह लोक संगीत, लोक नाट्य ,लोक नृत्य ,लोक कलाओं पर जिस वैचारिक विविधता और संतुलन का परिचय देता है , वह उसकी समृद्ध सौंदर्य चेतना का साक्ष्य है ।
अंत में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि राठी ने अपनी रचनाओं से समाज में मौजूद सामंती अवशेषों पर चोट की है । यह चोट बाहर से दिखाई नहीं देती लेकिन भीतर ही भीतर व्याकुल करती रहती है । उनकी रचनाओं में जीवन सहज रूप में सृजित है । इतना सहज कि उसे सांसो की आवाजाही में अनुभव किया जा सकता है ।

डायरी अंश - 
                                         रामानंद राठी
एक
16 मई, 2001, सांगानेर, जयपुर
खुद को स्थगित कर लेने और चुप रहने से कुछ नहीं हुआ। स्थितियाँ निरंतर खराब होती जा रही हैं। भूख, कुपोषण और बीमारी से मरते नौनिहालों की संख्या बढ़ रही है। वे माता-पिता जो अमानवीय स्थितियों के दबाव में अपनी संतानों तक को बेच देते हैं, उनकी संख्या निरंतर बढ़ रही है। युवाओं को सपने थमा दिए गए हैं ताकि वे अपने गाँव-देहात और आस-पास की व्यथा से आँखें उठाकर उन सपनों पर टिका दें...... जहाँ नयी-नयी उपभोक्ता सामग्रियाँ और उन्हें प्राप्त करने की समयबद्ध योजनाएँ हैं। प्रतिभा का एकमात्र उपयोग जैसे संपत्ति बटोरना हो गया है। कानों से उन पर्दों को ही हटा देने का देशव्यापी उपक्रम चल रहा है, जिनसे आहत हृदयों की चीत्कारें सुनी जा सकें। कितना घातक, कितना दूरगामी, कितना पूर्व-नियोजित षड्यंत्र है यह।

दो
3 जून, 2001, जयपुर
जिस घर में इन दिनों मैं रह रहा हूँ, वह एक विधवा का घर है। मुझे नहीं मालूम कि इस स्त्री के पति की मृत्यु को कितने दिन बीत गए लेकिन इस घर को देखकर मैं बता सकता हूँ कि यह बहुत पुरानी घटना होगी। अब यह स्त्री अधेड़ है और यह हादसा करीब-करीब इसके युवा दिनों की घटना होगी। वैधव्य अब इस स्त्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है। इस घर की हर चीज मानो प्रकृति के उस नैसर्गिक आनंद को उठाते हुए अजीब अपराध-बोध में डूब जाती है.... कि कोई एक पुरुष था जब हँसना और सितारों से आँख मिलाना एक स्वाभाविक जीवन-प्रसंग था...कि अब आनंद एक अनिवार्य रूप से दबा दिए जाने वाली अपराध भावना है। इस घर की दीवारें, घास, पेड़-पौधे,...सब कुछ जैसे विधवा हो गया!
वैधव्य की भी एक गतिशीलता और सृजन हो सकता है। उन पौधों पर जहाँ रसदार फल नहीं लगते, पत्तियाँ अधिक लचकदार और सुंदर पर्ण-विन्यास लिए हो सकती हैं। लेकिन यहाँ तो जैसे सब कुछ अपने होठ सिले हुए है। दीवारों से झांकती ईंटों के होठ भी मानो सिल दिए गए हैं। एक आदमी था जो मरते वक्त इस घर के जीवन की मानो गठरी बाँध कर उठा ले गया।
(सभी चित्र -अमित कल्ला)
तीन
29 जुलाई 2001, सांगानेर, जयपुर
इतनी खुली और खुशगवार शाम में भी जैसे दम घुट रहा है। आकाश में रोशनी के चश्मे बह रहे हैं और परिंदे बरसात-बाद की इस ठंडी हवा में जैसे नाच उठे हैं। एक परिंदा है.....बहुत जीवंत और फुर्तीला। आसमान में एक कोने से दूसरे कोने तक कुलाँचें भर रहा है। आकाश को नापने की जैसे धुन सवार है इस पर। धरती पर बसी दुनिया को बौना और बचकाना बना दिया है अथाह नीलेपन में परिंदों की इन उड़ानों ने।
आकाश में जीवन ही नहीं रह जायेगा यदि परिंदों की उन्मुक्त हलचलें वहाँ न हों।
इस चमकीले और खुशनुमा मौसम में भी मेरा दम घुट रहा है। एक परिंदे का विलाप मुझे बेचैन कर देता है।
मेरे सर के ऊपर से छोटे-छोटे पंछियों की एक कतार पर मारते हुए गुजर जाती है।

