सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कभी न छीने काल

कभी न छीने काल

अपने जीवन में मैं ने देखा है सब कुछ
सारे विषाद भरे अनुभव हैं मेरे खाते में
तमाम लौकिक प्रार्थनाओं में
मैं गुहारता हूं बस एक
किसी बच्चे को कभी न छीने काल।

मैं जानता हूँ कि संभव नहीं कि मौत
फेंके न किसी पर फंदा अपना, फिर भी
थकूंगा नहीं, मैं गुहारता रहूंगा अनथक
किसी बच्चे को कभी न छीने काल।

वर्षों पहले वसुधा ने अपनी यशस्वी परंपरा में काएसिन कुलिएव की अनूदित कविताओं की पुस्तिका जारी की थी- कभी न छीने काल। उसी की शीर्षक कविता से ये पंक्तियों उद्धरित की गयी हैं। इनके अनुवादक थे- कवि सुधीर सक्सेना। एक कवि की सोच और अभिरुचि को जानने में उसके द्वारा चयनित रचनाकार और रचनाओं से काफी मदद मिलती है। मैं तभी से सुधीर सक्सेना की कविताओं को पढता रहा हूं। जीवन की हरीतिमा के प्रति उनके आग्रह और अनुरक्ति का कुछ रिश्ता तो काएसिन कुलिएव से भी जुडता ही है जो हिन्दी वालों के लिए बहुत परिचित कवि नहीं हैं।

सुधीर सक्सेना लगभग चार दशक से कविताएँ लिख रहे हैं और अभी तक उनके करीबन दस संकलन आ चुके हैं। यह तो नहीं कहा जा सकता कि उनकी उपेक्षा या अनदेखी हुई है पर मुझे यह जरूर लगता रहा है कि उनकी कविता को वैसी अहमियत नहीं मिली जिसकी कि यह हकदार है। इसके कारणों में झांकने पर लगता है कि इधर विचार का संवहन करने वाली कविता पर कम ध्यान दिया जा रहा है। बेशक, साहित्य में आन्दोलनों के दौर में विचार के नाम पर कविता में काफी अनर्गल चीजों का प्रवेश हुआ और कई बार वैचारिकता को सतही तरीके से भी पेश किया गया। वैसे इसी से निपटने के लिए तो आलोचना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम विचार केन्द्रित कविता को नेपथ्य की ओर धकेल दें।

इस संदर्भ में यह उल्लेख भी जरूरी है कि विचार वामपंथ का पर्याय नहीं है और यदि इसे हिन्दी के आधुनिक साहित्य के संदर्भ में देखेंगे तो दक्षिण पंथ से भी इसकी दूरी समझ आ जायेगी। विचार का संदर्भ उस आधुनिक चेतना से जुड़ा है जो तर्क और विवेक से परिचालित है और आधुनिकता एक वैश्विक परिघटना थी।पाश्चात्य दर्शन के रेशनलिज्म से भी इसका संबंध रहा है। भारत की आजादी के ठीक पहले हम तर्क केन्द्रित समूहों की बंगाल से शुरू लेकर उत्तर भारत तक सक्रियता देखते हैं, नवजागरण के अध्येताओं ने इन पर काम किया है। इस प्रसंग में आधुनिक दार्शनिक रेने देकार्त द्वारा रेशनलिज्म की व्याख्या को याद कर लेना पर्याप्त है जो कहते हैं, यह एक ऐसी मान्यता या सिद्धान्त है जो कहता है कि हमारे मत एवं हमारी क्रियाएँ धार्मिक मान्यताओं तथा भावात्मक प्रतिक्रियाओं पर नहीं वरन् विवेक और ज्ञान पर आधारित होनी चाहिए।

