सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जेल : एक बच्चे की नजर से

जेल : एक बच्चे की नजर से


मनीष आजाद और अमिता शीरीन को उत्तर प्रदेश की एटीएस नक्सली गतिविधियों में लिप्तता के संदेह के चलते भोपाल से गिरफ्तार करके लायी। इन्हें कई महीने पुलिस हिरासत और फिर जेल में गुजारने पडे।  यह अर्बन नक्सल के दुष्प्रचार का दौर था। अपने इन अनुभवों को मनीष ने लिपिबद्ध किया है। दुनिया की अनेक भाषाओं में जेल डायरियों का यशस्वी इतिहास है जिनमें एंटोनियो ग्राम्शी और भगतसिंह की जेल नोटबुक हैं तो दूसरीओर भारतीय जेलों पर मेरी टाइलर और वरवर राव के अनुभव वृत्तान्त हैं। मनीष की जेल डायरी हिन्दी में है। इसकी एक और विशेषता यह है कि इसमें एक छह साल का बच्चा अब्बू भी उनके साथ है। यह उनके एक मित्र का बेटा अबीर है जिससे मनीष को बहुत लगाव है और जो उसे मौसा कहता है। मनीष लिखते हैं कि अब्बू को अपनी जेल- यात्रा में शामिल करने का खयाल उन्हें जर्मन फिल्म लाइफ इज ब्यूटीफुल से आया जिसमें जर्मनी के एक नाजी यातना शिविर में एक पिता अपने पांच साल के बच्चे के साथ है। अपने बच्चे के मासूम मन को नाजी नृशंसता के आघात से बचाने के लिए वह शिविर की सभी कारगुजारियों को बच्चे के सामने एक खेल की तरह बयान करता है। इस वृत्तान्त में भी मनीष अब्बू के सामने पुलिस तंत्र और जेल की तमाम प्रक्रियाओं को करीबन एक प्रहसन की तरह प्रस्तुत करते हैं।

दूसरी ओर एक बच्चे के नजरिये को लेकर, जैसा कि मनीष कहते हैं, राजा को नंगा कहने की हिमाकत एक बच्चा ही कर सकता है ; असल बात यह है कि जब तक उसमें  मासूमियत है तब तक उसके यहां उत्कंठा के लिए भी अवकाश है। अन्यथा बकौल निदा फाजली चार किताबें पढकर तो वे फिर हम जैसे हो ही जाते हैं। यह चार किताबें मुहावरा वास्तव में उस पेरेंन्टिग और शिक्षण के लिए है जो अपने अनुकूलन और मतारोपण के जरिए बच्चे की प्रश्नाकुलता को समाप्त कर देती है। यह महज संयोग नहीं है कि फासीवादी नृशंसता के विरुद्ध सबसे सशक्त आवाज एक बच्ची- अेन फ्रेंक - की रही है। अब्बू के सवाल भी इस तंत्र के महाकाय तिलस्म को मामूली ही सही खंडित तो करते ही हैं। यही क्रिटिकल इंक्वायरी इस रचना को विशिष्ट बना देती है।

शुरूआत एक रात से है, जब अमिता और अब्बू गहरी नींद में सोये मनीष को अरुण कमल की कविता पंक्तियाँ याद दिला रहे हैं- नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है। वह विलियम जेड फोस्टर की किताब की गिरफ्त में आते हैं और सुबह के किसी प्रहर में उससे रिहा होते हैं। वहीं से हमारी गिरफ्त शुरू हो जाती है जो अब्बू और मनीष की रिहाई के बाद ही समाप्त होती है। बल्कि समाप्त भी कहां होती है, वे लोग अभी भी हमारी चेतना में बने रहते हैं जो जेल की चाहरदीवारी में कैद हैं और जिन्हें वहाँ नहीं होना चाहिए। अब्बू का सवाल था कि शतरंज के खेल में राजा के मरने के बाद ही खेल क्यों खत्म हो जाता है। उसी का कहना था कि यह तब तक चलना चाहिए जब तक एक भी सिपाही जिंदा है। अभी तो जेलों में बहुत बेगुनाह भरे हैं। वहाँ गोरख पाण्डेय की एक कविता का जिक्र है : जाल में चिड़िया क्यों फंसी, कि वह भूखी थी। कंवल भारती इसे बदल कर लिखते हैं..., कि वह चिडिया थी। यानी कि वह दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अथवा स्त्री थी। क्या कारण है कि बहुसंख्यक कैदी इन्हीं वर्गों से आते हैं। और इसका एक और भाष्य वहाँ उभरता है, कि वहाँ शिकारी था। मनीष अब्बू को बताता है कि वह इसलिए जेल में है क्योंकि उसकी सरकार से लड़ाई हो गयी है। अब्बू प्रति- प्रश्न करता है कि लड़ाई तो आपकी मौसी (  मनीष की पत्नी) से भी होती है, उसके लिए वे कौन- सी जेल सोचते हैं? और मनीष जेल के दर्शन पर विचार करने लगता है। पितृसत्ता ने तो स्त्रियों के लिए भी सजा के तरीके निकाले हैं। जेलें बुरों को समाज से अलगाने के लिए बनीं। लोकतंत्र ने बुरों को भी सुधरने के अवसर की बात की और जेलों को सुधार- गृहों में बदलने की संकल्पना की गयी। फिर भी हमारी जेलें छोटे अपराधियों और अपने को निर्दोष न साबित करने वालों व असहमतों से भरी हैं। जोहान गाल्टुंग के हिसाब से ये संरचनात्मक हिंसा की एक सहायक एजेंसी की तरह काम कर रही हैं।
 
मनीष से लंबी पूछताछ होती है जो उसे अमेरिकी फिल्म दि आवर आफ फरनेस के इंटेरोगेशन दृश्यों की याद दिलाती है। जब एक अफसर उसकी किताबों व अन्य सामग्री से जुड़े ऊल- जुलूल सवाल करता है तो मनीष उसे कहते हैं कि आपको बेहतर होमवर्क करके आना चाहिए था। हमारे इन पुलिस बलों में पेशेवर क्षमता की गंभीर कमी है। इसलिए भी पूछताछ में  वे थर्ड डिग्री तरीकों पर निर्भर रहते हैं। एक महिला कांस्टेबल को मनीष का एक महिला साथी से गले मिलना नागवार गुजरता है। अवसाद में चल रही यह महिला अभी भी अपने पिछड़े मूल्यों की कैद में है। ए टी एस का एक सदस्य मनीष के घर लगे पोस्टरों को दिलचस्पी से निहारता ईरानी मजदूर कवि साबिर हक की कविता के बारे में पूछता है। वहाँ जल्दी ही इसकी संवेदनशीलता भी मुरझा जाने वाली है। जैसा कि मनीष को एक शे" र याद आता है : धूप की शिद्दत कभी महसूस न करता, ये कौन मगर पेड के साये में खडा है।

यह उल्लेखनीय है कि इस समूचे वृत्तान्त में लेखक को अन्य रचनाकारों और फिल्मों के प्रसंग याद आते रहते हैं। लाकअप की दुरावस्था को देखकर उसे जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कृति मुर्दाघर के प्रसंग याद आते हैं। अभी भी इंग्लैंड से बनकर आयी हथकड़ी के हाथों में खनकने पर पुलिस वालों के चौंक उठने पर उसे वरवर राव की कविता पंक्तियाँ याद आती हैं। कोर्ट में पेशी के दौरान वृद्ध कैदियों की बदहाली पर उसे कोयल ब्रदर्स की फिल्म देयर इज नो कंट्री फोर ओल्डमेन स्मरण होती है। पारधी के प्रसंग में जब एक पुलिस अधिकारी सभी विमुक्त जनजातियों को गाली देते हुए कहता है कि इनके तो डीएनए में ही अपराध है तो उसे न्यूंगी वा थांगो की कृति मातीगारी के तर्कों की अनुगूंज सुनायी देती है। डे सीका की फिल्म बाइसिकल थीफ के दृश्यों की प्रतिच्छाया तो वृत्तान्त में कई जगह उल्लिखित है। मुझे लगता है कि लेखक को विकट परिस्थितियों से गुजरते वक्त ये दृश्य- प्रसंग नैतिक और भावात्मक संबल प्रदान कर रहे हैं और इस तरह सृजन की अन्तर्निहित शक्ति का भी प्रकटन हो रहा है।

