सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जेल : एक बच्चे की नजर से

जेल : एक बच्चे की नजर से


मनीष आजाद और अमिता शीरीन को उत्तर प्रदेश की एटीएस नक्सली गतिविधियों में लिप्तता के संदेह के चलते भोपाल से गिरफ्तार करके लायी। इन्हें कई महीने पुलिस हिरासत और फिर जेल में गुजारने पडे।  यह अर्बन नक्सल के दुष्प्रचार का दौर था। अपने इन अनुभवों को मनीष ने लिपिबद्ध किया है। दुनिया की अनेक भाषाओं में जेल डायरियों का यशस्वी इतिहास है जिनमें एंटोनियो ग्राम्शी और भगतसिंह की जेल नोटबुक हैं तो दूसरीओर भारतीय जेलों पर मेरी टाइलर और वरवर राव के अनुभव वृत्तान्त हैं। मनीष की जेल डायरी हिन्दी में है। इसकी एक और विशेषता यह है कि इसमें एक छह साल का बच्चा अब्बू भी उनके साथ है। यह उनके एक मित्र का बेटा अबीर है जिससे मनीष को बहुत लगाव है और जो उसे मौसा कहता है। मनीष लिखते हैं कि अब्बू को अपनी जेल- यात्रा में शामिल करने का खयाल उन्हें जर्मन फिल्म लाइफ इज ब्यूटीफुल से आया जिसमें जर्मनी के एक नाजी यातना शिविर में एक पिता अपने पांच साल के बच्चे के साथ है। अपने बच्चे के मासूम मन को नाजी नृशंसता के आघात से बचाने के लिए वह शिविर की सभी कारगुजारियों को बच्चे के सामने एक खेल की तरह बयान करता है। इस वृत्तान्त में भी मनीष अब्बू के सामने पुलिस तंत्र और जेल की तमाम प्रक्रियाओं को करीबन एक प्रहसन की तरह प्रस्तुत करते हैं।

दूसरी ओर एक बच्चे के नजरिये को लेकर, जैसा कि मनीष कहते हैं, राजा को नंगा कहने की हिमाकत एक बच्चा ही कर सकता है ; असल बात यह है कि जब तक उसमें  मासूमियत है तब तक उसके यहां उत्कंठा के लिए भी अवकाश है। अन्यथा बकौल निदा फाजली चार किताबें पढकर तो वे फिर हम जैसे हो ही जाते हैं। यह चार किताबें मुहावरा वास्तव में उस पेरेंन्टिग और शिक्षण के लिए है जो अपने अनुकूलन और मतारोपण के जरिए बच्चे की प्रश्नाकुलता को समाप्त कर देती है। यह महज संयोग नहीं है कि फासीवादी नृशंसता के विरुद्ध सबसे सशक्त आवाज एक बच्ची- अेन फ्रेंक - की रही है। अब्बू के सवाल भी इस तंत्र के महाकाय तिलस्म को मामूली ही सही खंडित तो करते ही हैं। यही क्रिटिकल इंक्वायरी इस रचना को विशिष्ट बना देती है।

