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जेल : एक बच्चे की नजर से

जेल : एक बच्चे की नजर से


मनीष आजाद और अमिता शीरीन को उत्तर प्रदेश की एटीएस नक्सली गतिविधियों में लिप्तता के संदेह के चलते भोपाल से गिरफ्तार करके लायी। इन्हें कई महीने पुलिस हिरासत और फिर जेल में गुजारने पडे।  यह अर्बन नक्सल के दुष्प्रचार का दौर था। अपने इन अनुभवों को मनीष ने लिपिबद्ध किया है। दुनिया की अनेक भाषाओं में जेल डायरियों का यशस्वी इतिहास है जिनमें एंटोनियो ग्राम्शी और भगतसिंह की जेल नोटबुक हैं तो दूसरीओर भारतीय जेलों पर मेरी टाइलर और वरवर राव के अनुभव वृत्तान्त हैं। मनीष की जेल डायरी हिन्दी में है। इसकी एक और विशेषता यह है कि इसमें एक छह साल का बच्चा अब्बू भी उनके साथ है। यह उनके एक मित्र का बेटा अबीर है जिससे मनीष को बहुत लगाव है और जो उसे मौसा कहता है। मनीष लिखते हैं कि अब्बू को अपनी जेल- यात्रा में शामिल करने का खयाल उन्हें जर्मन फिल्म लाइफ इज ब्यूटीफुल से आया जिसमें जर्मनी के एक नाजी यातना शिविर में एक पिता अपने पांच साल के बच्चे के साथ है। अपने बच्चे के मासूम मन को नाजी नृशंसता के आघात से बचाने के लिए वह शिविर की सभी कारगुजारियों को बच्चे के सामने एक खेल की तरह बयान करता है। इस वृत्तान्त में भी मनीष अब्बू के सामने पुलिस तंत्र और जेल की तमाम प्रक्रियाओं को करीबन एक प्रहसन की तरह प्रस्तुत करते हैं।

दूसरी ओर एक बच्चे के नजरिये को लेकर, जैसा कि मनीष कहते हैं, राजा को नंगा कहने की हिमाकत एक बच्चा ही कर सकता है ; असल बात यह है कि जब तक उसमें  मासूमियत है तब तक उसके यहां उत्कंठा के लिए भी अवकाश है। अन्यथा बकौल निदा फाजली चार किताबें पढकर तो वे फिर हम जैसे हो ही जाते हैं। यह चार किताबें मुहावरा वास्तव में उस पेरेंन्टिग और शिक्षण के लिए है जो अपने अनुकूलन और मतारोपण के जरिए बच्चे की प्रश्नाकुलता को समाप्त कर देती है। यह महज संयोग नहीं है कि फासीवादी नृशंसता के विरुद्ध सबसे सशक्त आवाज एक बच्ची- अेन फ्रेंक - की रही है। अब्बू के सवाल भी इस तंत्र के महाकाय तिलस्म को मामूली ही सही खंडित तो करते ही हैं। यही क्रिटिकल इंक्वायरी इस रचना को विशिष्ट बना देती है।

