सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

एक शाइर के किस्से के रंग

एक शाइर के किस्से के रंग

गली कासिम जान विनोद भारद्वाज का लिखा क्लासिक शायर मिर्ज़ा ग़ालिब पर जिंदगीनामा है। इसकी भूमिका में आलोक श्रीवास्तव ने गालिब के समय को पृष्ठभूमि के तौर पर प्रस्तुत किया है। उन्होंने भारतीय इतिहास में उस दौर को गोधूलि और धूसर संध्या की संज्ञा दी है। ग़ालिब की शायरी की चर्चा करते हुए वे इसे उर्दू और फारसी काव्य की तत्कालीन प्रचलित प्रवृतियों से भिन्न ठहराते हैं और उर्दू भाषा में एक युगान्तर कहते हैं। वे गालिब की शायरी को  एक नष्ट होती सभ्यता की पुकार सम्बोधित करते हैं जो दुख- बोध के दर्शन से आपूरित है और जिसका भाव- जगत छू लेने वाला है। वे स्वीकारते हैं कि गालिब भारतीय नव- जागरण के ठीक पहले की शख्सियत हैं, यद्यपि वे यथार्थ के धरातल पर सोचने वाले विचारवान व्यक्ति हैं।

ऐसे व्यक्ति की जीवनी रचना कोई मामूली चुनौती नहीं है। जैसाकि हमने कहा, गालिब एक क्लासिक शायर हैं जिनकी सार्वभौमिक अपील रही है। उन्हें लोग न जानते हुए भी जानते हैं और जानने का दावा करने वाले भी बहुत कम ही जानते हैं। तब यह चुनौती दोहरी हो जाती है। एक तो शख्सियत के वैयक्तिक और सर्जक के रूप में निर्मिति की प्रक्रिया की प्रामाणिक प्रस्तुति; दूसरे, उस देश- काल की सृष्टि- जिसका वह शख्स शिशु था। अपने नायक के आभ्यंतर और बाहरी दुनिया के साथ उसकी जद्दोजहद का प्रासंगिक निरूपण भी एक कठिन कार्य- भार है। तब तो और भी दुष्कर, जब समय गालिब जैसा विश्रृंलित हो और आत्मसंघर्ष भी कदम- कदम पर क्या करूं- क्या न करूं के द्वंद्व से गुजरता हो।

शेक्सपियर ने कहा है, यदि घावों के पास जिव्हा होती तो वे अपनी पीडा चीख- चीख कर व्यक्त करते। विनोद भारद्वाज ने इस कृति में गालिब की पीडा को अभिव्यक्ति दी है लेकिन चीख कर नहीं, बल्कि संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ, जैसी कि उनके मामले में दरकार थी। हम इसे कृति इसलिए कह रहे हैं कि यह महज जीवनी नहीं है। सच में तो यह गालिब को केन्द्र में रखकर लिखा गया एक उपन्यास है और आत्मकथात्मक शैली  और हिन्दुस्तानी जबान में रचा उपन्यास होने की जरूरी शर्तें पूरा करता है। हिन्दी में जीवनियाँ अक्सर बोझिल और अतिरंजित होती हैं। जबकि इस कृति में औपन्यासिक छूट मिलते हुए भी कल्पना का उतना ही सहारा लिया गया है जितना कथ्य के प्रवाह को बनाये रखने के लिए जरूरी था। गालिब यहाँ अपने भौतिक वजूद ही नहीं वरन अपनी रूह के साथ संवाद कर रहे हैं। कथा कब्रों- मकबरों से शुरू होती गालिब की सृजनात्मक चेतना के निर्माण में सूफी पृष्ठभूमि से परिचय कराती है। गालिब अपने स्वतंत्र वजूद को लेकर शुरू से सचेत थे और उन्हें अपने इल्म और फन पर पूरा भरोसा था। इसमें गालिब के जीवन की लंबी कलकत्ता यात्रा का वृत्तान्त है जो उनकी सृजन यात्रा के लिहाज से बड़ा प्रस्थान- बिन्दु रही थी।

विनोद भारद्वाज गालिब की यात्रा के प्रसंग में उस समय के लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस और कलकत्ता जैसे शहरों का जीवंत चित्रण करते हैं। आगरा तो गालिब के शुरूआती जीवन के साथ आ ही चुका है। दिल्ली और गालिब का समय तो समान्तरता से चलता है। कलकत्ता यात्रा गालिब के लिए आज के क्रास कंन्ट्री एक्सपीरियंस की तरह है। कलकत्ता में उस समय भी कई देशों के लोग रह रहे  थे और वह कास्मोपालिटन सिटी के रूप में आंखें खोल रहा था। वहाँ से भारत ब्रिटिश उपनिवेश की शक्ल ले रहा था। गालिब जान लेते हैं कि फोर्ट विलियम कालेज जैसे संस्थान असल में अंग्रेजी राज के लिए पुर्जे बनाने के कारखाने हैं। इस यात्रा से गालिब की अन्तर्दृष्टि को क्षैतिजिक विस्तार मिलता है।