शुरूआत एक रात से है, जब अमिता और अब्बू गहरी नींद में सोये मनीष को अरुण कमल की कविता पंक्तियाँ याद दिला रहे हैं- नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है। वह विलियम जेड फोस्टर की किताब की गिरफ्त में आते हैं और सुबह के किसी प्रहर में उससे रिहा होते हैं। वहीं से हमारी गिरफ्त शुरू हो जाती है जो अब्बू और मनीष की रिहाई के बाद ही समाप्त होती है। बल्कि समाप्त भी कहां होती है, वे लोग अभी भी हमारी चेतना में बने रहते हैं जो जेल की चाहरदीवारी में कैद हैं और जिन्हें वहाँ नहीं होना चाहिए। अब्बू का सवाल था कि शतरंज के खेल में राजा के मरने के बाद ही खेल क्यों खत्म हो जाता है। उसी का कहना था कि यह तब तक चलना चाहिए जब तक एक भी सिपाही जिंदा है। अभी तो जेलों में बहुत बेगुनाह भरे हैं। वहाँ गोरख पाण्डेय की एक कविता का जिक्र है : जाल में चिड़िया क्यों फंसी, कि वह भूखी थी। कंवल भारती इसे बदल कर लिखते हैं..., कि वह चिडिया थी। यानी कि वह दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अथवा स्त्री थी। क्या कारण है कि बहुसंख्यक कैदी इन्हीं वर्गों से आते हैं। और इसका एक और भाष्य वहाँ उभरता है, कि वहाँ शिकारी था। मनीष अब्बू को बताता है कि वह इसलिए जेल में है क्योंकि उसकी सरकार से लड़ाई हो गयी है। अब्बू प्रति- प्रश्न करता है कि लड़ाई तो आपकी मौसी (  मनीष की पत्नी) से भी होती है, उसके लिए वे कौन- सी जेल सोचते हैं? और मनीष जेल के दर्शन पर विचार करने लगता है। पितृसत्ता ने तो स्त्रियों के लिए भी सजा के तरीके निकाले हैं। जेलें बुरों को समाज से अलगाने के लिए बनीं। लोकतंत्र ने बुरों को भी सुधरने के अवसर की बात की और जेलों को सुधार- गृहों में बदलने की संकल्पना की गयी। फिर भी हमारी जेलें छोटे अपराधियों और अपने को निर्दोष न साबित करने वालों व असहमतों से भरी हैं। जोहान गाल्टुंग के हिसाब से ये संरचनात्मक हिंसा की एक सहायक एजेंसी की तरह काम कर रही हैं।
 
मनीष से लंबी पूछताछ होती है जो उसे अमेरिकी फिल्म दि आवर आफ फरनेस के इंटेरोगेशन दृश्यों की याद दिलाती है। जब एक अफसर उसकी किताबों व अन्य सामग्री से जुड़े ऊल- जुलूल सवाल करता है तो मनीष उसे कहते हैं कि आपको बेहतर होमवर्क करके आना चाहिए था। हमारे इन पुलिस बलों में पेशेवर क्षमता की गंभीर कमी है। इसलिए भी पूछताछ में  वे थर्ड डिग्री तरीकों पर निर्भर रहते हैं। एक महिला कांस्टेबल को मनीष का एक महिला साथी से गले मिलना नागवार गुजरता है। अवसाद में चल रही यह महिला अभी भी अपने पिछड़े मूल्यों की कैद में है। ए टी एस का एक सदस्य मनीष के घर लगे पोस्टरों को दिलचस्पी से निहारता ईरानी मजदूर कवि साबिर हक की कविता के बारे में पूछता है। वहाँ जल्दी ही इसकी संवेदनशीलता भी मुरझा जाने वाली है। जैसा कि मनीष को एक शे" र याद आता है : धूप की शिद्दत कभी महसूस न करता, ये कौन मगर पेड के साये में खडा है।

यह उल्लेखनीय है कि इस समूचे वृत्तान्त में लेखक को अन्य रचनाकारों और फिल्मों के प्रसंग याद आते रहते हैं। लाकअप की दुरावस्था को देखकर उसे जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कृति मुर्दाघर के प्रसंग याद आते हैं। अभी भी इंग्लैंड से बनकर आयी हथकड़ी के हाथों में खनकने पर पुलिस वालों के चौंक उठने पर उसे वरवर राव की कविता पंक्तियाँ याद आती हैं। कोर्ट में पेशी के दौरान वृद्ध कैदियों की बदहाली पर उसे कोयल ब्रदर्स की फिल्म देयर इज नो कंट्री फोर ओल्डमेन स्मरण होती है। पारधी के प्रसंग में जब एक पुलिस अधिकारी सभी विमुक्त जनजातियों को गाली देते हुए कहता है कि इनके तो डीएनए में ही अपराध है तो उसे न्यूंगी वा थांगो की कृति मातीगारी के तर्कों की अनुगूंज सुनायी देती है। डे सीका की फिल्म बाइसिकल थीफ के दृश्यों की प्रतिच्छाया तो वृत्तान्त में कई जगह उल्लिखित है। मुझे लगता है कि लेखक को विकट परिस्थितियों से गुजरते वक्त ये दृश्य- प्रसंग नैतिक और भावात्मक संबल प्रदान कर रहे हैं और इस तरह सृजन की अन्तर्निहित शक्ति का भी प्रकटन हो रहा है।