चार
24 अक्टूबर 2001, दुर्गा अष्टमी, सांगानेर, जयपुर
जड़ों से ही मिलता है जीवनरस। पेड़ों के लिए जितना यह सही है उतना ही निर्विकल्प सत्य यह मनुष्यों के लिए भी है। बिना जड़ों के कोई भी मनुष्य अपने वैभव में एक कृत्रिम फूल जैसा है-कम से कम उसकी आत्मा में, अस्पष्ट ही सही, यह अहसास एक स्थायी अनुभूति का रूप ले लेता है।
वी.एस. नायपाल को ही देखें। उनके लेखन में अपनी जड़ों की यह खोज, उन्हें सुदूर इतिहास के सांस्कृतिक भूगोल में ले जाती है। अपना चेहरा देखने के लिए आपको अपनी जमीन पर भरे पानी के सामने ही झुकना होगा। किसी और भू-भाग पर भरे पानी में अपने चेहरे की आप सही प्रतिकृति नहीं देख सकते।

पांच

20 मई 2002, लक्ष्मणगढ़, अलवर
इस सराय में और इस कस्बे में आज का दिन। एक चैदह-पन्द्रह वर्ष का किशोर मेरी बगल के कमरे में ठहरा है। वह ग्वालियर से किशमिश लाकर यहाँ बेचता है। इस धर्मशाला के बाहर मैं आज, ठेले पर लगी उसकी इस मीठी, स्वास्थ्यवर्धक दूकान को मुख्य गेट से आते-जाते देखता रहा। वह खुद भी बहुत मीठा-सा और विनम्र है। उसकी आँखें बताती हैं कि वह एक भावुक लड़का है। इसीलिए उसने किशमिश को चुना।
इस सराय का प्रबंधन एक युवा नेपाली के हाथों में है जिसका पिछले दिनों विवाह हुआ है और वह वहाँ से हाल ही में अपनी पत्नी को लाया है। मैं टूटी-फूटी नेपाली में एक-आध वाक्य उससे बोलता हूँ। फिर वह सुंदर लड़की न जाने क्या-क्या मुझे नेपाली में बताती जाती है। यह बहुत कुछ उलाहने जैसा है। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा लेकिन बहुत संजीदगी के साथ इस तरह सर हिलाता रहता हूँ जैसे सारी बातों को समझ रहा हूँ।
शाम ढलती है तो एक व्यक्ति बहुत संकोच के साथ आता है और बताता है कि जिस कमरे में मैं आज ठहरा हुआ हूँ उसमें कल तक फेरी लगाकर चद्दरें बेचने वाले कुछ व्यापारी रुके हुए थे। वह कुछ देर उस कमरे को ठगा-सा देखता रहता है और मेरे चेहरे पर कुछ ढूँढ़ता रहता है। लगता है इस व्यक्ति की उन लोगों से गहरी आत्मीयता हो गई थी और मुझे इस कमरे में वह स्वीकार नहीं कर पा रहा। अंत में, बहुत टूटे हुए मन से, वह अपने कमरे में लौट जाता है।

छह
17 दिसंबर 2005, जयपुर
स्मृति का संबंध काल से है और अवधारणा का स्मृति और विवेक दोनों से है। इसीलिए नया जीवन शुरू करने में स्मृति और अवधारणा-दोनों बाधक बनती हैं।
नया जीवन! नये जीवन का संबंध शरीर और मन, भौतिक और पराभौतिक, दोनों से है। यह दोनों स्तरों पर घटित होना चाहिए-सम्पूर्ण नवजीवन!
स्मृति को योग से इसीलिए बेधा जा सकता है क्योंकि योगी स्मृतिजाल के भीतर से, अपनी सूक्ष्म योगात्मा, जिसे योग-सूत्र में हवा से भी महीन कहा गया है, के जरिए स्मृतिजाल के पार जा सकता है। यहाँ तक कि कोई योगी अपने बचपन की पहली किलकारी तक को फिर से दुहरा सकता है। हालांकि यह बहुत कठिन होगा लेकिन ऐसा संभव है। यह सब सिद्धि के अनुसार होता है। कुछ जंतुओं में जैसे शारीरिक विकास की अवस्थाओं में प्रत्यावर्तन (पीछे लौटना) होता है।
तो क्या वह योगी जब वापस अपने वर्तमान को प्राप्त होगा तो एक स्मृति खोये विक्षिप्त के समान होगा? ऐसा नहीं होता-स्मृतिजाल तब उसके सामने भावना-तंतुओं के समान नहीं, बल्कि एक केंचुल के समान लटका होता है।
ऐसा दुर्लभ योग निर्जन कंदराओं में अर्जित होता हो, ऐसा भी नहीं है। यह मन और शरीर के अंतरण की एक दुर्लभ स्थिति है। कई बार कई वेश्याएँ बहुत प्रसिद्ध साध्वियाँ हुई हैं। मोक्ष के द्वार, यदि वे सचमुच कहीं हंै, तो निरंतर प्रयासरत मुमुक्षुओं के बजाय ऐसे ‘अधम प्राणियों’ के लिए आश्चर्यजनक ढंग से स्वतः खुलते पाए गए हैं।
लिखना भी एक योग है। संसार को और स्वयं अपने को.....देखना और शब्दों के माध्यम से उसका पुनर्सजृन!

सात
17 फरवरी 2006, नीमराणा
आतिशबाजी के सितारा मंडप से चुंधियाते आकाश में जब धमाकों की आवाज ठहर गई तो यह ड्रिंक सेशन के खत्म होने का संकेत था। ऐतिहासिक नीमराणा फोर्ट की बासंती गर्माहट में लिपटे शब्द-शिल्पियों की यह उपस्थिति वैश्विक मनुष्य के भीतर पथरा रही संवेदनाओं में पुनः स्पंदन का प्रयास था। वे अपनी पहचान, विरासत और स्व-स्थापना के लिए बेचैन अफ्रीकी और ऐशियाई महाद्वीपों के रचनाधर्मी थे।
इस दो दिवसीय परिसंवाद में रचनाकारों ने पीड़ित और उपेक्षित मानवता के घर कहे जा सकने वाले एशिया और अफ्रीकी महाद्वीपों के लोगों के जातीय प्रश्नों की गहन पड़ताल की और उनके हल ढूँढ़ने की कोशिश की। समकालीन मानव का तथाकथित ‘ग्लोबल फेस’ पूँजी और हथियारों की ताकत से दुनिया को एक-ध्रुवीय बना देने वाले मनुष्य का ही चेहरा है। एफ्रो-एशियाई लेखकों-कवियों की साॅलिडरिटी तथा भाषायी व सांस्कृतिक पहचान के प्रति उनका यह आग्रह नीमराणा सम्मेलन में साफ तौर पर उभर कर सामने आया।
इण्डोनेशिया, भूटान, नेपाल जैसे राष्ट्रों से आए प्रतिनिधि अपनी भाषा की वैश्विक पहचान के लिए प्रतिबद्ध दिखे। वे दो स्तरों पर संघर्षरत हैं- मंचों पर व्याख्यानों के जरिए तथा अपनी रचनाओं में अपनी भाषा, लोक व्यवहार और जीवन के मुहावरे की पुनस्र्थापना के माध्यम से। यही वजह है कि ‘‘शंकुतला: दि प्ले आव मेमोरी’’ शीर्षक से अंग्रेजी में लिखे गए अपने उपन्यास की लेखिका नमिता गोखले मंच से यह घोषित करती हैं कि जब उनका यह उपन्यास हिन्दी में छपकर आया तो भारतीय जीवन के प्रतीक और मुहावरे अंग्रेजी के बंधन से छूटकर अधिक स्वाभाविक और जीवंत हो गए।
और यही वजह है कि अपने पिता की पहचान में गोद ढँूढ़ने वाली, इंग्लैंड में जन्मी और पली-बढ़ी, जापान में विवाहित और अब सिंगापुर में रह रही ‘मीरा चंद’ अपने नाम की भारतीय ‘‘मीराँ’’ पहचान के लिए व्याकुल दिखी। वह हालांकि कोई भी भारतीय भाषा नहीं बोल पाती। उनकी माता स्विट्जरलैंड की तथा पिता भारतीय थे।
मेरी मेज पर अपनी ड्रिंक खत्म कर जापानी कवयित्री काजुको शिराइशी जब लड़खड़ाते कदमों से उठी तो धुंधले-से दिखते एक अफ्रीकी लेखक से मैंने रचना की आत्मा को अभिव्यक्त करने के लिए सिर्फ दो शब्दों के उच्चारण के लिए कहा। ‘‘प्यार और सिर्फ प्यार’’ अंधेरे कोने से भावपूर्ण आवाज आयी।