शुरूआत एक रात से है, जब अमिता और अब्बू गहरी नींद में सोये मनीष को अरुण कमल की कविता पंक्तियाँ याद दिला रहे हैं- नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है। वह विलियम जेड फोस्टर की किताब की गिरफ्त में आते हैं और सुबह के किसी प्रहर में उससे रिहा होते हैं। वहीं से हमारी गिरफ्त शुरू हो जाती है जो अब्बू और मनीष की रिहाई के बाद ही समाप्त होती है। बल्कि समाप्त भी कहां होती है, वे लोग अभी भी हमारी चेतना में बने रहते हैं जो जेल की चाहरदीवारी में कैद हैं और जिन्हें वहाँ नहीं होना चाहिए। अब्बू का सवाल था कि शतरंज के खेल में राजा के मरने के बाद ही खेल क्यों खत्म हो जाता है। उसी का कहना था कि यह तब तक चलना चाहिए जब तक एक भी सिपाही जिंदा है। अभी तो जेलों में बहुत बेगुनाह भरे हैं। वहाँ गोरख पाण्डेय की एक कविता का जिक्र है : जाल में चिड़िया क्यों फंसी, कि वह भूखी थी। कंवल भारती इसे बदल कर लिखते हैं..., कि वह चिडिया थी। यानी कि वह दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अथवा स्त्री थी। क्या कारण है कि बहुसंख्यक कैदी इन्हीं वर्गों से आते हैं। और इसका एक और भाष्य वहाँ उभरता है, कि वहाँ शिकारी था। मनीष अब्बू को बताता है कि वह इसलिए जेल में है क्योंकि उसकी सरकार से लड़ाई हो गयी है। अब्बू प्रति- प्रश्न करता है कि लड़ाई तो आपकी मौसी (  मनीष की पत्नी) से भी होती है, उसके लिए वे कौन- सी जेल सोचते हैं? और मनीष जेल के दर्शन पर विचार करने लगता है। पितृसत्ता ने तो स्त्रियों के लिए भी सजा के तरीके निकाले हैं। जेलें बुरों को समाज से अलगाने के लिए बनीं। लोकतंत्र ने बुरों को भी सुधरने के अवसर की बात की और जेलों को सुधार- गृहों में बदलने की संकल्पना की गयी। फिर भी हमारी जेलें छोटे अपराधियों और अपने को निर्दोष न साबित करने वालों व असहमतों से भरी हैं। जोहान गाल्टुंग के हिसाब से ये संरचनात्मक हिंसा की एक सहायक एजेंसी की तरह काम कर रही हैं।
 
मनीष से लंबी पूछताछ होती है जो उसे अमेरिकी फिल्म दि आवर आफ फरनेस के इंटेरोगेशन दृश्यों की याद दिलाती है। जब एक अफसर उसकी किताबों व अन्य सामग्री से जुड़े ऊल- जुलूल सवाल करता है तो मनीष उसे कहते हैं कि आपको बेहतर होमवर्क करके आना चाहिए था। हमारे इन पुलिस बलों में पेशेवर क्षमता की गंभीर कमी है। इसलिए भी पूछताछ में  वे थर्ड डिग्री तरीकों पर निर्भर रहते हैं। एक महिला कांस्टेबल को मनीष का एक महिला साथी से गले मिलना नागवार गुजरता है। अवसाद में चल रही यह महिला अभी भी अपने पिछड़े मूल्यों की कैद में है। ए टी एस का एक सदस्य मनीष के घर लगे पोस्टरों को दिलचस्पी से निहारता ईरानी मजदूर कवि साबिर हक की कविता के बारे में पूछता है। वहाँ जल्दी ही इसकी संवेदनशीलता भी मुरझा जाने वाली है। जैसा कि मनीष को एक शे" र याद आता है : धूप की शिद्दत कभी महसूस न करता, ये कौन मगर पेड के साये में खडा है।

यह उल्लेखनीय है कि इस समूचे वृत्तान्त में लेखक को अन्य रचनाकारों और फिल्मों के प्रसंग याद आते रहते हैं। लाकअप की दुरावस्था को देखकर उसे जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कृति मुर्दाघर के प्रसंग याद आते हैं। अभी भी इंग्लैंड से बनकर आयी हथकड़ी के हाथों में खनकने पर पुलिस वालों के चौंक उठने पर उसे वरवर राव की कविता पंक्तियाँ याद आती हैं। कोर्ट में पेशी के दौरान वृद्ध कैदियों की बदहाली पर उसे कोयल ब्रदर्स की फिल्म देयर इज नो कंट्री फोर ओल्डमेन स्मरण होती है। पारधी के प्रसंग में जब एक पुलिस अधिकारी सभी विमुक्त जनजातियों को गाली देते हुए कहता है कि इनके तो डीएनए में ही अपराध है तो उसे न्यूंगी वा थांगो की कृति मातीगारी के तर्कों की अनुगूंज सुनायी देती है। डे सीका की फिल्म बाइसिकल थीफ के दृश्यों की प्रतिच्छाया तो वृत्तान्त में कई जगह उल्लिखित है। मुझे लगता है कि लेखक को विकट परिस्थितियों से गुजरते वक्त ये दृश्य- प्रसंग नैतिक और भावात्मक संबल प्रदान कर रहे हैं और इस तरह सृजन की अन्तर्निहित शक्ति का भी प्रकटन हो रहा है।

जेल के कष्टकर और ऊबाऊ जीवन में कुछ मुक्त क्षण भी आते हैं। हालांकि जेल में त्यौहार बिना आहट गुजर जाते हैं, फिर भी लोग वहाँ पूजा करते हैं और नमाज पढते हैं। कैदी के लिए सबसे सुखद क्षण वे होते हैं जब कोई उससे मुलाकात के लिए आता है। लेकिन ऐसे ही समय उनका अवसाद और अधिक बढ जाता है जिनसे कभी कोई मिलने नहीं आता। शानू नंबरदार जैसा मनहूस व्यक्ति भी अपने बच्चे की शरारतों पर खिलखिलाने लगता है। जेल में बच्चों की भागदौड से बने खुशनुमा माहौल से मनीष को खयाल आता है कि आदमी को इंसान बच्चे ही बनाते हैं। अब्बू  एक दिन सवाल करता है कि जेल में दो गेट हैं। हम लोग छोटे गेट से निकलते हैं। जेलर भी उससे निकल सकता है लेकिन उसके लिए बड़ा गेट खोला जाता है। मनीष उसे जबाव देता है, ताकि उसके शक्तिमान होने का अहसास दिलाया सके। अब्बू अपने स्वाभाविक हास्य- बोध से जबाव देता है : नहीं,  मुझे मालूम है बडा गेट एक बार और खुलता है, जब कचरा गाड़ी आती है। तो इस तरह हमारी जेलें दंभ और झूंठे दर्प के कचरे को आज भी ढोती भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी हैं।

मनीष की जेल के आखिरी दिनों में दंगाइयों की आवक शुरू हो गयी और इन्ही के साथ वहाँ जामिया, शाहीन बाग और रोशन बाग की बहनों की कहानियाँ पहुंचने लगीं। ये लोग सीएए- एनआरसी का विरोध करने वाले सामान्य नागरिक थे जिन्हें दंगा फैलाने की धाराओं में जेल भेज दिया गया था। अब्बू का फिर सवाल था कि कुछ लोगों का जेल में रहना जरूरी है क्या? किन्तु उसके मन में उठने वाले इन सवालों के जबाव किसके पास थे। उन लोगों की कहानी सुनते हुए ही एक दिन वह कह उठा कि उसे बड़ा होकर मुसलमान नहीं बनना, क्योंकि वह फिर से जेल आना नहीं चाहता। यह काग्नीटिव पैटर्न में ढलता हुआ अब्बू है। यहीं लेखक अब्बू को अपने से अलग यानी जेल से मुक्त करना चाहता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। आप पढते हुए भी इसे शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। पर सच तो यह है कि अब्बू कभी जेल में था ही नहीं। वह सिर्फ लेखक की कल्पना है, एक स्वाभाविक व जीवंत चरित्र की सृ्ष्टि जिसके सहारे वह तंत्र के इस अमानवीय तिलस्म पर गहरा आघात कर उसे पूरा नहीं तो काफी हद तक नंगा करता है। लेखक पिकासो को उद्धृत करता है, कला वह झूंठ है जो आपको सच तक पहुंचाती है। अब्बू के बहाने लेखक कला- सत्य का यथार्थ अनुभव कराता है अन्यथा तो अब्बू उसका ही विस्तार है। हालांकि उसके लिए कहना मुश्किल है कि उसने कितना अब्बू को गढा और कितना अब्बू ने उसे। सबसे प्रीतिकर तथ्य यह है कि अब्बू अपनी इस काल्पनिक कहानी को पढने के बाद लेखक से कहता है कि क्या हम कादिर की मदद नहीं कर सकते। बता दें कि कादिर इसलिए जेल में बना हुआ था क्योंकि उसे कोई जमानती नहीं मिल रहा था। और यह भी कि अब अब्बू को जेल से डर नहीं लगता 

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