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कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष
हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार ।

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी 
                                         हेतु भारद्वाज 
स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ असहज है, इसलिए ज्यादा बातें नहीं की। पोते-पोती ने भी पूछा 'बावा परेशान क्यों हैं?' मैं उन्हें क्या उत्तर देता। 

उनसे मेरा परिचय 1960 में मित्र नवल किशोर ने कराया था- तब वे युवा थे और देश के प्रसिद्ध गीतकारों में उनकी पहचान होने लगी थी। वह मंच पर बहुत मधुरता के साथ गीत गाते थे। तब से उनसे आत्मीयता बढ़ती गई। उनके घर जाकर उनके साथ साहित्य पर बातें करने का  सुख अनिर्वच होता था। वे बहुत पढ़ाकू तथा ज्ञान का समृद्ध भंडार थे। अध्यापक नहीं बन सके, ये अफसोस उन्हें हमेशा सताता रहा। वे प्रशासनिक अधिकारी थे पहले आरएएस वे फिर आईएएस। राजस्थान सरकार ने बड़े-बड़े पदों पर रहे। किंतु उनके व्यवहार में अफसरी आभिजात्य कभी नहीं आ पाया। सादा पोशाक में रहना और सबसे अपनापे के साथ मिलना, खूब बातें करना। अगर कोई उनके पास कोई मदद मांगने आता तो वह बिना हिचक उसकी मदद करते। मुझे नहीं लगता कि वह कभी नौकरशाहों की संगत में प्रसन्न रहे हों। वे शुद्ध कवि थे-अपने आचरण में। किसी तरह का अहंकार नहीं, दिखावटीपन नहीं सामने वाले को प्रभावित करने के लिए कोई कसदन कोशिश नहीं। 1960 में उनका पहला काव्य-संग्रह छपा था 'वेदना के स्वर'। इसकी समीक्षा मैंने जयपुर से प्रकाशित होने वाले 'ज्वाला' साप्ताहिक में की थी। नवल जी से उन्होंने इतनाभर कहा था, 'हेतु को साहित्य की समझ तो है।'

 मैं उनसे मिलने 2019 में गया था। उनकी दशा देखकर बड़ी पीड़ा हुई।  मैंने उनके प्रिय साथी श्रीकृष्ण शर्मा से कहा, 'अब उन्हें देखना बड़ा कष्टप्रद है।' वे ना कुछ कह पाते हैं, ना किसी को सुन पाते हैं। उनके पास आने का मतलब है उन्हें तथा अपने को यातना देना। सदा चहकते रहने वाला कवि बिस्तर पर निढाल शरीर में तब्दील हो गया था। उनके मित्रों का दायरा बहुत बड़ा था। उनसे मुलाकात करने का मतलब एक साहित्यिक गोष्ठी में हिस्सा लेना होता था।
 उनके साथ बहुत लंबा संपर्क रहा- भरपूर स्नेह मिला। बहुत सारे प्रसंग हैं जिनकी याद सदा बनी रहेगी। यहां एक प्रसंग का जिक्र कर रहा हूं- उन दिनों राजस्थान विश्वविद्यालय में परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन विवि परिसर में ही कराया जाता था। राजस्थान भर के शिक्षकों का विराट मेला लगता था। उस समय तारा प्रकाश जोशी राजस्थान वेयरहाउस कॉरपोरेशन में निदेशक पद पर कार्यरत थे। उनका कार्यालय संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल के बराबर था- विश्वविद्यालय के काफी निकट। 
 एक रोज हम लोग मूल्यांकन कार्य से मुक्त हुए तो अजमेर के डॉ हरीश मुझसे बोले, 'चलो हेतु, जोशी जी से मिलने चलते हैं।' हम चार-पांच लोग जोशी जी के कार्यालय में जा धमके। डॉ हरीश स्वयं अच्छे गीतकार थे तथा वे  भी सस्वर काव्य पाठ करते थे। 
 जोशी जी ने हम लोगों का स्वागत किया, पर वे विनम्रता से बोले,' आप लोग बैठो, चाय-वाय पियो, मैं लगभग पौने घंटे में सचिवालय जाकर आता हूं। कोई जरूरी मीटिंग में मेरी उपस्थिति जरूरी है।' पर डॉ हरीश में जैसे उनकी खुदी को धिक्कारा, 'क्या जोशी जी?' आपसे मिलने इतने बड़े बड़े साहित्यकार आए हैं और आप खिसक रहे हैं? मैंने हरीश जी से कहा, 'जाने दो इन्हें, हम कल आ जाएंगे।' पर डॉ हरीश तो जैसे अड़ गए, 'क्या मीटिंग हम लोगों से बड़ी है?' जोशी जी ने चुपचाप फोन उठाकर लगाया और हमारे सामने  कहा मेरी तबीयत थोड़ी खराब है। मैं मीटिंग में नहीं आऊंगा। फोन काट कर उन्होंने चपरासी को चाय समोसा लाने का आदेश दे दिया। 
 बैठक जम गई गीतों का आदान प्रदान हुआ दो बार चाय हुई। यह था तारा प्रकाश जोशी का कवि व्यक्तित्व। उनकी स्मृति को बार-बार नमन।
  