हिन्दी कविता में हम छायावादोत्तर काल में विकसित होते साहित्य- शास्त्र को देखें जो कविता में भाव और विचार पर विमर्शरत है। नयी कविता में तो जिरह और बहसें इसी पर केन्द्रित हैं और हम इसके रूप- विधान को बदलता देखते हैं। यहाँ तक कि बिंब, सादृश्य और प्रतीकों की पुरानी परिपाटी में आमूल परिवर्तन आ जाता है। धूमिल तक सपाटबयानी को कविता की एक स्वीकृत लाक्षणिकता मान लिया जाता है। किन्तु विचार अंतत: अमूर्त है, इसलिए कविता में इसे साधना एक चुनौती है। हम अकविता और उसके सहवर्ती आन्दोलन में व्यर्थ विचारों के घटाटोप की आलोचना पाते हैं। आखिर विचार कविता में कैसे आयेगा, इसका कोई सूत्रीकरण संभव नहीं है पर यह कविता की तरह तो आना ही चाहिए। कविता में वक्तव्य, जिरह और संवाद की भंगिमा का संबंध कवि की दृष्टि और शैली से है।

सुधीर सक्सेना की कविता का यह परिप्रेक्ष्य है। उनकी कविता में कोई वैचारिक अाग्रह अथवा अतिरेक नहीं है। उनकी कविता का स्वर संयत और सांन्द्र है जो मौजूदा वक्त के कोलाहल के लिए एक प्रतिकार भी है। जबकि वे अपने समय के ज्वलंत विषयों से टकराते हैं। धूसर में बिलासपुर उनकी लंबी कविता है जिसमें इनकी काव्य- प्रविधियों को एक साथ लक्षित किया जा सकता है। बदलते शहरों पर अनेक कवियों ने कविताएँ लिखीं हैं जिनमें शहर के पारंपरिक चरित्र के लोप की चिंता और नये बदलाव को लेकर खिन्नता सामान्य है। आपका ट्रीटमेंट ही कविता को अलग करता है। सुधीर जी की इस कविता में इतिहास, स्मृति, संस्कृति, परिवर्तन और मूल्य- क्षरण एक केन्द्रीय विचार से आबद्ध हैं। इसी तरह वे हिंसा के भयावह रूप लिंचिंग को उस हिंसक मानसिकता के विकास के रूप में देखते हैं जो हत्या के कई तरीके अपनाती रही है। अकबर इलाहाबादी ने कभी कहा था, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। वे इस विडंबना से हमारा सामना कराते हैं कि अब तो तोप वाले ही अखबार निकाल रहे हैं।

उनकी संवाद शैली देखिये-
प्रत्युत्तर के पहले उत्तर होता है
और उत्तर के पहले प्रश्न
और प्रश्न के पहले जिज्ञासा
इसी तरह सत्याग्रह से पहले सत्य था। गांधी ने इसका पुनर्संधान किया। इसी अर्थ में कवि कालयात्री है कि वह तमाम चीजों का एक अभिनव दृष्टि से पुनरावलोकन करता है। तानाशाह श्रृंखला कविताओं में पंक्तियाँ हैं- सच से भय खाता है तानाशाह और किसी भी भाषा में प्रामाणिक नहीं है तानाशाह की जीवनी। यहां क्षेपक और प्रक्षिप्तियों के समावेशन से कवि उसकी कथित विराटता की छवि को खंडित कर देता है। फिर कहता है कि उसका पोस्टमार्टम करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि वहाँ ह्रदय और अश्रु- ग्रंथियों जैसे अवयव नदारद होंगे। ताकत के विमर्श का कविता इसी तरह प्रतिरोध कर सकती है। सामाजिक दूरी बनाये रखने और अलग-थलग रहने की एहतिहातों के इस समय में ये पंक्तियाँ देखें-
जब दूर तलक, दूर तलक, दूर तलक
कोई नहीं होता  हमारे आसपास
वहीं से शुरू होता है नरक, वहीं से
शुरू होती है नरक- यात्रा
इसके बरक्स कवि के यहां सात्विक क्रोध और गर्हित प्रवृत्तियों के लिए घृणा का समर्थन है। सूर्य की लालिमा और हमारी शिराओं में बहते रक्त का साम्य हमारी अंत: शक्ति है।

हाल की एक कविता में वे कोरोना को विश्व इतिहास के सबसे बडे सबक के लिए देखते हैं, अगर हम बाकई सीखना चाहें; इसने प्रकृति से मनुष्य के संबंध की गत्यात्मकता को देखने की नयी दृष्टि दी है। ऐसा नहीं कि सुधीर सक्सेना को बिंब और प्रतीकों से कोई परहेज है। उनकी सुंदरी शीर्षक कविता है-
तुम
समुद्र से नहाकर निकली
और पहाड को 
तकिया बनाकर
लेट गयीं
घास के बिछौने पर
अम्लान।
बेगम अख्तर तो व्यथित थीं कि बरसात में शराब नहीं बरसी, सुधीर की एक कविता में वारिस शराब की मानिंद बरसती है। प्रेम को  वे सातवीं ऋतु की संज्ञा देते हैं। जीवन के कई कार्य- व्यापारों में वर्जना की अपनी अहमियत होती है लेकिन प्रेम एक ऐसी शय है जो वर्जना को नहीं मानता। इसके मायने हैं कि प्रेम में स्वतंत्रता अंतर्भुक्त है। यह - उतना ही उद्दाम फूटता, जितनी ज्यादा विषम होती है परिस्थिति। आज तंत्र पानी से जुड़ी अनेक चीजों को बचाना चाहता है लेकिन दुर्भाग्य से उसे यह बोध नहीं है कि यदि पानी ही नहीं बचा तो फिर ये सब कैसे बचेंगी। बाजार और विज्ञापन के गठजोड़ के संदर्भ में मर्लिन मुनरो को याद करते हुए उनकी एक प्रभावशाली कविता है। चीजें उनके अस्तित्व मात्र से नहीं बल्कि विशेषण से अर्थवत्ता पाती है, उसने कहा, ये राष्ट्र है मगर वहाँ लोकतंत्र नहीं था।  और अंत में बच्चों को लेकर सुधीर जी की चिंता-
वे बचपन छीनते हैं
और बच्चों को मार देते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अलवर में फिल्म समारोह

मौजूदा समय का मुम्बइया सिनेमा देश के जमीनी यथार्थ से पूरी तरह कट चुका है। अब यह भारत ही नहीं इंडिया का सिनेमा भी नहीं रहा। जबकि विडम्बना यह है कि जो लोग बेहतर फिल्में बनाते हैं उन्हें बाजार बहिष्कृत कर देता है। ऐसे में सार्थक फिल्मों को सही दर्शकों तक पहुँचाने के लिए जन हस्तक्षेप जरुरी हो जाता है। सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने के लिए अमन दिल्ली और समान्तर जयपुर ने मिलकर एक प्रयास शुरु किया है। अलवर में फिल्म समारोह इसी उपक्रम का हिस्सा था। अलवर में इस समारोह का आगाज ‘मई दिवस’ (1 मई 2010) को श्रमिक समस्या और विस्थापन से जुडी फिल्मों व उन पर विमर्श से हुआ। ऐसे समय में यह उपक्रम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब मजदूर और किसानों के मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि में जा रहे हैं। इस फिल्म समारोह की शुरुआत पहली मई 2010 को सुबह दस बजे अलवर के सामान्य चिकित्सालय स्थित आई.एम.ए. हॉल में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) दिल्ली के स्कॉलर और रंगकर्मी दौलत वैद्य ने दीप प्रज्वलित कर की। कार्यक्रम की शुरुआत में अमन पब्लिक चेरिटेबिल ट्रस्ट के निदेशक जमाल किदवई ने कहा कि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनका समाज पर ग...

अरुंधति राय से आशीष महर्षि की बातचीत

जानी-मानी लेखिका और बुकर सम्मान से सम्मानित अरुंधति राय जब भी कुछ लिखती हैं या फिर बोलती हैं तो वे विवादों से घिर जाती हैं। वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। इस इंटरव्यू के दौरान अरुंधति ने न सिर्फ विस्थापन पर बेबाकी से अपनी बात रखी बल्कि अयोध्या फैसले,केन्द्र सरकार और भाजपा कांग्रेस की नीतियों पर भी सवालिया निशान लगाया है। अरुंधति से खास बातचीत की आशीष महर्षि ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश- पूरे देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हो रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई भी बच्चों के अधिकारों की बात नहीं कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे न तो घर वालों की प्राथमिकता में रहते हैं और न सरकार की। लोग खुद की जिंदगी को बचाने में ही लग जाते हैं। लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हरेक के मूल अधिकारों की न सिर्फ रक्षा करे बल्कि वह देखे कि हर बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य से जोड़ा जाए। लेकिन हो नहीं रहा है। विस्थापन को आप किस प्रकार से देखती हैं, खासतौर से जंगलों से जिन लोगों को बेदखल किया जा रहा है। संविधान में साफ शब...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'