जेल के कष्टकर और ऊबाऊ जीवन में कुछ मुक्त क्षण भी आते हैं। हालांकि जेल में त्यौहार बिना आहट गुजर जाते हैं, फिर भी लोग वहाँ पूजा करते हैं और नमाज पढते हैं। कैदी के लिए सबसे सुखद क्षण वे होते हैं जब कोई उससे मुलाकात के लिए आता है। लेकिन ऐसे ही समय उनका अवसाद और अधिक बढ जाता है जिनसे कभी कोई मिलने नहीं आता। शानू नंबरदार जैसा मनहूस व्यक्ति भी अपने बच्चे की शरारतों पर खिलखिलाने लगता है। जेल में बच्चों की भागदौड से बने खुशनुमा माहौल से मनीष को खयाल आता है कि आदमी को इंसान बच्चे ही बनाते हैं। अब्बू  एक दिन सवाल करता है कि जेल में दो गेट हैं। हम लोग छोटे गेट से निकलते हैं। जेलर भी उससे निकल सकता है लेकिन उसके लिए बड़ा गेट खोला जाता है। मनीष उसे जबाव देता है, ताकि उसके शक्तिमान होने का अहसास दिलाया सके। अब्बू अपने स्वाभाविक हास्य- बोध से जबाव देता है : नहीं,  मुझे मालूम है बडा गेट एक बार और खुलता है, जब कचरा गाड़ी आती है। तो इस तरह हमारी जेलें दंभ और झूंठे दर्प के कचरे को आज भी ढोती भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी हैं।

मनीष की जेल के आखिरी दिनों में दंगाइयों की आवक शुरू हो गयी और इन्ही के साथ वहाँ जामिया, शाहीन बाग और रोशन बाग की बहनों की कहानियाँ पहुंचने लगीं। ये लोग सीएए- एनआरसी का विरोध करने वाले सामान्य नागरिक थे जिन्हें दंगा फैलाने की धाराओं में जेल भेज दिया गया था। अब्बू का फिर सवाल था कि कुछ लोगों का जेल में रहना जरूरी है क्या? किन्तु उसके मन में उठने वाले इन सवालों के जबाव किसके पास थे। उन लोगों की कहानी सुनते हुए ही एक दिन वह कह उठा कि उसे बड़ा होकर मुसलमान नहीं बनना, क्योंकि वह फिर से जेल आना नहीं चाहता। यह काग्नीटिव पैटर्न में ढलता हुआ अब्बू है। यहीं लेखक अब्बू को अपने से अलग यानी जेल से मुक्त करना चाहता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। आप पढते हुए भी इसे शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। पर सच तो यह है कि अब्बू कभी जेल में था ही नहीं। वह सिर्फ लेखक की कल्पना है, एक स्वाभाविक व जीवंत चरित्र की सृ्ष्टि जिसके सहारे वह तंत्र के इस अमानवीय तिलस्म पर गहरा आघात कर उसे पूरा नहीं तो काफी हद तक नंगा करता है। लेखक पिकासो को उद्धृत करता है, कला वह झूंठ है जो आपको सच तक पहुंचाती है। अब्बू के बहाने लेखक कला- सत्य का यथार्थ अनुभव कराता है अन्यथा तो अब्बू उसका ही विस्तार है। हालांकि उसके लिए कहना मुश्किल है कि उसने कितना अब्बू को गढा और कितना अब्बू ने उसे। सबसे प्रीतिकर तथ्य यह है कि अब्बू अपनी इस काल्पनिक कहानी को पढने के बाद लेखक से कहता है कि क्या हम कादिर की मदद नहीं कर सकते। बता दें कि कादिर इसलिए जेल में बना हुआ था क्योंकि उसे कोई जमानती नहीं मिल रहा था। और यह भी कि अब अब्बू को जेल से डर नहीं लगता 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन

कला- जगत में लगभग बिसरा दी गयी शिल्पकार हिमा कौल पर राजाराम भादू ने पूरी किताब लिखी है जिसमें उनके कलात्मक विकास और वैयक्तिक संघर्ष का संवेदनशील और जीवंत चित्रण किया है। अपराजित: शिल्पकार हिमा कौल शीर्षक यह पुस्तक रजा फैलोशिप के अन्तर्गत लिखी गयी थी। कला- मर्मज्ञ हेमंत शेष ने इस पर बड़ी गहराई से लिखा है। अपराजित शिल्पकार का पुनर्जीवन समीक्षक : हेमंत शेष अपराजित : शिल्पकार हिमा कौल एक नियमित जीवनी से कहीं अधिक है; यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का एक कार्य है। राजाराम भादू ने ऐतिहासिक उपेक्षा की छाया से एक उग्र, संवेदनशील कलात्मक विरासत को सफलतापूर्वक बाहर निकाला है। कला-इतिहासकारों, आलोचकों और आधुनिक भारतीय दृश्य संस्कृति में रुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए, यह पुस्तक एक ऐसी कलाकार का एक प्रभावशाली प्रमाण है, जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को स्थायी मूर्त रूप में बदल दिया। भारतीय कला-इतिहास और आलोचनात्मक साहित्य में, कई परिवर्तनकारी आवाज़ें अक्सर दुखद गुमनामी में चली गई हैं, जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श से बाहर कर दिया गया। दिवंगत मूर्तिकार हिमा कौल ऐसी ही एक गहन, फिर भी कम प्रलेखित उपस्थिति का ...

कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी

स्मृति-शेष हिंदी के विलक्षण कवि, प्रगतिशील विचारों के संवाहक, गहन अध्येता एवं विचारक तारा प्रकाश जोशी का जाना इस भयावह समय में साहित्य एवं समाज में एक गहरी  रिक्तता छोड़ गया है । एक गहरी आत्मीय ऊर्जा से सबका स्वागत करने वाले तारा प्रकाश जोशी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत एवं आधुनिकता दोनों के प्रति सहृदय थे । उनसे जुड़ी स्मृतियाँ एवं यादें साझा कर रहे हैं -हेतु भारद्वाज ,लोकेश कुमार सिंह साहिल , कृष्ण कल्पित एवं ईशमधु तलवार । कवि व्यक्तित्व-तारा प्रकाश जोशी                                           हेतु भारद्वाज   स्व० तारा प्रकाश जोशी के महाप्रयाण का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। मन कुछ अजीब सा हो गया। यही समाचार देने के लिए अजमेर से डॉ हरप्रकाश गौड़ का फोन आया। डॉ बीना शर्मा ने भी बात की- पर दोनों से वार्तालाप अत्यंत संक्षिप्त  रहा। दूसरे दिन डॉ गौड़ का फिर फोन आया तो उन्होंने कहा, कल आपका स्वर बड़ा अटपटा सा लगा। हम लोग समझ गए कि जोशी जी के जाने के समाचार से आप कुछ अस...