कृति में गालिब हाड- मांस का अपनी कमजोरियों और अन्तर्विरोधों में जीता एक सामान्य व्यक्तित्व है। वह अपने इस व्यक्तित्व का अतिक्रमण कर सोचता और अपनी बैचेनियों में जागता है। उसका नायकत्व उसके सृजन में है। गालिब में हम आत्मावलोकन की प्रक्रिया को अनवरत पाते हैं। वह अपनी रचनात्मक गरिमा के
 लिए भरसक संघर्ष करते हैं। गालिब रूमानीयत से तो मुक्त हैं ही, शराब का नियमित सेवन करने के बावजूद उनमें पलायनवाद नहीं है। उनके मटियाले अवसाद को आप यहाँ पारदर्शिता में देख सकते हैं।

वह समय था जब सामंती सत्ता ढह रही थी और इसके अनेक विवरण इस कृति में यत्र- तत्र बिखरे हैं। लेकिन उल्लेखनीय यह है कि गालिब के मित्र- शुभचिन्तकों का भी बौद्धिक स्तर कम नहीं है। लगता है कि तब तक पब्लिक स्फियर में बौद्धिक पतनशीलता का प्रवेश नहीं हुआ था। हालांकि सत्ता ने इन्हें अवमूल्यित और उपेक्षित कर दिया था। विनोद भारद्वाज ने संवादों के जरिए इनकी जो दुनिया रची है, वह चकित करती है।

इस कृति में वैसे तो कई पात्र हैं जो यादगार हैं। बैक ड्राप में नजीर और मीर हैं तो गालिब के समकालीनों में जौक मोमिन और दीगर चरित्र हैं। लेकिन सबसे अहम दूसरा चरित्र है- गालिब की बीबी उमराव। कृति में सीधे उभरने वाला यह अकेला स्त्री पात्र है जो अपने समय की महिलाओं के सोच, संघर्ष और भूमिकाओं काे इंगित करता है। लेकिन गालिब की जिन्दगी में इसके योगदान को लेखक ने बड़ी शिद्दत से प्रस्तुत किया है। यह उन्ही का कमाल है कि चंद झलकियों और संवादों के जरिए वे उमराव को गालिब के बराबर खडा कर देते हैं। और ये गालिब हैं जो अपनी बीबी के सामने अकुंठ ग्लानि अनुभव करते हैं।

आखिर में १८५७- जिसे सिपाही विद्रोह से लेकर गदर और क्रांति तक कहा गया। गालिब के मूल्यांकन में सबसे ज्यादा विवादास्पद पहलू यही है। अधिकतर इतिहासकार इसे भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम का पहला जन- उभार मानते हैं और गालिब के  इसके प्रति रुख को लेकर सवाल किये जाते हैं।

पहले १८५७ पर पश्चिम से प्रतिक्रिया का एक अंश-
....उस समय फ्रांस के अखबारों ने और इंग्लैंड के जन नेता अर्नेस्ट जोंस ने १८५७ के इस महा- संग्राम का खूब समर्थन किया। जोंस ने १ अगस्त १८५७ को लिखा, भारत का सैनिक विद्रोह कोई फौजी बगाबत नहीं, यह एक राष्ट्रीय स्तर का संघर्ष है। फिर उन्होंने लिखा, विश्व इतिहास का यह अब तक का सबसे ज्यादा इंसाफ भरा, महान और जरूरी विद्रोह है। जब पोलैंड, हंगरी और इटली अपनी आजादी के लिए खडे हुए, तब आम अंग्रेजों ने उनके प्रति हमदर्दी जतायी थी, तो फिर हिन्दुस्तान को भी आम अंग्रेजों की हमदर्दी मिलनी चाहिए।
....जहां तक बुंदेलखंड के झांसी का संबंध है, हम कह सकते हैं कि यह किलाबंद शहर है और इस प्रकार यह विद्रोह का एक दूसरा केन्द्र है।
       - न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून, २९ अगस्त, १८५७

इस संदर्भ में, पहली बात तो यह कि प्राय: सभी जीवनीकार शोध करते हैं, विनोद भारद्वाज ने गालिब पर लंबा शोध किया है। उन्होंने इतिवृत्तों , किंवदंतियों और विवरणों को इस तरह कथानक में गूंथा है कि वे अलहदा प्रतीत नहीं होते। वे कहीं गालिब को न तो महान ठहराना चाहते है और न ही डिफेंड करते हैं। गालिब परिवार के जिस पेशे से आते हैं और जिससे उनकी आजीविका ( पेंशन) जुड़ी है, वह सामंती ढांचे का हिस्सा है। विद्रोह से कुछ ही समय पहले वे दिल्ली दरबार से जुडते हैं। तब तक ब्रिटिश निजाम स्थानीय सामंती ढांचे के सहारे ही अपना वर्चस्व फैला रहा था। गालिब को दिल्ली डूबती और अंग्रेज आते दिख रहे थे। कृति के अनुसार यह गालिब की जिन्दगी का सबसे मुश्किल दौर था जिसमें वे दूसरे मसलों पर सोच भी नहीं पाते थे।