यशकाया-डॉ. ताराप्रकाश जोशी
                             लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

बात इस फोटो से ही शुरू करते हैं । पिछली दीपावली पर जोशी जी से मिलने गया था । हर बार की तरह ख़ूब बातें हो रही थीं । बात से बात निकालते हुए मैंने कहा "दादा ! आप ऐसा क्यों करते हैं ? आपने एक ऐसे व्यक्ति को साहित्य का चौकीदार बना दिया जिसे न साहित्य की समझ है और न ही भाषा की । अब वो साहित्य-भूषण पन्सारी बना ऐंठता है ।" 
जोशी जी ने एक लम्बी चुप्पी तोड़ते हुए कहा " जाने दो कुँअर साहब ! , मेरा क्या गया ? , चलो कोई और बात करो , और बताओ बहुरानी कैसी हैं ?" 
मैं समझ गया कि जोशी जी को मेरी बात अच्छी नहीं लगी । लेकिन जयपुर में दो ही घर तो ऐसे रहे जहाँ मैं अपने मन की बात बिना किसी संकोच के कह देता हूँ , एक जस्टिस विनोद शंकर दवे का और दूसरा ताराप्रकाश जी का ।  इन दोनों ही घरों में मैं जब चाहे जा सकता हूँ , माँग कर खा सकता हूँ और ज़रूरत पड़ने पर पैसे भी उधार ले सकता हूँ । तो जो मैं सोचता था , जोशी जी से कह दिया । 
ख़ैर ! बात जोशी जी की है तो मुझ पर निस्सीम नेह लुटाने वाले जोशी जी की कुछ बातें साझा कर रहा हूँ । 