दस कहानियाँ-१ : अज्ञेय

दस कहानियाँ १ : अज्ञेय- हीली- बोन् की बत्तखें                                                     राजाराम भादू                      1. अज्ञेय जी ने साहित्य की कई विधाओं में विपुल लेखन किया है। ऐसा भी सुनने में आया कि वे एक से अधिक बार साहित्य के नोवेल के लिए भी नामांकित हुए। वे हिन्दी साहित्य में दशकों तक चर्चा में रहे हालांकि उन्हें लेकर होने वाली ज्यादातर चर्चाएँ गैर- रचनात्मक होती थीं। उनकी मुख्य छवि एक कवि की रही है। उसके बाद उपन्यास और उनके विचार, लेकिन उनकी कहानियाँ पता नहीं कब नेपथ्य में चली गयीं। वर्षों पहले उनकी संपूर्ण कहानियाँ दो खंडों में आयीं थीं। अब तो ये उनकी रचनावली का हिस्सा होंगी। कहना यह है कि इतनी कहानियाँ लिखने के बावजूद उनके कथाकार पक्ष पर बहुत गंभीर विमर्श नहीं मिलता । अज्ञेय की कहानियों में भी ज्यादा बात रोज पर ही होती है जिसे पहले ग्रेंग्रीन के शीर्षक से भी जाना गया है। इसके अला...

जुरहरा की रामलीला

"लोक में राम और जुरहरा की रामलीला " डॉ॰ जीवन सिंह द्वारा लिखित एक अलग तरह की किताब है। इसमें डेढ शताब्दी से भी अधिक समय से जुरहरा में होने वाली रामलीला का विस्तृत दस्तावेजीकरण है। जुरहरा गाँव के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के साथ रामलीला की शैली, अभिनय- प्रक्रिया और लीला- प्रबंधन का ऐतिहासिक विवरण है। इस रामलीला ने वहाँ साधारणता और सामूहिकता की भावना को ऊर्जस्विता प्रदान की है। जुरहरा राजस्थान के भरतपुर जिले का  सीमावर्ती गाँव है जो अब बड़े कस्बे का रूप ले चुका है। ये राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमाओं के मध्य स्थित है। करीबन पांच शताब्दी पूर्व बसे इस गाँव में हिन्दू, जैन और मेव मुस्लिमों की आबादी है। आंचलिक रूप से मेवात और सांस्कृतिक रूप से ब्रज- मेवाती भाषी इस कस्बे के हिन्दुओं में अनेक सवर्ण, पिछड़ी व दलित जातियाँ शामिल हैं। जीवन सिंह लिखते हैं कि आजादी के आन्दोलन के समय सुधारिणी सभा ने गाँव में साक्षरता के साथ वाचनालय- पुस्तकालय स्थापित किये लेकिन आज की तारीख में कस्बे में कोई पुस्तकालय नहीं है। रामलीला जुरहरा का ऐसा सांस्कृतिक अनुष्ठान है जो सभी तरह के लोगों को परस्...

नरक में मोहलत -प्रणव प्रियदर्शी

कहानी प्रणव प्रियदर्शी की एक लंबी कहानी हम पहले मीमांसा में दे चुके हैं जिसे काफी सराहना मिली थी। उनकी यह कहानी प्रिन्ट मीडिया में प्रविष्ट पतनशीलता को उद्घाटित करती है। वैसे तो भारत के समूचे मीडिया का ही चरित्र बदल गया है। लेकिन यह बदलाव एक सच्चे आदमी की नैतिकता में कैसे सेंध लगाता है, यह कहानी इस परिघटना का विचलित कर देने वाला आख्यान है। नरक में मोहलत प्रणव प्रियदर्शी घर से निकलते समय ही अनिता ने कहा था, ‘बात अगर सिर्फ हम दोनों की होती तो चिंता नहीं थी। एक शाम खाकर भी काम चल जाता। लेकिन अब तो यह भी है। इसके लिए तो सोचना ही पड़ेगा।’ उसका इशारा उस बच्ची की ओर था जिसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। वह घुटनों के बल चलते, मुस्कुराते, न समझ में आने लायक कुछ शब्द बोलते उसी की ओर बढ़ी चली आ रही थी। अनिता के स्वर में झलकती चिंता को एक तरफ करके अशोक ने बच्ची को उठा लिया और उसका मुंह चूमते हुए पत्नी अनिता से कहा, ‘बात तुम्हारी सही है। अब इसकी खुशी से ज्यादा बड़ा तो नहीं हो सकता न अपना ईगो। फिक्कर नॉट। इस्तीफा वगैरह कुछ नहीं होगा। जो भी रास्ता निकलेगा, उसे मंजूर कर लूंगा, ऐसा भी क्या है।’ बच...