जेल के कष्टकर और ऊबाऊ जीवन में कुछ मुक्त क्षण भी आते हैं। हालांकि जेल में त्यौहार बिना आहट गुजर जाते हैं, फिर भी लोग वहाँ पूजा करते हैं और नमाज पढते हैं। कैदी के लिए सबसे सुखद क्षण वे होते हैं जब कोई उससे मुलाकात के लिए आता है। लेकिन ऐसे ही समय उनका अवसाद और अधिक बढ जाता है जिनसे कभी कोई मिलने नहीं आता। शानू नंबरदार जैसा मनहूस व्यक्ति भी अपने बच्चे की शरारतों पर खिलखिलाने लगता है। जेल में बच्चों की भागदौड से बने खुशनुमा माहौल से मनीष को खयाल आता है कि आदमी को इंसान बच्चे ही बनाते हैं। अब्बू  एक दिन सवाल करता है कि जेल में दो गेट हैं। हम लोग छोटे गेट से निकलते हैं। जेलर भी उससे निकल सकता है लेकिन उसके लिए बड़ा गेट खोला जाता है। मनीष उसे जबाव देता है, ताकि उसके शक्तिमान होने का अहसास दिलाया सके। अब्बू अपने स्वाभाविक हास्य- बोध से जबाव देता है : नहीं,  मुझे मालूम है बडा गेट एक बार और खुलता है, जब कचरा गाड़ी आती है। तो इस तरह हमारी जेलें दंभ और झूंठे दर्प के कचरे को आज भी ढोती भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी हैं।

मनीष की जेल के आखिरी दिनों में दंगाइयों की आवक शुरू हो गयी और इन्ही के साथ वहाँ जामिया, शाहीन बाग और रोशन बाग की बहनों की कहानियाँ पहुंचने लगीं। ये लोग सीएए- एनआरसी का विरोध करने वाले सामान्य नागरिक थे जिन्हें दंगा फैलाने की धाराओं में जेल भेज दिया गया था। अब्बू का फिर सवाल था कि कुछ लोगों का जेल में रहना जरूरी है क्या? किन्तु उसके मन में उठने वाले इन सवालों के जबाव किसके पास थे। उन लोगों की कहानी सुनते हुए ही एक दिन वह कह उठा कि उसे बड़ा होकर मुसलमान नहीं बनना, क्योंकि वह फिर से जेल आना नहीं चाहता। यह काग्नीटिव पैटर्न में ढलता हुआ अब्बू है। यहीं लेखक अब्बू को अपने से अलग यानी जेल से मुक्त करना चाहता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। आप पढते हुए भी इसे शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। पर सच तो यह है कि अब्बू कभी जेल में था ही नहीं। वह सिर्फ लेखक की कल्पना है, एक स्वाभाविक व जीवंत चरित्र की सृ्ष्टि जिसके सहारे वह तंत्र के इस अमानवीय तिलस्म पर गहरा आघात कर उसे पूरा नहीं तो काफी हद तक नंगा करता है। लेखक पिकासो को उद्धृत करता है, कला वह झूंठ है जो आपको सच तक पहुंचाती है। अब्बू के बहाने लेखक कला- सत्य का यथार्थ अनुभव कराता है अन्यथा तो अब्बू उसका ही विस्तार है। हालांकि उसके लिए कहना मुश्किल है कि उसने कितना अब्बू को गढा और कितना अब्बू ने उसे। सबसे प्रीतिकर तथ्य यह है कि अब्बू अपनी इस काल्पनिक कहानी को पढने के बाद लेखक से कहता है कि क्या हम कादिर की मदद नहीं कर सकते। बता दें कि कादिर इसलिए जेल में बना हुआ था क्योंकि उसे कोई जमानती नहीं मिल रहा था। और यह भी कि अब अब्बू को जेल से डर नहीं लगता 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सर्वेश्वर की भेडिया और हिंस्र शंक्लें - राजाराम भादू

पूर्वकथन : लीलाधर मंडलोई ने वर्तमान साहित्य के शताब्दी कविता विशेषांक ( मई- जून,२०००) का संपादन किया था। इसमें शताब्दी की कुछ चुनी हुई कविताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ व लेख हैं जो अलग- अलग लोगों से लिखवाये गये थे। मैं ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेडिया श्रृंखला पर लिखा था। इसे उलटते- पलटते लगा कि यह आज तो और भी मौजूं है। भगतसिंह की जेल में लिखी डायरी- ए मार्टायर्स नोटबुक ( इंडियन बुक क्रानिकल) का हिन्दी अनुवाद आ चुका है- शहीदे- आजम की जेल नोटबुक ( परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ)। इसमें भगतसिंह द्वारा मूल पृष्ठ ३९ में तिरछे लिखी ये पंक्तियां उद्धृत हैं- महान इसलिए महान हैं क्योंकि हम घुटनों पर हैं  आओ उठ खडे हों। पंक्तियों के लेखक का नाम नहीं है, बहुत संभव है ये स्वयं भगतसिंह की लिखी हों। सर्वेश्वर की इन कविताओं को पढते हुए मुझे लगता है, ये महानता के विरुद्ध साधारण जनों को उठ खडे होने के लिए आह्वान करती कविताएँ हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी काव्य- यात्रा सोच के जिस धरातल से शुरू की थी, बाद में वे लगभग उसके विपरीत छोर पर छोर पर पहुँच गये थे। यहां वे आततायी शक्तियों के प्रतिपक्...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

हाशिये के समुदाय तीन इतिवृत्त

हाशिये के समुदायों पर सामाजिक सांस्कृतिक सामग्री का नितांत अभाव मिलता है। आदिवासी समुदायों पर भारतीय नृतत्वशास्त्र सर्वेक्षण के अन्तर्गत कुछ मोनोग्राफ प्रकाशित हुए हैं। लेकिन ये दशकों पुराने हैं और इन्हें अद्यतन नहीं किया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों में कुछ समुदायों ने अपनी ही पहल पर लेखन का प्रयास किया है। ऐसे कुछ दस्तावेजों को सामाजिक अध्येता बद्रीनारायण ने गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक शोध संस्थान, झुंसी, इलाहाबाद के दलित संदर्भ केन्द्र में एकत्रित कराया है। लेकिन ऐसे समुदाय जो आदिवासी व दलित श्रेणियों में भी निचले पायदान पर हैं अथवा इनसे बाहर हैं और जिन्हें प्रायः घूमन्तू- अर्ध घूमन्तू कहकर अभिहित किया जाता है, उनके अतीत व वर्तमान को लेकर प्रामाणिक जानकारियों का लगभग अभाव है। इस दिशा में गंभीर प्रयास कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। ऐसे में जोधपुर के प्रो. नेमीचंद बोयत के कार्य की व्यापक सराहना होनी चाहिए। इन्होंने हाशिये के समुदायों पर तीन किताबें लिखी हैं: पहली - इतिहास के पन्नों में मेहतर, वाल्मीकि एवं चाण्डाल ; दूसरी - इतिहास के झरोखे में सांसी और तीसरी इतिहास के आइने में ब...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

सबाल्टर्न स्टडीज - दिलीप सीमियन

दिलीप सीमियन श्रम-इतिहास पर काम करते रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कॉलोनियलिज्म’ महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है और सूरत के सेन्टर फोर सोशल स्टडीज एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में फैलो रहे हैं। दिलीप सीमियन ने अपने कई लेखों में हिंसा की मानसिकता को विश्लेषित करते हुए शांति का पक्ष-पोषण किया है। वे अमन ट्रस्ट के संस्थापकों में हैं। हाल इनकी पुस्तक ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ प्रकाशित हुई है। भारत में समकालीन इतिहास लेखन में एक धारा ऐसी है जिसकी प्रेरणाएं 1970 के माओवादी मार्क्सवादी आन्दोलन और इतिहास लेखन में भारतीय राष्ट्रवादी विमर्श में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों की आलोचना पर आधारित हैं। 1983 में सबाल्टर्न अध्ययन का पहला संकलन आने के बाद से अब तब इसके संकलित आलेखों के दस खण्ड आ चुके हैं जिनमें इस धारा का महत्वपूर्ण काम शामिल है। छठे खंड से इसमें संपादकीय भी आने लगा। इस समूह के इतिहासकारों की जो पाठ्यवस्तु इन संकलनों में शामिल है उन्हें ‘सबाल्टर्न’ दृष्टि के उदाहरणों के रुप में देखा जा सकता है। इस इतिहास लेखन धारा की शुरुआत बंगाल के...

शिक्षा विमर्श के नए आयाम खोलती 'किताब'

कृति चर्चा  प्राचार्य एवं  प्रशासक रहे डॉ आर.डी सैनी लगभग चालीस वर्षों से साहित्य संसार में सक्रिय हैं । कविता ,उपन्यास एवं कथेतर विधाओं से गुजरते हुए 'किताब' उनकी दसवीं पुस्तक है । 'विचार प्रक्रिया ' और 'संज्ञानात्मक बोध ' का बच्चों में विकास कैसे हो ? इसका व्यावहारिक धरातल पर समाधान यह पुस्तक प्रस्तुत करती है   । डॉ. ममता चतुर्वेदी प्राचार्य है , जो कि लंबे समय से पठन-पाठन के साथ-साथ शिक्षा के व्यापक सरोकारों से जुड़ी रही हैंं । एक शिक्षिका की दृष्टि से डॉ. आर.डी सैनी की 'किताब' की यह समीक्षा , पाठकों को शिक्षा से जुड़े उन मूलभूत प्रश्नों एवं समस्याओं के समाधान समझने में मदद करेगी , जिनका सफलतापूर्वक सामना लेखक ने स्वयं किया है ।  यह पुस्तक समीक्षा 'किताब' के सभी आयामों को दृष्टिपात करते हुए पाठक को किताब की दहलीज तक ले जाती है । एक पुस्तक के रूप में  'कुछ यूं रचती है हमें "किताब", शिक्षा व बाल मनोविज्ञान पर आधारित भाव प्रधान पुस्तक है । इसमें लेखक डॉ आर.डी सैनी ने मानव मूल्य , नैतिकता, कर्तव्य एवं घटनाओं का मार्मिक चित्रण किया है...

बोनती : मोर्जुम लोयी

कहानी मोर्जुम लोयी ने अपने उपन्यास- मिनाम - से अपनी खास पहचान बनायी है। उन्होंने पूर्वोत्तर के स्त्री- संघर्षों की वास्तविकता को बडे फलक पर प्रस्तुत किया है। अभी वे अपने गाँव को केन्द्र में रखकर एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रही हैं। उसी से एक मार्मिक अंश मीमांसा में दे रहे हैं। इसके जरिए आप मोर्जुम लोयी की संवेदनशील दृष्टि, समर्थ भाषा के साथ एक उद्वेलित करने वाले प्रसंग से रूबरू हो सकते हैं। बोनती/बोनी/भोनती ये सभी एक अर्थ का द्योतक है। अब बात आती है ये शब्द कहां से आया? या इसका अर्थ क्या है?  ‘भोनती’ असमिया शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बहन । चूंकि असम अरुणाचल पड़ोसी राज्य है तो यहां के कई शब्द अरुणाचल प्रदेश की बोलियों में सम्मिलित हो गए है और कई बार उच्चारण बदल जाता है और वैसे ही ‘भोनती’ शब्द अरुणाचल में ‘बोनती’ बन गई।  असम की चाय के बागानों से आदिवासी लड़कियां, असमिया,कुलि-बंगाली आदि, तिराप-चाङलाङ से चाकमा लड़कियां आदि अरुणाचल के घरों में काम करती हुई पाएं जाते है। इन्हीं कामवालियों को यहां बोनती कहा जाता है। ये शब्द इस प्रदेश में इतनी रूढ़ हो गई है कि यहां के लड़कियों को असमि...

कथौड़ी समुदाय- सुचेता सिंह

शोध कथौडी एक ऐसी जनजाति है जो अन्य जनजातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी और उपेक्षित है। यह अल्पसंख्यक जनजाति महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ अंचलों में छितरायी हुई है। दक्षिण राजस्थान में इनके हालात प्रस्तुत कर रही हैं अध्येता सुचेता सिंह। दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में कथौड़ी जनजाति है जो वहां रहने वाली जनजातियों में सबसे कम संख्या में है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार इस जनजाति समुदाय की वृद्धि दर दशक वार घट रही है। 'ये लोग कैथ के पेड़ से कत्था निकालने का काम करते थे जो पान में लगाया जाता है इसलिए इनका नाम कथौड़ी पड़ा।' वैसे ये लोग कत्था बनाने के साथ-साथ बहुत से वन सम्बन्धी कार्य करते हैं, जैसे-बांस कटाई एवं दुलाई, वृक्ष कटाई, वन उपज संग्रहण, वन्य जीव आखेट, हाथ औजार निर्माण तथा वन औषध उपचार आदि। राजस्थान में इन लोगों का इतिहास कोई अधिक पुराना नहीं है। इन्हे महाराष्ट्र से इस क्षेत्र में कत्था उत्पादन और वन कटाई के लिए लाया गया। ऐसा अनुमान है कि जंगल के ठेकेदार इन्हे कोंकण महाराष्ट्र से यहां लेकर आये। ऐसा लगता है कि पूर्व में भी ये घुमक्कड़ जीवन जीते थे। इनकी बसाहटें म...

गांव की स्मृतियाँ - ज्ञान चंद बागड़ी

भूमंलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों ने गाँव, कृषि और पारंपरिक उद्यमों का भयावह हाशियाकरण किया है। कथाकार ज्ञानचंद बागडी अपनी स्मृतियों के गाँव को प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि अतीत का वह गाँव कोई आदर्श था लेकिन जिस तरह बदलाव आया, वह भी सहज नहीं कहा जा सकता। इसी संदर्भ में ये संस्मरण- लेख मीमांसा में प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरा गाँव मेरे लिए दुनिया की सबसे सुंदर जगह है , जहां मेरा बचपन बीता था । गाँव और बचपन की स्मृतियाँ  मुझे रोमांचित कर देती हैं । दिल करता है कि उड़कर गाँव पहुंच जाऊं । यही कारण है कि समय निकालकर वहां जाता रहता हूँ । वहां बिताये हुए कुछ ही दिन मुझे पूरे साल के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं । मेरे लिए गाँव का मतलब है प्रकृति का साथ , खेत-खलिहान ,  जहाँ सुबह आपकी आँख मुर्गे की बांग या किसी पशु के रंभाने से खुले , जहां मोर नाचते हों , झिंगुरों की आवाज सुनी जा सके , रात में एक-एक तारा साफ दिखाई दे , अंधेरे का संगीत और सन्नाटा सुनाई दे , साझी विरासत हो और साझी ही बहन-बेटियां , सहयोग हो , सामाजिकता हो , सादा खाना हो , मोटा पहनावा हो । ऐसा ही तो था मेरा गाँव , सरल औ...

कविताएं : सत्यदेव बारहठ

सत्यदेव बारहठ एक छुपे हुए कवि थे। लंबे छुपाव और संकोच के बाद वे इस रूप में प्रकट हुए हैं। उनके कवि का स्वागत करते हुए हम उनकी कविताएँ मीमांसा में प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही, कविताओं पर सत्यनारायण की टिप्पणी है। सत्यदेव बारहठ की कविताएं अपने समय, समाज और स्वयं से रूबरू कविताएं हैं। इन कविताओ ंका फलक तीन साढ़े तीन दशक के बीच फैला हुआ है। हालांकि इस बीच कवि के विचार और स्वभाव में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया बल्कि वह अधिक प्रौढ़़ और ज्यादा निखरकर सामने आया है। इसीलिए ये कविताएं आज भी बराबर विश्वसनीय बनी हुई हैंै। कवि को तब भी यह विश्वास था कि - ’’तार वीणा के बजेंग/ कर्ण स्वर आनंद लेंगे/ मधुर वेला की प्रतीक्षा हेतु/ अब यह जागरण है/ जागरण है/ जागरण है।’’ चार दशक पहले लिखी कविता के ये अंश हैं तो सन् दो हजार में लिखी कविता की पंक्तियां हैं - ’’मनुष्य होने का अर्थ तलाशते/ हमारे हाथ यह सत्य लगा है/ कि हम हारें नहीं/ अपनी पूरी सामथ्र्य से/ मुकाबला करें/ मनुष्य के खिलाफ खड़ी/ ताकतों का/ मनुष्य को/ विवेकहीन, दीन-हीन, कातर/ बना देने वाली ताकतों का।’’ लेकिन दो हजार पांच तक आते आते कवि को लगता है कि - ’’सत...