उन दिनों मैं हमारे लोक-विकास संस्थान के बैनर तले कला , साहित्य , पत्रकारिता और समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों का सम्मान किया करता था , उस दौर में सम्मान-राशि 5100/- थी और सम्मान या तो पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर प्रदान करते थे या पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह जी । 
पहला सम्मान समारोह होना तय हुआ । साहित्य के लिये मेरे पास एक ही नाम था , डॉ. ताराप्रकाश जोशी । मैं और मास्टर रामशरण अंत्यानुप्रासी जोशी जी के घर गये , उन्हें पूरी बात बताई । सुनकर जोशी जी बोले "यह सम्मान लेना मेरे लिये सम्भव नहीं है" । मैं हक्का-बक्का था , बोला "दादा ! आप मेरी बात नहीं मानोगे ?" जोशी जी बोले "अभी तो मेरे गुरु बैठे हैं , उनसे पहले मेरा सम्मान कैसे हो सकता है ?" अब बारी मेरे चौंकने की थी , मैं बोला "आपके गुरु ? वे कौन हैं ? मैं तो उन्हें जानता ही नहीं" । जोशी जी बोले "इन्दुशेखर जी , मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है , उनके गीत सुनो" । और जोशी जी ने गाना शुरू कर दिया "गये हज़ार वर्ष बीत , चाँद का कलंक तो नहीं धुला , नहीं धुला" । पूरा गीत शानदार था , सुनकर मैं बोला "चलो दादा ! आपके गुरु से मिलने चलते हैं , अब तो पहला सम्मान उन्ही का करेंगे" । 
हम इन्दुशेखर जी के घर गये । लाजवाब शख़्सियत थे । ज्ञान का भण्डार अपने पूरे सहज हास्य-बोध के साथ हमारे सामने था । जोशी जी ने उन्हें सम्मान हेतु तैयार कर लिया , हालांकि उनको भी ज़ोर बहुत लगाना पड़ा , डोकरा ज़िद्दी था लेकिन जोशी जी कौन से कम ज़िद्दी थे , मनवा कर ही छोड़ा । 
समारोह बिड़ला सभागार में आयोजित हुआ । वह बिड़ला सभागार का पहला निजी कार्यक्रम था । उससे पहले वहाँ सरकारी आयोजन ही होते थे । वो अनुमति भी के के बाबू (कृष्ण कुमार बिड़ला) को फ़ोन कराने पर मिली थी । पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे , अध्यक्षता धर्मयुग के सम्पादक गणेश मंत्री की थी और विशिष्ट अतिथि बिहार वाले दिग्विजय सिंह(जिनकी बेटी श्रेयसी सिंह , जो शूटर बहुत अच्छी है  , आजकल बिहार विधानसभा के चुनाव के कारण ख़बरों में है , और मेरे रिश्तेदार एमपी वाले दिग्विजय सिंह को सफ़ाई देनी पड़ रही है कि श्रेयसी उनकी बेटी नहीं है) थे । 
डॉ. ओंकार सक्सेना , प्रो.इक़बाल नारायण आदि  का सम्मान तो मंच पर हुआ लेकिन इन्दुशेखर जी(वे व्हील चेयर पर थे) का सम्मान करने के लिये चन्द्रशेखर जी मंच से नीचे उतर आये । सामने बैठे जोशी जी खड़े हुए , इन्दुशेखर जी ने अपनी पूरी ताकत लगाई और जोशी जी का सहारा लेकर अपनी व्हील चेयर पर खड़े हुए । चन्द्रशेखर जी ने इन्दुशेखर जी से हाथ मिलाया । अचानक जोशी जी के मुख से निकला "अगर आप चन्द्रशेखर हो तो ये भी इन्दुशेखर हैं" । पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा ।
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बात 9 या 10 दिसम्बर 1992 की है । रामलला के सर से छत हटे 3-4 दिन ही हुए थे । शह्र के माहौल में एक अजीब सी दहशत थी । राजस्थान के मशहूर शाइर आफ़ताब-ए-नज़्म मुहतरम नफ़ासत अली 'राही शहाबी' साहब (राही साहब की ग़ज़लें और उनका तरन्नुम भी लाजवाब था लेकिन वे मुशायरों में ग़ज़ल पढ़ने से बचते थे , अपनी पाबन्द नज़्में ही पढ़ा करते थे और इतनी घन-गरज से पढ़ते थे कि मुर्दा भी दाद दे उठता था ) मेरे ऑफ़िस आये । वे उन दिनों गाँधी नगर सरकारी क्वार्टर में रह रहे थे । चाय पीते-पीते बोले "जोशी जी से कुछ बात करनी है , चल सकते हैं ?" । जोशी जी से मिलना मेरे लिये सदा ही एक ट्रीट जैसा रहा । मैं तुरन्त तैयार हो और ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिये कह दिया । 
मालवीय नगर से बापू नगर पहुँचने के रास्ते भर राही साहब थोड़े गुमसुम , अनमने से दिखे । हम सी-121 , मंगल मार्ग(इस सड़क का नाम कब का नन्द किशोर पारीक मार्ग हो चुका है लेकिन मेरी ज़ुबान पर आज तक मंगल मार्ग ही है) पहुँचे ।
तब जोशी जी के घर का वर्तमान स्वरूप नहीं था , सिंगल स्टोरी बड़ी कोठी ही थी । ये सिंगल स्टोरी बड़ी कोठी कैसे मल्टीस्टोरी भवन में तब्दील हुई , कैसे इसमें अपार्टमेंट्स बने , राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के भतीजे रवि की कम्पनी से कैसे एग्रीमेंट हुआ , शुरू में जोशी जी बिल्कुल भी तैयार नहीं थे , कैसे सुबह-सुबह मेरे घर आये कि भैया (जोशी जी का एक मात्र पुत्र स्वर्गीय आलोक जोशी जिसे हम सब गुड्डू कहते थे और जोशी जी भैया) को समझाओ , वो इस घर को तुड़वा कर मल्टीस्टोरी बनाना चाह रहा है , फिर अंत में जोशी जी कैसे तैयार हुए , ये कहानी फिर कभी । 

