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वास्तविकता का विद्रूप चेहरा

वास्तविकता का विद्रूप चेहरा

चंदन पाण्डेय का उपन्यास वैधानिक गल्प वास्तविकता के विद्रूप चेहरे को हमारे सामने लाता है जिसका सहजता से सामना करना संभव नहीं है। हिन्दी में अपराध और हिंसा की पृष्ठभूमि पर बहुत कम लेखन हुआ है जबकि समाज में ये प्रवृत्तियाँ बढती जा रही हैं। हिन्दी सिनेमा के लिए अपराध और हिंसा बिकने वाले विषय हैं जिसके साहित्यिक संस्करण सस्ते लोकप्रिय उपन्यासों के रूप में मिलते रहे हैं। वहाँ इस विषय को लोकरंजक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

यदि कोई समाज अपराध और हिंसा से अपना मनोरंजन करने लगे तो यह कतई सुखद संकेत नहीं है। यह रंजकता अपराध और हिंसा के लिए पहले समाज में स्वीकृति की जमीन तैयार करती है। तदनन्तर समाज का वह हिस्सा उन प्रवृत्तियों को लेकर अनुकूलन की स्थिति में आ जाता है। दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है और वैधानिक गल्प इस तथ्य की ताईद करता है।

अर्से पहले अवधेश प्रीत की एक कहानी पढी थी- नृशंस। उसका कथ्य और कहन का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा, बल्कि अभी तक स्मृति में है। फिर वर्षों बाद चंदन पाण्डेय की कहानी पढी- जमीन अपनी तो थी। यह कहानी भी वैसी ही पीछा करने वाली है। पंजाब की हरित क्रान्ति का उतार, तद्जनित कृषि- संकट, युवाओं में नशाखोरी और अपराध की पृष्ठभूमि को यह कहानी लगभग अनकहे कह देती है। उसके बाद मैं ने कई शोध और पत्रकारीय रिपोर्ट पढीं, युवाओं में नशे और अपराध को कृषि- संकट से जोडने का उपक्रम कहीं देखने को नहीं मिला। मतलब कहानी के संदर्भ कहीं ज्यादा वस्तुपरक हैं। वैचारिक गल्प एक छोटा उपन्यास होते हुए भी समाज में हिंसा की व्याप्ति और अपराध के नये रूपों की निर्मम पडताल करता है। अहम बात यह है कि कृति पाठक में हिंसा के प्रति गहरी वितृष्णा ही नहीं जगाती बल्कि अपराधी शक्तियों के सक्रिय प्रतिकार के लिए जरूरी नैतिक धरातल प्रस्तुत करती है।

प्रायः समसामयिक प्रश्नों पर लेखन किया जाता है किन्तु देखा गया है कि उसमें से अधिकांश उथला और अल्पजीवी होता है। बेशक वैधानिक गल्प एक क्राइम थ्रिलर की शैली में लिखा गया है जो पाठक को शुरु से अंत तक बांधे रखता है। लेकिन आरंभ से ही कथानक में एक द्वंद्वात्मक चेतना- प्रवाह है जो हमारे प्रसुप्त नैतिक बोध को जागृत ही नहीं करता, उसे क्रियात्मक परिणति की ओर ले जाता है। इसमें कहीं भी उपदेशात्मक अथवा रूमानी प्रविधियों का सहारा नहीं लिया गया। जीवन में सत्य की अनिवार्य महत्ता और होने की सार्थकता के उत्खनन से एक स्वाभाविक विमर्श रचा गया है जो अपराध- रोमांच के सामान्य साहित्य से इस कृति को अलहदा और उन्नत दर्जा प्रदान करता है। ज्यां पाल सार्त्र के नौसिया का एक पात्र कहता है : मैं समझता हूं कि अपने दफ्तर में बैठकर जो बौद्धिक लड़ाई करता है, वह प्रति- क्रांतिकारी है, चाहे वह कुछ भी लिखे। बौद्धिक का दायित्व केवल बौद्धिक होना ही नहीं बल्कि उस सक्रियता में है जहां पर वह अपनी सेवाओं को दमितों के लिए समर्पित करता है।... वैसे तो सभी किताबे एकांत अथवा शांत क्षणों में टेबल या किसी तख्ती के सहारे ही लिखी जाती हैं, इस उपन्यास की कथाभूमि सुदूर बाहर और परे है और लेखक के दुधुर्ष आत्मसंघर्ष का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

हम किस तरह यथार्थ से विलग होकर अपने कंफर्ट जोन में हैं, इसकी तीव्र प्रतीति नैरेटर के साथ होने लगती है। जैसे- जैसे वास्तविकता की बीहडता और भयावहता से साक्षात्कार होता जाता है, नैरेटर ( जाे एक पात्र भी है, नायक गायब है। उसकी ही तो तलाश है।) की भांति पाठक भी भय और विवेक- जनित चेतना की प्रक्रिया से गुजरता है। चंदन पाण्डेय के पास वर्णन और चिंतन ( रेफ्लेशन के अर्थ में) की समर्थ और सधी भाषा है : खुद मुझे भी नहीं याद आ रहा कि पिछली बार मैं ने कब किसी की ऐसी सहायता की होगी जिसमें मेरा समय लगा हो या ऊर्जा लगी हो। मदद मेरे तईं अब महज चंदे तक सीमित रह गयी थी।... जो लेखक ( नैरेटर भी  उपन्यास में लेखक ही है।) बेमन से किसी की मदद करने जाता है, वह एक हिंस्त्र और बर्बर गिरोह के दुश्चक्र में फंसे होने पर भी अपने को सही पाने लगता है।

उपन्यास के अंत तक पहुंचने पर आपको लग सकता है, ये कैसा अंत ? आपको तो मंझधार में छोड दिया। मुझे लगता है यह सही है और लेखकीय दृष्टि से कृति की संगत निष्पत्ति है। सच क्या है ? आज हम सब मंझधार में हैं, पूरा देश मंझदार में है। धरातल तक उतरती एक- दलीय राजनीतिक केन्द्रीयता और इसके साथ पुलिस- आपराधिक गठजोड़ के समक्ष कोई अकेला सुपरमैन भी खडा नहीं हो सकता। यही तो आज के हालात की वास्तविकता है। हमें अन्यत्र से शक्ति संजोनी होगी और उसकी तलाश व प्रयुक्ति को संकेतित करता यह अंत हमें दूर- (दर्शन) का निष्क्रिय भोक्ता नहीं बने रहने देता।

किसी को उपन्यास फिल्मी लग सकता है अथवा कुछ को इसमें किन्हीं फिल्मों की प्रतिच्छायाएं, धुंधली- सी ही सही, मंडराती दिख सकती हैं। जैसे नैरेटर पात्र को खबर देने वाले से आक्रोश का जमीनी कार्यकर्ता याद आ जाता है। निलंबित पुलिस इंस्पेक्टर आपको अर्धसत्य के नसीरुद्दीन शाह की याद दिला सकता है। नैरेटर की पत्नी का आप आर्टिकल 15 के नायक की पत्नी से साम्य देख सकते हैं। इसी के साथ मुझे यह भी खयाल आया कि जो सार्थक सिनेमा है, उसमें यथार्थ कम से कम हिन्दी के साहित्य की तुलना में अधिक सूक्ष्म और प्रामाणिकता से व्यक्त हुआ है। दूसरे, समान अन्तर्वस्तु में कुछ बिम्बों की सादृश्यता संभव है। अन्यथा वैधानिक गल्प में ऐसा बहुत है जो आसानी से किसी फिल्म में नहीं अनूदित हो सकता, और यही इसकी शक्ति है।

अंग्रेजी के निबंधकार डिक्विंसी ने साहित्य को सिर्फ दो कोटियों में बांटा है। एक तो वह जिसे लिटरेचर आफ नालेज कहते हैं और दूसरी जिसे लिटरेचर आफ पावर कहा जाता है। अधिकांशतः ज्ञान के साहित्य की रचना होती रहती है और वही बाजार में ज्यादा चलता है। शक्ति के साहित्य से ज्यादा लोगों का लेना- देना नहीं है। जाहिर है कि यह उपन्यास शक्ति के साहित्य की कोटि में है जो हमारी अंत:शक्ति का बोध कराता है।

बचाने वाला भगवान होता है, यह उपन्यास के नायक की नाट्य- पटकथा का शीर्षक था। शनै- शनै नैरेटर के सामने इस चालू दिखते शीर्षक के निहितार्थ खुलते हैं। नाटक एक व्यक्ति को तेजाबी घृणा प्रेरित भीड द्वारा हत्या से बचाने वाले एक पुलिस इंस्पेक्टर पर आधारित है जो अब निलंबन भुगत रहा है। और निष्कर्षत: बचाने वाला भगवान हो जाता है। ( उपन्यास उत्तराखण्ड के ऐसे ही साहसी पुलिस अधिकारी गगनदीप सिंह को समर्पित है।) मुझे सैकन्डरी क्लास की अपनी अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक में पढी एक ईसाई संत की कहानी याद आ रही है। ( संत का नाम भूल रहा हूं, कृपया याद दिलायें।) उसका अति- संक्षिप्त सार है कि किसी यूरोपीय देश में पहले मृत्यु- दण्ड पाये कैदियों के द्वंद्व- युद्ध से मनोरंजन किया जाता था। ऐसे दो कैदियों को तलवार देकर एक स्टेडियम के बीच गोल घेरे में लडने के लिए उतार दिया जाता था। जो दूसरे को मार देगा, उसे कैद से मुक्त कर दिया जायेगा। एक दिन स्टेडियम में एक ईसाई पादरी भी आकर दर्शकों में बैठ गये। जब लड़ते हुए कैदी लहूलुहान होने लगे तो पादरी चिल्लाने लगे- इन्हें रोको ! लोग उन पर हंसने लगे। पादरी कूदकर मैदान में उन्हें रोकने गये। एक कैदी ने उनमें तलवार घोंप दी। वे निढाल होकर गिर गये और उनकी मृत्यु हो गयी। लड़ते कैदी ठिठके खडे रह गये। दर्शक एक- एक स्टेडियम से बाहर जाने लगे और वह खाली हो गया। इसके बाद वह खूंनी खेल सदैव के लिए समाप्त हो गया। ईसाई पादरी को इसी के उपरात संत की उपाधि दी गयी थी।


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