शिक्षा विमर्श के नए आयाम खोलती 'किताब'

कृति चर्चा  प्राचार्य एवं  प्रशासक रहे डॉ आर.डी सैनी लगभग चालीस वर्षों से साहित्य संसार में सक्रिय हैं । कविता ,उपन्यास एवं कथेतर विधाओं से गुजरते हुए 'किताब' उनकी दसवीं पुस्तक है । 'विचार प्रक्रिया ' और 'संज्ञानात्मक बोध ' का बच्चों में विकास कैसे हो ? इसका व्यावहारिक धरातल पर समाधान यह पुस्तक प्रस्तुत करती है   । डॉ. ममता चतुर्वेदी प्राचार्य है , जो कि लंबे समय से पठन-पाठन के साथ-साथ शिक्षा के व्यापक सरोकारों से जुड़ी रही हैंं । एक शिक्षिका की दृष्टि से डॉ. आर.डी सैनी की 'किताब' की यह समीक्षा , पाठकों को शिक्षा से जुड़े उन मूलभूत प्रश्नों एवं समस्याओं के समाधान समझने में मदद करेगी , जिनका सफलतापूर्वक सामना लेखक ने स्वयं किया है ।  यह पुस्तक समीक्षा 'किताब' के सभी आयामों को दृष्टिपात करते हुए पाठक को किताब की दहलीज तक ले जाती है । एक पुस्तक के रूप में  'कुछ यूं रचती है हमें "किताब", शिक्षा व बाल मनोविज्ञान पर आधारित भाव प्रधान पुस्तक है । इसमें लेखक डॉ आर.डी सैनी ने मानव मूल्य , नैतिकता, कर्तव्य एवं घटनाओं का मार्मिक चित्रण किया है...

डायरी - रामानंद राठी

डायरी डायरी में प्रस्तुत है लेखक रामानंद राठी की डायरी के अंश । रामानंद राठी की चार दशकों में फैली रचना यात्रा पर टिप्पणी की है उनके सृजन के सहयात्री आलोचक मनु शर्मा ने । आलोचक मनु शर्मा की यह टिप्पणी न केवल लेखक रामानंद राठी के सृजन के सरोकारों पर दृष्टि डालती है अपितु उनकी रचना प्रक्रिया की समग्रता में गहराई से विवेचना भी करती है । रामानंद राठी की रचना प्रक्रिया                                                        ■    डॉ. मनु शर्मा रामानंद राठी ने कहानियों के अलावा शब्द चित्र , रिपोर्ताज ,नाटक, जीवन वृत्त, इतिहास और कला संस्कृति पर भी लिखा है । और इन सभी में उनकी रचनात्मकता के अलग-अलग पहलू प्रकट हुए हैं । अधिकतर रचनाओं में उनका पैतृक गांव गूंती महानायक की भांति मौजूद है। ऐसा महानायक जो निरंतर अपनी सीमाओं को लांघ कर विराट रूप में सामने आता है । जैसे 'पिंड में ब्रह्मांड '।  अपनी जड़ों की पहचान के दौरान राठी ने उन संदर्भों की खोज की...