सभी मित्र जानते हैं कि विनोद भारद्वाज हर काम बड़ी तन्मयता से करते हैं। वे इस मामले में परफैक्शनिस्ट हैं। यदि आप मुझे कहने की इजाजत दें, गहन शोध और जज्बे से जन्मी यह उनकी एक परफैक्ट किताब है। हार्दिक बधाई!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सर्वेश्वर की भेडिया और हिंस्र शंक्लें - राजाराम भादू

पूर्वकथन : लीलाधर मंडलोई ने वर्तमान साहित्य के शताब्दी कविता विशेषांक ( मई- जून,२०००) का संपादन किया था। इसमें शताब्दी की कुछ चुनी हुई कविताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ व लेख हैं जो अलग- अलग लोगों से लिखवाये गये थे। मैं ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेडिया श्रृंखला पर लिखा था। इसे उलटते- पलटते लगा कि यह आज तो और भी मौजूं है। भगतसिंह की जेल में लिखी डायरी- ए मार्टायर्स नोटबुक ( इंडियन बुक क्रानिकल) का हिन्दी अनुवाद आ चुका है- शहीदे- आजम की जेल नोटबुक ( परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ)। इसमें भगतसिंह द्वारा मूल पृष्ठ ३९ में तिरछे लिखी ये पंक्तियां उद्धृत हैं- महान इसलिए महान हैं क्योंकि हम घुटनों पर हैं  आओ उठ खडे हों। पंक्तियों के लेखक का नाम नहीं है, बहुत संभव है ये स्वयं भगतसिंह की लिखी हों। सर्वेश्वर की इन कविताओं को पढते हुए मुझे लगता है, ये महानता के विरुद्ध साधारण जनों को उठ खडे होने के लिए आह्वान करती कविताएँ हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी काव्य- यात्रा सोच के जिस धरातल से शुरू की थी, बाद में वे लगभग उसके विपरीत छोर पर छोर पर पहुँच गये थे। यहां वे आततायी शक्तियों के प्रतिपक्...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

हाशिये के समुदाय तीन इतिवृत्त

हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में ब...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...
रंगमंच समकालीन हिंदी रंगमंच और राजस्थान -2                                         राघवेन्द्र रावत  अंग्रेजों के आने के साथ साथ ही पाश्चात्य संस्कृति और साहित्य का प्रभाव भारतीय जनमानस पर पड़ने लगा था | जैसे जैसे औपनिवेशिक काल में औद्योगिक विकास होता गया मध्य वर्ग का उदय हुआ | जिसके पास ऊँचाइयाँ छूने के सपने थे तो असफलता से नीचे जाने का डर भी था | धार्मिक नगरों के रूप में बनारस, उज्जैन हरिद्वार आदि विकसित हुए वहीँ औद्योगिक नगरों के रूप में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास. भिलाई और जमशेदपुर जैसे नगर विकसित होते गए | इन नगरों में गाँव से मजदूर जीविकोपार्जन की तलाश में विस्थापित हुए | वहां उनके लिए जीविका के साथ साथ अपनी संस्कृति, बोली और घर की तलाश एक अहम् मुद्दा बन कर उभर रही थी |  यूरोप में नार्वे के प्रसिद्ध नाटककार हेनरिक इब्सन के नाटकों में यही मध्य वर्ग दिखाया जाने लगा | इब्सन के नाटकों में यथार्थवाद की अवधारणा का उदय हो चुका था | उनके नाटक ‘अ डॉल्स हाउस(1879)’,’घोस्ट्स’ (1881) तथा ‘ए...

गांव की स्मृतियाँ - ज्ञान चंद बागड़ी

भूमंलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों ने गाँव, कृषि और पारंपरिक उद्यमों का भयावह हाशियाकरण किया है। कथाकार ज्ञानचंद बागडी अपनी स्मृतियों के गाँव को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि अतीत का वह गाँव कोई आदर्श था लेकिन जिस तरह बदलाव आया, वह भी सहज नहीं कहा जा सकता। इसी संदर्भ में ये संस्मरण- लेख मीमांसा में प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरा गाँव मेरे लिए दुनिया की सबसे सुंदर जगह है , जहां मेरा बचपन बीता था । गाँव और बचपन की स्मृतियाँ  मुझे रोमांचित कर देती हैं । दिल करता है कि उड़कर गाँव पहुंच जाऊं । यही कारण है कि समय निकालकर वहां जाता रहता हूँ । वहां बिताये हुए कुछ ही दिन मुझे पूरे साल के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं । मेरे लिए गाँव का मतलब है प्रकृति का साथ , खेत-खलिहान ,  जहाँ सुबह आपकी आँख मुर्गे की बांग या किसी पशु के रंभाने से खुले , जहां मोर नाचते हों , झिंगुरों की आवाज सुनी जा सके , रात में एक-एक तारा साफ दिखाई दे , अंधेरे का संगीत और सन्नाटा सुनाई दे , साझी विरासत हो और साझी ही बहन-बेटियां , सहयोग हो , सामाजिकता हो , सादा खाना हो , मोटा पहनावा हो । ऐसा ही तो था मेरा गाँव , सरल औ...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...