मोटर से उतरने पर हमने देखा कि जोशी जी लूँगी बाँधे बाहर ही मूढ़े पर बैठे हुए कुछ पढ़ रहे थे । हमें देखते ही एकदम भड़भड़ा कर खड़े हुए , गेट के बाहर तक आ गये और राही साहब से बोले "राही अपने सैंडिल (राही साहब ने कभी भी पैंट-शर्ट अलग-अलग रंग के नहीं पहने , सफ़ारी जैसा ही कुछ पहनते थे और अक्सर सफ़ारी के साथ सैंडिल ही हुआ करते थे) उतारो और हमारे सिर पर गिन कर दस बार मारो , आज हमें तुमसे आँख मिलाकर बात करने में शर्म आ रही है" । 
मैं भौंचक्का था और राही साहब रुआँसे । राही साहब तो भूल ही गये कि किस काम से आये थे ।
यह था राजस्थान में प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक डॉ. ताराप्रकाश जोशी जी पर 6 दिसम्बर 1992 का असर ।  
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राजस्थान के एक बढ़िया गीत-कवि थे जगदीश चतुर्वेदी । डीपीआर में अच्छे पद पर थे । नेहरू जी के ख़िलाफ़ कविता लिख बैठे , राजस्थान की तत्कालीन कांग्रेस सरकार नाराज़ हो गयी , नौकरी चली गयी । मुक़द्दमे लड़ते रहे लेकिन बहाल नहीं हो पाये और विकराल आर्थिक संकट के शिकार हो गये । 
उनकी बेटी की शादी तय हो गयी , पैसे घर में थे नहीं । राजस्थानी के अप्रतिम गीतकार कल्याण सिंह राजावत और मित्र-परिषद के कुछ अन्य मित्र मेरे पास आये । दहेज़ के सामान का ज़िम्मा मुझे दिया गया । अब प्रश्न था विवाह के भोजन व अन्य व्यवस्थाओं का । मैंने कहा "चलो जोशी जी के पास चलते हैं" । मैं और कल्याण सिंह जी जोशी जी के पास पहुँचे । 