नित्यानंद गायेन की कविताएँँ

कवि -कविता  जन सरोकारों से जुड़े कवि का नाम है नित्यानन्द गायेन                                                      ■  दिनकर कुमार रूस के एक प्रांत दागिस्तान के लोक कवि रसूल हमजातोव कहते हैं कि कभी-कभी मैं अपने से यह प्रश्न करता हूं कि क्या चीज कविता का स्थान ले सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि कविता के अलावा पहाड़ हैं, बर्फ और नदी -नाले हैं, बारिश और सितारे हैं, सूरज और अनाज के खेत हैं…। मगर क्या पहाड़ , बारिश, फूल और सूरज का कविता के बिना और कविता का इनके बिना काम चल सकता है? वे आगे कहते हैं -कविता के बिना पहाड़ पत्थर बन जाएंगे, बारिश परेशान करने वाले पानी और डबरों में बदल जाएगी और सूर्य गर्मी देने वाला अंतरिक्षीय पिंड बनकर रह जाएगा।   कवि नित्यानन्द गायेन की कविताएं काफी दिनों से पढ़ते हुए मैंने महसूस किया है कि वह जन सरोकारों से जुड़े हुए कवि हैं। आम लोगों के हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है। उनकी यही ईमानदारी और बेबाकी उनको य...

कविताएं : सत्यदेव बारहठ

सत्यदेव बारहठ एक छुपे हुए कवि थे। लंबे छुपाव और संकोच के बाद वे इस रूप में प्रकट हुए हैं। उनके कवि का स्वागत करते हुए हम उनकी कविताएँ मीमांसा में प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही, कविताओं पर सत्यनारायण की टिप्पणी है। सत्यदेव बारहठ की कविताएं अपने समय, समाज और स्वयं से रूबरू कविताएं हैं। इन कविताओ ंका फलक तीन साढ़े तीन दशक के बीच फैला हुआ है। हालांकि इस बीच कवि के विचार और स्वभाव में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया बल्कि वह अधिक प्रौढ़़ और ज्यादा निखरकर सामने आया है। इसीलिए ये कविताएं आज भी बराबर विश्वसनीय बनी हुई हैंै। कवि को तब भी यह विश्वास था कि - ’’तार वीणा के बजेंग/ कर्ण स्वर आनंद लेंगे/ मधुर वेला की प्रतीक्षा हेतु/ अब यह जागरण है/ जागरण है/ जागरण है।’’ चार दशक पहले लिखी कविता के ये अंश हैं तो सन् दो हजार में लिखी कविता की पंक्तियां हैं - ’’मनुष्य होने का अर्थ तलाशते/ हमारे हाथ यह सत्य लगा है/ कि हम हारें नहीं/ अपनी पूरी सामथ्र्य से/ मुकाबला करें/ मनुष्य के खिलाफ खड़ी/ ताकतों का/ मनुष्य को/ विवेकहीन, दीन-हीन, कातर/ बना देने वाली ताकतों का।’’ लेकिन दो हजार पांच तक आते आते कवि को लगता है कि - ’’सत...

डांग- एक अभिनव आख्यान

डांग: परिपार्श्व कवि- कथाकार- विचारक हरिराम मीणा के नये उपन्यास को पढते हुए इसका एक परिपार्श्व ध्यान में आता जाता है। डाकुओं के जीवन पर दुनिया भर में आरम्भ से ही किस्से- कहानियाँ रहे हैं। एक जमाने में ये मौखिक सुने- सुनाये जाते रहे होंगे। तदनंतर मुद्रित माध्यमों के आने के बाद ये पत्र- पत्रिकाओं में जगह पाने लगे। इनमें राबिन हुड जैसी दस्यु कथाएं तो क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं। फिल्मों के जादुई संसार में तो डाकुओं को होना ही था। भारत के हिन्दी प्रदेशों में दस्यु कथाओं के प्रचलन का ऐसा ही क्रम रहा है। एक जमाने में फुटपाथ पर बिकने वाले साहित्य में किस्सा तोता मैना और चार दरवेश के साथ सुल्ताना डाकू और डाकू मानसिंह किताबें भी बिका करती थीं। हिन्दी में डाकुओं पर नौटंकी के बाद सैंकड़ों फिल्में बनी हैं जिनमें सुल्ताना डाकू, पुतली बाई और गंगा- जमना जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी रिकॉर्ड सफलता पायी है। जन- सामान्य में डाकुओं के जीवन को लेकर उत्सुकता और रोमांच पर अध्ययन की जरूरत है। एक ओर उनमें डाकुओं के प्रति भय और आतंक का भाव होता है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़े किस्सों के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहत...