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सुजन सखा हरिपाल




दिवाकर भट्ट अपनी पत्रिका आधारशिला का अगला अंक चित्रकार- लेखक हरिपाल त्यागी को समर्पित कर रहे हैं। वाचस्पति जी का आदेश है कि इसके लिए मैंं भी त्यागी जी पर लिखूं। १९९८ में उन पर प्रकाश मनु के संपादन में एक संचयन आया था- सुजन सखा हरिपाल। इसके लिए भी मुझे लिखना था पर लिख न सका। अब इसे फिर से पढ रहा था तो त्यागी जी की स्मृतियाँ उमडने- घुमडने लगीं।

त्रिलोचन जी सागर मुक्तिबोध सृजनपीठ में थे तो उन्होंने एक कविता शिविर में बुलाया था। वहाँ जाने से पहले ही वाचस्पति जी का एक पोस्टकार्ड आया कि सागर में तुम्हें चित्रकार हरिपाल त्यागी मिलेंगे। उनके साथ बांदा केदार बाबू के जाना है। जब त्यागी जी से मिलकर उन्हें वह पोस्टकार्ड दिखाया तो ठीक वैसा वाचस्पति जी का अपने नाम लिखा पोस्टकार्ड उन्होंने मुझे दिखा दिया। शिविर के बाद रात्रिकालीन बस से हम बांदा निकले और त्यागी जी सदैव के लिए बडे भाई हो गये। केदार बाबू को भी वाचस्पति का पत्र मिल चुका था। उन्होंने हमें आत्मीयता से घर ठहराया। त्यागी जी ने उनका पोर्ट्रेट बनाया। वहाँ कृष्ण मुरारी पहारिया और नरेन्द्र पुण्डरीक थे। उनसे प्रगतिशील लेखक संघ के गुना सम्मेलन में मित्रता हो गयी थी। उनके साथ केन नदी पर भ्रमण किया, त्यागी जी ने केन पर रेखांकन किये। ये आठवें दशक के आखिर का कोई बरस था।

मेरे जयपुर आने के कुछ साल बाद मैं ने त्यागी जी को पत्र लिखा था। उत्तर में वे खुद जयपुर चले आये। यहाँ और  लेखक मित्रों- चित्रकारों से उनकी मुलाकातें हुई। लेखकों से मिलाते वक्त हम बताते थे कि मुक्तिबोध रचनावली के मुखपृष्ठ पर जो उनका बीडी पीते हुए चित्र है, वह इन त्यागी जी का बनाया हुआ है। हमारे मित्र सत्यनारायण की एक प्रिय पुस्तक है- आदमी से आदमी। दिल्ली के फुटपाथों पर जीवन बसर करने वालों की जिंदगी पर कथाकार भीमसेन त्यागी ने रिपोर्ताज लिखे, और रेखांकन हरिपाल त्यागी के, जो धर्मयुग में धारावाहिक छपे और बाद में यह अनूठी किताब सामने आयी। सत्यनारायण जी के साथ योजना बनी कि ये दोनों राजस्थान के खानाबदोश समूहों पर एक इसी तरह का काम करेंगे। काश , यह हो पाता।

कवि ओमेन्द्र ने कुछ समय पत्रिका एक और अंतरीप का संपादन किया। सागर के मुक्तिबोध सृजनपीठ की दो शोधकर्ताओं ने  त्रिलोचन जी पर डायरी लिखी थी। त्रिलोचन जी उनसे अलग- अलग समय मिलते थे। उनसे जो भी बात होती, मीना व्यास और मनीषा जैन उसे अपनी- अपनी डायरी में लिख लेतीं। ये डायरियां उहोंने मुझे पढने के लिए भेजी थीं।  मैं ने उनकी स्वीकृति से ओेमेन्द्र को दे दीं। अंतरीप का अंक निकला ही, बाद में रचना प्रकाशन से यह स्वतंत्र पुस्तक रूप में भी छपा। त्रिलोचन पर डायरी के मुखपृष्ठ पर भी त्यागी जी का ही बनाया त्रिलोचन जी का रेखाचित्र था।

ओमेन्द्र चाहते थे कि पुस्तक का लोकार्पण त्रिलोचन जी के हाथों हो। त्यागी जी से बात की गयी। उन्होंने बताया कि आजकल बाबा भी यहीं हैं, उनके हाथों क्यों नहीं। त्रिलोचन जी भी रहें। हम तीन लोग- ओमेन्द्र, प्रेमचंद गांधी और मैं, दिल्ली में कवियों के गाँव सादतपुर गये। वहाँ कवि रामकुमार कृषक जी के प्रांगण में आयोजित एक आयोजन में बाबा नागार्जुन ने त्रिलोचन की डायरी का लोकार्पण किया। त्रिलोचन जी के साथ सादतपुर के तो लगभग सभी लेखक थे। सायंकाल कथाकार वीरेन्द्र जैन के घर बैठक जमीं। उनका डूब उपन्यास तब चर्चाओं में आ चुका था और वे पार पर काम कर रहे थे। दिल्ली के इस आयोजन के सूत्रधार त्यागी जी ही थे।

पूर्व की भांति अप्रत्याशित रूप से त्यागी एक बार फिर जयपुर आये। यह इस शताब्दी के शुरूआती किसी साल की बात है। सुजन सखा हरिपाल की प्रति उन्होंने बाकायदा भेंट की। मुझे शर्मिंदगी थी कि मैं लिख नहीं पाया था। इस पुस्तक पर लिखूगा, मैं ने वादा किया। इस पुस्तक के आंतरिक कवर पर हमारे प्रिय चित्रकार सुरेन्द्र जोशी द्वारा त्यागी जी का बनाया रेखांकन है। त्यागी जी ने अपने लंबे साक्षात्कार में चित्रकार एकेश्वर हटवाल की रिक्शावाला चित्र- श्रृंखला का विशेष उल्लेख किया है। बाकी और क्या है, वह तो मैं लिखूंगा ही ; बहरहाल एक उल्लेख और। कवि कृष्ण कल्पित बनारस पर शिवप्रसाद मिश्र रुद्र की पुस्तक बहती गंगा का उल्लेख करते रहते हैं। भीमसेन त्यागी ने अपने संस्मरण में बताया है कि राधाकृष्ण प्रकाशन के ओंप्रकाश ने इसका नया संस्करण हरिपाल त्यागी के चित्र व रेखांकनों के साथ छापा था। इसके लिए उन्होंने त्यागी जी को अपने खर्च पर बनारस भेजा था।

# पढते-पढते/२६

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