कवि-कविता सृजन संभव नहीं 'इन हाथों के बिना'                                                         रोहिणी अग्रवाल  अक्सर माना जाता है एक कविता भावोंच्छवास है , स्मृतियों का पुनःस्फुरण, कि नॉस्टैल्जिया , कल्पना और तरल संवेदना कविता की चमकीली त्वचा को बुनने वाले अनिवार्य घटक हैं ; कि मनोवेगों के घनीभूत दबाव का नैसर्गिक उद्गार है कविता । लेकिन क्या इतनी भर है कविता ? विचार से अछूती , विजन और मिशन से नितांत अपरिचित , सैलाब की तरह उमड कर बह जाने वाली ? नहीं !!  कविता के अछोर छितिज को दोनों बांहों से थामता है महीन बुनाई की तरह भीतरी तहो में बुना गया विचार । इतना सूक्ष्म और इतना अपारदर्शी कि अपनी बुनियादी ठोस पहचान खो वह संवेदना की मिट्टी में नमी सा घुल जाता है और हृदयस्पर्शी अनुगूंजे पैदा कर हर रसिक पाठक के संवेदनात्मक बोध के अनुरूप कितने- कितने व्यंजनात्मक स्वरूप ग्रहण करता चलता है । नरेंद्र पुंडरीक का कविता संग्रह 'इन हाथों के बिना' पढ़ रही ह...

मानिनी का मान : शिवानी

समीक्षा कविता कैसे हमारे बाहर- भीतर इर्द- गिर्द बिखरी है, बस उसे सृजनात्मक रूप से सहेजने की सामर्थ्य होनी चाहिए- इस बात को समझना है तो नूतन गुप्ता की कविताएँ आपकी मदद कर सकती हैं। कविताओं के भीतर किस विनम्रता और भाव- बोध से उतरना चाहिए और अवगाहन से जो हासिल हो, उसे सहजता से प्रस्तुत करें - यह समीक्षा ऐसा संदेश देती लगती है। शिवानी ने बड़े मनोयोग से इन निन्यानवें कविताओं का पाठ किया है, वह इस प्रक्रिया को उत्सव में बदल देता है। जिजीविषा की कहानी कविता की ज़ुबानी" जो पाया वो पाने की चाहत से कम था! पर और पाने के लिए ज़िन्दगी से चिरौरी न करके, पाए गए को सहेजने में ही लगे रहे! इसीलिए कहा कि "कम है तो अच्छा है!" जब बात संवेदनाओं की होती है तो उनके कम-ज्यादा होने की मापनी कैसे की जाए!जो एक बात किसी एक के लिए अति संवेदनशील होती है वही किसी दूसरे के लिए बिल्कुल साधारण सी भी हो सकती है! मगर उस साधारण सी बात को कहने का वैशिष्ट्य उसकी संवेदनशीलता को सर्वग्राही बना सकता है! नूतन गुप्ता जी की कविताओं से गुज़रते हुए यही बात सत्यापित होती है! बिना किसी कठिन शब्दावली और गूढ़ार्थ के,ये कव...

अमृता शेरगिल के कुछ पत्र

अमृता शेरगिल ( 1913-1941 ) भारतीय मूल की चित्रकार थीं। उनका जन्म 30 जनवरी, 1913 को बुडापेस्ट, हंगरी में हुआ। कला में आरंभिक रुचि के चलते उन्होंने यूरोपीय कला का गहन अध्ययन किया और इस सिलसिले में पेरिस रहीं। यहीं उन्हें लगा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जडों से जुडना चाहिए। इस क्रम में उन्होंने भारत आकर यहां की पारंपरिक और तत्कालीन कला का सूक्ष्म- अवलोकन व अध्ययन किया। उनका महत्वपूर्ण सृजन उसके बाद ही सामने आया। उन्हें बीसवीं सदी के अवांगार्द कला आन्दोलन की अहम् स्त्री- कलाकार माना जाता है। साथ ही, वे आधुनिक कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार हैं। यहाँ उनके कुछ पत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें उनकी अन्वेषी कला- दृष्टि और मौलिक सृजनशीलता के मूल उत्स परिलक्षित होते हैं। अमृता का अल्पायु में ही 5 दिसम्बर, 1941 को लाहौर में निधन हो गया।                     प्रस्तुति- राजाराम भादू                     अमृता शेरगिल के कुछ पत्र मां को : बेरोस, हंगरी, १५ अगस्त, १९३४ मैं कुछ सैरे बना रही हूं। मैं का...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...

दिखना तुम सांझ- तारे को

वर्षों पहले आलोक श्रीवास्तव का कविता संकलन वेरा उन सपनों की कथा कहो पढा था। अब उसकी कुछ बिम्ब- छवियां और अन्तर्ध्वनियां स्मृति में रह गयी हैं। इसके बाद वेरा भी कविताओं से आये उन उदात्त स्त्री चरित्रों में शामिल हो गयी जो हमारे विमर्श में बार- बार संदर्भ बनते हैं, जैसे- बनलता सेन ( जीवनानंद दास), चेतना पारेख ( ज्ञानेन्द्र पति) और निरुपमा दत्त ( कुमार विकल)। समकालीन प्रेम कविताओं की दुनिया में ऐसे यादगार चरित्र बहुत कम हैं। वेरा तो और भी अनुपम है क्योंकि उसकी तो अन्तर्कथा ही अलग है। आलोक श्रीवास्तव की कविता की एक विशिष्ट छाप चेतना और मन पर बन गयी थी और इसमें वेरा भी थी।  अभी उनका कविता संकलन दिखना तुम सांझ- तारे को पढा तो फिर से कुछ- कुछ वही धुंधली- सी पहचान वाली दुनिया उभरी। परिभाषा से मुक्त हो चुका और किसी बच रहे अर्थ में प्लेटोनिक रह गया प्रेम और नि:सर्ग। विपर्यय की तरह हिन्दी काव्य- परिदृश्य ध्यान में आ जाता है। हमारे मार्क्सवादी आलोचक भी प्रायः प्रेम के प्रति सहिष्णु नहीं रहे। कविता में इसकी अस्वीकार्यता के पीछे अक्सर रूमानीपन और तद्जनित यथार्थ से कवि के पलायन को वे इसके लिए प्र...

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४

ऋतुराज को पहल सम्मान : जयपुर-१९९४ कविताएँ मेरी बकरियाँ हैं। सीधे रास्तों पर चलने के बजाय ऊबड- खाबड और पहाड़ी रास्तों पर चलना पसंद करती हैं। इस रेवड के बढने के साथ- साथ मेरी जिम्मेदारियां भी बढी हैं। मुझे इसे संभाले रखना है। लोगों ने हाथी- घोडे बांध लिए हैं जबकि यही मेरी सम्पत्ति हैं। जयपुर में २४ दिसम्बर, १९९४ को आयोजित पहल- सम्मान समारोह में अपना उद्बोधन देते हुए कवि ऋतुराज ने यह कहा। मराठी के सुप्रसिद्ध कवि भुजंग मेश्राम ने ऋतुराज को प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कार राशि भेंट की। उन्होंने राज्याश्रित पुरस्कारों से कविता को हुए नुकसान को रेखांकित करते हुए कहा, वो ठोकते हैं हमारी पीठ तो टूट जाती है रीढ की हड्डी। कई दलित कवि पुरस्कार पाकर खामोश हो गये। इस तरह दलित कविता को दलित होकर भी मध्यवर्गीय बना दिया जाता है। भुजंग मेश्राम ने साहित्यकारों से टी. वी. रेडियो के माध्यम से शीघ्र प्रतिष्ठा पाने की महत्वाकांक्षा छोडने तथा आत्म की खोज करने का आह्वान किया। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा साहित्यकारों के सम्मान की परंपरा का स्वागत करते हुए कहा कि हिन्दी में यह प्रक्रिया पहले शुरू हो गयी है और...