कल्याण सिंह जी को देखते ही जोशी जी खिल उठे । कल्याण सिंह राजावत को जोशी जी "किल जी" कहते थे । उनके राजस्थानी गीतों के दीवाने थे । "बेलड़ी" गीत की एक उपमा "काया ताता दूध सी उफनबा लागी" पर तो फ़िदा थे । कहते थे कि दुनिया के किसी भी भाषा के साहित्य में ऐसी मौलिक , ऐसी अछूती और ऐसी अद्भुत उपमा नहीं मिलेगी । कल्याण सिंह जी के गीत "मालण" को टैगोर(जिन्हें जोशी जी हमेशा ठाकुर ही कह कर सम्बोधित करते थे) के टक्कर की रचना कहते थे और उस पूरे गीत पर गीतांजलि की ही तरह एक बैले तैयार कराने का मन था उनका ।
एक बार मैं जोशी जी के घर पर था । हम बाहर ही बैठे थे । तेज़ हवा चल रही थी । अचानक कहीं से शराब की गन्ध का झौंका आया और तत्काल जोशी जी के मुख से निकला "किल जी एमआई रोड तक आ गये" । हम दोनों ठहाका लगा कर हँस पड़े । 
कल्याण सिंह जी तब शिल्प कॉलोनी , झोटवाड़ा में रहा करते थे । आजकल तो उससे भी आगे अपनी बड़े दामाद देवेन्द्र सिंह राठौड़ और बेटी कामना के पास सुशान्त सिटी में रह रहे हैं । पिछले कई सालों से लकवाग्रस्त हैं , बोली चली गयी है लेकिन राजस्थानी गीतों के राजकुमार की ठसक और मुस्कुराहट आज भी पहले जैसी ही है । देवेन्द्र जी बहुत ही बढ़िया , नेकदिल और समझदार इन्सान हैं । कल्याण सिंह जी का बेटे की ही तरह पूरा ध्यान रखते हैं । उनके दोनों बेटे चन्दन और हनी भी अपने नानो-सा पर जान छिड़कते हैं ।
तो हमारे पहुँचते ही जोशी जी ने कल्याण सिंह जी को गले लगाते हुए कहा "ओ गजबण गली-गली में रास रचनो चोखो कोणी ऐ" । चाय-पानी के बाद कल्याण सिंह जी ने हमारे आने का मक़सद जोशी जी को बताया तो जोशी जी उदास हो गये । कहने लगे "जगदीश ने कुल्हाड़ी पर पैर मारा , मैंने कितना कहा था कि माफ़ी माँग लो , नहीं माँगी , अब देखो कितना दुखी है" । (जोशी जी नेहरू के शैदाई थे और कहते थे कि नेहरू जी यदि राजनीति में नहीं होते तो नोबेल विजेता साहित्यकार होते)
फिर बोले "कोई बात नहीं , जो बन पड़ेगा करेंगे" । ख़ुद भी मदद की और तत्काल कर्पूर चन्द 'कुलिश' जी को भी फ़ोन किया ।
कुलिश जी और जोशी जी दोनों ही गुरु कमलाकर 'कमल' के साहित्य-सदाव्रत के साथी थे और एक-दूसरे का भरपूर सम्मान करते थे । पूरी बात सुनकर कुलिश जी ने जोशी जी को पूरे सहयोग का वचन दिया और उसे पूरी तरह निभाया भी । 
जगदीश जी की पुत्री का विवाह ख़ूब बढ़िया ढंग से सम्पन्न हुआ ।
किसी को जताये बिना उसकी मदद करने और फिर उस बात को हमेशा के लिये भूल जाने में जोशी जी जैसा भावुक-हृदय , मददगार कवि मैंने आज तक कोई दूसरा नहीं देखा ।

साँझ हुई चल पंख समेटें !

                                               कृष्ण कल्पित

ताराप्रकाश जोशी (८७) जब भी यह गीत सुनाते थे हम उदास हो जाते थे । नाराज़ हो जाते थे । 

मुझ अकिंचन को 1977 में जयपुर आने पर जिन लोगों ने हृदय से गले लगाया उनमें जोशीजी प्रमुख हैं । मुझ पर उनका अत्यधिक प्रेम और अत्यधिक अहसान हैं । वे पिछले लगभग एक दशक से बीमार थे लेकिन उनका आशीर्वाद हम पर छतरी की तरह हमेशा तना रहा।
कविता और छन्द को लेकर उनकी बहस अज्ञेय और नामवर सिंह से भी रही । वे बड़े अफ़सर ही नहीं बड़े कवि ही नहीं बड़े विद्वान भी थे और अद्भुत वक्ता भी । वे राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक रहे ।

मेरा वेतन ऐसे रानी 
जैसे गर्म तवे पर पानी !

जब भी वे गीत सुनाते लोग उनसे इस गीत को सुनने की फ़रमाइश करते । वे सुनाते । यह गीत उनका सिग्नेचर गीत था लेकिन अद्भुत बात यह कि इस नितांत भौतिक और अभावों के गीत का अंत इन स्वप्निल पंक्तियों से होता  है :

जिस दिन नया सूर्य जनमेगा
तेरे जूड़े कली लगानी !
कवि ताराप्रकाश जोशी अब नहीं हैं । पवन पवन में मिल चुकी है और राख ख़ाक में । सोचता रहा कि जाने से पहले मैं जोशीजी से उनका प्रिय गीत सुनाने को कहता तो वे क्या सुनाते ? यह गीत वे मंचों पर नहीं सुनाते थे । ये उनके अकेले के गुनगुनाने का गीत था । जोशीजी ने एकाकी जीवन जिया । यह कविता उनके अकेले जीवन का आर्तनाद है । कविता क्या है जैसे ठुमरी के बोल हों । कविता के कितने प्रकारों/शिल्पों/अदाओं को हमने ठुकरा दिया है । और यह अकेलापन मारखेज़ और काफ़्का के एकांत से अलग है । यदि आप काव्य-रसिक-मर्मज्ञ हैं तो ताराप्रकाश जोशी की इस दुर्लभ कविता-ठुमरी का रसपान कर सकते हैं और यदि कोई सुरीला-गायक इसे गाये तो अमर हो सकता है । जोशीजी के इस काव्य में निराला की कसक और वेदना है ! 
~ ~ ~
सूनापन जाये तो सोऊँ !

(१)
यह बैठा है कैसे बोलूँ
अपना बिस्तर कैसे खोलूँ

यह उलझन जाये तो सोऊँ !

(२)
यह जब से आया गुमसुम है
इसका मौन बड़ा निर्मम है

दुखता दिन जाये तो सोऊँ !

(3)
यह मुझसे मिलता जुलता है
छाया-सा हिलता डुलता है

अपनापन आये तो सोऊँ !

गीतों का चमकता तारा अस्त!
                                        ईशमधु तलवार

राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक, पुरोधा कवि, गीतकार ताराप्रकाश जोशी का ऐसे दौर में जाना भीतर तक आहत कर गया। राजस्थान में वे हमारे समय के शीर्ष गीतकार थे, जिनकी ध्वनियां अब जेहन में गूंजती रहेंगी।
राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ का जब हमने 12 नवंबर,2017 को कार्यभार संभाला तो हमें सबसे पहले उनका ही ख़याल आया। कोई बीस दिन बाद ही 3 दिसंबर को हमने अपना पहला कार्यक्रम उनके सम्मान का किया- "प्रसंग: ताराप्रकाश जोशी।" इसके लिए वे बहुत मुश्किल से राजी हुए। सम्मान के लिए तो वे तैयार ही नहीं थे। हमने जब कहा कि सम्मान नहीं, चर्चा करेंगे, तब उन्होंने अपनी सहमति दी। वह बात अलग है कि इस चर्चा के बहाने हम उनका औपचारिक सम्मान भी कर पाए।
वे कहते थे-"जिस दिन 'सेंस ऑफ पोएट्री' (कविता का बोध) खत्म हो जाएगा, उस दिन यह समाज नष्ट हो जाएगा।" उनका एक ज़माने में यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -"मेरा वेतन ऐसा रानी, जैसे गर्म तवे पर पानी।"

एक बार मैं, फ़ारूक़ आफ़रीदी, कृष्ण कल्पित और लोकेश कुमार सिंह 'साहिल' उनसे मिलने गए। जब हम उनके पास से आने के लिए उठने लगे, तो वे बोले- "ऐसे दिल तोड़ कर जाओगे।" तब वहाँ लंबे समय तक बैठना पड़ा, लेकिन आनंद आया।
उन्होंने अनेक संस्मरण सुनाए।
ताराप्रकाश जोशी जी से खूब स्नेह मिला और उनके साथ बहुत सारी यादें जुड़ी हैं। वे फिर कभी। फिलहाल इस खराब समय में उनका इस तरह जाना अंदर तक हिला गया है। उन्हें सादर नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।










टिप्पणियाँ

  1. ये स्मृति आलेख आदरणीय श्री ताराप्रकाश जोशी जी के अंतरंग को समझने का निस्पृह प्रयास है।बहुत अच्छी यादें। और अब ईशमधु जी भी चल दिए। हे भगवान।

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  2. Mere papa.....You have written a beautiful article on my papa...I am his proud princess....

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हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में ब...

शिक्षा विमर्श के नए आयाम खोलती 'किताब'

कृति चर्चा  प्राचार्य एवं  प्रशासक रहे डॉ आर.डी सैनी लगभग चालीस वर्षों से साहित्य संसार में सक्रिय हैं । कविता ,उपन्यास एवं कथेतर विधाओं से गुजरते हुए 'किताब' उनकी दसवीं पुस्तक है । 'विचार प्रक्रिया ' और 'संज्ञानात्मक बोध ' का बच्चों में विकास कैसे हो ? इसका व्यावहारिक धरातल पर समाधान यह पुस्तक प्रस्तुत करती है   । डॉ. ममता चतुर्वेदी प्राचार्य है , जो कि लंबे समय से पठन-पाठन के साथ-साथ शिक्षा के व्यापक सरोकारों से जुड़ी रही हैंं । एक शिक्षिका की दृष्टि से डॉ. आर.डी सैनी की 'किताब' की यह समीक्षा , पाठकों को शिक्षा से जुड़े उन मूलभूत प्रश्नों एवं समस्याओं के समाधान समझने में मदद करेगी , जिनका सफलतापूर्वक सामना लेखक ने स्वयं किया है ।  यह पुस्तक समीक्षा 'किताब' के सभी आयामों को दृष्टिपात करते हुए पाठक को किताब की दहलीज तक ले जाती है । एक पुस्तक के रूप में  'कुछ यूं रचती है हमें "किताब", शिक्षा व बाल मनोविज्ञान पर आधारित भाव प्रधान पुस्तक है । इसमें लेखक डॉ आर.डी सैनी ने मानव मूल्य , नैतिकता, कर्तव्य एवं घटनाओं का मार्मिक चित्रण किया है...

मंजुला बिष्ट की कहानी' पराई जीभ'

संभावना    कैसे कहुँ कि इस कहानी को पढ़कर कैसी हूक उठी है। आत्मा के भीतरी भाग पर चोट करती यह कथा आज के दिन का हासिल रही। मुझे खुशी है कि मैंने यह कहानी पढ़ी । इस अद्भुत कहानी पर कुछ भी कह सकूँ इतनी क्षमता कहाँ हो सकेगी मेरी । फिर भी कुछ पक्तियाँ लिखनी ही होगी।  'पराई जीभ' एक साथ कई चीज़ों से रूबरू कराती चलती है। जीवन-मृत्यु, साथ-असाथ, आशा-निराशा, सपना-यथार्थ. एक संग कितना कुछ! इसे पढ़ते हुए एक विचित्र सी मनोदशा रही... एक प्रतिभावान मेधावी बालक धीरज जिसने अभी-अभी उत्कृष्ट अंकों से बारहवीं पास की है, जिसके तमाम सपने उसके सामने क्षत-विक्षत होते जा रहे हैं।उसका चाटर्ड अकॉन्टेन्ट बनना अब सपना मात्र रह गया है, वह देखता है सामने बिस्तर पर लेटे बीमार पिता लिवर सिरोसिस से जूझ रहे हैं। उसे अपने मजबूत पिता बेतरह याद आ रहे हैं, जिन्हें वो बचपन से देखता रहा है। उसकी जीभ पर बचपन में पिता की दी हुई टॉफ़ी का स्वाद है। एक क्षण को वह उस सुखद स्मृति में डूबता उतरता है तो अगले ही क्षण उसके सम्मुख एक त्रासद वर्तमान आ खड़ा होता है। वह जान गया है कि इतनी गम्भीर स्तिथि में भी उसके पिता छिपकर शराब पी र...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...