आठ
4 मार्च 2006, जयपुर
कैंडिल लाइट की बेचैन छायाएँ कमरे की दीवारों पर डोलती हैं.....गहरी, अटूट निस्तब्धता जिसमें दिल की धड़कन को साफ सुना जा सके....और मैं एकाएक उस जैविक आश्चर्य को सुनता हूँ....मेरे दाहिने अंगूठे और तर्जनी के सिरों पर दर्दभरी एक कराह है- रिसता हुआ कोई ताजा जख्म....मैं किसी अज्ञात आग्रह से बिंधा हुआ टेबिल पर उपेक्षित पड़ी उस कलम को खोलता हूँ और उसे अपनी पकड़ में कस लेता हूँ....और तब मुझे एकाएक पिछली रात याद हो आती है...इसी अंदाज में मैंने उसके हृदय को छुआ था....बाएँ स्तन के नीचे उफनता समुद्र....और तभी से यह अंगुलियाँ उसी दिल की तरह धड़क रही हैं.....जीवन विरोधी शक्तियों और निराशा को ललकारती हुई....हम जरूर लिखेंगे और जिएंगे....उर्वरा पृथ्वी और मनुष्यता के लिए....सूर्य की किरणों और पक्षियों की उड़ानों के लिए....जोगेश्वर के घने-घुमेर पीपल के लिए, उन सिक्कों के लिए जिन्हें हमने दुगने हो जाने की आस में मिट्टी के नीचे दबाया था और हमारे सपनों को झुठलाते हुए वे वर्षों बाद खोदने पर हमें नहीं मिले।....हम मनुष्यता के गले में शब्दों के ऐसे हार पहना देंगे जो सदियों तक उसके सुखों-दुःखों में महकते रहेंगे।....हम जरूर लिखेंगे और जियेंगे।

नौ
30 जुलाई 2006, जयपुर
वैष्णोदेवी तीर्थ की यात्रा से लौटे आज तीन दिन बीत चुके हैं। आज जाकर कहीं पाँवों की सूजन मिट सकी है। हिमालय के उस प्राकृतिक वैभव की गोद में दुबका आस्था का यह संगम सचमुच आश्चर्यचकित कर देने वाला है। हजारों लोग उस कठिन लेकिन मनोहारी पदयात्रा के बाद वैष्णोदेवी की गुफा तक पहुँचते हैं-अटूट आस्था और विश्वास की ऊर्जा से ओतप्रोत!
बादलों से घिरे गिरि-शिखरों और चीड़-वनों से आच्छादित विशाल घाटियों का पवित्र संयोजन हृदय को रोमांच से भर देता है। कई बार तो ऐसा भी होता है जब आप बादलों के बीच होते हैं और ठंडी फुहारें पहाड़ों की लंबी चढ़ाई से थके आपके शरीर को अचानक ताज़गी का स्पर्श देती हैं। आप उस पवित्र ठंडक को अपनी आत्मा में उतरता हुआ पाते हैं और बादलों की कोमल शुभ्रता में बाहें फैलाये चीड़ों की अदृश्य पत्तियों से पानी की बूँद आपके सर पर लगातार गिरती हैं....टप्-टप्! बारिश का यह जादुई संगीत आस्था के जयकारों के साथ मिलकर आपको ऊँचे और ऊँचे चढ़ते जाने की प्रेरणा देता है।
बिना प्रेरणा, बिना आशा के सृजनात्मक जीवन संभव नहीं। हरी-भरी घाटियों में विशाल नौकाओं की भाँति तैरते बादल आपकी आँखों में उन सपनों को फिर से जगा देते हैं जिन्हें बरसों पहले आप हृदय के उजाड़ में दफ्न कर चुके होते हैं।
यह हिमालय है....एक भौगोलिक सच्चाई के साथ-साथ इस महादेश की आध्यात्मिक ऊर्जा का महास्रोत! गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी अनेकानेक नदियों का उद्गम और विदेह साधू-संन्यासियों की तपोभूमि। सूरजभान चढ़ाई में मुझसे आगे है और बादलों के घूमर में मैं उसे एक धुंधली आकृति की तरह ही देख पाता हूँ। धड़धड़ाती टापों के साथ दो-तीन घोड़े कुछ अंग्रेज युवतियों को लिए मेरी बग़ल से गुजरते हैं। पीछे छाये घने कुहासे से एक वृद्ध की पालकी मजबूत कद-काठी के पहाड़ी कहारों के कंधों पर प्रकट होती है। फिर युवक-युवतियों का एक उत्साही दल पसीने में तरबतर...हाय-हैल्लो छोड़ो! जय माता दी बोलो!!
चीड़ की शाखाओं से लगातार बारिश की बूंदें टपक रही हैं......टप्-टप्-टप्.....
रास्ते के किनारे लगी घुमावदार रेलिंग का सहारा लेकर मैं नीचे, घाटी में झाँकता हूँ- जंगल के अपार सौंदर्य से लदी कोसों गहरी ढलानें जहाँ से आँखें हटाने का मन नहीं करता। धूप के उजास में चमकती कटरा शहर की आपस में सटी छतें और आकाश में खिंचे सफेद बादलों से होड़ लेती झेलम की दूर-दूर तक फैली धाराएं! एक घुमाव ऊपर तक पहुँच चुका सूरजभान हाथ के इशारे से मुझे ऊपर बुला रहा है जहाँ एक छोटी-सी गुमटी पर कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें सजी रखी हैं।

दस
15 जुलाई 2014, गूँती
सृजन!
एक दुनिया जो ईश्वर की बनायी कायनात से अलग हो। खुद अपनी बनाई हुई एक दुनिया!
जो प्राकृतिक दुनिया हमें अपने आस-पास दिखाई देती है, वह ईश्वर की बनाई हुई है.....पेड़-पौधे, समुद्र, आकाश, फूलों के दरीचे!
जब मैं लिखता हूँ- उन फूलों को, उन आँसुओं को, उस दुस्साहस को, उस रेगिस्तान को और आकाश के उस सुरमई चेहरे को.....तो जैसे मैं ईश्वर की बनाई हुई दुनिया को पाठकों के लिए फिर से सृजित करता हूँ...एक पाठक को अक्षरों की नोक से झिंझोड़ता हूँ...तुमने देखा उस लड़खड़ाते भिखारी का दुःख या उस किशोरी की हँसी का पवित्र उल्लास या आँसुओं में बहकर आते उस समुद्र का खारापन या फिर कठफोड़वा के कर्मशील जीवन की उस ठक्-ठक् को ही ध्यान से सुना तुमने या तुमने अपने दिल को ही बजाया किसी एकांत क्षण में परमात्मा के दिए साज की तरह.....तो इस तरह मैं एक पाठक के लिए उसके बोध और इन्द्रिय से महसूस की जा रही दुनिया को ही एक बार फिर उसके लिए अपनी लेखकीय दृष्टि और भावना के साथ सृजित करता हूँ।.....इसके लिए मुझे कनखजूरे के पाँवों की जटिल श्रृंखला को या एक ऊँट के व्यवहार को बहुत ध्यान से देखना-परखना पड़ता है ताकि सृजित किए गए विषय का कोई पक्ष छूट नहीं जाये।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चैड़े मुँह वाला टिग्रीना मेढ़क यदि लिखता तो वह अपनी प्रजाति के पाठकों के लिए क्या लिखता! उसके अनुभव तो जलीय जीवन के बहुत विस्तृत अनुभव होते। एक पेंटिंग में वह रंगों की ऐसी व्यवस्था करता जो जल-रंगों के साथ जिंदगी भर काम करने वाले हमारे किसी कलाकार से भिन्न होते!
यह भी सच है कि शब्दों के जरिए भावाभिव्यक्ति में मैं कभी-कभी एक बंधन-सा महसूस करता हूँ। किसी नर्तक के शरीर पर जैसे लबादा पड़ा हो और अंग-संचालन में वह खुद को बाधित महसूस कर रहा हो।
मैं इस बात को थोड़ा और खोलना चाहूँगा। कई बार गाँव के अपने खेतों में पक्षियों द्वारा बनाए गए चकित कर देने वाले घोंसलों को मैं देखता हूँ। उन घोंसलों में भी उन पक्षियों की उद्दाम भावनाएँ और एक सामाजिक संदेश निहित होता है। नीड़ निर्माण में निहित उस संदेश को संप्रेषित करने के लिए काग़ज खराब करने की जरूरत नहीं पड़ी। एक पक्षी ने अपने दिल के भावों को, अपनी सुंदर अभिव्यक्ति को, बिना शब्दों और कलम का सहारा लिए दूसरों तक पहुँचा दिया।
गरज कि हर माध्यम की अपनी सीमा होती है। इसीलिए तो ईश्वर हमें चकित कर देता है-विधाओं की इस सीमा को तोड़कर। जल को ही लीजिए। धरती पर उसने झरना बनाया। अब कोई यदि अंधा है तो झरने की कल-कल को सुन सकता है। अंधा व बहरा दोनों है तो उन ठंडी फुहारों के स्पर्श को तो महसूस कर ही सकता है और यदि कोई बूँद उछलकर उसकी जीभ पर आ गिरे तो.....तरलता की पूर्ण तृप्ति!
झरने के साथ कान, नाक, त्वचा, आँखें, जीभ, सबके सब आनंद में डूब जाते हैं। लेकिन जब कोई लेखक उस झरने को लेकर लिखता है तो ईश्वर की सत्ता से अलहदा उसे अपना एक अलग झरना बनाना होता है। यह है उसका पुनर्सृजन! जब आप उस झरने को पढ़ रहे होते हैं तो उसमें आप उस लेखक की उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं। इसलिए निव्र्ययक्तिक कला कुछ नहीं होती-कला से आप कलाकार के व्यक्तित्व को हटा नहीं सकते। झरने के उल्लास को अंजुरी में भरकर वही तो पुस्तकों की आलमारी या कलादीर्घा तक लाता है। अब यह उसकी क्षमता पर निर्भर है कि वह कितना जल अंजुरी में लेकर आया है या समूचा झरना ही.....कितना उल्लास, कितनी कलकल, कितनी उदासी, कितनी हरियाली, कितना व्यामोह और कितना आश्चर्य!
उस झरने को हरफों में उठाने के लिए जब उसने अंजुरी बनाई तो कितनी विविध भावनाओं और रंगों में उसे रंगा। क्या वह अपनी प्यास बुझाने के लिए झुके उस वनमानुष की व्याकुल प्रतिच्छाया को अपनी अंजुरी में भरकर ला सका? और इतना ही क्यों, क्या वह झरने की बगल में उगे झुरमुट में चहचहाती नन्ही गोरैया की उस उमंग को ला सका, और उस केकड़े की तात्कालिक आपदा का राज भी, जो खिली धूप को सेंकने के लिए पानी से बाहर आना तो चाहता था लेकिन पत्थर की नोंक पर पाँव जमाकर बैठे शत्रु की उपस्थिति के कारण ऐसा नहीं कर सका!
गरज कि आप ईश्वर के बनाए झरने को तो बिना खंडित किए लाएँ ही साथ ही अपनी कला-सामथ्र्य के द्वारा उसमें अपने निजी रंग और संगीत भी घोल दें।
सृजन पर अधिक समीक्षात्मक चीर-फाड़ किए बिना इसका रहस्य भी बना रहने देना चाहिए। ईश्वर, मृत्यु और जीवात्मा के तमाम रहस्य जिस दिन खुल जायेंगे तो सभी जानकारियाँ इस व्यावसायिक युग में शीघ्र ही उत्पादों में बदल दी जायेंगी और सृजन के दिव्यत्व, उसके अज्ञेय का लोप हो जायेगा।

रामानंद राठी
चार दशक से साहित्य में सक्रिय रामानंद राठी ने कहानी ,रिपोर्ताज ,शब्द चित्र, नाटक समेत साहित्य की लगभग सभी विधाओं में खुद को अभिव्यक्त किया है । 'गूंती का अंतिम पठान'  समेत दो कहानी संग्रह, इतिहास एवं संस्कृति केंद्रित 'राठ 'तथा 'गूंती गाथा '( स्मृति चित्र ) प्रकाशित । वर्तमान में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की पत्रिका 'हिंदी बुनियाद' के संपादक ।
मोबाइल - 9829258006

टिप्पणियाँ

  1. सभी प्रविष्टियों में एक विरल आत्मीय अनुराग झलकता-छलकता है। परिवेश ही पात्र के रूप में, पात्रों से भी अधिक *पात्रता* के साथ, उभरकर सामने खड़ा हो जाता है। सहजता और पूरी रागात्मकता के साथ मुखरित होने वाली आत्मीयता मेरे तईं इन डायरी प्रविष्टियों को मूल्यवान बनाती है। भाई रामानंद राठी को भरपूर मुबारकबाद!

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  2. रामानन्द राठी अब ख़लीफ़ा हैं । डॉ मनु शर्मा की खोज उपलब्धि । पुराना राग है और नयी जुगलबन्दी । राठी का हर वाक्य पढ़ने लायक होता है और यह कोई मामूली बात नहीं । मनु, राठी, राजाराम, नितिन और मीमांसा को इस डायरी प्रकाशन के लिए साधुवाद ।

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  3. रामानन्द राठी अब ख़लीफ़ा हैं । डॉ मनु शर्मा की खोज उपलब्धि । पुराना राग है और नयी जुगलबन्दी । राठी का हर वाक्य पढ़ने लायक होता है और यह कोई मामूली बात नहीं । मनु, राठी, राजाराम, नितिन और मीमांसा को इस डायरी प्रकाशन के लिए साधुवाद ।

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  4. रामानन्द राठी अब ख़लीफ़ा हैं । डॉ मनु शर्मा की खोज उपलब्धि । पुराना राग है और नयी जुगलबन्दी । राठी का हर वाक्य पढ़ने लायक होता है और यह कोई मामूली बात नहीं । मनु, राठी, राजाराम, नितिन और मीमांसा को इस डायरी प्रकाशन के लिए साधुवाद ।

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अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...